Saturday, 12 September 2026

प्रेम, देह और नैतिकता का सवाल

 प्रेम, देह और नैतिकता का सवाल

- सन्दीप तोमर 
 

क्या देह के रिश्ते के लिए विवाह संस्था की उपस्थिति अनिवार्य है? यह सवाल जितना सीधा दिखाई देता है, उतना है नहीं। दरअसल, इसके भीतर मनुष्य की देह, इच्छा, प्रेम, अधिकार, स्वतंत्रता और सामाजिक स्वीकृति- इन सबके बीच का पूरा तनाव छिपा हुआ है। विवाह को हमने केवल दो व्यक्तियों के साथ रहने की व्यवस्था नहीं रहने दिया; उसे नैतिकता, परिवार, वंश, संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्त्री-पुरुष के व्यवहार को नियंत्रित करने वाली संस्था में बदल दिया। इसलिए जब कोई व्यक्ति यह पूछता है कि क्या दो सहमत वयस्कों के बीच देह का संबंध विवाह के बिना संभव है, तो प्रश्न केवल देह का नहीं रह जाता। वह सीधे उस सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने वाला लगने लगता है जिसने देह पर अधिकार को विवाह की वैधता से जोड़ दिया है।

हमारे समाज में विवाह के भीतर होने वाला हर यौन संबंध अपने आप सहमति का संबंध मान लिया जाता है। पति-पत्नी हैं, इसलिए दोनों एक-दूसरे के लिए उपलब्ध हैं, यह धारणा इतनी गहरी है कि विवाह के भीतर इच्छा और अनिच्छा के बीच का अंतर अक्सर दिखाई ही नहीं देता। कितने ही विवाहों में देह का मिलन प्रेम या इच्छा से नहीं, बल्कि कर्तव्य, दबाव, आदत या संबंध टूट जाने के भय से होता है। एक साथी पहल करता है और दूसरा चुप रहता है। वह चुप्पी सहमति मान ली जाती है। जबकि चुप रहना और सहमत होना एक बात नहीं है।

यहीं विवाह संस्था की सबसे असहज विडंबना सामने आती है। जिस संस्था को प्रेम, सुरक्षा और साथ का आश्रय होना चाहिए था, उसी संस्था के भीतर कई बार देह अपनी स्वतंत्र इच्छा खो देती है। एक पार्टनर सक्रिय होता है, दूसरा पैसिव। बाहर से संबंध सामान्य दिखाई देता है, भीतर से शायद उसमें बहुत कुछ मर चुका होता है। यदि दो व्यक्तियों के बीच देह का रिश्ता इच्छा, सम्मान और पारस्परिक सहमति पर टिकना चाहिए, तो केवल विवाह का प्रमाणपत्र उस संबंध को सार्थक कैसे बना सकता है?

इस प्रश्न का दूसरा सिरा उतना ही महत्वपूर्ण है- क्या मनुष्य को अपने साथी को चुनने की स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए? प्रेम और देह को हमेशा एक ही व्यक्ति, एक ही समय और एक ही जीवन-संबंध में बाँध देना क्या मनुष्य की स्वाभाविक इच्छाओं को समझना है या उन्हें नियंत्रित करना? संभव है किसी व्यक्ति को एक साथी के साथ भावनात्मक निकटता मिले और दूसरे के साथ कोई दूसरा अनुभव। संभव है किसी संबंध में प्रेम हो लेकिन देह की जरूरतें अलग हों। संभव है दो लोग एक-दूसरे से प्रेम करते हों और फिर भी यह स्वीकार करते हों कि उनका रिश्ता किसी एक व्यक्ति की सम्पूर्ण भावनात्मक और शारीरिक जरूरतों का अंतिम उत्तर नहीं है।

यहाँ सहमति सबसे महत्वपूर्ण शब्द है। विवाह के बाहर संबंध होना अपने आप में न तो स्वतंत्रता का प्रमाण है और न ही विवाह के भीतर होना अपने आप में नैतिकता का। असली प्रश्न यह है कि संबंध में शामिल लोगों की इच्छा क्या है, उनकी सहमति कितनी स्वतंत्र है, और क्या किसी व्यक्ति को धोखे, दबाव या अधिकार के नाम पर संबंध में बाँधा तो नहीं गया है। प्रेम में स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि सामने वाले की भावनाओं की कोई कीमत नहीं; बल्कि इसका अर्थ है कि दोनों व्यक्तियों को अपने बारे में निर्णय लेने का अधिकार हो।

सिमोन द बोउवार और जाँ-पॉल सार्त्र का संबंध इस बहस को समझने के लिए अक्सर उदाहरण की तरह सामने आता है। दोनों ने पारंपरिक दांपत्य की उस धारणा को स्वीकार नहीं किया जिसमें प्रेम का अर्थ एक-दूसरे पर पूर्ण अधिकार हो। उनके संबंध में स्वतंत्रता, बौद्धिक साझेदारी और व्यक्तिगत चुनाव की एक अलग अवधारणा दिखाई देती है। बोउवार के जीवन में सार्त्र के अतिरिक्त भी दूसरे प्रेम-संबंध रहे और सार्त्र इन संबंधों से परिचित थे। वे अपने संबंध को केवल सामाजिक वैवाहिक ढाँचे की शर्तों से नहीं परिभाषित करना चाहते थे। उनके जीवन को आदर्श बनाकर किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना जरूरी नहीं, लेकिन यह उदाहरण इतना जरूर बताता है कि प्रेम और प्रतिबद्धता की कल्पना एक ही ढाँचे में संभव नहीं होती।

दरअसल, प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि बोउवार के कितने प्रेमी थे या सार्त्र ने उसे स्वीकार कैसे किया। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दो स्वतंत्र व्यक्तियों ने अपने संबंध की शर्तें स्वयं तय करने का साहस कैसे किया। समाज की सबसे बड़ी बेचैनी शायद इसी स्वतंत्रता से पैदा होती है। समाज को विवाह इसलिए सुविधाजनक लगता है क्योंकि उसके भीतर रिश्तों की भूमिकाएँ पहले से तय होती हैं, पति कौन, पत्नी कौन, अधिकार किसका, जिम्मेदारी किसकी, बच्चे किसके, परिवार किसका। जैसे ही दो लोग इन तय भूमिकाओं से बाहर अपने संबंध की परिभाषा खुद लिखना शुरू करते हैं, सामाजिक व्यवस्था असहज होने लगती है।

भारतीय समाज में इस असहजता का एक बड़ा कारण यह भी है कि यहाँ देह केवल व्यक्ति की निजी चीज नहीं मानी जाती। परिवार, जाति, धर्म, समुदाय और सामाजिक प्रतिष्ठा तक उसकी निगरानी में शामिल हो जाते हैं। विशेषकर स्त्री की देह को परिवार की इज्जत से जोड़ दिया गया है। पुरुष के अनेक संबंधों को अक्सर अनुभव, मर्दानगी या स्वाभाविकता की भाषा मिल जाती है, जबकि स्त्री की इच्छा को चरित्र के तराजू पर तौला जाता है। यही दोहरा नैतिक पैमाना विवाह संस्था के भीतर और बाहर दोनों जगह दिखाई देता है।

लेकिन विवाह संस्था की आलोचना करते हुए यह भूलना भी ठीक नहीं कि हर विवाह दमन का दूसरा नाम नहीं है। बहुत से लोगों के लिए विवाह प्रेम, दोस्ती, सुरक्षा, साझेदारी और जीवन की कठिनाइयों को मिलकर झेलने का सुंदर माध्यम है। समस्या विवाह में नहीं, उस धारणा में है जिसमें विवाह को मनुष्य के निजी चुनाव से ऊपर रख दिया जाता है। जब विवाह प्रेम का विकल्प बन जाता है, तब वह संस्था है; जब वह प्रेम और स्वतंत्रता की साझी जमीन बनता है, तब वह संबंध भी हो सकता है।

इसी तरह विवाह के बाहर बने हर संबंध को स्वतः मुक्त और प्रगतिशील मान लेना भी उतना ही सरलीकरण होगा। वहाँ भी अधिकार, ईर्ष्या, असुरक्षा, छल और भावनात्मक हिंसा संभव है। इसलिए प्रश्न विवाह बनाम अविवाह का नहीं, बल्कि संबंधों की गुणवत्ता का होना चाहिए। क्या दोनों व्यक्ति स्वतंत्र हैं? क्या दोनों अपनी इच्छा व्यक्त कर सकते हैं? क्या ‘न’ कहने का अधिकार सुरक्षित है? क्या संबंध में पारदर्शिता है? और सबसे महत्वपूर्ण- क्या दोनों को अपनी देह और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का समान अधिकार है?

शायद देह के रिश्तों पर बहस की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए कि देह पर पहला अधिकार व्यक्ति का है। विवाह उस अधिकार को समाप्त नहीं करता और विवाह से बाहर होना उस अधिकार को अपने आप पवित्र भी नहीं बना देता। देह को नैतिकता की सार्वजनिक अदालत में खड़ा करने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसके भीतर इच्छा है या दबाव, सहमति है या भय, प्रेम है या अधिकारबोध।

भारतीय समाज को शायद विवाह को समाप्त करने से अधिक अपनी नैतिकता की भाषा बदलने की जरूरत है। दो सहमत वयस्कों के बीच बने संबंधों को केवल इसलिए अनैतिक कहना कि वे हमारी स्थापित पारिवारिक संरचना में फिट नहीं बैठते, व्यक्ति की स्वतंत्रता को सामाजिक सुविधा के सामने छोटा कर देना है। हर संबंध को स्वीकार करना जरूरी नहीं, लेकिन हर संबंध के लिए एक ही नैतिक पैमाना थोपना भी न्याय नहीं।

आखिर मनुष्य किसी संस्था से पहले एक स्वतंत्र व्यक्ति है। विवाह उसकी जिंदगी का एक चुनाव हो सकता है, उसकी नियति नहीं। प्रेम उसका अनुभव हो सकता है, संपत्ति नहीं। और देह, वह किसी रिश्ते की मुहर नहीं, स्वयं व्यक्ति के अस्तित्व का हिस्सा है। शायद रिश्तों की सबसे मानवीय शुरुआत वहीं से होगी जहाँ हम यह मानना सीखेंगे कि किसी व्यक्ति के साथ होना और किसी व्यक्ति का मालिक होना- दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

 

 

 

Sunday, 6 September 2026

समकालीन हिंदी कहानी, लैंगिक चेतना और 'थर्ड जेंडर' की संवेदना: दो कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन

 समकालीन हिंदी कहानी, लैंगिक चेतना और 'थर्ड जेंडर' की संवेदना: दो कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन

कहानी की विकास यात्रा पर बात की जाए तो कहना होगा कि समकालीन हिंदी कहानी अब पुराने घिसे-पिटे विषयों से कहीं आगे का सफ़र तय कर चुकी है। आज का कहानीकार अपने समय की नब्ज को पकड़कर रचना रच रहा है, लेकिन इसके बावजूद भाषा, शिल्प और वैचारिक स्पष्टता के स्तर पर कई गंभीर समस्याएँ मौजूद हैं। हाल-फिलहाल की कहानियों को पढ़कर लगता है कि कुछ लेखक तो भाषा के स्तर पर खूब मेहनत कर रहे हैं, अत्यधिक क्लिष्ट और सुसंस्कृत भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो भाषा के स्तर पर सोचते ही नहीं कि वे क्या लिख रहे हैं। नरेशन हो या संवाद—उनकी भाषा बहुत लचर होती है। इसके अलावा, अधिकांश कहानीकारों की एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि वे कथा-रस की जगह 'प्रवचन की मुद्रा' में आकर कहानी के मूल रूप को ही भूल बैठते हैं।

नवम्बर 2025 में अंजू शर्मा की कहानी 'राधिका रानी@इंस्ट्राग्राम डॉट कॉम' को पुरवाई कथा सम्मान दिया गया। उत्सुकतावश जब यह कहानी पढ़ी और इसके साथ ही सत्या शर्मा कीर्ति की कथाक्रम पत्रिका में प्रकाशित कहानी 'छुपमछुपाई' सामने आई, तो दोनों पर एक साथ बात करना बेहद जरूरी लगा। दोनों कहानियों की खास बात यह है कि इनके केंद्र में नायक 'थर्ड जेंडर' है, परंतु दोनों रचनाकारों का दृष्टिकोण और वैचारिक धरातल एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न है।

अंजू शर्मा की कहानी 'राधिका रानी@इंस्ट्राग्राम डॉट कॉम' को पढ़कर लगता है कि एक बेहद मजबूत थीम पर बेहद लचर कहानी लिखी गई है। इसमें टर्निंग पॉइंट्स, ड्रामा-टेंशन-रिलीज़ और भावनात्मक ज्वार के बीच जिस जीवंत समन्वय और कसावट की जरूरत थी, वह महसूस नहीं होती। कहानी में दो मुख्य संघर्ष हैं—पहला समाज बनाम राधे, दूसरा राधे का प्रेम बनाम उसकी स्त्रीरूप पहचान। परंतु कहानी में इनका कोई संतुलन नहीं दिखता। कहानी प्रेम वाली लाइन को छूकर छोड़ देती है; वह arc विकसित नहीं हो पाती। राधे की आंतरिक यात्रा भी आधी-अधूरी रह जाती है—उलझन दिखती है, पर कोई ठोस resolution या breakdown सामने नहीं आता।

इस कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि थर्ड जेंडर को समझने के बजाय कहानीकार ने एक स्त्री-वेशधारी पुरुष की त्रासदी को ही थर्ड जेंडर की त्रासदी मान लिया है। राधे का स्त्रैण होना, रासलीला में राधा की भूमिका निभाना, पुरुषों द्वारा उसका यौन उत्पीड़न होना और उसका प्रेम में असफल होना—इनमें से कोई भी बिंदु अपने-आप में उसे 'थर्ड जेंडर' नहीं बनाता। कहानी में उसकी लैंगिक पहचान को लेकर बुनियादी समझ ही स्पष्ट नहीं है। कथ्य भी बेहद लचर और बिखरा हुआ है। रासलीला, चंदा का प्रेम, आर्थिक संकट, लॉकडाउन, सोशल मीडिया की सफलता, यौन हिंसा और अंत में 'राधिका' में उसका विलय—कहानी बहुत सारे संघर्ष एक साथ खड़े तो करती है, लेकिन किसी एक केंद्रीय संघर्ष को गहराई से विकसित नहीं करती। घटनाएँ लगातार जुड़ती जाती हैं, पर उनका नाटकीय कारण-परिणाम संबंध कमजोर है। अंत में 'वही कृष्ण, वही राधिका' वाला निष्कर्ष प्रभाव पैदा करने की कोशिश तो करता है, लेकिन चरित्र की मनोवैज्ञानिक यात्रा से स्वाभाविक रूप से नहीं निकलता।

सबसे गंभीर समस्या यह है कि लेखक राधे के स्त्रीत्व को बार-बार देह, लचक, आवाज, रंग-रूप और 'स्त्रैण गुणों' से परिभाषित करता है। इससे लैंगिक पहचान की आधुनिक और मानवीय समझ के बजाय रूढ़ धारणाएँ मजबूत होती हैं। कहानी में थर्ड जेंडर समुदाय का कोई वास्तविक सामाजिक अनुभव, आत्मबोध, पहचान-संघर्ष या सामुदायिक संदर्भ दिखाई ही नहीं देता। इसलिए यह कहानी थर्ड जेंडर पर कहानी कम और 'स्त्री-वेश में नृत्य करने वाले पुरुष कलाकार की सामाजिक विडंबना' पर कहानी अधिक है। समस्या यह नहीं कि विषय गलत चुना गया है; समस्या यह है कि विषय और पात्र की लैंगिक पहचान के बीच लेखक ने जो संबंध बनाया है, वह वैचारिक रूप से ही कमजोर है।

वहीं दूसरी ओर सत्या शर्मा कीर्ति की कहानी 'छुपमछुपाई' है, जिसके केंद्र में भी नीलेश नाम का एक थर्ड जेंडर पात्र है। इस कहानी के प्रत्येक पक्ष को गहराई से देखा जाए तो यह 'राधिका रानी@इंस्ट्राग्राम डॉट कॉम' की तुलना में कहीं अधिक संघनित, आत्मीय और मानसिक रूप से उद्वेलित करने वाली सिद्ध होती है। सत्या जी ने कथा के हर पक्ष को किसी सतही सामाजिक ड्रामे से नहीं, बल्कि पात्र के गहन आंतरिक द्वंद्व, भय और आत्म-स्वीकार्यता के संवेदनशील धागों से बुना है।

कहानी की शुरुआत म्यूजिक सिस्टम पर थिरकते नीलेश से होती है, जहाँ उसे अपने मरहूम पिता के कमरे में होने का आभास होता है। उसे लगता है कि पिता का थप्पड़ उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर पड़ता है कि वह ऐसा क्यों पैदा हुआ? नीलेश मानसिक द्वंद्व में है, वह छटपटाता है कि कौन है उसके भीतर जो उसे कुरेदता है—मुझे कौन चाहिए, स्त्री या पुरुष? वह अपने इस द्वंद्व को किसी से साझा करना चाहता है, लेकिन उसके पास कोई ऐसा नहीं है जिससे वह अपने मन की बात कह सके। ऐसे में लेखिका यहाँ 'डायरी' को एक माध्यम बनाती हैं, जो कथा-शिल्प के इस पक्ष को और अधिक अंतरंग तथा संवेदनशील बनाता है।

इस कहानी का सबसे विचारणीय और समृद्ध पक्ष इसका दार्शनिक तथा पौराणिक जुड़ाव है। कहानी में सत्या लिखती हैं—"सिर्फ कृष्ण ही पुरुष हैं बाकी सब स्त्री..." यह संवाद नीलेश के विचलित मन को तुष्ट करता है और उसके अस्तित्व को सकारात्मकता की ओर ले जाता है। नीलेश जब नटराज रूपी शिव से स्वयं की तुलना करता है या महाभारत के पात्र 'बृहन्नला' से खुद की तुलना करते हुए कहता है—"हे कृष्ण, ये अज्ञातवास कब तक चलेगा?"—तब कहानी का यह वैचारिक पक्ष केवल एक व्यक्ति की त्रासदी न रहकर सदियों से अपनी पहचान छिपाने को मजबूर एक पूरे समुदाय के शास्कत 'अज्ञातवास' की करुण पुकार बन जाता है।

कहानी का सबसे सबल और व्यावहारिक पक्ष इसका चरमोत्कर्ष है। नीलेश अपने इस अज्ञातवास को निष्क्रिय रहकर सहने के बजाय तोड़ता है। वह किसी झूठी नाटकीयता या सामाजिक दबाव के आगे घुटने टेकने के बजाय चिकित्सीय तकनीक (Medical Transition) का निर्भीक सहारा लेकर हमेशा के लिए स्त्री रूप स्वीकारता है और अपनी पहचान स्थापित करने के लिए पिता के नाम पर ही एक नृत्य अकादमी खोलता है। कथा के इस पक्ष की सबसे खूबसूरत परिणति यहाँ होती है कि जिस पिता के थप्पड़ और अस्वीकृति के साए में वह ताउम्र जीया, अपनी पहचान की जीत को वह उन्हीं को समर्पित कर देता है। यहाँ नायक अपने स्वाभाविक और साहसी रूप में है; सत्या ने उसे किसी भी तरह की कृत्रिम नाटकीयता या बेचारगी के साथ पेश नहीं किया है।

निष्कर्षतः, अंजू शर्मा की कहानी जहाँ विषय और पात्र की लैंगिक पहचान के बीच कमजोर वैचारिक संबंध के कारण सतही बनकर रह जाती है, वहीं सत्या शर्मा कीर्ति की कहानी पात्र के आंतरिक अंतर्द्वंद्व, पौराणिक-सामाजिक चेतना और आत्म-सशक्तीकरण को अत्यंत प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत करती है।


सन्दीप तोमर 

आलोचक 




Wednesday, 15 July 2026

विभाजन से पारिवारिक विघटन तक की जीवनगाथा

 बिगाड़ के डर से...
(मलिक राजकुमार के उपन्यास 'स्टेशन मास्टर' का आलोचनात्मक मूल्यांकन)

भारतीय उपन्यास साहित्य में देश-विभाजन एक ऐसा विषय है, जिसकी त्रासदी समय बीतने के बाद भी समाप्त नहीं होती। 1947 केवल राजनीतिक सीमाओं के पुनर्निर्धारण का वर्ष नहीं था; वह करोड़ों मनुष्यों के जीवन, स्मृतियों और संबंधों के विखंडन का वर्ष भी था। विभाजन पर लिखे गए अधिकांश उपन्यास उस रक्तरंजित इतिहास, सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन की यातना को केंद्र में रखते हैं, किंतु मलिक राजकुमार का उपन्यास 'स्टेशन मास्टर' इस परंपरा से आगे बढ़ता है। यह विभाजन को केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं मानता, बल्कि उसके दूरगामी सामाजिक और पारिवारिक परिणामों का संवेदनशील आख्यान प्रस्तुत करता है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
उपन्यास का प्रारंभ विभाजन की भयावह परिस्थितियों से होता है। लेखक किसी इतिहासकार की तरह घटनाओं का ब्यौरा नहीं देता, बल्कि एक सामान्य परिवार की दृष्टि से उस त्रासदी को जीता है। अपना घर-बार, खेत, स्मृतियाँ और पूर्वजों की धरती छोड़कर भारत की ओर निकल पड़ना केवल स्थान परिवर्तन नहीं था; वह मनुष्य की पहचान, सुरक्षा और आत्मसम्मान के विघटन का क्षण था। लेखक इस यात्रा को अत्यंत मार्मिकता के साथ चित्रित करता है। रास्ते की असुरक्षा, भय, भूख, हिंसा और अनिश्चित भविष्य का जो चित्र उपन्यास में उभरता है, वह पाठक को विभाजन की वास्तविक पीड़ा से जोड़ देता है।
उपन्यास का सबसे मार्मिक पक्ष स्त्रियों की त्रासदी है। विभाजन के दौरान स्त्रियाँ सबसे अधिक हिंसा का शिकार हुईं। उनकी देह को प्रतिशोध का माध्यम बनाया गया, अस्मिता को कुचला गया और परिवारों की असहायता उन्हें जीवनभर का घाव दे गई। लेखक इन प्रसंगों का चित्रण अत्यंत संयम के साथ करता है। वह न तो करुणा का अनावश्यक प्रदर्शन करता है और न ही घटनाओं को सनसनीखेज बनाता है। परिणामस्वरूप इन प्रसंगों की मार्मिकता कहीं अधिक गहरी हो जाती है।
सीमा पार करते समय छोटे-छोटे बच्चों को गोद में उठाए माता-पिता की चिंता, रास्ते में बिछड़ते परिजन, शरणार्थी शिविरों की अमानवीय परिस्थितियाँ और भविष्य के प्रति अनिश्चितता- ये सभी दृश्य उपन्यास को ऐतिहासिक विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। रिफ्यूजी कैंपों का चित्रण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वहाँ केवल भूख और अभाव नहीं है, बल्कि अपने अतीत के खो जाने का स्थायी दुःख भी है। लेखक दिखाता है कि मनुष्य केवल रोटी से नहीं जीता; स्मृतियाँ भी उसके अस्तित्व का अनिवार्य हिस्सा होती हैं।
भारत आने के बाद संघर्ष समाप्त नहीं होता। यहीं से उपन्यास का दूसरा और अधिक महत्त्वपूर्ण चरण आरंभ होता है। भूमि आवंटन, प्रशासनिक जटिलताएँ, रोजगार की तलाश और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का संघर्ष उस पीढ़ी के वास्तविक जीवन का दस्तावेज़ बन जाता है। लेखक ने सरकारी व्यवस्था की विसंगतियों और शरणार्थियों की विवशता को बिना किसी वैचारिक आक्रोश के, केवल जीवन की सच्चाइयों के रूप में प्रस्तुत किया है।
कथानक आगे बढ़ते-बढ़ते धीरे-धीरे पारिवारिक जीवन की ओर मुड़ता है। बच्चों की शिक्षा, बेटियों के विवाह, आर्थिक कठिनाइयाँ और परिवार को संगठित रखने का निरंतर प्रयास कथा का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं। यहीं लेखक का दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है। वह केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं लिख रहा, बल्कि विभाजन के बाद खड़ी हुई पूरी पीढ़ी के संघर्ष का प्रतिनिधि आख्यान रच रहा है।
मुख्य पात्र का स्टेशन मास्टर बनना इस उपन्यास का प्रतीकात्मक मोड़ है। यह केवल नौकरी प्राप्त करने की घटना नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, श्रम और संघर्ष की विजय का बिंदु है। शरणार्थी से सम्मानित सरकारी कर्मचारी बनने की यह यात्रा भारतीय समाज की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने श्रम पर विश्वास बनाए रखा।
लेकिन लेखक की दृष्टि यहीं नहीं रुकती। उपन्यास का वास्तविक संघर्ष इसके बाद शुरू होता है। नायक अपने भाइयों और विस्तृत परिवार के लिए निरंतर त्याग करता है। वह अपने व्यक्तिगत सुखों से अधिक परिवार की उन्नति को महत्त्व देता है। भारतीय संयुक्त परिवार की परंपरा, जिसमें बड़ा भाई पिता के समान उत्तरदायित्व निभाता है, उपन्यास में अत्यंत स्वाभाविक रूप से चित्रित हुई है। किंतु समय के साथ यही संबंध स्वार्थ, आर्थिक लालसा और गलत निर्णयों के कारण टूटने लगते हैं।
यहीं उपन्यास अपनी सबसे गहरी वैचारिक भूमि पर पहुँचता है। लेखक एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकेत देता है- देश का विभाजन एक बार हुआ था, लेकिन परिवारों का विभाजन निरंतर होता रहता है। सीमाएँ केवल नक्शों पर नहीं बनतीं; वे मनुष्यों के भीतर भी खिंच जाती हैं। जिन भाइयों के लिए नायक ने अपना जीवन अर्पित किया, उन्हीं के व्यवहार से परिवार में दरारें पैदा होती हैं। यह दरार केवल संपत्ति की नहीं, विश्वास और संवेदना की भी है। इस प्रकार उपन्यास बाहरी इतिहास से आगे बढ़कर मनुष्य के भीतरी इतिहास की कथा बन जाता है।
चरित्र-चित्रण उपन्यास की उल्लेखनीय उपलब्धि है। नायक किसी आदर्शवादी मिथकीय चरित्र की तरह नहीं, बल्कि अपने गुण-दोषों सहित एक जीवंत मनुष्य के रूप में सामने आता है। उसकी संवेदनशीलता, संघर्षशीलता, पारिवारिक उत्तरदायित्व और अंततः उसकी निराशा पाठक को गहराई से प्रभावित करती है। सहायक पात्र भी केवल कथा को आगे बढ़ाने के लिए नहीं हैं; वे अपने समय और समाज की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
मलिक राजकुमार की भाषा सरल, सहज और आत्मीय है। वे भाषिक चमत्कारों की अपेक्षा अनुभव की सच्चाई पर अधिक भरोसा करते हैं। संवाद स्वाभाविक हैं और वर्णनात्मक अंशों में भी कृत्रिमता नहीं आती। कई स्थानों पर लेखक संस्मरणात्मक शैली का सहारा लेते हैं, जिससे उपन्यास में आत्मीयता बढ़ जाती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो लेखक अपने समय का देखा-भोगा इतिहास पाठक के सामने रख रहा हो।
शिल्प की दृष्टि से उपन्यास रैखिक शैली में आगे बढ़ता है। घटनाओं का क्रम सहज है और पाठक को कथा के साथ चलने में कोई कठिनाई नहीं होती। हालांकि कुछ स्थानों पर विस्तार अपेक्षाकृत अधिक है और संपादन से कथा में और कसाव लाया जा सकता था, फिर भी यह विस्तार कई बार उस पीढ़ी के जीवन-संघर्ष की व्यापकता को समझने में सहायक भी सिद्ध होता है।
उपन्यास का सबसे बड़ा गुण उसका जीवन-सत्य है। लेखक किसी विचारधारा को स्थापित करने का प्रयास नहीं करता, बल्कि जीवन को उसकी समूची जटिलता के साथ स्वीकार करता है। यही कारण है कि पाठक इस कथा को केवल पढ़ता नहीं, बल्कि जीता है। विभाजन, विस्थापन, संघर्ष, सफलता, त्याग, पारिवारिक विघटन और अंततः मानवीय अकेलेपन का जो क्रम उपन्यास में विकसित होता है, वह भारतीय समाज के लगभग एक शताब्दी के इतिहास को समेट लेता है।
यदि हिंदी के विभाजन साहित्य की परंपरा में इस उपन्यास को देखा जाए तो यह उन कृतियों से भिन्न दिखाई देता है जो केवल 1947 की हिंसा तक सीमित रहती हैं। 'स्टेशन मास्टर' विभाजन के बाद के जीवन की कथा है- उस पीढ़ी की कथा जिसने अपना सब कुछ खोकर भी नया संसार बसाया और फिर उसी संसार के भीतर संबंधों को टूटते हुए देखा। इस दृष्टि से यह उपन्यास इतिहास और समाजशास्त्र के बीच पुल का कार्य करता है।
समग्रतः 'स्टेशन मास्टर' केवल एक स्टेशन मास्टर की जीवनी नहीं है। यह उस पीढ़ी का सामूहिक जीवन-वृत्त है जिसने विभाजन की विभीषिका झेली, शरणार्थी शिविरों में जीवन बिताया, परिश्रम से अपना भविष्य बनाया, परिवारों को खड़ा किया और अंततः बदलते सामाजिक मूल्यों के बीच अपने ही घरों में भावनात्मक विस्थापन का अनुभव किया। मलिक राजकुमार ने इस उपन्यास के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियाँ केवल एक पीढ़ी को नहीं, कई पीढ़ियों को प्रभावित करती हैं।
'स्टेशन मास्टर' इसलिए पढ़ा जाना चाहिए कि यह हमें केवल अतीत की याद नहीं दिलाता, बल्कि वर्तमान के टूटते पारिवारिक संबंधों पर भी गंभीर आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। यही किसी सार्थक उपन्यास की सबसे बड़ी सफलता होती है।

क्या हर प्रकाशित लेखक साहित्यकार होता है?


लेखन, अवसाद और आलोचना के बीच फँसा एक प्रश्न



लगभग 2012 के आसपास मेरे परिचय में दो ऐसे लोग आए जिन्होंने लगभग एक साथ साहित्य-सृजन की यात्रा शुरू की। एक सज्जन थे, जो नौकरी से सेवानिवृत्त हो चुके थे। दूसरी एक अधेड़ आयु की महिला थीं, जिन्होंने जीवन की अनेक भूमिकाएँ निभाने के बाद कलम उठाई। दोनों की पृष्ठभूमियाँ अलग थीं, अनुभव अलग थे, लेकिन उनकी साहित्यिक यात्रा में कुछ ऐसी समानताएँ थीं, जिन्होंने मुझे वर्षों तक सोचने पर विवश किया।
दोनों ने अपनी पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं के खर्च पर शुरू किया। अंतर केवल इतना था कि पुरुष (लेखक) प्रकाशक के माध्यम से पुस्तकें प्रकाशित कराते थे, जबकि महिला (लेखिका) वस्तुतः पुस्तकें प्रकाशित नहीं, मुद्रित कराती थीं। वितरण से लेकर प्रचार और बिक्री तक का पूरा दायित्व स्वयं संभालती थीं। प्रचार-प्रसार में उनकी दक्षता ऐसी थी कि वे अपनी अधिकांश पुस्तकें स्वयं ही पाठकों तक पहुँचा देती थीं। आज के दौर में इसे 'पर्सनल ब्रांडिंग' कहा जाएगा।
इन दोनों के बीच एक और विचित्र समानता थी। दोनों एक-दूसरे को अपना गुरु कहते थे। कोई किसी का शिष्य नहीं था, पर दोनों एक-दूसरे के गुरु थे। उम्र का अंतर भी इस रिश्ते के बीच कभी बाधा नहीं बना। यह संबंध ज्ञान से अधिक परस्पर सम्मान, प्रोत्साहन और शायद आत्मविश्वास का स्रोत था।
लेकिन मेरी सोच की दिशा एक अलग घटना ने बदल दी।
एक दिन एक प्रकाशक मित्र से बातचीत हो रही थी। चर्चा इन्हीं लेखक महोदय की पुस्तकों पर चली। मैंने सहज ही पूछ लिया—"आप उनकी किताबें आखिर क्यों छापते हैं? क्या केवल प्रकाशित पुस्तकों की संख्या बढ़ाने के लिए? क्योंकि सच कहूँ तो उनके कुछ उपन्यास मैंने भी पढ़े हैं और उनमें साहित्यिक दृष्टि से ऐसा कुछ नहीं मिला जो विशेष रूप से उल्लेखनीय कहा जा सके।"
प्रकाशक का उत्तर अप्रत्याशित था।
उन्होंने कहा—
"अगर मैं उनकी किताबें न छापूँ, तो वे अवसाद में चले जाएँगे।"
उस एक वाक्य ने मेरी पूरी सोच बदल दी।
मैं पहली बार इस संभावना पर गंभीरता से विचार करने लगा कि क्या कभी-कभी लिखना साहित्य से अधिक मनुष्य के मानसिक अस्तित्व का सहारा बन जाता है? क्या पुस्तक का प्रकाशित होना किसी लेखक के लिए साहित्यिक उपलब्धि से पहले मनोवैज्ञानिक आवश्यकता भी हो सकता है?
हम अक्सर यह मानकर चलते हैं कि हर लेखक साहित्य के लिए लिखता है। लेकिन शायद यह पूरी सच्चाई नहीं है। कुछ लोग इसलिए लिखते हैं क्योंकि लिखना उन्हें जीवित रखता है। उनके लिए लेखन आत्म-अभिव्यक्ति नहीं, आत्म-रक्षा है। पुस्तक उनके लिए आलोचकों से संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की पुष्टि है।
यहीं से दूसरा प्रश्न जन्म लेता है।
यदि कोई व्यक्ति लिखने के सहारे अपने मानसिक संतुलन को बनाए हुए है, तो क्या उसके लेखन का मूल्यांकन भी उसी कठोरता से किया जाना चाहिए, जिससे हम किसी स्थापित साहित्यकार की रचनाओं का करते हैं?
साहित्य का उत्तर शायद "हाँ" होगा।
मानवता का उत्तर शायद "नहीं"।
यहीं आलोचना की नैतिकता का प्रश्न खड़ा होता है।
हमारे भीतर बैठा विशुद्ध आलोचक केवल रचना को देखता है। उसे भाषा, शिल्प, कथ्य, संरचना और मौलिकता से मतलब होता है। लेकिन सामने बैठा मनुष्य केवल रचनाकार नहीं होता; वह अपनी असफलताओं, अकेलेपन, उपेक्षाओं और मानसिक संघर्षों का भी बोझ उठाए होता है। ऐसे में एक निर्मम टिप्पणी केवल रचना को नहीं, व्यक्ति को भी घायल कर सकती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि खराब रचना को उत्कृष्ट घोषित कर दिया जाए। साहित्य की ईमानदारी भी उतनी ही आवश्यक है। लेकिन आलोचना और अपमान में बहुत महीन अंतर होता है। एक आलोचक यदि इस अंतर को नहीं समझता, तो उसकी विद्वत्ता भी हिंसा का रूप ले सकती है।
दूसरी ओर, अंधी प्रशंसा भी कम खतरनाक नहीं है।
आज साहित्य में ऐसे अनेक छोटे-छोटे समूह दिखाई देते हैं जहाँ लोग एक-दूसरे की हर पुस्तक की भूमिका लिखते हैं, हर संग्रह पर प्रशस्ति-पत्र देते हैं, हर विमोचन में एक-दूसरे के लिए विशेषणों की वर्षा करते हैं। वहाँ आलोचना का स्थान परस्पर प्रशंसा ने ले लिया है। परिणाम यह होता है कि लेखक का आत्मविश्वास तो बढ़ता है, लेकिन लेखन का विकास रुक जाता है।
शायद इसलिए मेरे परिचित उन दोनों लेखकों का एक-दूसरे को गुरु कहना मुझे आज भी एक प्रतीक-सा लगता है। वहाँ गुरु-शिष्य परंपरा नहीं थी; वहाँ पारस्परिक पुष्टि थी—"तुम मुझे अच्छा लेखक कहो, मैं तुम्हें अच्छा लेखक कहूँगा।"
यह स्थिति केवल दो व्यक्तियों की नहीं है; हमारे समय के साहित्य की भी है।
आज तकनीक ने प्रकाशन को लोकतांत्रिक बना दिया है। कोई भी अपनी पुस्तक छपवा सकता है। यह अच्छी बात है। लेकिन पुस्तक का प्रकाशित हो जाना और साहित्य का स्थायी हिस्सा बन जाना—इन दोनों के बीच बहुत लंबी दूरी है। मुद्रण और प्रकाशन में वही अंतर है जो बोलने और सुने जाने में होता है।
इस पूरी घटना ने मुझे एक निष्कर्ष तक पहुँचाया।
शायद हमें लेखन के दो पृथक मूल्य स्वीकार करने होंगे।
पहला—मनोवैज्ञानिक मूल्य।
लेखन किसी व्यक्ति को टूटने से बचा सकता है। उसे जीने का कारण दे सकता है। उसके अकेलेपन का साथी बन सकता है।
दूसरा—साहित्यिक मूल्य।
जो यह तय करेगा कि वह रचना समय की कसौटी पर कितनी टिकती है, पाठकों को कितना नया अनुभव देती है और साहित्य में कितना योगदान करती है।
ये दोनों मूल्य हमेशा एक-दूसरे के समान नहीं होते।
संभव है कोई पुस्तक अपने लेखक का जीवन बचा ले, लेकिन साहित्य को कुछ नया न दे।
और यह भी संभव है कि कोई महान रचना अपने लेखक को भीतर तक तोड़कर लिखी गई हो।
शायद इसलिए लेखक के प्रति करुणा और रचना के प्रति ईमानदारी—दोनों साथ-साथ चलनी चाहिए। संवेदना यदि साहित्य की पहली शर्त है, तो सत्य उसकी अंतिम शर्त है। इन दोनों में से किसी एक को भी छोड़ देने पर न साहित्य बचता है और न मनुष्य।

Friday, 5 June 2026

बिगाड़ के डर से- प्रियंका ओम की कहानी ‘विगत की व्याधि’ : एक समीक्षात्मक आलोचना

प्रियंका ओम की कहानीविगत की व्याधि’ : एक समीक्षात्मक आलोचना

प्रियंका ओम को बहुत पहले से पढता-समझता आ रहा हूँ... और यकीन के साथ कह सकता हूँ कि वे बहुत समय लेकर, बहुत ठहरकर लिखती हैं, उनके लेखन में संख्या बढ़ाने को लेकर लिखना कभी मुझे नहीं दिखा। जब तक वे कहानी को पूरी तरह से मथ नहीं लेती, वे कलम आगे नहीं बढाती। हाल ही में उनकी कहानी विगत की व्याधि हंस के जून अंक में आई है, उनके उपन्यास साज-बाज को पढ़ते हुए जिन चीजों पर मैं अटका था, इस कहानी को पढ़ते हुए लगा कि उन्होंने लेखन के वे तमाम बेरियर हटा दिए हैं, जहाँ आलोचक अटके।

प्रियंका ओम की कहानी विगत की व्याधि’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में वृद्धावस्था, दाम्पत्य संबंधों, मानसिक स्वास्थ्य और स्मृतियों के दीर्घकालिक प्रभावों को केंद्र में रखकर लिखी गई एक महत्त्वपूर्ण कहानी है। यह कहानी केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की भी पड़ताल करती है जो मानसिक रोगों को समझने के बजाय उन्हें चरित्र-दोष, सनक या पारिवारिक कलह मानकर टाल देती है। कहानी का मूल कथ्य यह है कि अतीत के अनसुलझे घाव व्यक्ति के वर्तमान को किस प्रकार विषाक्त कर देते हैं और अंततः पूरा परिवार उनकी चपेट में आ जाता है।

कहानी का केंद्र वृद्ध दम्पती- निर्मल बाबू और कुंती देवी हैं। बाहरी स्तर पर यह एक सामान्य घरेलू विवाद की कथा प्रतीत होती है, जहाँ पत्नी पति पर निराधार आरोप लगाती रहती है और पति स्वयं को एक प्रकार की कैद में अनुभव करता है। किंतु जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, पाठक समझता है कि समस्या केवल वैवाहिक असहमति नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक व्याधि है। बेटी पल्लवी के माध्यम से यह तथ्य सामने आता है कि कुंती देवी सिज़ोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं और वास्तविकता तथा भ्रम के बीच भेद नहीं कर पा रही हैं।

कहानी की सबसे बड़ी शक्ति इसका मनोवैज्ञानिक यथार्थ है। लेखिका ने मानसिक रोग को किसी सनसनीखेज घटना की तरह प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसके सूक्ष्म और दैनिक प्रभावों को उकेरा है। कुंती देवी का सब्जियाँ गिनना, चोरी के भ्रम पालना, पड़ोसियों और पति के संबंधों को लेकर काल्पनिक कथाएँ गढ़ना, फोन पर निगरानी रखना, ये सभी व्यवहार रोग की अभिव्यक्तियाँ हैं, जिन्हें परिवार लंबे समय तक केवल ‘सनक’ मानता रहता है। इस प्रकार कहानी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज की अज्ञानता को भी उजागर करती है।

कहानी का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष दाम्पत्य संबंधों की जटिलता है। लेखिका दाम्पत्य को किसी आदर्शवादी दृष्टि से नहीं देखतीं। यह बात मुझे उपन्यास साज-बाज पढ़ते हुए भी प्रतीत हुई थी। निर्मल बाबू और कुंती देवी के वैवाहिक जीवन में प्रेम, उपेक्षा, असमानता, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत कुंठाएँ एक साथ उपस्थित हैं। फ्लैशबैक के माध्यम से स्पष्ट होता है कि निर्मल बाबू ने पत्नी को कभी मन से स्वीकार नहीं किया था और कुंती देवी ने जीवन भर भावनात्मक असुरक्षा का बोझ ढोया। यही दबा हुआ अतीत बाद में मानसिक विकृति के रूप में उभरता है। इस प्रकार कहानी मानसिक बीमारी को केवल जैविक या चिकित्सकीय समस्या न मानकर सामाजिक और भावनात्मक संदर्भों से भी जोड़ती है।

कहानी का शीर्षक विगत की व्याधि’ अत्यंत सार्थक है। यहाँ ‘विगत’ केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि स्मृतियों, अपमानों, अस्वीकृतियों और अधूरे प्रेम का प्रतीक है। कुंती देवी वर्तमान में नहीं, बल्कि अतीत की छायाओं में जी रही हैं। उनके भ्रमों का स्रोत भी वही अतीत है जिसने उन्हें कभी संतुष्टि और आत्मविश्वास नहीं दिया। इस दृष्टि से शीर्षक कथा के केंद्रीय भाव को सटीक रूप से व्यक्त करता है।

शिल्प की दृष्टि से भी कहानी उल्लेखनीय है। वर्तमान और अतीत के बीच लगातार आवागमन कथा को मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान करता है। बालकनी का बिंब विशेष रूप से प्रभावशाली है। आरंभ में जो बालकनी खुलापन, संवाद और दाम्पत्य निकटता का प्रतीक थी, वही बाद में बंदीगृह और संदेह का प्रतीक बन जाती है। यह रूपक कहानी के भाव-संरचना को मजबूत बनाता है।

भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादप्रधान है। लेखिका ने अनावश्यक बौद्धिकता से बचते हुए पात्रों की सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया है। विशेष रूप से कुंती देवी और पल्लवी के संवाद अत्यंत स्वाभाविक प्रतीत होते हैं। भाषा में संवेदना है, किंतु भावुकता नहीं; यही इसकी साहित्यिक शक्ति है।

फिर भी कहानी कुछ सीमाएँ भी रखती है। कई स्थानों पर मानसिक रोग संबंधी व्याख्या अत्यधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। पल्लवी द्वारा सिज़ोफ्रेनिया की विस्तार से की गई व्याख्या कथा के स्वाभाविक प्रवाह को कुछ हद तक बाधित करती है। यदि रोग के संकेतों को और अधिक कलात्मक ढंग से पाठक पर छोड़ दिया जाता, तो कथा का प्रभाव और गहरा हो सकता था। इसी प्रकार कुछ प्रसंग अपेक्षाकृत लंबे हैं, जिनसे कथा की गति थोड़ी धीमी पड़ती है।

समग्रतः विगत की व्याधि’ एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से परिपक्व कहानी है। यह कहानी वृद्धावस्था, मानसिक स्वास्थ्य और दाम्पत्य जीवन की उन परतों को उद्घाटित करती है जिन पर हिंदी कथा-साहित्य में अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है। प्रियंका ओम ने यह स्थापित किया है कि कई बार व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु वर्तमान नहीं, बल्कि उसका अनसुलझा अतीत होता है। यही अतीत जब व्याधि बनकर लौटता है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरा परिवार उसकी कीमत चुकाता है।

निष्कर्षतः विगत की व्याधि’ मानसिक स्वास्थ्य विमर्श और पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं को समझने वाली एक प्रभावशाली कहानी है, जो पाठक को केवल भावुक नहीं करती, बल्कि सोचने के लिए भी विवश करती है।

हिन्दी कथा साहित्य को एक बढ़िया, प्रभावशाली रचना देने के लिए प्रियंका ओम को बधाई...


सन्दीप तोमर 

Monday, 1 June 2026

रेखाचित्र- टेपरिकॉर्डर

टेपरिकॉर्डर


 

अलमारी के एक पुराने खाने में रखा था- बीपीएल सानियों कंपनी का मेरा टेपरिकॉर्डर। धूल में लिपटा, खामोश, लेकिन भीतर कहीं अब भी कुछ बोलता हुआ। यह वही टेपरिकॉर्डर था जो मैंने स्कूल के दिनों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर इकट्ठे किये पैसो से खरीदा था। मेरा स्कूल का दोस्त था विपिन, उसके पिताजी को नयी नयी चीजों का शौंक था, और मेरे घर में ये सब पढाई खराब करने का यंत्र। पिताजी से किसी भी मनोरंजन के साधन की उम्मीद करना ही बेकार था। विपिन ने जब कहा कि उस टेपरिकॉर्डर बेचना है तो उसी से यह ख़रीदा गया था। दिन भर की पढ़ाई, फिर शाम को पास-पड़ोस के बच्चों को जोड़-घटाव सिखाना, और महीने के अंत में मिलती थी ट्यूशन फीस, एक बच्चे से साठ रूपये, पड़ोस के चार बच्चे नवी कक्षा का गणित पढने मेरे पास आते थे। १९९२ में दो सौ चालीस रूपये महीने की ट्यूशन फीस भी मन को बड़ा सुकून देती थी। उसी फीस से इकट्ठे हुए पैसों से पहले एक दिवार घडी खरीदी फिर उसी इकट्ठी हुई फीस से साढ़े तीन सौ रूपये विपिन को देकर यह टेपरिकार्डर ले लिया। ये वो समय था जब थोड़े-थोड़े पैसे जमा हो जाते तो मन में एक अजीब-सी गर्मी भर जाती थी।

टेपरिकॉर्डर लेना कोई अनायास हुई घटना नहीं थी। मुझे कैमरा, टेपरिकार्डर, घडी का शौक था। एक सपना था कि ये सब चीजें मेरी निजी हों, मेरी जिन्दगी का हिस्सा हों, क्योंकि पिताजी की सीमित आय से पढाई के लिए तो पैसे मांगे जा सकते थे लेकिन अपने निजी शौक पूरे करने के लिए उनसे पैसे लेने का सवाल ही नहीं होता था। मुझे उस समय नए सिक्के इकट्ठे करने का भी शौक था, मेरे कई शौक थे जो धीरे-धीरे कागज़ के लिफ़ाफों में, छोटे सिक्कों और मुड़े-तुड़े नोटों में आकार ले रहे थे।

उस दिन जब पहली बार उसे घर लाया, तो कमरे की दीवारें जैसे थोड़ी और पास आ गई थीं। एक सिहरन-सी महसूस हुई, जैसे कोई पुराना सपना नए रूप में लौट आया हो। वो एक ठोस-सा, भारी-भरकम टू इन वन था, भले वह पुराना था लेकिन उसमें जो जादू भरा था, वो किसी यादों के संदूक जैसा था।

काले-भूरे प्लास्टिक में जड़ा हुआ शरीर, आगे की ओर सिल्वर पट्टी में चमकते बटन, कैसेट स्लॉट के ठीक ऊपर कतार में सजे हुए बटन; प्ले, पॉज़, रिवाइंड, फॉरवर्ड, स्टॉप और इजेक्ट। रिकॉर्डिंग के लिए तो स्टॉप और प्ले को एक साथ दबाना पड़ता था, और उस हल्की-सी "क्लिक" की आवाज़ से जैसे दिल भी धड़क उठता था। वॉल्यूम डायल घुमाते हुए एक खड़खड़ाहट सी आती थी, मानो साउंड का ही नहीं, वक्त का भी स्तर बदल रहा हो। उसमें रेडियो भी था, और एफएम भी, मतलब यह वो ज़माना था जब टू इन वन की जगह ‘थ्री इन वन’ जैसी अनोखी चीज़ें आने लगी थीं। डायल घुमाकर स्टेशन पकड़ते वक्त उस सूं-सूं और खर्र-खर्र के बीच जब कोई साफ आवाज़ मिलती तो लगता जैसे कोई सुदूर जगह से जुड़ गए हों। आकाशवाणी की मद्धम सी उद्घोषणा, फिर किसी पुराने ग़ज़ल की शुरुआती तान। लगता मानों कमरा एकाएक किसी और समय, किसी और संसार में तब्दील हो गया हैऔर कैसेट? हर कैसेट के साथ एक नयी कहानी जुड़ी होती थी। कभी कोई नया कैसेट मार्किट से आया, कभी किसी दोस्त ने तोहफे में दिया। कुछ कैसेटों के साथ प्लेन काग़ज लगा होता जिस पर हाथ से नाम लिखा करता: "लता मंगेशकर– रोमांटिक कलेक्शन" या "किशोर कुमार– सैड सॉन्ग्स", और कुछ पर तो बस एक फटे-से स्टिकर के नीचे छिपे होते थे कुछ किस्से। ‘शोले’ और ‘कालिया’ फिल्म के डायलोग की कैसेट्स लाया तो उनका हर डायलोग जुबान पर चढ़ गया। छेनू आया था डायलोग भी खूब बोला जाने लगा, एक और डायलोग याद आता है उन्हीं दिनों का याद किया हुआ- “एक म्यान में दो तलवारे होने का मतलब है, एक का टूट जाना विक्की... और विक्की फौलाद से बनी वो तलवारें है छेनू जिसने सिर्फ काटना सीखा है..” “कौन बोल रहे हो... तुम्हारा बाप कालिया... जिसे तुमने खुद पैदा किया है...।”, यह डायलोग भी खूब जुबान पर रहा।

उस दिन जब पहली बार उसे घर लाया गया, तो सिर्फ एक संगीत यंत्र नहीं आया था, मानो घर में एक नया किरायेदार आया था, जो बोलता नहीं था, लेकिन सुनाता बहुत कुछ था। कमरे की दीवारें सच में पास आ गई थीं, शायद इसलिए कि अब उनमें गूंजने को बहुत कुछ था।

सच पूछो तो वह टेपरिकॉर्डर मेरे लिए केवल संगीत का साधन नहीं था, वह मेरी मेहनत का दूसरा प्रतिफल था, पहले प्रतिफल के रूप में मैंने एक दीवार घड़ी खरीदी थी, जिसके लिए दो बच्चों की ट्यूशन फीस खर्च की गयी थी।

पढ़ाई के समय अक्सर वह मेरे पास ही रहता। अब हर ट्यूशन फीस से एक-दो नयी कैसेट खरीदी जाती, या फिर ब्लेंक खरीदकर अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड करवाकर लता, १९९२ में एक साइड की कैसेट रिकॉर्ड करवाने के पाँच रुपये और दोनों साइड के दस रुपये देने होते। धीरे-धीरे पसंद के गानों की कैसेट का भी कलेक्शन होता गया। गणित के सवाल हल करते हुए मैं उसे चला देता, और कोई पुराना, जाना-पहचाना गाना मेरी उँगलियों की गति के साथ बहता रहता। एक कैसेट में तो मैंने अपना प्रिय गाना दोनों साइड में रिकॉर्ड करा लिया थ- ताकि बार-बार रिवाइंड न करना पड़े। मुझे गाने सुनते हुए गणित के सवाल हल करने की आदत सी होने लगी, लेकिन इतना जरुर रहा कि आवाज़ इतनी धीमी होती कि कमरे के बाहर कोई खड़ा हो तो उसके कानों तक गाने के बोल न पहुँच पाए, रात को सोने से पहले कमरे में लाल रंग का प्रकाश, यानी नाईट बल्ब ऑन करके गाने सुनना और उसी संगीत के साथ नींद लेना, ये मानो नियत कर्म बन गया, ऐसे ही पंसदीदा संगीत सुन दिन भी कट जाता।

समय बीतता गया, और मशीनें, जैसे जीवन, पुरानी होने लगीं। कभी टेप अटक जाती, कभी आवाज़ फुसफुसाने लगती। वैसे भी यह पहले ही पुराना माल था तो समय के साथ खराबी आना स्वाभाविक था, शुरू में कुछ बार दुकान ले गया, खतौली में ही एक लड़का था बिल्लू, वह रेडियो, टेपरिकार्डर और टीवी ठीक करता था, लेकिन हर बार ठीक कराने के नाम पर पैसे खर्च होते। जब बिल्लू उसे ठीक करता तो मैं ये देखता कि कौन से पार्ट्स अमूमन ख़राब होते हैं, किस तरीके से वह पार्ट्स बाहर निकालता है, कैसे उनको लगाता है यह सब अवलोकन मैं किया करता, फिर एक दिन, एक छोटी-सी सोल्डरिंग आयरन खरीद लाया। तय कर लिया किअब इसे खुद ही ठीक करूँगा। धीरे-धीरे वायरिंग समझ आने लगी, टेप हेड की सफाई, सर्किट की मरम्मत, स्पीकर की लाइन, सब कुछ सीखा, अपनी कोशिशों से। अब वह टेपरिकॉर्डर सिर्फ एक यंत्र नहीं रहा था, वह मेरी प्रयोगशाला बन गया था और मैं उसका एक इंजिनियर। वह अनुभव एक सृजन जैसा था जिसमें तकनीक, धैर्य और आत्मीय लगाव तीनों शामिल थे।

अलग-अलग जगह रहकर पढाई करते हुए, वह मेरे गाँव वाले कमरे को शोभायमान करता रहा, जब कभी छुट्टी में गाँव जाता उससे रूबरू होता, वह मेरा अकेलेपन का भी साथी बन चुका था, किसी बेहतरीन प्रेयसी की भांति वह भी यादों का हिस्सा बनता। उससे मिलकर वही ख़ुशी होती जो माशूका से मिलकर होती हो, वही अनुभूति। पढाई करने तक वह गाँव रहा लेकिन जैसे ही प्रथम नियुक्ति का वक़्त आया और होस्टल छोड़ कमरा किराए पर लेना पड़ा, वह टेपरिकार्डर भी अन्य जरूरी सामान का हिस्सा बन गया। कर्मपुरा से महेन्द्रा पार्क तक के सफ़र में वह भी साथ-साथ हमसफ़र रहा। फिर जब रहने में स्थायित्व आया, उसे भी स्थायी आवास मिल गया। हमेशा ही टीवी से ज्यादा प्रिय रहा, रात को सोने से पहले उसकी ड्यूटी थी, एफएम पर नीलेश का कार्यक्रम ‘ब्रोकन हार्ट’ सुनाना।

वह मेरे हर दुःख-सुख का साथी बना गया था। आज जब उसे देखता हूँ, तो लगता है जैसे वह केवल गाने नहीं बजाता था, वह मेरी किशोरावस्था का संगीत था, मेरे भीतर के आत्मविश्वास का, आत्मनिर्भरता का, और उस छोटे-से लड़के का, जिसे अपनी कमाई से खरीदी चीज़ सबसे प्रिय लगती थी।

फिर एक दिन पता चला कि उसे मेरे पीछे से एक कबाड़ी के सुपुर्द कर दिया गया, और साथ में वो सब कसेट्स भी, जो मैंने बड़े जतन से एक-एक कर सहेजी थी। उस दिन मैं भी ब्रोकन हार्ट हो गया था, एक ऐसा टूटा हुआ इंसान जिसकी कहानी सुनाने एफएम पर कोई नीलेश नहीं आएगा।

आज उस टेपरिकॉर्डर का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है, उसका कोई अवशेष भी नहीं रखा है, यदि वह होता भी तो शायद चालू नहीं होता, शायद टूट चुका होता, लेकिन मेरे पास सहेजा हुआ होता तो एक तसल्ली होती कि मेरे जीवन के शुरूआती दिनों की एक यादगार वस्तु मेरे पास है, अब वह मात्र मेरी स्मृतियों में बिल्कुल वैसा ही है जैसा पहली बार था: थोड़ा भारी, कुछ खड़खड़ाता हुआ, लेकिन पूरी तरह मेरा। यह सब लिखते हुए मानों उन्ही दिनों में पहुँच गया हूँ, और एक संगीत की धुन मेरे कानों में बज रही है- “चलते-चलते ये मेरे गीत याद रखना... कभी अलविदा न कहना...।”




सन्दीप तोमर 

प्रेम, देह और नैतिकता का सवाल

  प्रेम , देह और नैतिकता का सवाल - सन्दीप तोमर    क्या देह के रिश्ते के लिए विवाह संस्था की उपस्थिति अनिवार्य है ? यह सवाल जितना सीधा दि...