फेक आईडी नहीं, फेक इरादे
सन्दीप तोमर
किसी कार्यक्रम में एक महिला से
मुलाकात हुई। औपचारिक-सी बातचीत हुई। जाते-जाते उन्होंने मुझसे कांटेक्ट नंबर
माँगा। मैंने अपने स्वभाव के अनुरूप नंबर दे दिया। मेरे लिए इसमें कोई विशेष बात
नहीं थी। किसी परिचित को नंबर दे देना मेरे लिए वैसा ही सामान्य काम है जैसे किसी
को किताब दे देना या किसी से उसका ईमेल पूछ लेना।
एक-दो दिन बाद व्हाट्सएप पर
सुप्रभात का संदेश आया। मैंने भी सामान्य शिष्टाचार में जवाब दे दिया। फिर
सुप्रभात के साथ दो-चार बातें होने लगीं और दो-चार बातें कब लंबी बातचीत में बदल
गईं, पता ही नहीं चला।
किसी से सहानुभूति पाने का शायद
सबसे आसान और सस्ता तरीका है- अपने पार्टनर से पीड़ित होने की दास्तान सुनाना।
इसमें ज्यादा मेहनत भी नहीं
लगती। कोई लंबी भूमिका नहीं चाहिए। बस इतना कह दीजिए कि पति समझता नहीं, पत्नी
सहयोग नहीं करती,
प्रेमी धोखा दे गया, प्रेमिका बेवफा निकली, ससुराल
वाले प्रताड़ित करते हैं,
बच्चे सुनते नहीं, घर में कोई कद्र नहीं करता...
सामने वाला अगर थोड़ा संवेदनशील हुआ तो आपकी कहानी का एक आसान श्रोता बन जाएगा और
श्रोता मिल जाए तो कहानी लंबी होती चली जाती है।
मैं यह नहीं कहता कि पार्टनर से
पीड़ित होने वाले लोग नहीं होते। बिल्कुल होते हैं। बल्कि हमारे समाज में ऐसे
लोगों की संख्या कम नहीं है। खासकर महिलाओं के संदर्भ में घरेलू हिंसा, मानसिक
प्रताड़ना, आर्थिक निर्भरता,
शराब की लत, विवाह के भीतर असमानता और कई
तरह के शोषण वास्तविक समस्याएँ हैं। इन समस्याओं को केवल ‘घर की बात’ कहकर खारिज
नहीं किया जा सकता।
लेकिन एक समस्या और है। किसी की
पीड़ा सुनना और किसी की पीड़ा का स्थायी कूड़ेदान बन जाना- दो अलग बातें हैं।
शुरुआत में मैं भी सहानुभूति के
कारण उनकी बातें सुनता रहा। वे अपने पति के व्यवहार, उनकी आदतों, शराब, घर के
माहौल और रोजमर्रा की परेशानियों के बारे में बतातीं। मैं सुनता रहा।
कुछ दिन सुनने के बाद मुझे लगने
लगा कि यह बातचीत अब बातचीत नहीं रही। यह बाकायदा ‘पति-पुराण’ बन चुकी है। और
पति-पुराण की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका कोई अंतिम अध्याय नहीं होता।
आज पति ने यह किया। कल पति ने
वह किया। आज पति ने फिर शराब पी। पति शराब पीकर साहचर्य की डिमांड करता है लेकिन
मुझे घिन्न आती है। कल पति ने फिर से पैसे माँगे। न देने पर फिर खूब गाली दी। कल फिर
पति ने झगड़ा किया।
मैं सोचने लगा कि आखिर मैं कर
क्या रहा हूँ? मैं कोई पारिवारिक परामर्शदाता नहीं था। न मैं कोई कानूनी विशेषज्ञ ही हूँ। न
मेरे पास उनके पति को सुधारने की कोई मशीन ही है। न मेरे पास ऐसा कोई जादुई वाक्य
था जिसे सुनकर उनके पति अगले दिन शराब छोड़कर आदर्श पति बन जाते।
मैं सिर्फ एक लेखक हूँ, जो
अपने लेखन और पढ़ाई के लिए मुश्किल से समय निकाल पाता है। मेरी अपनी किताबें हैं, पढ़ाई है, लिखने
के लिए विषय हैं और सबसे बढ़कर समय की अपनी एक सीमित पूँजी है।
मुझे लगा कि मेरा वह समय, जिसे
मैं पढ़ने-लिखने में लगाना चाहता हूँ, किसी ऐसी समस्या को सुनने में
खर्च हो रहा है जिसका समाधान मेरे पास है ही नहीं। तो मैंने उनसे कहा- ‘देखिए, हमें
अपना क्वालिटी टाइम क्वालिटी बातचीत पर खर्च करना चाहिए। ऐसी बातचीत हो जिससे आपको
भी कुछ मिले और शायद मुझे भी लिखने के लिए कोई नया विषय। यह पति-पुराण हमारे दोनों
का समय नष्ट कर रहा है।’
उन्होंने अपनी समस्या फिर से दोहराई
तो मैंने कहा- ‘अगर स्थिति इतनी ही खराब है तो अलग होना भी एक विकल्प हो सकता है।’ यह कहते
हुए मुझे खुद मालूम था कि भारतीय मध्यमवर्गीय समाज में अलग होना कोई मोबाइल का ऐप
डिलीट करने जितना आसान काम नहीं है। यहाँ विवाह सिर्फ दो लोगों के बीच का संबंध
नहीं होता। उसके साथ बच्चे जुड़े होते हैं, परिवार जुड़े होते हैं, आर्थिक
निर्भरता जुड़ी होती है,
सामाजिक प्रतिष्ठा जुड़ी होती है और सबसे बड़ी बात- लोगों
की राय जुड़ी होती है।
‘लोग क्या कहेंगे’ हमारे समाज
में कई बार संविधान से भी बड़ा दस्तावेज हो जाता है।
उन महिला की स्थिति भी कुछ ऐसी
ही थी। उनके पति कामकाजी नहीं थे। महिला स्वयं प्राइवेट नौकरी करती थीं। उसी कमाई
से घर चलता था और पति की शराब का खर्च भी निकलता था। यानी जिस व्यक्ति से वह
परेशान थीं, उसी व्यक्ति की आर्थिक जरूरतों का भार भी उन्हीं के कंधों पर था।
फिर भी मैं यह नहीं चाहता था कि
मेरी हर शाम किसी और के वैवाहिक जीवन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सुनने में निकल जाए। आखिर
एक दिन मैंने कुछ खीजकर स्पष्ट कहा- ‘प्लीज, अब और
नहीं। मेरे पास इतना समय नहीं होता कि मैं एक-एक घंटा यही सब सुनता रहूँ। न मेरे
पास आपकी समस्या का कोई समाधान है और न सिर्फ मुझे सुनाते रहने से आपकी समस्या हल
होने वाली है।’
मैंने फेसबुक से उन्हें अपनी
मित्र सूची से हटा दिया। व्हाट्सएप पर उनका नंबर ब्लॉक कर दिया। और मन ही मन सोचा-
अब शायद सुकून से लिखा-पढ़ा जा सकेगा। लेकिन सोशल मीडिया पर किसी को ब्लॉक कर देना
भी हमेशा किसी कहानी का अंत नहीं होता। कभी-कभी वह अगले अध्याय की शुरुआत होती है।
कुछ समय बाद एक अनजान नंबर से
मैसेज आने लगे। कोई लड़की थी। उसने खुद को देहरादून की कॉलेज स्टूडेंट बताया। कहने
लगी कि वह मेरी कहानियाँ पढ़ती है। मेरे साहित्य में उसकी बहुत गहरी रुचि थी। मेरी
कहानियों के पात्र उसे पसंद थे। मेरी भाषा पसंद थी। मेरे विचार पसंद थे। मेरी लगभग
हर चीज पसंद थी।
अब किसी लेखक को इससे ज्यादा और
क्या चाहिए! लेकिन समस्या यह थी कि उसकी रुचि कुछ ज्यादा ही गहरी थी। इतनी गहरी कि
मुझे शक होने लगा। मुझे लगा कि कहीं कोई परिचित ही नए नंबर से फिरकी तो नहीं ले
रहा।
फिर एक मजेदार संयोग सामने आया।
उस लड़की ने जिन-जिन कहानियों को अपनी पसंद बताया, उनमें वही कहानियाँ भी
थीं जो उस महिला मित्र को पसंद थीं। अब संयोग कभी-कभी इतना संयोग नहीं रहता। मैंने
उस नंबर पर कभी फोन किया तो कॉल डिस्कनेक्ट कर दी गई। दूसरी बार किया तो फिर वही
हुआ।
आखिर एक दिन मैंने सीधे कह दिया-
‘पहले दिन से पता था कि आप यह सब कर रही हैं।’ उसके बाद बातचीत बंद हो गई। मैंने
राहत की साँस ली।
लेकिन इस पूरे प्रसंग ने मुझे
सोशल मीडिया की एक विचित्र दुनिया के बारे में सोचने को मजबूर किया।
हम अक्सर कहते हैं- ‘फेक आईडी।’
मुझे यह शब्द हमेशा थोड़ा अजीब लगता है। आईडी फेक हो सकती है, लेकिन
उसके पीछे बैठा इंसान तो असली ही होता है। वह कोई मशीन नहीं होता। वह कोई काल्पनिक
पात्र नहीं होता। वह एक वास्तविक व्यक्ति है, जिसने बस अपनी पहचान बदल रखी
है। इसलिए मुझे लगता है कि असली समस्या ‘फेक आईडी’ नहीं है।
अगर कहीं कोई समस्या है तो वह
है फेक इरादा।
पहचान छिपाने का अपना कोई नैतिक
अर्थ नहीं होता। वह इस बात पर निर्भर करता है कि पहचान क्यों छिपाई गई है। कोई
व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए पहचान छिपा सकता है। कोई निजी जीवन बचाने के लिए। कोई
सामाजिक दबाव से बचने के लिए। लेकिन कोई व्यक्ति अगर किसी और की पहचान बनकर सिर्फ
इसलिए सामने आए कि वह दूसरे व्यक्ति के जीवन में घुस सके, उससे
निजी बातें निकलवा सके,
उसका समय ले सके या उसके विश्वास का फायदा उठा सके, तो
समस्या प्रोफाइल की नहीं,
इरादे की है। और सोशल मीडिया ने इस काम को बहुत आसान कर
दिया है।
सामने बैठकर किसी से निजी सवाल
पूछने में झिझक होती है। इनबॉक्स में पूछने में नहीं। सामने देखकर कोई अश्लील बात
कहने में शर्म आती है। फर्जी नाम से लिखने में नहीं। सामने वाले की असहमति का
सामना करना मुश्किल लगता है। स्क्रीन के पीछे से वही बात दोबारा-दोबारा कहने में
कोई संकोच नहीं।
सोशल मीडिया ने आदमी को संवाद
की सुविधा जितनी दी है,
उतनी ही छिपने की सुविधा भी दी है। और छिपने की सुविधा ने
कई लोगों को यह भ्रम दे दिया है कि उन्हें कुछ भी करने की आजादी मिल गई है।
सहानुभूति भी एक तरह की लत हो
सकती है
मुझे लगता है कि हमारे समय में
एक और विचित्र प्रवृत्ति बढ़ी है—लोगों को अपनी कहानी सुनाने के लिए श्रोता चाहिए।
हर व्यक्ति चाहता है कि कोई उसे सुने। यह स्वाभाविक भी है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है
जब सुनने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे ‘इमोशनल डस्टबिन’ बना दिया जाए। आप अपनी सारी
निराशाएँ उसमें डालते जाइए। अपना गुस्सा डालिए। अपना वैवाहिक असंतोष डालिए। अपनी
कुंठाएँ डालिए। अपनी इच्छाएँ डालिए। और फिर उम्मीद कीजिए कि सामने वाला हर बार
सहानुभूति के साथ बैठा रहे।
कई बार यह सहानुभूति भी संबंध
का एक माध्यम बन जाती है। पहले समस्या बताई जाती है। फिर समस्या पर चर्चा होती है।
फिर सलाह माँगी जाती है। फिर निजी बातें शुरू होती हैं। फिर भावनात्मक निकटता पैदा
की जाती है। और कई बार वही भावनात्मक निकटता धीरे-धीरे ऐसी जगह पहुँच जाती है जहाँ
से लौटना दोनों के लिए असहज हो जाता है।
यहीं से सोशल मीडिया की कई
कहानियाँ शुरू होती हैं।
एक और किस्सा
इंदौर से एक मित्रता प्रस्ताव
आया। कुछ म्यूचुअल फ्रेंड्स दिखाई दिए तो मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। कुछ ही
दिन बाद मैसेंजर पर बातचीत शुरू हुई।
उस लड़की ने बताया कि उसकी
नई-नई शादी हुई है। पति अच्छा है, लेकिन बिस्तर पर... उसने अपनी वैवाहिक
यौन-असंतुष्टि के बारे में बात करनी शुरू की।
मैंने सबसे पहले यह पता करने की
कोशिश की कि सामने सचमुच कोई महिला है या कोई पुरुष किसी महिला की पहचान से बात कर
रहा है।
एक मित्र से इसकी पुष्टि भी
हुई। उस लड़की ने उन्हें अपनी शादी का निमंत्रण भेजा था और फोन पर आने के लिए भी
कहा था।
तो कम-से-कम इतना स्पष्ट था कि
वह कोई पूरी तरह काल्पनिक प्रोफाइल नहीं थी।
मुझे उससे सहानुभूति हुई। लेकिन
वह सहानुभूति बहुत जल्दी एक दूसरी दिशा में जाने लगी। वह सेक्स चैट करना चाहती थी।
उसका तर्क था- ‘मैं आपसे मिलने की जिद नहीं कर रही। बस आप मुझे रिप्लाई करें और मेरा साथ
दें।’
मैं सोचता रह गया कि यह कैसा
साथ माँगा जा रहा है? और मेरे जैसे साहित्यिक व्यक्ति से इस तरह का साथ क्यों माँगा जा रहा है?
क्या लेखक होना किसी के लिए यह
प्रमाणपत्र है कि वह अपनी हर तरह की कल्पना का सहयात्री बनने के लिए उपलब्ध है?
एक दिन मैंने मैसेंजर खोला तो
इनबॉक्स में एक साथ कई तरह की तस्वीरें थीं। मैंने उन्हें तुरंत डिलीट किया। उसे
चेताया कि भविष्य में इस तरह का कोई वार्तालाप न करे।
यब सब बात मैंने अपनी एक महिला मित्र
से साझा की। उन्होंने कहा- ‘तोमर जी, आप ख्यातिलब्ध हैं। जितनी जल्दी हो उसे
ब्लॉक कीजिए। क्या पता कब कौन किस बात का गलत इस्तेमाल करके आपको ही बदनाम करने
लगे।’
सलाह बिल्कुल व्यावहारिक थी। मैंने
उस आईडी को ब्लॉक कर दिया। लेकिन मन में फिर वही सवाल था- संसार में आखिर कितनी
तरह की कुंठाएँ हैं? और सोशल मीडिया ने उन कुंठाओं को कितने खूबसूरत पैकेज में उपलब्ध करा दिया
है!
किसी के पास अकेलापन है तो उसके
लिए इनबॉक्स है। किसी के पास वैवाहिक असंतोष है तो इनबॉक्स है। किसी के पास सेक्स
की भूख है तो इनबॉक्स है। किसी को सहानुभूति चाहिए तो इनबॉक्स है। किसी को सिर्फ
किसी अजनबी का ध्यान चाहिए तो भी इनबॉक्स है। और किसी को दूसरे के जीवन में
ताक-झाँक करनी है तो भी इनबॉक्स मौजूद है। बस सामने वाला तैयार रहना चाहिए।
महिला मित्रों का इनबॉक्स
महिला मित्रों से जब कभी सोशल
मीडिया की बातचीत होती है तो मुझे अक्सर लगता है कि उनके इनबॉक्स की अपनी एक अलग
दुनिया है। न जाने कितने प्रस्ताव लंबित पड़े होते हैं। कितने ‘हाय’। कितने ‘हैलो
मैम’। कितने ‘आप बहुत सुंदर हैं।’ कितने ‘आपकी पोस्ट बहुत अच्छी लगी।’ कितने ‘आपसे
एक जरूरी बात करनी है।’ कितने ‘क्या हम दोस्त बन सकते हैं?’ और
कितने ऐसे प्रस्ताव जिन्हें खोलकर देखना भी समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं।
पुरुषों के इनबॉक्स में भी यह
सब होता है, लेकिन महिलाओं के मामले में एक और परत जुड़ जाती है- अनचाही निकटता की।
किसी महिला ने कोई तस्वीर डाल
दी तो वह सार्वजनिक घोषणा नहीं होती कि अब हर व्यक्ति उस पर निजी टिप्पणी करने के
लिए अधिकृत है।
किसी ने अपनी जिंदगी के बारे
में कुछ लिखा तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपनी जिंदगी का दरवाजा हर अजनबी के लिए
खोल रही है।
सोशल मीडिया पर सार्वजनिक होना
और निजी होने की अनुमति देना—दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। लेकिन बहुत से लोग इन
दोनों के बीच का फर्क नहीं समझते।
सबसे महँगी चीज- समय
इन तमाम अनुभवों से मुझे एक बात
और समझ आई। सोशल मीडिया पर हम सिर्फ अपनी जानकारी, तस्वीरें या निजी बातें
साझा नहीं करते। हम अपना समय भी साझा करते हैं। और समय शायद हमारी सबसे महँगी चीज
है। पैसा चला जाए तो कमाया जा सकता है। मोबाइल खो जाए तो नया खरीदा जा सकता है। पासवर्ड
बदल सकते हैं। प्रोफाइल बदल सकते हैं। नंबर बदल सकते हैं। लेकिन जो एक घंटा किसी
निरर्थक बातचीत में चला गया, वह वापस नहीं आता।
मैंने अपने लेखन के लिए समय
बड़ी मुश्किल से बचाया है। पढ़ने के लिए समय निकालना पड़ता है। लिखने के लिए समय
निकालना पड़ता है।
एक लेखक का सबसे बड़ा संसाधन
शायद उसकी मेज पर रखा लैपटॉप या उसकी अलमारी में रखी किताबें नहीं, बल्कि
उसका एकांत और समय है। और सोशल मीडिया इस एकांत पर सबसे पहले हमला करता है।
कोई सुप्रभात भेजता है। कोई
पूछता है- क्या कर रहे हैं? कोई कहता है- एक बात पूछनी थी। कोई अपनी समस्या बताता है। कोई अपनी कहानी
सुनाता है। कोई आपकी कहानी पर चर्चा शुरू करता है। कोई निजी बात करता है।
और देखते-देखते वह एक घंटा निकल
जाता है जिसे आपने सोचा था कि आज लिखूँगा। फिर रात को लगता है- आज भी नहीं लिख
पाया।
दोष समय का नहीं था। दोष उस समय
के छोटे-छोटे टुकड़ों का था, जिन्हें हमने बिना हिसाब दिए बाँट दिया।
इसलिए हर बातचीत संबंध नहीं
होती
मुझे लगता है कि हमें सोशल
मीडिया पर एक बात समझने की जरूरत है—हर बातचीत संबंध नहीं होती और हर निकटता
आत्मीयता नहीं होती।
कोई लगातार आपसे बात कर रहा है, इसका
अर्थ यह नहीं कि वह आपको समझता भी है। कोई आपकी कहानियाँ पढ़ रहा है, इसका
अर्थ यह नहीं कि वह आपके व्यक्तित्व तक पहुँचने का अधिकार पा गया है। कोई अपनी
निजी जिंदगी आपके सामने खोल रहा है, इसका अर्थ यह नहीं कि आप उसकी
जिंदगी के स्थायी श्रोता बन गए हैं। और कोई आपकी सहानुभूति चाहता है, इसका
अर्थ यह भी नहीं कि आपको अपनी मानसिक शांति और अपना समय उसके हवाले कर देना चाहिए।
सहानुभूति जरूरी है। लेकिन
सीमाएँ भी जरूरी हैं। किसी की समस्या सुनना मानवीयता है।
हर दिन उसी समस्या में डूबे
रहना जरूरी नहीं। किसी के अकेलेपन को समझना संवेदनशीलता है। उसके अकेलेपन का
स्थायी साथी बन जाना आपकी जिम्मेदारी नहीं। और किसी के जीवन में संकट है तो उसके
प्रति संवेदना रखिए,
लेकिन यह भी समझिए कि हर संकट का समाधान आपका समय नहीं हो
सकता।
फेक आईडी से ज्यादा खतरनाक है
फेक इंटिमेसी
आज जब हम फेक आईडी की बात करते
हैं तो मुझे लगता है कि हमें उससे आगे जाकर ‘फेक इंटिमेसी’ पर भी बात करनी चाहिए।
अजनबी व्यक्ति अचानक आपको बहुत
निजी बातें बताने लगता है। आपको विशेष महसूस कराता है। कहता है कि वह आप पर भरोसा
करता है। आपसे निजी बातें पूछता है। आपकी संवेदनशीलता को पहचानता है। आपकी
कमजोरियों को जानता है। और फिर उसी रास्ते से आपकी निजी सीमा में प्रवेश कर जाता
है।
कई बार उसे आपके जीवन में आने
की जरूरत भी नहीं होती। उसे बस इतना चाहिए कि आप उसे अपना समय देते रहें। वह आपकी
जिंदगी का हिस्सा बने बिना आपकी जिंदगी का समय खाता रहता है। यही सोशल मीडिया की
शायद सबसे कम दिखाई देने वाली चोरी है। समय की चोरी। और इसकी कोई एफआईआर
नहीं होती।
अपनी इमेज से ज्यादा अपनी
सीमाओं की रक्षा कीजिए
आखिर में बात सिर्फ इतनी नहीं
कि सोशल मीडिया पर सतर्क रहिए। बात थोड़ी आगे की है। अपनी छवि के साथ-साथ अपनी
सीमाओं के प्रति भी सजग रहिए। किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत शुरू करते समय यह
मानकर चलना जरूरी नहीं कि सामने वाला बुरा ही है। लेकिन यह मान लेना भी ठीक नहीं
कि सामने वाला वैसा ही है जैसा वह अपने प्रोफाइल पर दिखाई दे रहा है।
पहचान की पुष्टि हो सकती है। इरादे
की नहीं। वह समय के साथ ही सामने आता है।
इसलिए किसी की निजी कहानी सुनकर
तुरंत भावनात्मक रूप से जुड़ जाने की जरूरत नहीं।
किसी की सहानुभूति की जरूरत को
अपनी जिम्मेदारी मत समझिए। किसी के अकेलेपन को अपनी उपलब्धता मत बनाइए।
और सबसे जरूरी- अपने समय को
सस्ता मत समझिए। क्योंकि सोशल मीडिया पर लोग आपकी तस्वीर चुरा लें, आपकी
पोस्ट कॉपी कर लें,
आपका नाम इस्तेमाल कर लें—इन सबका कोई न कोई उपाय है। लेकिन
जो व्यक्ति आपका एक घंटा चुपचाप चुरा लेता है, उसके खिलाफ आपके पास कोई
‘ब्लॉक’ भी नहीं होता।
वह घंटा हमेशा के लिए गया। इसलिए
अब मुझे लगता है- फेक आईडी से डरने की जरूरत उतनी नहीं है, जितनी फेक इरादों को पहचानने की। क्योंकि स्क्रीन के
दूसरी तरफ बैठा व्यक्ति असली हो सकता है, उसका नाम असली हो सकता है, उसकी
कहानी भी असली हो सकती है...
बस आपकी जिंदगी में उसकी जगह और
उसके इरादे, दोनों नकली हो सकते हैं। और तब पता चलता है कि
सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सावधानी पासवर्ड की नहीं, अपने
समय, अपनी सहजता और अपनी सीमाओं की रखनी चाहिए।




