प्रेम, देह और नैतिकता का सवाल
क्या देह के रिश्ते के
लिए विवाह संस्था की उपस्थिति अनिवार्य है? यह सवाल जितना
सीधा दिखाई देता है, उतना है नहीं। दरअसल, इसके भीतर मनुष्य की देह, इच्छा, प्रेम, अधिकार, स्वतंत्रता और
सामाजिक स्वीकृति- इन सबके बीच का पूरा तनाव छिपा हुआ है। विवाह को हमने केवल दो
व्यक्तियों के साथ रहने की व्यवस्था नहीं रहने दिया; उसे
नैतिकता, परिवार, वंश, संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्त्री-पुरुष के
व्यवहार को नियंत्रित करने वाली संस्था में बदल दिया। इसलिए जब कोई व्यक्ति यह
पूछता है कि क्या दो सहमत वयस्कों के बीच देह का संबंध विवाह के बिना संभव है,
तो प्रश्न केवल देह का नहीं रह जाता। वह सीधे उस सामाजिक व्यवस्था
को चुनौती देने वाला लगने लगता है जिसने देह पर अधिकार को विवाह की वैधता से जोड़
दिया है।
हमारे समाज में विवाह के
भीतर होने वाला हर यौन संबंध अपने आप सहमति का संबंध मान लिया जाता है। पति-पत्नी
हैं, इसलिए दोनों एक-दूसरे के लिए उपलब्ध हैं, यह धारणा इतनी गहरी
है कि विवाह के भीतर इच्छा और अनिच्छा के बीच का अंतर अक्सर दिखाई ही नहीं देता।
कितने ही विवाहों में देह का मिलन प्रेम या इच्छा से नहीं, बल्कि
कर्तव्य, दबाव, आदत या संबंध टूट जाने
के भय से होता है। एक साथी पहल करता है और दूसरा चुप रहता है। वह चुप्पी सहमति मान
ली जाती है। जबकि चुप रहना और सहमत होना एक बात नहीं है।
यहीं विवाह संस्था की
सबसे असहज विडंबना सामने आती है। जिस संस्था को प्रेम, सुरक्षा और साथ का आश्रय होना चाहिए था, उसी संस्था के
भीतर कई बार देह अपनी स्वतंत्र इच्छा खो देती है। एक पार्टनर सक्रिय होता है,
दूसरा पैसिव। बाहर से संबंध सामान्य दिखाई देता है, भीतर से शायद उसमें बहुत कुछ मर चुका होता है। यदि दो व्यक्तियों के बीच
देह का रिश्ता इच्छा, सम्मान और पारस्परिक सहमति पर टिकना
चाहिए, तो केवल विवाह का प्रमाणपत्र उस संबंध को सार्थक कैसे
बना सकता है?
इस प्रश्न का दूसरा सिरा
उतना ही महत्वपूर्ण है- क्या मनुष्य को अपने साथी को चुनने की स्वतंत्रता नहीं
होनी चाहिए? प्रेम और देह को हमेशा एक ही व्यक्ति,
एक ही समय और एक ही जीवन-संबंध में बाँध देना क्या मनुष्य की
स्वाभाविक इच्छाओं को समझना है या उन्हें नियंत्रित करना? संभव
है किसी व्यक्ति को एक साथी के साथ भावनात्मक निकटता मिले और दूसरे के साथ कोई
दूसरा अनुभव। संभव है किसी संबंध में प्रेम हो लेकिन देह की जरूरतें अलग हों। संभव
है दो लोग एक-दूसरे से प्रेम करते हों और फिर भी यह स्वीकार करते हों कि उनका
रिश्ता किसी एक व्यक्ति की सम्पूर्ण भावनात्मक और शारीरिक जरूरतों का अंतिम उत्तर
नहीं है।
यहाँ सहमति सबसे
महत्वपूर्ण शब्द है। विवाह के बाहर संबंध होना अपने आप में न तो स्वतंत्रता का
प्रमाण है और न ही विवाह के भीतर होना अपने आप में नैतिकता का। असली प्रश्न यह है
कि संबंध में शामिल लोगों की इच्छा क्या है, उनकी सहमति
कितनी स्वतंत्र है, और क्या किसी व्यक्ति को धोखे, दबाव या अधिकार के नाम पर संबंध में बाँधा तो नहीं गया है। प्रेम में
स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि सामने वाले की भावनाओं की कोई कीमत नहीं; बल्कि इसका अर्थ है कि दोनों व्यक्तियों को अपने बारे में निर्णय लेने का
अधिकार हो।
सिमोन द बोउवार और
जाँ-पॉल सार्त्र का संबंध इस बहस को समझने के लिए अक्सर उदाहरण की तरह सामने आता
है। दोनों ने पारंपरिक दांपत्य की उस धारणा को स्वीकार नहीं किया जिसमें प्रेम का
अर्थ एक-दूसरे पर पूर्ण अधिकार हो। उनके संबंध में स्वतंत्रता, बौद्धिक साझेदारी और व्यक्तिगत चुनाव की एक अलग अवधारणा दिखाई देती है।
बोउवार के जीवन में सार्त्र के अतिरिक्त भी दूसरे प्रेम-संबंध रहे और सार्त्र इन
संबंधों से परिचित थे। वे अपने संबंध को केवल सामाजिक वैवाहिक ढाँचे की शर्तों से
नहीं परिभाषित करना चाहते थे। उनके जीवन को आदर्श बनाकर किसी एक निष्कर्ष पर
पहुँचना जरूरी नहीं, लेकिन यह उदाहरण इतना जरूर बताता है कि
प्रेम और प्रतिबद्धता की कल्पना एक ही ढाँचे में संभव नहीं होती।
दरअसल, प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि बोउवार के कितने प्रेमी थे या सार्त्र ने
उसे स्वीकार कैसे किया। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दो स्वतंत्र व्यक्तियों
ने अपने संबंध की शर्तें स्वयं तय करने का साहस कैसे किया। समाज की सबसे बड़ी
बेचैनी शायद इसी स्वतंत्रता से पैदा होती है। समाज को विवाह इसलिए सुविधाजनक लगता
है क्योंकि उसके भीतर रिश्तों की भूमिकाएँ पहले से तय होती हैं, पति कौन, पत्नी कौन, अधिकार किसका, जिम्मेदारी
किसकी, बच्चे किसके, परिवार किसका।
जैसे ही दो लोग इन तय भूमिकाओं से बाहर अपने संबंध की परिभाषा खुद लिखना शुरू करते
हैं, सामाजिक व्यवस्था असहज होने लगती है।
भारतीय समाज में इस
असहजता का एक बड़ा कारण यह भी है कि यहाँ देह केवल व्यक्ति की निजी चीज नहीं मानी
जाती। परिवार, जाति, धर्म, समुदाय और सामाजिक प्रतिष्ठा तक उसकी निगरानी में शामिल हो जाते हैं।
विशेषकर स्त्री की देह को परिवार की इज्जत से जोड़ दिया गया है। पुरुष के अनेक
संबंधों को अक्सर अनुभव, मर्दानगी या स्वाभाविकता की भाषा
मिल जाती है, जबकि स्त्री की इच्छा को चरित्र के तराजू पर
तौला जाता है। यही दोहरा नैतिक पैमाना विवाह संस्था के भीतर और बाहर दोनों जगह
दिखाई देता है।
लेकिन विवाह संस्था की
आलोचना करते हुए यह भूलना भी ठीक नहीं कि हर विवाह दमन का दूसरा नाम नहीं है। बहुत
से लोगों के लिए विवाह प्रेम, दोस्ती, सुरक्षा, साझेदारी और जीवन की कठिनाइयों को मिलकर
झेलने का सुंदर माध्यम है। समस्या विवाह में नहीं, उस धारणा
में है जिसमें विवाह को मनुष्य के निजी चुनाव से ऊपर रख दिया जाता है। जब विवाह
प्रेम का विकल्प बन जाता है, तब वह संस्था है; जब वह प्रेम और स्वतंत्रता की साझी जमीन बनता है, तब
वह संबंध भी हो सकता है।
इसी तरह विवाह के बाहर
बने हर संबंध को स्वतः मुक्त और प्रगतिशील मान लेना भी उतना ही सरलीकरण होगा। वहाँ
भी अधिकार, ईर्ष्या, असुरक्षा,
छल और भावनात्मक हिंसा संभव है। इसलिए प्रश्न विवाह बनाम अविवाह का
नहीं, बल्कि संबंधों की गुणवत्ता का होना चाहिए। क्या दोनों
व्यक्ति स्वतंत्र हैं? क्या दोनों अपनी इच्छा व्यक्त कर सकते
हैं? क्या ‘न’ कहने का अधिकार सुरक्षित है? क्या संबंध में पारदर्शिता है? और सबसे महत्वपूर्ण- क्या
दोनों को अपनी देह और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का समान अधिकार है?
शायद देह के रिश्तों पर
बहस की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए कि देह पर पहला अधिकार व्यक्ति का है। विवाह उस
अधिकार को समाप्त नहीं करता और विवाह से बाहर होना उस अधिकार को अपने आप पवित्र भी
नहीं बना देता। देह को नैतिकता की सार्वजनिक अदालत में खड़ा करने से पहले यह देखना
जरूरी है कि उसके भीतर इच्छा है या दबाव, सहमति है या भय,
प्रेम है या अधिकारबोध।
भारतीय समाज को शायद
विवाह को समाप्त करने से अधिक अपनी नैतिकता की भाषा बदलने की जरूरत है। दो सहमत
वयस्कों के बीच बने संबंधों को केवल इसलिए अनैतिक कहना कि वे हमारी स्थापित
पारिवारिक संरचना में फिट नहीं बैठते, व्यक्ति की
स्वतंत्रता को सामाजिक सुविधा के सामने छोटा कर देना है। हर संबंध को स्वीकार करना
जरूरी नहीं, लेकिन हर संबंध के लिए एक ही नैतिक पैमाना थोपना
भी न्याय नहीं।
आखिर मनुष्य किसी संस्था
से पहले एक स्वतंत्र व्यक्ति है। विवाह उसकी जिंदगी का एक चुनाव हो सकता है, उसकी नियति नहीं। प्रेम उसका अनुभव हो सकता है, संपत्ति
नहीं। और देह, वह किसी रिश्ते की मुहर नहीं, स्वयं व्यक्ति
के अस्तित्व का हिस्सा है। शायद रिश्तों की सबसे मानवीय शुरुआत वहीं से होगी जहाँ
हम यह मानना सीखेंगे कि किसी व्यक्ति के साथ होना और किसी व्यक्ति का मालिक होना- दो
बिल्कुल अलग बातें हैं।






