मुक्तक
धरती की तो बात क्या फलक तक चिकते हैं यारो
कल गम हो जायेंगे बस्ती में आज दीखते है यारों
कुचलोगे कब तलक यूँ फूलों को पैरों तलेअपने
सियासतों का दौर है अरमान भी बिकते है यारों
बिगाड़ के डर से... (मलिक राजकुमार के उपन्यास 'स्टेशन मास्टर' का आलोचनात्मक मूल्यांकन) भारतीय उपन्यास साहित्य में देश-विभाजन एक ऐसा...
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