मेरे विचार
Wednesday, 15 July 2026
विभाजन से पारिवारिक विघटन तक की जीवनगाथा
बिगाड़ के डर से...
क्या हर प्रकाशित लेखक साहित्यकार होता है?
Friday, 5 June 2026
बिगाड़ के डर से- प्रियंका ओम की कहानी ‘विगत की व्याधि’ : एक समीक्षात्मक आलोचना
प्रियंका ओम की कहानी ‘विगत की व्याधि’ : एक समीक्षात्मक आलोचना
प्रियंका ओम को बहुत पहले से पढता-समझता आ
रहा हूँ... और यकीन के साथ कह सकता हूँ कि वे बहुत समय लेकर, बहुत ठहरकर लिखती हैं, उनके लेखन में संख्या बढ़ाने
को लेकर लिखना कभी मुझे नहीं दिखा। जब तक वे कहानी को पूरी तरह से मथ नहीं लेती, वे कलम आगे नहीं बढाती। हाल ही में उनकी कहानी विगत की व्याधि हंस के जून
अंक में आई है, उनके उपन्यास साज-बाज को पढ़ते हुए जिन चीजों पर मैं अटका था, इस कहानी को पढ़ते हुए लगा कि उन्होंने लेखन के वे तमाम बेरियर हटा दिए
हैं, जहाँ आलोचक अटके।
प्रियंका ओम की कहानी ‘विगत की व्याधि’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में
वृद्धावस्था, दाम्पत्य संबंधों, मानसिक
स्वास्थ्य और स्मृतियों के दीर्घकालिक प्रभावों को केंद्र में रखकर लिखी गई एक
महत्त्वपूर्ण कहानी है। यह कहानी केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की भी पड़ताल करती है जो मानसिक रोगों को समझने
के बजाय उन्हें चरित्र-दोष, सनक या पारिवारिक कलह मानकर टाल
देती है। कहानी का मूल कथ्य यह है कि अतीत के अनसुलझे घाव व्यक्ति के वर्तमान को
किस प्रकार विषाक्त कर देते हैं और अंततः पूरा परिवार उनकी चपेट में आ जाता है।
कहानी का केंद्र वृद्ध दम्पती- निर्मल बाबू
और कुंती देवी हैं। बाहरी स्तर पर यह एक सामान्य घरेलू विवाद की कथा प्रतीत होती
है, जहाँ पत्नी पति पर निराधार आरोप लगाती रहती है और पति स्वयं
को एक प्रकार की कैद में अनुभव करता है। किंतु जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है,
पाठक समझता है कि समस्या केवल वैवाहिक असहमति नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक व्याधि है। बेटी पल्लवी के माध्यम से यह तथ्य सामने
आता है कि कुंती देवी सिज़ोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं और
वास्तविकता तथा भ्रम के बीच भेद नहीं कर पा रही हैं।
कहानी की सबसे बड़ी शक्ति इसका मनोवैज्ञानिक
यथार्थ है। लेखिका ने मानसिक रोग को किसी सनसनीखेज घटना की तरह प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसके सूक्ष्म और दैनिक प्रभावों को उकेरा है। कुंती देवी का
सब्जियाँ गिनना, चोरी के भ्रम पालना, पड़ोसियों
और पति के संबंधों को लेकर काल्पनिक कथाएँ गढ़ना, फोन पर
निगरानी रखना, ये सभी व्यवहार रोग की अभिव्यक्तियाँ हैं, जिन्हें
परिवार लंबे समय तक केवल ‘सनक’ मानता रहता है। इस प्रकार कहानी मानसिक स्वास्थ्य
के प्रति समाज की अज्ञानता को भी उजागर करती है।
कहानी का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष दाम्पत्य संबंधों की जटिलता है। लेखिका दाम्पत्य को किसी आदर्शवादी दृष्टि से नहीं देखतीं। यह बात मुझे उपन्यास साज-बाज पढ़ते हुए भी प्रतीत हुई थी। निर्मल बाबू और कुंती देवी के वैवाहिक जीवन में प्रेम, उपेक्षा, असमानता, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत कुंठाएँ एक साथ उपस्थित हैं। फ्लैशबैक के माध्यम से स्पष्ट होता है कि निर्मल बाबू ने पत्नी को कभी मन से स्वीकार नहीं किया था और कुंती देवी ने जीवन भर भावनात्मक असुरक्षा का बोझ ढोया। यही दबा हुआ अतीत बाद में मानसिक विकृति के रूप में उभरता है। इस प्रकार कहानी मानसिक बीमारी को केवल जैविक या चिकित्सकीय समस्या न मानकर सामाजिक और भावनात्मक संदर्भों से भी जोड़ती है।
कहानी का शीर्षक ‘विगत की व्याधि’ अत्यंत सार्थक है। यहाँ ‘विगत’
केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि स्मृतियों, अपमानों,
अस्वीकृतियों और अधूरे प्रेम का प्रतीक है। कुंती देवी वर्तमान में
नहीं, बल्कि अतीत की छायाओं में जी रही हैं। उनके भ्रमों का
स्रोत भी वही अतीत है जिसने उन्हें कभी संतुष्टि और आत्मविश्वास नहीं दिया। इस
दृष्टि से शीर्षक कथा के केंद्रीय भाव को सटीक रूप से व्यक्त करता है।
शिल्प की दृष्टि से भी कहानी उल्लेखनीय है।
वर्तमान और अतीत के बीच लगातार आवागमन कथा को मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान करता है।
बालकनी का बिंब विशेष रूप से प्रभावशाली है। आरंभ में जो बालकनी खुलापन, संवाद और दाम्पत्य निकटता का प्रतीक थी, वही बाद में
बंदीगृह और संदेह का प्रतीक बन जाती है। यह रूपक कहानी के भाव-संरचना को मजबूत
बनाता है।
भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण
और संवादप्रधान है। लेखिका ने अनावश्यक बौद्धिकता से बचते हुए पात्रों की सामाजिक
पृष्ठभूमि के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया है। विशेष रूप से कुंती देवी और पल्लवी
के संवाद अत्यंत स्वाभाविक प्रतीत होते हैं। भाषा में संवेदना है, किंतु भावुकता नहीं; यही इसकी साहित्यिक शक्ति है।
फिर भी कहानी कुछ सीमाएँ भी रखती है। कई
स्थानों पर मानसिक रोग संबंधी व्याख्या अत्यधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। पल्लवी
द्वारा सिज़ोफ्रेनिया की विस्तार से की गई व्याख्या कथा के स्वाभाविक प्रवाह को
कुछ हद तक बाधित करती है। यदि रोग के संकेतों को और अधिक कलात्मक ढंग से पाठक पर
छोड़ दिया जाता, तो कथा का प्रभाव और गहरा हो सकता था। इसी
प्रकार कुछ प्रसंग अपेक्षाकृत लंबे हैं, जिनसे कथा की गति
थोड़ी धीमी पड़ती है।
समग्रतः ‘विगत की
व्याधि’ एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से परिपक्व कहानी है। यह कहानी
वृद्धावस्था, मानसिक स्वास्थ्य और दाम्पत्य जीवन की उन परतों
को उद्घाटित करती है जिन पर हिंदी कथा-साहित्य में अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया
है। प्रियंका ओम ने यह स्थापित किया है कि कई बार व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु
वर्तमान नहीं, बल्कि उसका अनसुलझा अतीत होता है। यही अतीत जब
व्याधि बनकर लौटता है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरा परिवार उसकी कीमत चुकाता है।
निष्कर्षतः ‘विगत की व्याधि’ मानसिक स्वास्थ्य विमर्श और
पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं को समझने वाली एक प्रभावशाली कहानी है, जो पाठक को केवल भावुक नहीं करती, बल्कि सोचने के
लिए भी विवश करती है।
हिन्दी कथा साहित्य को एक बढ़िया, प्रभावशाली
रचना देने के लिए प्रियंका ओम को बधाई...
सन्दीप तोमर
Monday, 1 June 2026
रेखाचित्र- टेपरिकॉर्डर
टेपरिकॉर्डर
अलमारी के एक पुराने खाने में रखा था- बीपीएल सानियों कंपनी का
मेरा टेपरिकॉर्डर। धूल में लिपटा, खामोश, लेकिन भीतर कहीं अब भी कुछ बोलता हुआ। यह वही
टेपरिकॉर्डर था जो मैंने स्कूल के दिनों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर इकट्ठे किये
पैसो से खरीदा था। मेरा स्कूल का दोस्त था विपिन, उसके पिताजी को नयी नयी
चीजों का शौंक था,
और मेरे घर में ये सब पढाई खराब करने का यंत्र। पिताजी से किसी भी मनोरंजन के साधन
की उम्मीद करना ही बेकार था। विपिन ने जब कहा कि उस टेपरिकॉर्डर बेचना है तो उसी
से यह ख़रीदा गया था। दिन भर की पढ़ाई, फिर शाम को पास-पड़ोस के बच्चों को जोड़-घटाव
सिखाना,
और
महीने के अंत में मिलती थी ट्यूशन फीस, एक बच्चे से साठ रूपये, पड़ोस के चार बच्चे
नवी कक्षा का गणित पढने मेरे पास आते थे। १९९२ में दो सौ चालीस रूपये महीने की
ट्यूशन फीस भी मन को बड़ा सुकून देती थी। उसी फीस से इकट्ठे हुए पैसों से पहले एक
दिवार घडी खरीदी फिर उसी इकट्ठी हुई फीस से साढ़े तीन सौ रूपये विपिन को देकर यह
टेपरिकार्डर ले लिया। ये वो समय था जब थोड़े-थोड़े पैसे जमा हो जाते तो मन में एक
अजीब-सी गर्मी भर जाती थी।
टेपरिकॉर्डर लेना कोई अनायास हुई घटना नहीं थी। मुझे कैमरा, टेपरिकार्डर, घडी का शौक था। एक
सपना था कि ये सब चीजें मेरी निजी हों, मेरी जिन्दगी का हिस्सा हों, क्योंकि पिताजी की सीमित आय
से पढाई के लिए तो पैसे मांगे जा सकते थे लेकिन अपने निजी शौक पूरे करने के लिए
उनसे पैसे लेने का सवाल ही नहीं होता था। मुझे उस समय नए सिक्के इकट्ठे करने का भी
शौक था,
मेरे
कई शौक थे जो धीरे-धीरे कागज़ के लिफ़ाफों में, छोटे सिक्कों और मुड़े-तुड़े
नोटों में आकार ले रहे थे।
उस दिन जब पहली बार उसे घर लाया, तो कमरे की दीवारें जैसे
थोड़ी और पास आ गई थीं। एक सिहरन-सी महसूस हुई, जैसे कोई पुराना सपना नए रूप
में लौट आया हो। वो एक ठोस-सा, भारी-भरकम टू इन वन था, भले वह पुराना था लेकिन
उसमें जो जादू भरा था, वो किसी यादों के संदूक जैसा था।
काले-भूरे प्लास्टिक में जड़ा हुआ शरीर, आगे की ओर सिल्वर पट्टी में
चमकते बटन, कैसेट स्लॉट के ठीक ऊपर कतार में सजे हुए बटन; प्ले, पॉज़, रिवाइंड, फॉरवर्ड, स्टॉप और इजेक्ट।
रिकॉर्डिंग के लिए तो स्टॉप और प्ले को एक साथ दबाना पड़ता था, और उस हल्की-सी
"क्लिक" की आवाज़ से जैसे दिल भी धड़क उठता था। वॉल्यूम डायल घुमाते हुए
एक खड़खड़ाहट सी आती थी, मानो साउंड का ही नहीं, वक्त का भी स्तर बदल रहा हो।
उसमें रेडियो भी था, और एफएम भी, मतलब यह वो ज़माना था जब टू इन वन की जगह ‘थ्री इन
वन’ जैसी अनोखी चीज़ें आने लगी थीं। डायल घुमाकर स्टेशन पकड़ते वक्त उस सूं-सूं और
खर्र-खर्र के बीच जब कोई साफ आवाज़ मिलती तो लगता जैसे कोई सुदूर जगह से जुड़ गए
हों। आकाशवाणी की मद्धम सी उद्घोषणा, फिर किसी पुराने ग़ज़ल की शुरुआती तान। लगता
मानों कमरा एकाएक किसी और समय, किसी और संसार में तब्दील हो गया है… और कैसेट? हर कैसेट के साथ एक नयी
कहानी जुड़ी होती थी। कभी कोई नया कैसेट मार्किट से आया, कभी किसी दोस्त ने तोहफे में
दिया। कुछ कैसेटों के साथ प्लेन काग़ज लगा होता जिस पर हाथ से नाम लिखा करता:
"लता मंगेशकर– रोमांटिक कलेक्शन" या "किशोर कुमार– सैड
सॉन्ग्स",
और कुछ
पर तो बस एक फटे-से स्टिकर के नीचे छिपे होते थे कुछ किस्से। ‘शोले’ और ‘कालिया’
फिल्म के डायलोग की कैसेट्स लाया तो उनका हर डायलोग जुबान पर चढ़ गया। छेनू आया था
डायलोग भी खूब बोला जाने लगा, एक और डायलोग याद आता है उन्हीं दिनों का याद किया
हुआ- “एक म्यान में दो तलवारे होने का मतलब है, एक का टूट जाना विक्की... और
विक्की फौलाद से बनी वो तलवारें है छेनू जिसने सिर्फ काटना सीखा है..” “कौन बोल
रहे हो... तुम्हारा बाप कालिया... जिसे तुमने खुद पैदा किया है...।”, यह डायलोग भी
खूब जुबान पर रहा।
उस दिन जब पहली बार उसे घर लाया गया, तो सिर्फ एक संगीत यंत्र
नहीं आया था, मानो घर में एक नया किरायेदार आया था, जो बोलता नहीं था, लेकिन सुनाता बहुत
कुछ था। कमरे की दीवारें सच में पास आ गई थीं, शायद इसलिए कि अब उनमें गूंजने को
बहुत कुछ था।
सच पूछो तो वह टेपरिकॉर्डर मेरे लिए केवल संगीत का साधन नहीं था, वह मेरी मेहनत का
दूसरा प्रतिफल था,
पहले प्रतिफल के रूप में मैंने एक दीवार घड़ी खरीदी थी, जिसके लिए दो बच्चों की
ट्यूशन फीस खर्च की गयी थी।
पढ़ाई के समय अक्सर वह मेरे पास ही रहता। अब हर ट्यूशन फीस से
एक-दो नयी कैसेट खरीदी जाती, या फिर ब्लेंक खरीदकर अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड
करवाकर लता, १९९२ में एक साइड
की कैसेट रिकॉर्ड करवाने के पाँच रुपये और दोनों साइड के दस रुपये देने होते।
धीरे-धीरे पसंद के गानों की कैसेट का भी कलेक्शन होता गया। गणित के सवाल हल करते
हुए मैं उसे चला देता, और कोई पुराना, जाना-पहचाना गाना मेरी उँगलियों की गति के साथ बहता
रहता। एक कैसेट में तो मैंने अपना प्रिय गाना दोनों साइड में रिकॉर्ड करा लिया थ- ताकि
बार-बार रिवाइंड न करना पड़े। मुझे गाने सुनते हुए गणित के सवाल हल करने की आदत सी
होने लगी,
लेकिन
इतना जरुर रहा कि आवाज़ इतनी धीमी होती कि कमरे के बाहर कोई खड़ा हो तो उसके कानों
तक गाने के बोल न पहुँच पाए, रात को सोने से पहले कमरे में लाल रंग का प्रकाश, यानी नाईट बल्ब ऑन
करके गाने सुनना और उसी संगीत के साथ नींद लेना, ये मानो नियत कर्म बन गया, ऐसे ही पंसदीदा
संगीत सुन दिन भी कट जाता।
समय बीतता गया, और मशीनें, जैसे जीवन, पुरानी होने लगीं। कभी टेप
अटक जाती,
कभी
आवाज़ फुसफुसाने लगती। वैसे भी यह पहले ही पुराना माल था तो समय के साथ खराबी आना
स्वाभाविक था,
शुरू
में कुछ बार दुकान ले गया, खतौली में ही एक लड़का था बिल्लू, वह रेडियो, टेपरिकार्डर और
टीवी ठीक करता था,
लेकिन हर बार ठीक कराने के नाम पर पैसे खर्च होते। जब बिल्लू उसे ठीक करता तो मैं
ये देखता कि कौन से पार्ट्स अमूमन ख़राब होते हैं, किस तरीके से वह पार्ट्स
बाहर निकालता है,
कैसे उनको लगाता है यह सब अवलोकन मैं किया करता, फिर एक दिन, एक छोटी-सी
सोल्डरिंग आयरन खरीद लाया। तय कर लिया किअब इसे खुद ही ठीक करूँगा। धीरे-धीरे
वायरिंग समझ आने लगी, टेप हेड की सफाई, सर्किट की मरम्मत, स्पीकर की लाइन, सब कुछ सीखा, अपनी कोशिशों से। अब
वह टेपरिकॉर्डर सिर्फ एक यंत्र नहीं रहा था, वह मेरी प्रयोगशाला बन गया
था और मैं उसका एक इंजिनियर। वह अनुभव एक सृजन जैसा था जिसमें तकनीक, धैर्य और आत्मीय
लगाव तीनों शामिल थे।
अलग-अलग जगह रहकर पढाई करते हुए, वह मेरे गाँव वाले कमरे को
शोभायमान करता रहा,
जब कभी छुट्टी में गाँव जाता उससे रूबरू होता, वह मेरा अकेलेपन का भी साथी
बन चुका था, किसी बेहतरीन
प्रेयसी की भांति वह भी यादों का हिस्सा बनता। उससे मिलकर वही ख़ुशी होती जो माशूका
से मिलकर होती हो,
वही अनुभूति। पढाई करने तक वह गाँव रहा लेकिन जैसे ही प्रथम नियुक्ति का वक़्त आया
और होस्टल छोड़ कमरा किराए पर लेना पड़ा, वह टेपरिकार्डर भी अन्य जरूरी सामान का हिस्सा बन
गया। कर्मपुरा से महेन्द्रा पार्क तक के सफ़र में वह भी साथ-साथ हमसफ़र रहा। फिर जब
रहने में स्थायित्व आया, उसे भी स्थायी आवास मिल गया। हमेशा ही टीवी से ज्यादा
प्रिय रहा,
रात को
सोने से पहले उसकी ड्यूटी थी, एफएम पर नीलेश का कार्यक्रम ‘ब्रोकन हार्ट’ सुनाना।
वह मेरे हर दुःख-सुख का साथी बना गया था। आज जब उसे देखता हूँ, तो लगता है जैसे वह
केवल गाने नहीं बजाता था, वह मेरी किशोरावस्था का संगीत था, मेरे भीतर के
आत्मविश्वास का,
आत्मनिर्भरता
का,
और उस
छोटे-से लड़के का, जिसे अपनी कमाई से खरीदी चीज़ सबसे प्रिय लगती थी।
फिर एक दिन पता चला कि उसे मेरे पीछे से एक कबाड़ी के सुपुर्द कर
दिया गया,
और साथ
में वो सब कसेट्स भी, जो मैंने बड़े जतन से एक-एक कर सहेजी थी। उस दिन मैं भी ब्रोकन
हार्ट हो गया था, एक ऐसा टूटा हुआ इंसान जिसकी कहानी सुनाने एफएम पर कोई नीलेश नहीं
आएगा।
आज उस टेपरिकॉर्डर का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है, उसका कोई अवशेष भी
नहीं रखा है,
यदि वह
होता भी तो शायद चालू नहीं होता, शायद टूट चुका होता, लेकिन मेरे पास सहेजा हुआ
होता तो एक तसल्ली होती कि मेरे जीवन के शुरूआती दिनों की एक यादगार वस्तु मेरे
पास है,
अब वह
मात्र मेरी स्मृतियों में बिल्कुल वैसा ही है जैसा पहली बार था: थोड़ा भारी, कुछ खड़खड़ाता हुआ, लेकिन पूरी तरह
मेरा। यह सब लिखते हुए मानों उन्ही दिनों में पहुँच गया हूँ, और एक संगीत की धुन
मेरे कानों में बज रही है- “चलते-चलते ये मेरे गीत याद रखना... कभी अलविदा न
कहना...।”
Thursday, 21 May 2026
बिगाड़ के डर से--- एकता व्यास की कहानी ‘स्लीपिंग पार्टनर’
बिगाड़ के डर से---
एकता व्यास की कहानी ‘स्लीपिंग पार्टनर’
यह कहानी अपने शीर्षक के कारण प्रथम दृष्टया पाठक को एक ऐसे भ्रम में डालती है, मानो यह किसी यौन सम्बन्ध अथवा देहात्मक निकटता की कथा हो। किंतु कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह स्पष्ट होता जाता है कि लेखिका का सरोकार शरीर से अधिक उस गहरे अकेलेपन से है, जो आधुनिक जीवन-शैली और बदलते पारिवारिक ढाँचों ने बुज़ुर्गों के हिस्से में छोड़ दिया है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी सफलता भी है कि वह एक भ्रामक शीर्षक के भीतर अत्यंत मार्मिक मानवीय संवेदना को छिपाकर रखती है।
कहानी की पृष्ठभूमि एक ऐसी सीनियर सिटीजन सोसाइटी है, जहाँ जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचे लोग रह रहे हैं। उनके जीवन-साथी अब इस दुनिया में नहीं हैं और बच्चे अपने-अपने करियर, विदेशों या महानगरों में व्यस्त हैं। मध्यवर्ग और उच्च-मध्यवर्ग—दोनों ही वर्गों के बुज़ुर्ग यहाँ लगभग एक जैसी मानसिक त्रासदी से गुजरते दिखाई देते हैं। आर्थिक सुविधाएँ मौजूद हैं, लेकिन भावनात्मक रिक्तता लगातार फैलती जाती है। लेखिका ने इस विडम्बना को बहुत सहज ढंग से उभारा है कि आधुनिकता ने बुज़ुर्गों को सुविधाएँ तो दी हैं, पर साथ छीन लिया है।
कहानी का पुरुष पात्र निरव शाह अपनी दिवंगत पत्नी भारती की स्मृतियों में जीता हुआ व्यक्ति है। वह हर बात में भारती को याद करता है—खाने के स्वाद से लेकर घर की सज्जा और व्यवहार तक। दूसरी ओर मिनाली भी अपने अकेलेपन और अनिद्रा से जूझ रही स्त्री है। वह निरव की ओर आकर्षित अवश्य होती है, किंतु यह आकर्षण देह से अधिक साझे अकेलेपन का आकर्षण है। यहाँ लेखिका ने अत्यंत सूक्ष्मता से यह रेखांकित किया है कि वृद्धावस्था में मनुष्य को प्रेम से पहले उपस्थिति की आवश्यकता होती है—किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसकी साँसों और खर्राटों की आवाज़ यह भरोसा दे सके कि वह अकेला नहीं है।
मिनाली द्वारा निरव को अपने घर सोने का निमंत्रण कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे अधिक विवादास्पद लग सकने वाला प्रसंग है। कुछ आलोचक इसे लिव-इन रिलेशनशिप या दैहिक निकटता की कथा के रूप में पढ़ सकते हैं, किंतु कहानी का भाव-संकेत उससे बिल्कुल अलग है। मिनाली को नींद नहीं आती; वह अपने जीवनसाथी के साथ सोने की अभ्यस्त रही है। इसलिए उसका निमंत्रण ‘हमबिस्तर’ होने का नहीं, बल्कि ‘साथ सोने’ का निमंत्रण है। कहानी का यह बिंदु अत्यंत मानवीय और संवेदनशील है, जिसे लेखिका ने बिना अनावश्यक उत्तेजना के प्रस्तुत किया है।
एकता व्यास की विशेषता यह है कि वे बदलते सामाजिक यथार्थ से कहानी के नए विषय चुनती हैं। भूमंडलीकरण, भौतिकवाद और उदारवादी जीवन-शैली ने परिवारों की पारंपरिक संरचना को बदल दिया है। संयुक्त परिवार टूटे हैं, रिश्तों की निकटता कम हुई है और बुज़ुर्ग भावनात्मक निर्वासन का जीवन जीने को विवश हुए हैं। ‘स्लीपिंग पार्टनर’ इसी बदलते समाज की कहानी है। यह उन लोगों की कथा है जिन्हें पैसे, सुविधा और स्वतंत्रता तो मिली, पर रात की नींद छिन गई।
कहानी की भाषा में कई जगह आत्मीयता और घरेलू सहजता दिखाई देती है। गुजराती मिश्रित संवाद पात्रों को स्थानीयता और विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। साथ ही, कहानी में स्मृति और वर्तमान के बीच जो आवाजाही है, वह कथा को भावुक हुए बिना मार्मिक बनाती है।
हालाँकि कहानी अभी और कसावट की माँग करती है। कुछ प्रसंग अपेक्षाकृत लंबे हो गए हैं, जिनसे कथा का प्रवाह थोड़ा ढीला पड़ता है। प्रूफ और भाषा-संशोधन की भी पर्याप्त गुंजाइश है। यदि लेखिका कथा-संरचना को थोड़ा और सघन करें तथा अनावश्यक विस्तार को नियंत्रित करें, तो यह कहानी समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में बुज़ुर्ग अकेलेपन पर लिखी गई एक उल्लेखनीय और प्रभावशाली कहानी बन सकती है।
कुल मिलाकर ‘स्लीपिंग पार्टनर’ उस भावनात्मक भूख की कहानी है, जिसे आधुनिक समाज अक्सर समझ नहीं पाता। यह कहानी बताती है कि जीवन के अंतिम वर्षों में मनुष्य को प्रेम से भी अधिक किसी की उपस्थिति, किसी की आवाज़ और किसी के साथ की आवश्यकता होती है। यही इसकी सबसे बड़ी मानवीय उपलब्धि है।
सन्दीप तोमर
(समीक्षक, आलोचक)
Friday, 8 May 2026
बिगाड़ के डर से… विकलांग विमर्श इतना भी आसान नहीं है...
बिगाड़ के डर से…
विकलांग विमर्श इतना भी आसान नहीं है...
मेरे एक शिक्षक साथी ने एक किताब सुझाई और
कहा— “सर, आपको यह महत्वपूर्ण किताब अवश्य पढ़नी
चाहिए।” उनके आग्रह से मेरे भीतर उस पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता पैदा हुई। फिर
पता चला कि उक्त पुस्तक को पुरस्कार भी मिल चुका है और इंदौर की किसी संस्था ने
उसके लेखक को सम्मानित भी किया है। अब मेरे लिए उस पुस्तक को पढ़ना लगभग अनिवार्य
हो गया था। मैंने पुस्तक खरीदी और पढ़ना शुरू किया।
लेकिन ज्यों-ज्यों मैं पुस्तक पढ़ता गया, मेरी हैरानी बढ़ती गई। हैरानी का कारण यह था कि पुस्तक मेरे भीतर किसी
प्रकार की साहित्यिक दिलचस्पी पैदा ही नहीं कर पा रही थी। पन्ना-दर-पन्ना आगे
बढ़ते हुए मुझे लगा कि या तो लेखक ने अपनी आपबीती किसी को सुनाकर लिखवा दी है,
या फिर लेखक के पास संस्मरणात्मक उपन्यास कहने की वह कलात्मक क्षमता
नहीं है, जिसकी इस विधा में सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
वैसे भी “संस्मरणात्मक उपन्यास” जैसी विधा
पर अभी तक बहुत गंभीर चर्चा नहीं हुई। मैंने स्वयं इस शैली में कुछ रचनाएँ लिखने
की कोशिश की और कुछ वरिष्ठ लेखकों ने उसे स्वीकार्यता भी दी। सच कहूँ तो मुझे
संस्मरणात्मक उपन्यास लिखने में अधिक आनंद आता है, क्योंकि
इसमें जीवन की वास्तविकता और कथा-संरचना एक साथ चलती हैं। लेकिन यही वह क्षेत्र है
जहाँ लेखक की ईमानदारी और कलात्मकता दोनों की असली परीक्षा होती है।
जिस पुस्तक को मैं पढ़ रहा था, उसमें लेखक ने अपने विकलांग जीवन के संघर्षों को लिखते हुए पाठक की
सहानुभूति बटोरने पर इतना अधिक जोर दिया कि मूल विषय और उसके भीतर छिपे
जीवन-संघर्ष का ताप कहीं पीछे छूट गया। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि
विकलांग-विमर्श दया बटोरने का नहीं, मनुष्य के जुझारूपन और
अस्तित्व-संघर्ष को सामने लाने का विषय होना चाहिए। लेकिन “विटामिन जिंदगी” में
ऐसा नहीं हो पाया। किताब लेखक को एक संघर्षशील मनुष्य के रूप में कम और दया के
पात्र के रूप में अधिक प्रस्तुत करती है।
यह समस्या केवल एक पुस्तक तक सीमित नहीं है। मैंने विकलांग-विमर्श पर आधारित अनेक कहानियाँ और उपन्यास पढ़े हैं, लेकिन अधिकांश रचनाकार अपने विकलांग पात्रों के साथ न्याय नहीं कर पाए। हिंदी कथा-साहित्य में विकलांग पात्रों को या तो करुणा पैदा करने वाले पात्र के रूप में चित्रित किया गया है, या फिर उन्हें हास्य और विडंबना का माध्यम बना दिया गया। बहुत कम रचनाएँ ऐसी हैं जहाँ विकलांग पात्र अपनी सम्पूर्ण मनुष्यता, जिजीविषा और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित दिखाई देते हों।
जब मैंने “लहरों के
पूर्व रंग” पुस्तक का संकलन शुरू किया, तब विकलांग-विमर्श पर केंद्रित अनेक रचनाएँ पढ़ीं। महादेवी वर्मा की
“अलोपी” और “गुंगिया”, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
की “खितीन बाबू”, विष्णु प्रभाकर की संस्मरणात्मक कहानी
“नेत्रहीन”, डॉ. इंद्र बहादुर द्वारा लिखित “हेलेन केलर की
आत्मकथा” आदि। इन सबको पढ़ते हुए बार-बार यही महसूस हुआ कि रचनाकार विकलांग
पात्रों की भीतरी दुनिया तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाए। कहीं करुणा अधिक हो गई,
कहीं आदर्शवाद, कहीं विकलांगता को प्रतीक बना
दिया गया और कहीं उसे केवल कथानक का उपकरण भर बना दिया गया।
शायद इन्हीं सब कारणों से भीतर एक बेचैनी पैदा हुई और मैंने “एक अपाहिज की डायरी” लिखने का जोखिम उठाया। यह जोखिम केवल साहित्यिक नहीं था, बल्कि आत्मिक भी था। क्योंकि आत्मकथात्मक शैली में लिखते समय लेखक अपने अनुभवों को निर्वस्त्र करता है। उसमें छिपने की गुंजाइश बहुत कम होती है। मैंने अपने नायक के साथ जो घटा, जैसा घटा, उसे पूरी ईमानदारी से कागज पर उतारने की कोशिश की। मैं “मोहनदास करमचंद गांधी” तो नहीं हूँ कि “सत्य के मेरे प्रयोग” जैसी विराट और ऐतिहासिक रचना दे सकूँ, लेकिन इतना जरूर चाहता था कि जो लिखूँ, वह भीतर से झूठा न लगे।
साहित्य में विकलांग-विमर्श का सबसे बड़ा
संकट यही है कि यहाँ अक्सर विकलांग व्यक्ति को “मनुष्य” मानने के बजाय “स्थिति”
मान लिया जाता है। लेखक उसके दर्द को तो लिखता है, लेकिन
उसकी इच्छाएँ, उसका प्रेम, उसका क्रोध,
उसका अहंकार, उसका यौन-बोध, उसका सामाजिक अपमान, उसकी महत्वाकांक्षाएँ— इन सबको
नज़रअंदाज़ कर देता है। जैसे विकलांग व्यक्ति केवल पीड़ा झेलने के लिए पैदा हुआ
हो। जबकि सच यह है कि विकलांग व्यक्ति भी उतना ही जटिल, विरोधाभासी
और बहुआयामी मनुष्य होता है, जितना कोई और।
दरअसल हिंदी साहित्य में विमर्शों के नाम पर
भी एक फैशन पैदा हो गया है। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श,
आदिवासी-विमर्श और विकलांग-विमर्श— इन सब पर बड़ी संख्या में ऐसा
लेखन सामने आया है, जिसमें अनुभव की प्रामाणिकता कम और
वैचारिक प्रदर्शन अधिक है। कुछ लेखक विमर्श को समझने के बजाय उसका उपयोग अपनी
“प्रगतिशील छवि” चमकाने के लिए करते दिखाई देते हैं। परिणाम यह होता है कि रचना
जीवन से कटकर नारे में बदल जाती है।
इसी बीच कुछ अच्छी रचनाएँ भी पढ़ने को
मिलीं। पूजा अग्निहोत्री की कहानी “वो धूप जो जलकर
निकल गयी” ऐसी ही कहानी है, जो अपने विकलांग पात्र के साथ अपेक्षाकृत अधिक न्याय करती दिखाई देती है।
वहाँ पात्र केवल दया का पात्र नहीं बनता, बल्कि अपनी
संवेदनाओं और संघर्षों के साथ उपस्थित होता है। ऐसी रचनाएँ उम्मीद जगाती हैं कि
हिंदी साहित्य अभी पूरी तरह संवेदनहीन नहीं हुआ।
हाल ही में मैंने एक और चर्चित उपन्यास “व्हीलचेयर” पढ़ा। यह उपन्यास भी गहरी
निराशा देकर गया। यहाँ भी लेखक पात्र और कथा— दोनों के साथ न्याय करते नहीं दिखाई
पड़ते। कथ्य अत्यंत कमजोर है और बार-बार का दोहराव पाठक को थका देता है। ज्ञान
प्रकाश विवेक पूरे उपन्यास में किस्सागोई पैदा करने में असफल रहे हैं। ऐसा लगता है
जैसे लेखक के पास अनुभव तो हैं, लेकिन उन्हें कथा में बदलने
की कला नहीं है। उपन्यास कई जगह डायरी, कई जगह लेख और कई जगह
भावुक आत्मस्वीकृति बनकर रह जाता है। एक जगह वे लिखते हैं— “ज़िन्दगी एक ऐसा
लतीफ़ा बना गयी थी, जिसको सुनकर आँसू टपक पड़ते हैं।”
ऐसे वाक्य पढ़कर पाठक का “लतीफ़ा” शब्द से ही विश्वास उठने लगता है।
लतीफ़ा अपने स्वभाव में व्यंग्य, विनोद और हल्केपन का वाहक
होता है, लेकिन यहाँ लेखक उसे करुणा के ऐसे अतिरंजित बिंदु
तक ले जाते हैं कि भाषा अपनी विश्वसनीयता खो बैठती है। साहित्य में संवेदना जितनी
आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक भाषा की सटीकता भी है।
उपन्यास पढ़ते हुए मैं यह भी नहीं समझ पाया
कि प्रेम-विवाह करने वाली पत्नी अस्पताल में भर्ती अपने पति को “मिस्टर असमर्थ”
कैसे कह सकती है? यदि यह स्थिति लंबे समय तक विकलांग जीवन के
साथ संघर्ष करते हुए आती, तब भी उसे मनोवैज्ञानिक धरातल पर
समझा जा सकता था, लेकिन उपचाराधीन व्यक्ति के प्रति इतनी
शीघ्र निर्ममता पाठक को चौंकाती है। “क्या फर्क पड़ता है, छुट्टी
दो दिन पहले मिले या बाद में, रहना तो आपको बेड पर ही है”—
जैसे संवाद प्रेम को गहराई नहीं देते, बल्कि उसे हास्यास्पद
और कृत्रिम बना देते हैं।
एक स्थान पर ज्ञान प्रकाश विवेक लिखते हैं—
“आकाश अपनी पर्सनैलिटी के प्रति सचेत था। वह लापरवाह-सा नज़र आता।”
यहाँ प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति एक साथ
अत्यधिक सचेत और उतना ही लापरवाह कैसे हो सकता है? लेखक
चरित्र-निर्माण में स्थिरता नहीं रख पाते। फुटबॉल प्लेयर होना, कद-काठी, विकलांग होने का दर्द— इन बातों का इतना
अधिक दोहराव है कि लगने लगता है लेखक की कलम में कथा को आगे बढ़ाने की ऊर्जा कम
पड़ गई है। कथानक आगे बढ़ने के बजाय एक ही भावभूमि पर गोल-गोल घूमता रहता है।
एक जगह उपन्यासकार लिखते हैं— “विकलांग
लोगों की सबसे बड़ी विडम्बना यह होती है कि वे निरंतर शरीर के उस अंग के बारे में
सोचते रहते हैं, जो या तो होता नहीं, या
नाकारा, बेहिस और बेजान होता है।”
यह वाक्य पढ़कर लगता है कि लेखक ने विकलांग
व्यक्तियों के जीवन को बहुत सतही ढंग से देखा है। यदि वे किसी विकलांग व्यक्ति के
साथ कुछ दिन भी बिताते, तो शायद समझ पाते कि विकलांग लोग अपने
निष्क्रिय अंगों के बारे में कम, जीवन के सक्रिय संघर्षों के
बारे में अधिक सोचते हैं। उन्हें अपने शरीर की कमी पर रोते रहने की फुर्सत नहीं
होती। वे अपनी सीमाओं के भीतर नई संभावनाएँ गढ़ते हैं। बहुत-से विकलांग व्यक्ति
मानसिक रूप से सामान्य लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक दृढ़ और आत्मनिर्भर हो जाते
हैं। वे अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत में बदल देते हैं।
लेखक एक जगह लिखते हैं— “आकाश को इस बात का
इल्हाम हो चुका था कि वह लाचार है।” और अगले ही पृष्ठ पर लिखते हैं— “आकाश अपने
अपाहिज रूप को स्वीकार नहीं कर पा रहा था।” यह विरोधाभास केवल भाषा का नहीं, चरित्र की मनोवैज्ञानिक संरचना का भी है। यदि पात्र अपनी स्थिति को
स्वीकार कर चुका है, तो फिर अस्वीकार का संकट क्यों? और यदि वह अभी स्वीकार नहीं कर पाया, तो “इल्हाम”
जैसी निर्णायक भाषा क्यों? उपन्यासकार अंत तक यह स्पष्ट नहीं
कर पाते कि वे अपने नायक को किस रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं— संघर्षशील
मनुष्य, आत्मदया में डूबा व्यक्ति या केवल करुणा बटोरने वाला
पात्र।
डॉ. तनेजा के आकाश और संगीता दोनों के साथ
संवाद अपेक्षाकृत अधिक दिलचस्प और मनोवैज्ञानिक हैं। उनमें जीवन-दृष्टि की संभावना
दिखाई देती है। लेकिन विडम्बना यह है कि उस मनोवैज्ञानिकता का प्रभाव पूरे उपन्यास
में कहीं दिखाई नहीं देता। लेखक लिखते हैं— “विकलांग के दुःख हर पल तोड़ते हैं।”
मैं कहता हूँ— विकलांगता के दुःख हमेशा
तोड़ते नहीं, कई बार वे मनुष्य को भीतर से असाधारण रूप
से मजबूत भी बनाते हैं। डॉ. तनेजा और नर्स स्टेला के संवाद उपन्यास की सबसे बड़ी
शक्ति बन सकते थे, लेकिन उनका असर मुख्य पात्रों के व्यवहार
और विकास में कहीं परिलक्षित नहीं होता। इससे पूरा कथानक बिखरा हुआ प्रतीत होता
है।
अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद संगीता
आकाश को जिस कमरे में रखती है, उसका वर्णन देखिए— पुरानी
छतरी, पुराना कूलर, टू-इन-वन, पुरानी वाशिंग मशीन, टूटे जूते, टूटी हत्थेवाली कुर्सी…। यह दृश्य किसी स्वाभाविक वैवाहिक तनाव से अधिक
कृत्रिम प्रतीत होता है। मानव-मन की थोड़ी भी समझ रखने वाला व्यक्ति जानता है कि
प्रेम-विवाह करने वाले दंपति के बीच इतनी जल्दी ऐसा भावनात्मक पतन आ जाना सहज नहीं
है। लेखक बिना पर्याप्त मनोवैज्ञानिक तैयारी के पात्रों को अमानवीय बना देते हैं।
विडम्बना देखिए— रघु, जो एक मूक-बधिर नौकर है, व्हीलचेयर देखकर खुश होता
है, जबकि आकाश, जिसे उसकी सबसे अधिक
आवश्यकता है, सोचता है— “व्हीलचेयर सुविधा देती है, सुख नहीं।”
यहाँ समस्या व्हीलचेयर नहीं, लेखक की दृष्टि है। उपन्यास में व्हीलचेयर एक सहायक उपकरण कम और कलंक अधिक
बनकर उपस्थित होती है। लेखक बार-बार उसे त्रासदी का प्रतीक बनाते हैं, जबकि वास्तविक जीवन में व्हीलचेयर अनेक लोगों के लिए स्वतंत्रता और
गतिशीलता का माध्यम होती है।
पूरे उपन्यास में उपस्थित अनेक प्रसंग यह
आभास देते हैं कि लेखक का ध्यान कथा की स्वाभाविकता से अधिक पन्ने भरने पर रहा है।
पत्नी की बॉस का घर आने वाला प्रसंग भी कुछ ऐसा ही लगता है। जबकि वही बॉस एक
अत्यंत सकारात्मक बात कहती है— “एक इनर हाइट भी होती है, उस हाइट को कोई एक्सीडेंट नहीं छीन सकता।” लेकिन आश्चर्य यह है कि इस
संवाद का भी संगीता या आकाश पर कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता। जैसे लेखक स्वयं अपने
ही सकारात्मक विचारों पर विश्वास नहीं करते।
एक जगह उपन्यासकार लिखते हैं— “जिन लोगों का
शारीरिक रूप से कुछ छिन जाता है, वे समाज में सहमे-सहमे से
नज़र आते हैं।”
मैं लेखक से पूछना चाहता हूँ कि वे कितने
विकलांग लोगों से वास्तव में मिले हैं? उन्हें अरुणिमा
सिन्हा, स्टीफन हॉकिंग और अनेक संघर्षशील व्यक्तित्वों को
गहराई से पढ़ने-समझने की आवश्यकता है। विकलांगता मनुष्य को हमेशा सहमा हुआ नहीं
बनाती, कई बार वह उसे अधिक निर्भीक और जीवन-सचेत बना देती
है।
अध्याय अठारह में लेखक यौन-इच्छाओं को लेकर
भी कई अनावश्यक और तर्कहीन बातें लिखते हैं। यौन-क्रीड़ा का किसी व्यक्ति की
विकलांगता से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। यह बात लेखक सहित पाठकों को भी समझनी
चाहिए। मेरे एक दृष्टिबाधित मित्र विश्वविद्यालय में कहा करते थे— “सेक्स के लिए
सेक्स-ऑर्गन की जरूरत होती है, आँखों, हाथों या पैरों की नहीं।”
यह वाक्य जितना सरल है, उतना ही गहरा भी। लेकिन उपन्यास इस विषय को भी दया और हीनभावना के चश्मे से देखता है।
पूरे उपन्यास में आकाश को जितना असहाय
दिखाया गया है, वैसा असहाय विकलांग पात्र मैंने अपने जीवन
में नहीं देखा। लेखक कई बार उसके हाथों से महंगे कप तुड़वाते हैं। पढ़ते हुए
बार-बार मन में प्रश्न उठता है— आकाश पैरों से विकलांग हुआ है या हाथों से?
यह अतिशयोक्ति पात्र को विश्वसनीय नहीं रहने देती।
विडम्बना यह भी है कि आज के एंड्रॉइड और
डिजिटल युग में लेखक आकाश को व्हीलचेयर पर बैठाकर बिजली का बिल जमा करवाने काउंटर
तक भेजते हैं, जबकि उसकी पत्नी स्वयं ऑनलाइन बिल भरती है।
वर्क-फ्रॉम-होम के दौर में इंजीनियरिंग पढ़ा-लिखा पात्र बेरोजगार बना रहता है,
जबकि उसके सामने अनेक संभावनाएँ हो सकती थीं। इसी प्रकार कनॉट प्लेस
जैसे व्यावसायिक इलाके में किसी रेस्तराँ का दरबान व्हीलचेयर के कारण प्रवेश रोक
दे— यह भी बेहद अविश्वसनीय लगता है। बाज़ार का मनोविज्ञान ग्राहक को रोकने का नहीं,
आकर्षित करने का होता है।
मैंने स्वयं अपनी विकलांगता के बावजूद ऐसा
कभी अनुभव नहीं किया कि मुझे कहीं प्रवेश से रोका गया हो। दरअसल लेखक के भीतर
व्हीलचेयर को लेकर जो हीनभावना बैठी हुई है, वही बार-बार
कथा में रिसती रहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने अपने निजी भय और असुरक्षाएँ
नायक पर आरोपित कर दी हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि दुर्घटना के बाद मित्र व्यक्ति
से दूरी बना लेते हैं, जबकि अनुभवजन्य सच्चाई यह है कि कठिन
समय में कई मित्र और अधिक निकट आ जाते हैं।
यही कारण है कि उपन्यास का लगभग पहला डेढ़
सौ पृष्ठ बोझिल और अनावश्यक विस्तार से भरा प्रतीत होता है। वास्तविक उपन्यास तो
अंतिम तीस-चालीस पन्नों में कहीं जाकर शुरू होता है। और सबसे बड़ी विडम्बना यह कि
विकलांग पति को छोड़कर चली गई पत्नी का अंत में बिना पर्याप्त कारण लौट आना उतना
ही अतार्किक लगता है, जितना उसका अचानक छोड़कर चले जाना। उपन्यास
अपने अंत तक आते-आते पाठक को भावनात्मक संतोष नहीं, बल्कि एक
अधूरी और अविश्वसनीय कथा का अनुभव देकर छोड़ता है।
असल में विकलांग-विमर्श पर लिखना केवल
“विकलांगता” पर लिखना नहीं है। यह मनुष्य की उस लड़ाई को लिखना है, जो वह अपने शरीर, समाज, व्यवस्था
और कभी-कभी अपने ही भीतर से लड़ता है। यहाँ लेखक को अतिरिक्त संवेदनशीलता और
अतिरिक्त ईमानदारी की आवश्यकता होती है। लेकिन अक्सर लेखक या तो दया में फँस जाता
है या प्रेरणात्मक भाषण देने लगता है। दोनों ही स्थितियाँ साहित्य को कमजोर करती
हैं।
मुझे लगता है कि आने वाले समय में हिंदी
साहित्य को विकलांग-विमर्श पर नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। विकलांग पात्रों
को “बेचारा” या “महान” बनाकर प्रस्तुत करने के बजाय उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह
देखने की जरूरत है। क्योंकि सबसे बड़ा अन्याय यही है कि किसी मनुष्य को उसकी
सम्पूर्ण मनुष्यता से वंचित कर दिया जाए।
और शायद इसी “बिगाड़” के डर से बहुत से लेखक
सच लिखने से बचते हैं। वे पात्र को सुरक्षित बनाते हैं, कथा को मुलायम बनाते हैं और जीवन की असुविधाजनक सच्चाइयों पर पर्दा डाल
देते हैं। लेकिन साहित्य यदि असुविधाजनक सच कहने का साहस खो देगा, तो फिर वह केवल पुरस्कारों और सम्मानों की सीढ़ी भर बनकर रह जाएगा।
विभाजन से पारिवारिक विघटन तक की जीवनगाथा
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