मुक्तक
धरती की तो बात क्या फलक तक चिकते हैं यारो
कल गम हो जायेंगे बस्ती में आज दीखते है यारों
कुचलोगे कब तलक यूँ फूलों को पैरों तलेअपने
सियासतों का दौर है अरमान भी बिकते है यारों
प्रियंका ओम की कहानी ‘ विगत की व्याधि’ : एक समीक्षात्मक आलोचना प्रियंका ओम को बहुत पहले से पढता-समझता आ रहा हूँ... और यकीन के साथ कह सक...
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