Friday, 8 May 2026

बिगाड़ के डर से… विकलांग विमर्श इतना भी आसान नहीं है...

 


बिगाड़ के डर से…

विकलांग विमर्श इतना भी आसान नहीं है...

मेरे एक शिक्षक साथी ने एक किताब सुझाई और कहा— “सर, आपको यह महत्वपूर्ण किताब अवश्य पढ़नी चाहिए।” उनके आग्रह से मेरे भीतर उस पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता पैदा हुई। फिर पता चला कि उक्त पुस्तक को पुरस्कार भी मिल चुका है और इंदौर की किसी संस्था ने उसके लेखक को सम्मानित भी किया है। अब मेरे लिए उस पुस्तक को पढ़ना लगभग अनिवार्य हो गया था। मैंने पुस्तक खरीदी और पढ़ना शुरू किया।

लेकिन ज्यों-ज्यों मैं पुस्तक पढ़ता गया, मेरी हैरानी बढ़ती गई। हैरानी का कारण यह था कि पुस्तक मेरे भीतर किसी प्रकार की साहित्यिक दिलचस्पी पैदा ही नहीं कर पा रही थी। पन्ना-दर-पन्ना आगे बढ़ते हुए मुझे लगा कि या तो लेखक ने अपनी आपबीती किसी को सुनाकर लिखवा दी है, या फिर लेखक के पास संस्मरणात्मक उपन्यास कहने की वह कलात्मक क्षमता नहीं है, जिसकी इस विधा में सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

वैसे भी “संस्मरणात्मक उपन्यास” जैसी विधा पर अभी तक बहुत गंभीर चर्चा नहीं हुई। मैंने स्वयं इस शैली में कुछ रचनाएँ लिखने की कोशिश की और कुछ वरिष्ठ लेखकों ने उसे स्वीकार्यता भी दी। सच कहूँ तो मुझे संस्मरणात्मक उपन्यास लिखने में अधिक आनंद आता है, क्योंकि इसमें जीवन की वास्तविकता और कथा-संरचना एक साथ चलती हैं। लेकिन यही वह क्षेत्र है जहाँ लेखक की ईमानदारी और कलात्मकता दोनों की असली परीक्षा होती है।

जिस पुस्तक को मैं पढ़ रहा था, उसमें लेखक ने अपने विकलांग जीवन के संघर्षों को लिखते हुए पाठक की सहानुभूति बटोरने पर इतना अधिक जोर दिया कि मूल विषय और उसके भीतर छिपे जीवन-संघर्ष का ताप कहीं पीछे छूट गया। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि विकलांग-विमर्श दया बटोरने का नहीं, मनुष्य के जुझारूपन और अस्तित्व-संघर्ष को सामने लाने का विषय होना चाहिए। लेकिन “विटामिन जिंदगी” में ऐसा नहीं हो पाया। किताब लेखक को एक संघर्षशील मनुष्य के रूप में कम और दया के पात्र के रूप में अधिक प्रस्तुत करती है।

यह समस्या केवल एक पुस्तक तक सीमित नहीं है। मैंने विकलांग-विमर्श पर आधारित अनेक कहानियाँ और उपन्यास पढ़े हैं, लेकिन अधिकांश रचनाकार अपने विकलांग पात्रों के साथ न्याय नहीं कर पाए। हिंदी कथा-साहित्य में विकलांग पात्रों को या तो करुणा पैदा करने वाले पात्र के रूप में चित्रित किया गया है, या फिर उन्हें हास्य और विडंबना का माध्यम बना दिया गया। बहुत कम रचनाएँ ऐसी हैं जहाँ विकलांग पात्र अपनी सम्पूर्ण मनुष्यता, जिजीविषा और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित दिखाई देते हों।

जब मैंने लहरों के पूर्व रंग” पुस्तक का संकलन शुरू किया, तब विकलांग-विमर्श पर केंद्रित अनेक रचनाएँ पढ़ीं। महादेवी वर्मा की “अलोपी” और “गुंगिया”, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की “खितीन बाबू”, विष्णु प्रभाकर की संस्मरणात्मक कहानी “नेत्रहीन”, डॉ. इंद्र बहादुर द्वारा लिखित “हेलेन केलर की आत्मकथा” आदि। इन सबको पढ़ते हुए बार-बार यही महसूस हुआ कि रचनाकार विकलांग पात्रों की भीतरी दुनिया तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाए। कहीं करुणा अधिक हो गई, कहीं आदर्शवाद, कहीं विकलांगता को प्रतीक बना दिया गया और कहीं उसे केवल कथानक का उपकरण भर बना दिया गया।

शायद इन्हीं सब कारणों से भीतर एक बेचैनी पैदा हुई और मैंने एक अपाहिज की डायरी” लिखने का जोखिम उठाया। यह जोखिम केवल साहित्यिक नहीं था, बल्कि आत्मिक भी था। क्योंकि आत्मकथात्मक शैली में लिखते समय लेखक अपने अनुभवों को निर्वस्त्र करता है। उसमें छिपने की गुंजाइश बहुत कम होती है। मैंने अपने नायक के साथ जो घटा, जैसा घटा, उसे पूरी ईमानदारी से कागज पर उतारने की कोशिश की। मैं “मोहनदास करमचंद गांधी” तो नहीं हूँ कि “सत्य के मेरे प्रयोग” जैसी विराट और ऐतिहासिक रचना दे सकूँ, लेकिन इतना जरूर चाहता था कि जो लिखूँ, वह भीतर से झूठा न लगे।


साहित्य में विकलांग-विमर्श का सबसे बड़ा संकट यही है कि यहाँ अक्सर विकलांग व्यक्ति को “मनुष्य” मानने के बजाय “स्थिति” मान लिया जाता है। लेखक उसके दर्द को तो लिखता है, लेकिन उसकी इच्छाएँ, उसका प्रेम, उसका क्रोध, उसका अहंकार, उसका यौन-बोध, उसका सामाजिक अपमान, उसकी महत्वाकांक्षाएँ— इन सबको नज़रअंदाज़ कर देता है। जैसे विकलांग व्यक्ति केवल पीड़ा झेलने के लिए पैदा हुआ हो। जबकि सच यह है कि विकलांग व्यक्ति भी उतना ही जटिल, विरोधाभासी और बहुआयामी मनुष्य होता है, जितना कोई और।

दरअसल हिंदी साहित्य में विमर्शों के नाम पर भी एक फैशन पैदा हो गया है। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श और विकलांग-विमर्श— इन सब पर बड़ी संख्या में ऐसा लेखन सामने आया है, जिसमें अनुभव की प्रामाणिकता कम और वैचारिक प्रदर्शन अधिक है। कुछ लेखक विमर्श को समझने के बजाय उसका उपयोग अपनी “प्रगतिशील छवि” चमकाने के लिए करते दिखाई देते हैं। परिणाम यह होता है कि रचना जीवन से कटकर नारे में बदल जाती है।

इसी बीच कुछ अच्छी रचनाएँ भी पढ़ने को मिलीं। पूजा अग्निहोत्री की कहानी वो धूप जो जलकर निकल गयी” ऐसी ही कहानी है, जो अपने विकलांग पात्र के साथ अपेक्षाकृत अधिक न्याय करती दिखाई देती है। वहाँ पात्र केवल दया का पात्र नहीं बनता, बल्कि अपनी संवेदनाओं और संघर्षों के साथ उपस्थित होता है। ऐसी रचनाएँ उम्मीद जगाती हैं कि हिंदी साहित्य अभी पूरी तरह संवेदनहीन नहीं हुआ।

हाल ही में मैंने एक और चर्चित उपन्यास व्हीलचेयर” पढ़ा। यह उपन्यास भी गहरी निराशा देकर गया। यहाँ भी लेखक पात्र और कथा— दोनों के साथ न्याय करते नहीं दिखाई पड़ते। कथ्य अत्यंत कमजोर है और बार-बार का दोहराव पाठक को थका देता है। ज्ञान प्रकाश विवेक पूरे उपन्यास में किस्सागोई पैदा करने में असफल रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे लेखक के पास अनुभव तो हैं, लेकिन उन्हें कथा में बदलने की कला नहीं है। उपन्यास कई जगह डायरी, कई जगह लेख और कई जगह भावुक आत्मस्वीकृति बनकर रह जाता है। एक जगह वे लिखते हैं— “ज़िन्दगी एक ऐसा लतीफ़ा बना गयी थी, जिसको सुनकर आँसू टपक पड़ते हैं।”
ऐसे वाक्य पढ़कर पाठक का “लतीफ़ा” शब्द से ही विश्वास उठने लगता है। लतीफ़ा अपने स्वभाव में व्यंग्य, विनोद और हल्केपन का वाहक होता है, लेकिन यहाँ लेखक उसे करुणा के ऐसे अतिरंजित बिंदु तक ले जाते हैं कि भाषा अपनी विश्वसनीयता खो बैठती है। साहित्य में संवेदना जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक भाषा की सटीकता भी है।

उपन्यास पढ़ते हुए मैं यह भी नहीं समझ पाया कि प्रेम-विवाह करने वाली पत्नी अस्पताल में भर्ती अपने पति को “मिस्टर असमर्थ” कैसे कह सकती है? यदि यह स्थिति लंबे समय तक विकलांग जीवन के साथ संघर्ष करते हुए आती, तब भी उसे मनोवैज्ञानिक धरातल पर समझा जा सकता था, लेकिन उपचाराधीन व्यक्ति के प्रति इतनी शीघ्र निर्ममता पाठक को चौंकाती है। “क्या फर्क पड़ता है, छुट्टी दो दिन पहले मिले या बाद में, रहना तो आपको बेड पर ही है”— जैसे संवाद प्रेम को गहराई नहीं देते, बल्कि उसे हास्यास्पद और कृत्रिम बना देते हैं।

एक स्थान पर ज्ञान प्रकाश विवेक लिखते हैं— “आकाश अपनी पर्सनैलिटी के प्रति सचेत था। वह लापरवाह-सा नज़र आता।”
यहाँ प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति एक साथ अत्यधिक सचेत और उतना ही लापरवाह कैसे हो सकता है? लेखक चरित्र-निर्माण में स्थिरता नहीं रख पाते। फुटबॉल प्लेयर होना, कद-काठी, विकलांग होने का दर्द— इन बातों का इतना अधिक दोहराव है कि लगने लगता है लेखक की कलम में कथा को आगे बढ़ाने की ऊर्जा कम पड़ गई है। कथानक आगे बढ़ने के बजाय एक ही भावभूमि पर गोल-गोल घूमता रहता है।

एक जगह उपन्यासकार लिखते हैं— “विकलांग लोगों की सबसे बड़ी विडम्बना यह होती है कि वे निरंतर शरीर के उस अंग के बारे में सोचते रहते हैं, जो या तो होता नहीं, या नाकारा, बेहिस और बेजान होता है।”
यह वाक्य पढ़कर लगता है कि लेखक ने विकलांग व्यक्तियों के जीवन को बहुत सतही ढंग से देखा है। यदि वे किसी विकलांग व्यक्ति के साथ कुछ दिन भी बिताते, तो शायद समझ पाते कि विकलांग लोग अपने निष्क्रिय अंगों के बारे में कम, जीवन के सक्रिय संघर्षों के बारे में अधिक सोचते हैं। उन्हें अपने शरीर की कमी पर रोते रहने की फुर्सत नहीं होती। वे अपनी सीमाओं के भीतर नई संभावनाएँ गढ़ते हैं। बहुत-से विकलांग व्यक्ति मानसिक रूप से सामान्य लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक दृढ़ और आत्मनिर्भर हो जाते हैं। वे अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत में बदल देते हैं।

लेखक एक जगह लिखते हैं— “आकाश को इस बात का इल्हाम हो चुका था कि वह लाचार है।”
और अगले ही पृष्ठ पर लिखते हैं— “आकाश अपने अपाहिज रूप को स्वीकार नहीं कर पा रहा था।”
यह विरोधाभास केवल भाषा का नहीं, चरित्र की मनोवैज्ञानिक संरचना का भी है। यदि पात्र अपनी स्थिति को स्वीकार कर चुका है, तो फिर अस्वीकार का संकट क्यों? और यदि वह अभी स्वीकार नहीं कर पाया, तो “इल्हाम” जैसी निर्णायक भाषा क्यों? उपन्यासकार अंत तक यह स्पष्ट नहीं कर पाते कि वे अपने नायक को किस रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं— संघर्षशील मनुष्य, आत्मदया में डूबा व्यक्ति या केवल करुणा बटोरने वाला पात्र।

डॉ. तनेजा के आकाश और संगीता दोनों के साथ संवाद अपेक्षाकृत अधिक दिलचस्प और मनोवैज्ञानिक हैं। उनमें जीवन-दृष्टि की संभावना दिखाई देती है। लेकिन विडम्बना यह है कि उस मनोवैज्ञानिकता का प्रभाव पूरे उपन्यास में कहीं दिखाई नहीं देता। लेखक लिखते हैं— “विकलांग के दुःख हर पल तोड़ते हैं।”
मैं कहता हूँ— विकलांगता के दुःख हमेशा तोड़ते नहीं, कई बार वे मनुष्य को भीतर से असाधारण रूप से मजबूत भी बनाते हैं। डॉ. तनेजा और नर्स स्टेला के संवाद उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति बन सकते थे, लेकिन उनका असर मुख्य पात्रों के व्यवहार और विकास में कहीं परिलक्षित नहीं होता। इससे पूरा कथानक बिखरा हुआ प्रतीत होता है।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद संगीता आकाश को जिस कमरे में रखती है, उसका वर्णन देखिए— पुरानी छतरी, पुराना कूलर, टू-इन-वन, पुरानी वाशिंग मशीन, टूटे जूते, टूटी हत्थेवाली कुर्सी…। यह दृश्य किसी स्वाभाविक वैवाहिक तनाव से अधिक कृत्रिम प्रतीत होता है। मानव-मन की थोड़ी भी समझ रखने वाला व्यक्ति जानता है कि प्रेम-विवाह करने वाले दंपति के बीच इतनी जल्दी ऐसा भावनात्मक पतन आ जाना सहज नहीं है। लेखक बिना पर्याप्त मनोवैज्ञानिक तैयारी के पात्रों को अमानवीय बना देते हैं।

विडम्बना देखिए— रघु, जो एक मूक-बधिर नौकर है, व्हीलचेयर देखकर खुश होता है, जबकि आकाश, जिसे उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, सोचता है— “व्हीलचेयर सुविधा देती है, सुख नहीं।”
यहाँ समस्या व्हीलचेयर नहीं, लेखक की दृष्टि है। उपन्यास में व्हीलचेयर एक सहायक उपकरण कम और कलंक अधिक बनकर उपस्थित होती है। लेखक बार-बार उसे त्रासदी का प्रतीक बनाते हैं, जबकि वास्तविक जीवन में व्हीलचेयर अनेक लोगों के लिए स्वतंत्रता और गतिशीलता का माध्यम होती है।

पूरे उपन्यास में उपस्थित अनेक प्रसंग यह आभास देते हैं कि लेखक का ध्यान कथा की स्वाभाविकता से अधिक पन्ने भरने पर रहा है। पत्नी की बॉस का घर आने वाला प्रसंग भी कुछ ऐसा ही लगता है। जबकि वही बॉस एक अत्यंत सकारात्मक बात कहती है— “एक इनर हाइट भी होती है, उस हाइट को कोई एक्सीडेंट नहीं छीन सकता।”
लेकिन आश्चर्य यह है कि इस संवाद का भी संगीता या आकाश पर कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता। जैसे लेखक स्वयं अपने ही सकारात्मक विचारों पर विश्वास नहीं करते।

एक जगह उपन्यासकार लिखते हैं— “जिन लोगों का शारीरिक रूप से कुछ छिन जाता है, वे समाज में सहमे-सहमे से नज़र आते हैं।”
मैं लेखक से पूछना चाहता हूँ कि वे कितने विकलांग लोगों से वास्तव में मिले हैं? उन्हें अरुणिमा सिन्हा, स्टीफन हॉकिंग और अनेक संघर्षशील व्यक्तित्वों को गहराई से पढ़ने-समझने की आवश्यकता है। विकलांगता मनुष्य को हमेशा सहमा हुआ नहीं बनाती, कई बार वह उसे अधिक निर्भीक और जीवन-सचेत बना देती है।

अध्याय अठारह में लेखक यौन-इच्छाओं को लेकर भी कई अनावश्यक और तर्कहीन बातें लिखते हैं। यौन-क्रीड़ा का किसी व्यक्ति की विकलांगता से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। यह बात लेखक सहित पाठकों को भी समझनी चाहिए। मेरे एक दृष्टिबाधित मित्र विश्वविद्यालय में कहा करते थे— “सेक्स के लिए सेक्स-ऑर्गन की जरूरत होती है, आँखों, हाथों या पैरों की नहीं।”
यह वाक्य जितना सरल है, उतना ही गहरा भी। लेकिन उपन्यास इस विषय को भी दया और हीनभावना के चश्मे से देखता है।

पूरे उपन्यास में आकाश को जितना असहाय दिखाया गया है, वैसा असहाय विकलांग पात्र मैंने अपने जीवन में नहीं देखा। लेखक कई बार उसके हाथों से महंगे कप तुड़वाते हैं। पढ़ते हुए बार-बार मन में प्रश्न उठता है— आकाश पैरों से विकलांग हुआ है या हाथों से? यह अतिशयोक्ति पात्र को विश्वसनीय नहीं रहने देती।

विडम्बना यह भी है कि आज के एंड्रॉइड और डिजिटल युग में लेखक आकाश को व्हीलचेयर पर बैठाकर बिजली का बिल जमा करवाने काउंटर तक भेजते हैं, जबकि उसकी पत्नी स्वयं ऑनलाइन बिल भरती है। वर्क-फ्रॉम-होम के दौर में इंजीनियरिंग पढ़ा-लिखा पात्र बेरोजगार बना रहता है, जबकि उसके सामने अनेक संभावनाएँ हो सकती थीं। इसी प्रकार कनॉट प्लेस जैसे व्यावसायिक इलाके में किसी रेस्तराँ का दरबान व्हीलचेयर के कारण प्रवेश रोक दे— यह भी बेहद अविश्वसनीय लगता है। बाज़ार का मनोविज्ञान ग्राहक को रोकने का नहीं, आकर्षित करने का होता है।

मैंने स्वयं अपनी विकलांगता के बावजूद ऐसा कभी अनुभव नहीं किया कि मुझे कहीं प्रवेश से रोका गया हो। दरअसल लेखक के भीतर व्हीलचेयर को लेकर जो हीनभावना बैठी हुई है, वही बार-बार कथा में रिसती रहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने अपने निजी भय और असुरक्षाएँ नायक पर आरोपित कर दी हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि दुर्घटना के बाद मित्र व्यक्ति से दूरी बना लेते हैं, जबकि अनुभवजन्य सच्चाई यह है कि कठिन समय में कई मित्र और अधिक निकट आ जाते हैं।

यही कारण है कि उपन्यास का लगभग पहला डेढ़ सौ पृष्ठ बोझिल और अनावश्यक विस्तार से भरा प्रतीत होता है। वास्तविक उपन्यास तो अंतिम तीस-चालीस पन्नों में कहीं जाकर शुरू होता है। और सबसे बड़ी विडम्बना यह कि विकलांग पति को छोड़कर चली गई पत्नी का अंत में बिना पर्याप्त कारण लौट आना उतना ही अतार्किक लगता है, जितना उसका अचानक छोड़कर चले जाना। उपन्यास अपने अंत तक आते-आते पाठक को भावनात्मक संतोष नहीं, बल्कि एक अधूरी और अविश्वसनीय कथा का अनुभव देकर छोड़ता है।

असल में विकलांग-विमर्श पर लिखना केवल “विकलांगता” पर लिखना नहीं है। यह मनुष्य की उस लड़ाई को लिखना है, जो वह अपने शरीर, समाज, व्यवस्था और कभी-कभी अपने ही भीतर से लड़ता है। यहाँ लेखक को अतिरिक्त संवेदनशीलता और अतिरिक्त ईमानदारी की आवश्यकता होती है। लेकिन अक्सर लेखक या तो दया में फँस जाता है या प्रेरणात्मक भाषण देने लगता है। दोनों ही स्थितियाँ साहित्य को कमजोर करती हैं।

मुझे लगता है कि आने वाले समय में हिंदी साहित्य को विकलांग-विमर्श पर नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। विकलांग पात्रों को “बेचारा” या “महान” बनाकर प्रस्तुत करने के बजाय उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह देखने की जरूरत है। क्योंकि सबसे बड़ा अन्याय यही है कि किसी मनुष्य को उसकी सम्पूर्ण मनुष्यता से वंचित कर दिया जाए।

और शायद इसी “बिगाड़” के डर से बहुत से लेखक सच लिखने से बचते हैं। वे पात्र को सुरक्षित बनाते हैं, कथा को मुलायम बनाते हैं और जीवन की असुविधाजनक सच्चाइयों पर पर्दा डाल देते हैं। लेकिन साहित्य यदि असुविधाजनक सच कहने का साहस खो देगा, तो फिर वह केवल पुरस्कारों और सम्मानों की सीढ़ी भर बनकर रह जाएगा।

 

Thursday, 7 May 2026

कहानी और पुरस्कार


 कहानी और पुरस्कार
एक किस्सा कुछ यूँ---

एक ऑनलाइन और ऑफलाइन पत्रिका ने मिलकर कहानी प्रतियोगिता आयोजित की। नियम बड़े लोकतांत्रिक अंदाज़ में लिखे गए थे— “पुरस्कार का आधार पाठकों के लाइक और कॉमेंट्स होंगे।”
अब मैं सामान्यतः ऐसी प्रतियोगिताओं में कहानियाँ नहीं भेजता। साहित्य को मैं कभी वोटिंग एप का खेल नहीं मान पाया। लेकिन एक बहुत प्रिय महिला मित्र ने अपनी कहानी भेजते हुए आग्रह किया—
“तोमर जी, आप भी कहानी भेजिए न…”

दोस्ती के आग्रह में आदमी कई बार अपने सिद्धांतों को थोड़ी देर के लिए कोने में रख देता है। मैंने भी रख दिया। नियमावली पढ़ी, थोड़ा माथा पकड़ा, फिर सोचा— चलो, देख लेते हैं कि साहित्य का नया लोकतंत्र कैसा दिखता है।

मन में एक सवाल लगातार कुलबुला रहा था—
क्या सचमुच सामान्य पाठक कहानी की तकनीक, संरचना, शिल्प, कथ्य, चरित्र-विकास और भाषा की बारीकियों को उस स्तर पर परखते हैं कि केवल लाइक और कॉमेंट्स को ही पुरस्कार का आधार बना दिया जाए?
क्योंकि सोशल मीडिया पर तो लोग कई बार सिर्फ लेखक का चेहरा देखकर भी “वाह सर”, “गजब”, “लाजवाब” लिख आते हैं। कहानी पढ़ना तो दूर, शीर्षक तक पूरा नहीं पढ़ते।

खैर, कहानी अपलोड कर दी गयी।

धीरे-धीरे प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। मेरी कहानी पर सबसे अधिक लाइक आए, सबसे अधिक टिप्पणियाँ आईं। लोग कहानी शेयर कर रहे थे, बहस कर रहे थे, निजी संदेश भेज रहे थे। मैं यह नहीं कहता कि मेरी कहानी सर्वश्रेष्ठ थी, लेकिन प्रतियोगिता की घोषित शर्तों के हिसाब से वह स्पष्ट रूप से सबसे आगे थी।

फिर परिणाम आया।

और परिणाम देखकर मुझे पहली बार समझ आया कि साहित्यिक प्रतियोगिताओं में “नियमावली” केवल पाठकों को उत्साहित रखने के लिए होती है, आयोजकों को बाँधने के लिए नहीं।

जिस कहानी को पाठकों ने सबसे अधिक पसंद किया, उसे प्रथम नहीं बल्कि द्वितीय पुरस्कार दिया गया।
और जो कहानी प्रथम हुई, उसके बारे में लोगों ने उतनी चर्चा तक नहीं की थी।

मेरी मित्र की कहानी प्रतियोगिता से बाहर कर दी गयी।

अब यहाँ से कहानी ज्यादा दिलचस्प हो जाती है।

कुछ दिन बाद आयोजक महोदय मेरी उस मित्र को फोन करते हैं—
“आपकी कहानी वास्तव में दिल को छूने वाली थी… प्रतियोगिता में भले चयन न हो पाया हो, लेकिन मैं उसे अपनी प्रिंट पत्रिका में स्थान दे रहा हूँ… और पत्रिका की प्रति भी आपको भेजूँगा…”

यह सुनकर मुझे साहित्य कम, पुरानी हिंदी फिल्मों के संवाद ज्यादा याद आने लगे।

फिर प्रिंट पत्रिका आई।
उसमें न मेरी द्वितीय पुरस्कार प्राप्त कहानी थी, न प्रतियोगिता के घोषित परिणामों का कोई सम्मान।
लेकिन मेरी मित्र की कहानी बड़े आदर से प्रकाशित थी।

अब आप इसे संयोग कह सकते हैं।
मैं इसे साहित्यिक संस्कार नहीं कह पाता।

धीरे-धीरे समझ आने लगता है कि कुछ लोग पत्रिका नहीं निकालते, वे अपने अहंकार और आकर्षण का निजी दरबार चलाते हैं।
कई तथाकथित संपादकों के लिए साहित्य साधना नहीं, “इम्प्रेशन मैनेजमेंट” का माध्यम बन चुका है।
वे कहानी कम पढ़ते हैं, प्रोफाइल फोटो ज्यादा देखते हैं।
रचना से अधिक रचनाकार के जेंडर में रुचि रखते हैं।
और “प्रकाशन” को ऐसे पेश करते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा उपकार कर रहे हों।

सबसे मजेदार बात यह है कि ऐसे लोग खुद को साहित्य का प्रहरी भी घोषित किए रहते हैं।
फेसबुक पर लंबी पोस्ट लिखेंगे—
“हम साहित्य में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते…”
और इनबॉक्स में लिखेंगे—
“मैम, आपकी संवेदनशीलता ने मन छू लिया…”

अब ये “मन” कहाँ छूता है, यह साहित्य का विषय नहीं, मनोविज्ञान का विषय है।

आजकल कई ऑनलाइन प्रतियोगिताएँ वास्तव में साहित्यिक कम, डिजिटल दुकानदारी अधिक हो गयी हैं।
लाइक जुटवाओ, मित्रों से कॉमेंट कराओ, वेबसाइट की ट्रैफिक बढ़ाओ, पत्रिका का प्रचार करवाओ— और अंत में पुरस्कार उस व्यक्ति को दे दो जो आयोजकों की निजी पसंद हो।

कई बार तो निर्णायक बाद में खोजे जाते हैं और विजेता पहले तय होते हैं।
कुछ जगह पुरस्कार प्रतिभा को नहीं, परिचय को मिलता है।
कुछ जगह लेखन नहीं, लॉबिंग जीतती है।
और कुछ जगह “साहित्यिक संस्कार” का अर्थ होता है— आयोजक की पोस्ट पर नियमित “वाह वाह” करना।

दुखद यह नहीं है कि पुरस्कार पक्षपाती हो गया।
दुखद यह है कि इस प्रक्रिया में नए लेखक सबसे अधिक ठगे जाते हैं।
वे सचमुच विश्वास कर लेते हैं कि साहित्य एक निष्पक्ष दुनिया है।
वे रात-रात भर जागकर कहानी लिखते हैं, शब्दों में अपना जीवन उड़ेल देते हैं, और फिर देखते हैं कि परिणाम किसी और ही गणित से तय हो रहे हैं।

लेकिन समय बदल रहा है।

अब महिलाएँ भी समझने लगी हैं कि हर “आप बहुत अच्छा लिखती हैं” वास्तव में साहित्यिक प्रशंसा नहीं होती।
हर “मैं आपकी रचना पत्रिका में लेना चाहता हूँ” के पीछे संपादकीय ईमानदारी नहीं होती।
और हर साहित्यिक मंच वास्तव में साहित्य के लिए नहीं चलाया जाता।

इसलिए ऐसे आयोजकों और संपादकों से मेरा साफ संदेश है—

मेरे भाई,
प्रकाशन के नाम पर महिलाओं को प्रभावित करने का यह पुराना खेल अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला।
लेखिकाएँ अब आपकी कृपा पर निर्भर नहीं हैं।
सोशल मीडिया ने उन्हें अपनी आवाज़ खुद दे दी है।
वे अब समझती हैं कि कौन रचना पढ़ रहा है और कौन केवल अवसर तलाश रहा है।

साहित्य सेवा के नाम पर निजी आकर्षण की दुकानें बहुत दिन नहीं चलतीं।
क्योंकि अंततः शब्द बचते हैं, चालाकियाँ नहीं।

बिगाड़ के डर से--- पुरस्कार और कहानी लेखन

 बिगाड़ के डर से--- पुरस्कार और कहानी लेखन


पिछले वर्ष गाजियाबाद एक कहानी की वर्कशॉप में बोलने का मौका मिला तो मैंने कहानी विधा की एक लम्बी विकास यात्रा की बात करते हुए कहा था - कहानी अब पुराने घिसे–पिटे विषयों से कहीं आगे का सफ़र तय कर चुकी है। कहानीकार अपने समय की नब्ज को पकड़े और वहाँ से कहानी के विषय लेकर कहानी लिखे। हाल-फिलहाल कुछ कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता है कि कुछ लेखक तो भाषा के स्तर पर खूब मेहनत कर रहे हैं, अत्यधिक क्लिष्ट और सुसंस्कृत भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो भाषा के स्तर पर सोचते ही नहीं कि वे क्या लिख रहे हैं? नरेशन हो या संवाद - उनकी बहुत लचर भाषा होती है। अधिकांश कहानीकारों की यह भी दिक्कत है कि वे प्रवचन की मुद्रा में आकर कहानी के मूल रूप को भूल बैठते हैं। उस कार्यक्रम में विनय विक्रम सिंह की कहानी के हवाले से मैंने कहा था - “भाषा का अपना सौन्दर्य है, किंतु जब कहानीकार अति-चित्रात्मक और कीमियागिरीपूर्ण लेखन करता है या हर वाक्य में रचनाकार का सजग सौन्दर्यबोध झलकता है तो कथा का शिल्प कथा की गति को रोक देता है... ऐसी कहानियों में कहानी का वातावरण, भाषा और संवेदना की गहनता तो होती है— पर ऐसे कहानीकार अपने समय से संवाद नहीं कर पाते। लेखक एक सुंदर, पर नॉस्टैल्जिक संसार रचता है, जहाँ गरीबी भी गरिमामय है और अभाव भी कलात्मक। किंतु यह यथार्थ नहीं, यथार्थ का सौंदर्यीकृत पुनर्निमाण है। आज के दौर में जहाँ कला, धर्म और आजीविका का मिश्रण नए आयाम ले रहा है, वहाँ ऐसी कथाएँ पुराने मिथकीय आग्रह, लेखक के निजी पूर्वाग्रहों में फँसी प्रतीत होने लगती हैं।”
यही बात मुझे कुणाल सिंह की कहानी “विसर्जन” को पढ़कर महसूस हुई थी। विसर्जन को पढ़कर मैंने एक लम्बी टिप्पणी उन्क्त वेब पोर्टल को लिखी थी, लेकिन उन्होंने उक्त टिप्पणी को प्रकाशित नहीं किया।
नवम्बर २०२५ में अंजू शर्मा की कहानी को प्रसिद्ध कथा यूके का इंदु शर्मा कथा सम्मान दिया गया। यह एक निष्पक्ष चयन प्रक्रिया वाला सम्मान है। ऐसा दावा किया जाता है। मन में उत्सुकता हुई कि चुनी गई कहानी पढ़ी जाए... कहानी को पढ़कर लगा कि एक बेहद मजबूत थीम पर बेहद लचर कहानी लिखी गई है। इसमें टर्निंग पॉइंट्स, ड्रामा-टेंशन-रिलीज़ और भावनात्मक ज्वार के बीच ज्वलंत समन्वय को और कसावट की जरूरत है, ऐसा मुझे महसूस हुआ। कहानी में दो संघर्ष हैं— पहला समाज बनाम राधे, दूसरा राधे का प्रेम बनाम उसकी स्त्रीरूप पहचान। कहानी में इनका संतुलन नहीं दिखा। कहानी प्रेम वाली लाइन को छूकर छोड़ देती है; वह arc विकसित नहीं हो पाती। राधे की आंतरिक यात्रा भी आधी-अधूरी रह जाती है— उलझन दिखती है, पर resolution या breakdown नहीं आता।
भगतजी की मृत्यु कहानी का असली pivot है, पर प्लॉट को यहाँ चरम तक ले जाना चाहिए था, लेकिन कहानीकार ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं है। कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी मुझे यह लगी कि राधे का मनोवैज्ञानिक द्वंद्व पूरी तरह articulate नहीं हुआ; climax तक भी उसकी growth या fall स्पष्ट नहीं हो पाता। चंदा सबसे महत्वपूर्ण भावनात्मक धुरी बन सकती थी, पर उसका किरदार कथा में कोई आयाम नहीं पाता। चंदा–राधे का रिश्ता केवल संकेत में है; इसमें संभावित tragedy या forbidden love का भारी material है, जिस पर काम होना चाहिए था। कहानी में लंबे संवाद में लेखक ने दो-चार शब्द शुरू में और दो-चार ही अंत में ब्रज भाषा के लिखकर बताया है कि ये संवाद ब्रज भाषा का ज्ञाता दर्शाने के लिए ठूंसे भर हैं; लेखक खुद ब्रज भाषा लिखने में सिद्धहस्त नहीं है। एक ही वाक्य में संस्कृत-निष्ठ हिन्दी, ब्रज और उर्दू का घालमेल भी दिखता है।
कथा में वर्णन बहुत है, घटनाएँ कम। आंतरिक संघर्ष की भाषा कवितामयी है, पर analytical depth कम है या न के बराबर। कई बार कहानी जर्नल की तरह लगने लगती है, फिक्शन की तरह नहीं। अगर समाजशास्त्रीय परतों पर बात की जाए तो हम पाते हैं कि यह कहानी असल में जेंडर–द्वैत का विघटन दर्शाती है। राधे की देह और मन अलग-अलग दिशाओं में खिंचते हैं— यह trans-feminine या gender-fluid identity की ओर संकेत करता है, पर कहानी इसे सिर्फ अभिनय की परिणति मानती है।
कहानी में— Conflict है (समाज vs कला vs पहचान), Build-up भी है (दुविधा, तंज, प्रेम, कला, गिरावट), पर Climax या Resolution नहीं है (राधे किस ओर जाता है? टूटता है? लड़ता है? समर्पित होता है? स्वीकारता है? खो देता है?) यह “आख्यान-पूर्णता” की सबसे बड़ी कमी है।
कहानी को बेहतर बनाने के लिए ठोस प्रेम–रेखा विकसित की जानी चाहिए थी। चंदा का arc कहानी को भावनात्मक ऊँचाई दे सकता है। जैसे— क्या वह राधे का प्रेम स्वीकार करती या अस्वीकार? समाज उसे कैसे देखता? क्या यह प्रेम राधे का उपचार बनता है या और घाव? राधे का मनोवैज्ञानिक संघर्ष गहरा किया जाना चाहिए था— जिसमें identity crisis, अपनी देह से संघर्ष, कला vs समाज, प्रेम vs वास्तविकता, आत्मसम्मान vs भूख इत्यादि को ध्यान में रखा जाता।
बहरहाल, यदि निर्णायकों ने इस कहानी को कथा सम्मान के लिए चुना है तो उनकी अपनी आलोचनात्मक, पाठकीय दृष्टि है, लेकिन यहाँ यह सवाल अवश्य खड़ा होता है कि निर्णायकों में कितनी निष्पक्षता होती है? वे किसी कहानी को किस कसौटी पर कसते हैं? उनके अपने पुरस्कारों के अपने मानक क्या हैं? मुझे लगता है कि कहानीकार की विचारधारा निर्णायकों और आयोजकों से कितनी मिलती है, यह भी चयन का एक महत्वपूर्ण घटक हो सकता है। शॉर्टलिस्ट किए जाने का भार जिनके ऊपर होता है, उनके आपसी रिश्ते भी कई बार चयन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि ऐसा हो ही, यह मेरा अनुमान भर भी हो सकता है। आवश्यक नहीं कि किसी निष्पक्ष आलोचना की पुरस्कारों के लिए कथाओं के चयन से कोई तारतम्यता हो।
बहरहाल, यह सब मेरी चिंता का विषय नहीं है। अभी हाल ही में सन्निधि ने अनीता प्रभाकर कहानी प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कारों के साथ ही कुछ सांत्वना पुरस्कारों के नामों पर मेरी नजर गई, जिनमें एक घोर सांप्रदायिक नाम के साथ ही डॉ. रंजना जायसवाल का भी नाम था। अभी कुछ दिन पहले एक नवोदित लेखिका ने चर्चा के समय कहा— डॉ. रंजना जायसवाल आजकल बढ़िया कहानियाँ लिख रही हैं... ।
आजकल पैर की चोट के चलते इधर-उधर जाना लगभग बंद रहा, और कार्यक्रमों में जाना तो एकदम बंद है।बहराल घर से ही साहित्य का पठन-पाठन चल रहा है।
संयोग ही है कि कल ही एक साहित्यिक पत्रिका मिली, जिसमें सबसे पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त अपनी प्रिय लेखिका ममता कालिया की कहानी पढ़ी, उसके बाद डॉ. रंजना जायसवाल की कहानी पढ़ी।
कहानी का शीर्षक है— “भालचंद्र डिब्बे वाला”। पत्रिका के ढाई पृष्ठ कहानीकार ने निःसंदेह खराब कराए हैं, जिनमें किसी लेखक की एक कहानी का पूरा स्पेस मिल सकता था। ये वो ढाई पृष्ठ हैं, जिनकी कहानी में कोई आवश्यकता मुझे नहीं लगी।
ढाई पृष्ठ पढ़ने के बाद मेरे अंदर का पाठक भाषा का स्तर देख बेचैन हो उठा।
“हम खानाबदोशों के ठिकाने का कोई पता कहाँ होता है न?” (पृष्ठ-२२)
सामने दरवाजे के दाहिने तरफ उसके नाम की नेम प्लेट चमक रही थी (पृष्ठ-२२)
मेज पर उसके नाम की नेम प्लेट रखी थी पृष्ठ-२२)
रिवलिंग चेयर पर बगुले सी सफ़ेद और मुलायम सफ़ेद तौलिया रखी हुई थी(पृष्ठ-२२)
बैंक की तरफ आते वक्त उसने एक डिब्बे वाले को देख था (पृष्ठ- २३)
अरविन्द जी के पीछे-पीछे पूरा कुनबा भी चल आया था (पृष्ठ-२३)
नौ जवानों और अधेड़ कर्मचारियों के एक कुनबा उनके चैंबर में बिखर चुका था (पृष्ठ-२३)
तब तक स्थान्तरण के एक पत्र (पृष्ठ-२३)
इमारतें अब उसे उतनी अपरिचित नहीं लग रहे थे (पृष्ठ-२३)
यहीं-कहीं आस-पास डब्बे वाले भाऊ (पृष्ठ-२३)
भाऊ डब्बे वाले का काम करते थे (पृष्ठ-२३)
उनके जैसे पांच हजार हजारों लोग इस शहर में डब्बे वाले का काम करते थे (पृष्ठ-२३)
पृष्ठ २४ पर पहचानने के लिए हुलिया का वर्णन करते हुए कहानीकार लिखती हैं- बहत्तर किलो वजन, खिचड़ी बाल, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर का पेशेंट, डबल चिन और तोंद वाले राजीव को पहचानना मुश्किल तो था पर नामुमकिन तो नहीं... (मुझे समझ नहीं आया कि पहचान के लिए डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर कैसे झलक जाता है? ये शरीर के अन्दर की बीमारी हैं या बाहर से दिखने वाली?)
प्यार की दो छींटे क्या पड़ी (पृष्ठ-२४)
वक्त की मार से वो चश्मा भी अब चोटहिल हो चुका था (पृष्ठ-२४)
उन्होंने बुढ़ापे में झुक गयी कमर की तरह झुक आई चश्में की डंडियों को सूती धागे से बांधकर सीधा कर साध दिया था (पृष्ठ -२४)
बूढ़ी हो गयी हो तेरी ताई... जब देखो किड़-किड़ करती रहती हो (पृष्ठ-२६)
उन्होंने अपनी झुर्रीदार हाथों से उसके हाथों को अपने हाथों में ले लिया (पृष्ठ-२६)
दरिया बह निकलने को बहाने ढूढ रहा था(पृष्ठ-२६)
वे बारिश के हल्के दबाव से मिट्टी के बाहर अपने झरोखों से बाहरी दुनियाँ को झाँकने लगे हैं (पृष्ठ-२६)
दर्द बादलों के माध्यम से धरती पर टप-टप टपक रहा था (पृष्ठ-२६)
कहानी में इन वाक्यों को पढ़कर लगा कि कहानीकार आखिर किस तरह की नई भाषा गढ़ रहा है? क्या यह नव-व्याकरण है या फिर नई वाली हिंदी के भाषिक प्रयोग?
इसी संदर्भ में एक और हालिया प्रसंग याद आता है। हाल ही में पाकिस्तान में एक स्कूल में हुई घटना को मीडिया में काफी कवरेज मिला—एक स्कूल की प्रधानाचार्या ने अपने चपरासी के चाय पिलाने के स्टाइल से प्रभावित होकर उसके साथ निकाह कर लिया। चूँकि खबर बहुत वायरल हुई, तो शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इस खबर से परिचित न हुआ हो। एक लेखक महेन्द्र तिवारी ने उस घटना पर कहानी लिखी, जिसे जनसत्ता अखबार ने प्रकाशित किया।
जब मैंने ये कहानी साहित्य किंज के व्हाट्सएप ग्रुप में पढ़ी तो मैंने लिखा— “ये पूरी अखबार की खबर है। उसे कहानी बनाकर लिख दिया गया बस।”
कहानीकार का तर्क था— “तो कहानी भी एक घटना ही होती है सर। अगर रिपोर्टिंग लिखी जाती तो कहानी कैसे कहलाती? धुरंधर फिल्म की कहानी को आप क्या कहेंगे? आप कहेंगे कि धुरंधर भी मौलिक नहीं है?”
फिर किसी महाशय की टिप्पणी थी— “सच्ची घटनाओं पर कहानियां लिखी जाती हैं। और पहले भी लिखी जाती रही हैं। उसमें कहानीपन होना चाहिए।”
मैंने अपनी बात रखते हुए कहा— “लेखक की मौलिकता वहां होती जहां वह पात्रों के आंतरिक भावों को पाठक के सामने रख दे। उसके भीतर के द्वंद्व को बाहर निकाल दे। कुल मिलाकर कहानी घटना भर न हो। अमीना बेगम ने चपरासी से शादी क्यों की? पूरी कहानी इस पर केंद्रित होनी चाहिए। इसी बात की पड़ताल करें तो?”
मैंने उस घटना की खबर के कुछ लिंक शेयर किए, तो जवाब मिला— “रिपोर्टिंग में यह दिखाया गया है कि उसके चाय रखने के सलीके से प्रभावित होकर प्रिंसिपल मैम चपरासी से निकाह कर लेती है। लेकिन कहानीकार बाह्य कारकों से निकाह नहीं करा सकता है। साहित्यकार उसके अंदर की फीलिंग को बाहर निकालने का काम करता है। तभी वह साहित्यिक कृति बन पाती है। आपने इसमें प्रयास तो किया है पर संवेदनाओं पर कुछ घटनाएं हावी दिख जाती है। खैर इससे कहानी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। यह कहानी ही है और इसे महेंद्र तिवारी की कहानी कहा जाएगा।”
मेरा मत था— “रिपोर्टिंग को कहानी में बदलने को मौलिक रचना कैसे कहा जा सकता है? कहानी कहे जाने पर सवाल नहीं है, सवाल मौलिकता पर है। मौलिकता यानी नया दृष्टिकोण (vision), न कि केवल नया कथानक (plot)।”
लेखक का तर्क था— “आपके अनुसार उसमें मौलिकता यानि नया दृष्टिकोण नहीं है? पहले तो ये बोल रहे थे कि कहानी मौलिक नहीं है। अब कह रहे हैं कि नया दृष्टिकोण नहीं है। आप कहानी पर सवाल खड़े नहीं कर रहे, आप तो जनसत्ता की स्तरीयता और उसके संपादक पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। यह आवश्यक नहीं कि हर कहानीकार आपके दृष्टिकोण से ही कहानी लिखे।”
मेरा स्पष्ट मानना है कि कहानीकार को कहानी से इतना मोह नहीं होना चाहिए कि वह कहानी के डिफेंस में तर्क करने लगे।
कहानीकार ने कहा- आप तो जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित अखबार पर ही सवाल खाद आकार रहे हैं?
मुझे लगता है कि कोई अखबार, कोई पत्रिका, कोई लेखक, कोई रचना आलोचना से परे नहीं हो सकते।
एक महोदया उनके पक्ष में तर्क देती हैं— “कहानियां, कविताएं सभी आसपास घटी घटाओं, आप बीती या जग बीती से ही निकलती हैं। यदि यह घटना स्वयं देखी होती या किसी से सुनी होती, उसकी रिपोर्टिंग न होती तो इस कहानी को मौलिक कहा जाता, यदि रिपोर्टिंग हो गई तो, कहानी मौलिक नहीं हुई? यह समाचार हजारों ने पढ़ा होगा, कितनों ने कहानी में ढाला?”
मुझे कहना पड़ा— “यानी अब मौलिकता को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। समाचार या रिपोर्टिंग पर कहानी लिखी जा सकती है। इससे मुझे कोई गुरेज नहीं है। लेकिन मेरा सवाल मौलिकता को लेकर था। कथानक का स्रोत चाहे कहीं से भी हो (खबर, लोककथा, इतिहास), यदि लेखक उसमें नया अर्थ, नया संवेदनात्मक अनुभव और रचनात्मक पुनर्संरचना देता है, तो वह रचना मौलिक मानी जाएगी। लेकिन यदि कहानी केवल खबर का विस्तार भर है—अर्थात घटनाक्रम वही है, पात्रों में कोई गहराई नहीं जोड़ी गई, और लेखक का दृष्टिकोण नया नहीं है—तो उसे ‘रिपोर्टाज’ या ‘रूपांतरण’ तो कहा जा सकता है, लेकिन पूरी तरह मौलिक कहानी नहीं।”
यही वह बिंदु है जहाँ समूची बहस आकर टिकती है—चाहे वह पुरस्कार प्राप्त कहानियाँ हों या अख़बार में छपी चर्चित रचनाएँ। सवाल सिर्फ भाषा या कथानक का नहीं है, बल्कि उस रचनात्मक ईमानदारी का है, जो किसी भी साहित्यिक कृति को “घटना” से “कहानी” बनाती है।
आख़िरकार प्रश्न सिर्फ एक कहानी या एक लेखक का नहीं है, बल्कि उस समूची साहित्यिक व्यवस्था का है जहाँ भाषा की बुनियादी शुद्धता, कथ्य की आंतरिक सच्चाई और शिल्प की ईमानदारी की जगह अक्सर संबंधों, विचारधारात्मक निकटताओं और दिखावटी प्रभावों को तरजीह मिलने लगती है। यदि कहानी अपने समय की संवेदना को सटीक भाषा और प्रामाणिक अनुभव के साथ व्यक्त नहीं कर पा रही, और फिर भी वह पुरस्कारों से नवाज़ी जा रही है, तो यह केवल एक रचना की विफलता नहीं, बल्कि चयन-प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न है।
साहित्य में असहमति स्वाभाविक है, दृष्टियाँ भिन्न हो सकती हैं, परंतु भाषा की लापरवाही और शिल्प की कमजोरी को ‘नवाचार’ का नाम देकर प्रतिष्ठित करना अंततः साहित्य के साथ ही अन्याय है। जरूरी यह है कि हम रचना को रचना की कसौटी पर परखें— न कि रचनाकार के प्रभाव, परिचय या प्रचलित धारणाओं के आधार पर। वरना वह समय दूर नहीं जब कहानी अपने मूल स्वभाव— जीवन के सत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति से भटककर एक औपचारिक अभ्यास मात्र बनकर रह जाएगी।
सन्दीप तोमर (कथाकार, आलोचक)
नई दिल्ली

सीरिज == बिगाड़ के डर से... जानकी पुल पर एक कहानी पढ़ी-- कहानी पर मेरी राय---

 बिगाड़ के डर से...


जानकी पुल पर एक कहानी पढ़ी-- कहानी पर मेरी राय---
सुधा ॐ धींगरा की कहानी ‘अंतर्नाद’ अपने विषय के कारण पहली नज़र में महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है। बलात्कार, स्त्री-अस्मिता, मीडिया-ट्रायल, पितृसत्ता और स्त्री की आत्मप्रतिष्ठा जैसे प्रश्न निस्संदेह हमारे समय के बड़े प्रश्न हैं। लेकिन किसी गंभीर विषय का चयन मात्र किसी रचना को प्रभावशाली नहीं बना देता। साहित्य का मूल्यांकन अंततः उसके कलात्मक निर्वाह, शिल्प, भाषा, चरित्र-निर्माण, अंतर्विरोधों की विश्वसनीयता और कथ्य की आंतरिक संगति के आधार पर होता है। इसी कसौटी पर ‘अंतर्नाद’ एक अत्यंत कमजोर, असंतुलित और कई स्तरों पर सतही कहानी बनकर सामने आती है।
सबसे पहली समस्या कहानी के शिल्प की है। पूरी कहानी वस्तुतः एक लंबे भाषण में बदल जाती है। यह कहानी कम और मंचीय वक्तव्य अधिक लगती है। कथानक, दृश्य, परिस्थितियाँ, संवाद, पात्रों के बीच का तनाव — सब कुछ अनुपस्थित है। नायिका लगातार बोलती जाती है और लेखक उसकी आवाज़ में अपने विचार ठूँसता जाता है। कहानी में कथा-संरचना का विकास नहीं है, बल्कि एक विचारधारात्मक मोनोलॉग है जो पचासों पन्नों तक फैला हुआ है। साहित्य में विचारों की उपस्थिति बुरी नहीं होती, लेकिन जब विचार पात्रों की स्वाभाविकता को खा जाते हैं, तब रचना घोषणापत्र बन जाती है। ‘अंतर्नाद’ इसी संकट की शिकार है।
कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी नायिका मोहिनी देशमुख का चरित्र है। लेखिका उसे एक साथ कई विरोधी रूपों में प्रस्तुत करना चाहती हैं — वह अत्यंत आधुनिक, आत्मनिर्भर, एआई कंपनी चलाने वाली, कॉर्पोरेट दुनिया की सफल महिला भी है; साथ ही इतनी भावुक, असावधान और मानसिक रूप से निर्भर भी कि एक साधारण भावनात्मक जाल में फँसकर अपने पिता की करोड़ों की कंपनी और बैंकिंग ढाँचे को लगभग किसी अजनबी युवक के हवाले कर देती है। यह विरोधाभास स्वाभाविक नहीं बन पाया।
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक की एक कॉर्पोरेट महिला, जो प्रोजेक्ट्स, बैंकिंग, साझेदारी और कंपनी संचालन समझती है, वह अपने पार्टनर के बारे में लगभग कुछ नहीं जानती — यह बात अविश्वसनीय लगती है। कहानी में बार-बार कहा गया है कि वह “टॉपर” थी, “आत्मनिर्भर” थी, “एआई कंपनी” की संस्थापक थी; लेकिन उसके निर्णयों में परिपक्वता का एक भी संकेत नहीं मिलता। वह प्रेम में है, इसलिए सब कुछ भूल जाती है — यह तर्क हिंदी फिल्मों में चल सकता है, गंभीर कथा-साहित्य में नहीं।
उदाहरण के लिए यह अंश देखिए—
“मेरा परिवार बहुत आदर्शवादी थी। मैं भी परिवार की आन, बान, शान में नहीं जीना चाहती थी, स्वयं मेहनत करके कुछ बनना चाहती थी। पढ़ाई में मैं टॉपर थी। कोई जान नहीं पाया था कि मैं समृद्ध परिवार से हूँ। रमन उसका नाम है…”
यहाँ भाषा और विचार — दोनों स्तरों पर भारी असावधानी दिखाई देती है। “मेरा परिवार बहुत आदर्शवादी थी” जैसी बुनियादी व्याकरणिक त्रुटि चौंकाती है। “रमन उसका नाम है” जैसी संरचना भी बेहद असहज है। आगे “सेल्फ सपोर्टेड लड़कों” जैसी अभिव्यक्तियाँ कहानी की भाषा को हिंदी और कॉर्पोरेट जार्गन के बीच झुलाती रहती हैं। ऐसा लगता है कि लेखिका भाषा के भीतर नहीं, भाषा के ऊपर खड़ी होकर उसे धकेल रही हैं।
इसी अंश में नायिका कहती है कि वह किसी को यह नहीं जानने देना चाहती थी कि वह समृद्ध परिवार से है, लेकिन आगे पता चलता है कि उसका परिवार इतना प्रभावशाली है कि बैंक लोन, कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स, सिक्योरिटी नेटवर्क, पुलिस, कानूनी टीम — सब कुछ तत्काल सक्रिय हो जाता है। यहाँ कहानी की आंतरिक संगति टूटती है। लेखिका सुविधानुसार पात्र को कभी साधारण लड़की बना देती हैं, कभी सर्वशक्तिमान कॉर्पोरेट उत्तराधिकारी।
कहानी की दूसरी बड़ी समस्या उसका अतिनाटकीयपन है। हर घटना चरम पर घटती है। रमन सिर्फ स्वार्थी नहीं, बल्कि बलात्कारी, धोखेबाज़, फ्रॉड करने वाला, हत्या की योजना बनाने वाला, मीडिया-मैनेज करने वाला खलनायक है। दूसरी ओर नायिका लगभग हर स्तर पर पीड़िता होते हुए भी अंततः नैतिक विजेता के रूप में खड़ी होती है। इस तरह का द्वैत साहित्य को कमजोर करता है क्योंकि वास्तविक जीवन में मनुष्य इतने एकरेखीय नहीं होते।
कहानी में मीडिया की आलोचना भी बेहद सतही और सुविधाजनक है। मीडिया को लगभग सामूहिक खलनायक की तरह चित्रित किया गया है। लेकिन कहीं भी कोई विशिष्ट संदर्भ, समाचार-तंत्र की जटिलता, वर्गीय विमर्श या जनमत की संरचना नहीं आती। सब कुछ नारे की तरह कहा गया है। लेखिका जिस विषय को उठाना चाहती हैं, वह गंभीर समाजशास्त्रीय समझ की माँग करता है, लेकिन कहानी उसे भावुक आक्रोश तक सीमित कर देती है।
सबसे अधिक आपत्तिजनक बात यह है कि कहानी कई जगहों पर स्त्री-विमर्श को जैविक शुद्धता के बेहद कमजोर और खतरनाक तर्कों तक ले जाती है। उदाहरण के लिए यह अंश—
“नारी तो कभी मैली होती ही नहीं। कुदरत ने उसे बनाया ही इस तरह का है, कि हर माह माहवारी उसे भीतर से साफ़ कर देती है…”
यह कथन न सिर्फ वैज्ञानिक रूप से हास्यास्पद है, बल्कि स्त्री-अस्मिता की पूरी बहस को शरीर की “शुद्धता” और “मैलेपन” के पुराने ढाँचों में वापस धकेल देता है। स्त्री की गरिमा का आधार उसका जैविक “शुद्ध” होना नहीं, उसका मनुष्य होना है। लेकिन कहानी बार-बार उसी पितृसत्तात्मक भाषा में लौट आती है, जिससे लड़ने का दावा करती है। यह वैचारिक भ्रम कहानी की केंद्रीय कमजोरी है।
कहानी में बार-बार “पुरुष सत्ता”, “पुरुष मानसिकता”, “स्त्रियों की कंडीशनिंग” जैसे शब्द आते हैं, लेकिन उनका कोई गहरा विश्लेषण नहीं है। वे केवल घोषणात्मक वाक्य बनकर रह जाते हैं। यही कारण है कि कहानी विमर्श का भ्रम पैदा करती है, लेकिन वास्तविक वैचारिक जटिलता तक नहीं पहुँचती।
भाषा की दृष्टि से भी कहानी बेहद असावधान है। हिंदी, अंग्रेज़ी और भावुक भाषण शैली का मिश्रण कई जगह हास्यास्पद हो जाता है। जैसे—
“मैं उसे एक ‘सब्जेक्ट’ बना कर अधिकार जमा रहा था…”
“उसकी ‘पोज़ेसिवनेस’ मुझे चुभने लगी…”
“कॉर्पोरेट वर्ड में काम का एक हिस्सा…”
ये वाक्य कहानी की संवेदनात्मक लय तोड़ते हैं। ऐसा लगता है मानो कोई फेसबुक पोस्ट या टीवी डिबेट का ट्रांसक्रिप्ट पढ़ रहे हों। कथा-भाषा में जो सांद्रता, संकेत और कलात्मक संयम होना चाहिए, वह पूरी तरह अनुपस्थित है।
कहानी का एक और संकट उसका आत्ममुग्ध नैतिक स्वर है। नायिका लगातार अपने विचारों को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करती है। पाठक के लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा गया। साहित्य प्रश्न उठाता है, जटिलताएँ निर्मित करता है; जबकि यह कहानी हर जगह निष्कर्ष सुनाती चलती है।
बलात्कार जैसे गंभीर विषय को कहानी जिस तरह “मोटिवेशनल स्पीच” में बदल देती है, वह भी समस्या पैदा करता है। पीड़ा की गहराई, आंतरिक टूटन, सामाजिक चुप्पी, मनोवैज्ञानिक आघात — इन सबको कलात्मक सूक्ष्मता चाहिए थी। लेकिन यहाँ सब कुछ भाषणों और नारों में बदल जाता है। परिणामतः संवेदना पैदा होने के बजाय कृत्रिमता पैदा होती है।
कहानी का अंत भी अत्यंत फिल्मी है— हॉल में सन्नाटा, फिर तालियाँ, फिर युवा पीढ़ी तक “अंतर्नाद” पहुँच जाना। यह अंत किसी टीवी शो की स्क्रिप्ट जैसा लगता है, कहानी का स्वाभाविक निष्कर्ष नहीं।
दरअसल ‘अंतर्नाद’ की सबसे बड़ी विफलता यही है कि वह अपने समय की स्त्री को उसकी वास्तविक जटिलताओं में नहीं पकड़ पाती। वह या तो पीड़िता है या विजेता; बीच का मनुष्य कहीं गायब है। उसमें आत्मालोचन नहीं, केवल आरोप हैं; अनुभव की गहराई नहीं, विचारों की घोषणा है; कथा नहीं, भाषण है।
साहित्य में स्त्री-विमर्श का अर्थ केवल पुरुष-विरोध नहीं होता, न ही हर पुरुष को राक्षस और हर स्त्री को प्रतीक बना देना। अच्छी कहानियाँ मनुष्य की जटिलताओं को पकड़ती हैं। इस दृष्टि से देखें तो ‘अंतर्नाद’ अपने महत्त्वपूर्ण विषय के बावजूद एक कमजोर, अतिनाटकीय और शिल्पहीन कहानी बनकर रह जाती है।
सन्दीप तोमर
(कथाकार, आलोचक)

Friday, 7 November 2025

लेखक बेचारा—किताब लिखे या ठेला लगाए?

 “लेखक बेचारा—किताब लिखे या ठेला लगाए?”-- संदीप तोमर

(हिंदी दिवस स्पेशल )
हिंदी दिवस आते ही बधाइयाँ रेवड़ियों की तरह बंटने लगती हैं। सोशल मीडिया पर लेखक पोस्ट करता है—“मेरा नया उपन्यास प्रकाशित हुआ है, कृपया पढ़ें।” देखते ही देखते सौ-दो सौ लाइक्स आ जाते हैं। दिल, गुलाब और तालियों की इमोजियों की बौछार हो जाती है। लेकिन उन सौ-दो सौ में से दस पाठक तो छोड़िए, दो भी असली खरीदार नहीं निकलते। लाइक देने वाले अंगूठे जितनी तेजी से उठते हैं, किताब खरीदने के समय उतनी ही फुर्ती से जेब दबा ली जाती है।
कल ही एक प्रकाशक मिले। बड़े दुखी स्वर में बोले—“लेखक लोग चर्चा के लिए पांच-दस किताबें मंगा लेते हैं, चर्चा भी हो जाती है। मगर उसके बाद… एक भी ऑर्डर नहीं आता।” वही किताब अगर किसी साहित्यिक गोष्ठी में पीछे की मेज पर मुफ्त रख दी जाए तो लोग एक नहीं, दो-दो, तीन-तीन उठा ले जाते हैं। पढ़ेंगे या नहीं, ये अलग बहस है, लेकिन ‘फ्री’ का माल कौन छोड़ता है!
अब प्रकाशकों की असली सेवा सुनिए। मेरा उपन्यास एक प्रकाशक ने छापा। चार साल तक जितनी प्रतियाँ बिकीं, सब मेरे द्वारा किये प्रचार की वजह से, या मेरे नाम के प्रभाव से। प्रकाशक महाशय तो आराम से बैठकर गिनती करते रहे। आखिर मैंने तंग आकर कहा—“अगर आप बेच नहीं पा रहे तो शेष प्रतियाँ मुझे भिजवा दीजिए।” वे भी बड़े सज्जन निकले, दो किस्तों में 32 किताबें भेज दीं। मैंने सोचा, ठीक है, सौ रुपए प्रति किताब देकर हिसाब चुकता कर दूँ। पर वे तो 40% डिस्काउंट की गणना लेकर बैठ गए।
अरे भइया! मैं तो आपकी गोदाम की रद्दी बचा रहा था। फिर भी संतोष नहीं। उल्टा सलाह देने लगे—“लेखक जी, किताबों पर 20% मुनाफ़ा रखकर बेचिए।” यानी प्रकाशक तो प्रकाशक, अब लेखक को भी ठेला लगाकर किताबें बेचनी हैं।
भला लेखक किताब बेचेगा या लिखेगा? अगर व्यापार ही करना होता तो सीधे प्रिंटर को पाण्डुलिपि देकर खुद छपवाता, खुद बेचता। प्रकाशक महाशय यूँ तो हर काम का पैसा दे देंगे —डिजाइन का, प्रूफरीडिंग का, छपाई का, बाइंडिंग का—बस पाण्डुलिपि ही मुफ्त चाहिए। और ऊपर से कहते हैं—“लेखकीय प्रतियाँ हम तोहफे में दे रहे हैं।”
वाह! क्या उदारता है! जैसे वे अपनी मेहनत की कमाई से किताब बाँट रहे हों। रॉयल्टी देने की तो जैसे कृपा ही कर रहे हैं। ऐसे उदारमना प्रकाशकों की मैं हृदय से वंदना करता हूँ। आखिर हिंदी दिवस पर बधाइयाँ ही क्यों, ऐसे प्रकाशकों को तो आजीवन सम्मान मिलना चाहिए—“लेखक की जेब पर पलने का सर्वोच्च सम्मान।”
लेखक–प्रकाशक संवाद

लेखक: किताबें क्यों नहीं बिक रही हैं?
प्रकाशक: पाठक अब पीडीएफ पढ़ते हैं, किताब कौन खरीदे?
लेखक: तो फिर आपने छापी क्यों?
प्रकाशक: आप ही तो आए थे, बोले थे कि ‘मेरी पांडुलिपि जीवन बदल देगी।’ हमने सोचा—पहले हमारा ही जीवन बदल दे!
लेखक: कम-से-कम मेरी किताब का प्रचार तो कीजिए।
प्रकाशक: अरे हम क्यों करें? प्रचार तो आपका कर्तव्य है। आपने लिखा है, बेचिए भी आप।
लेखक: बेचूँ? मैं तो लेखक हूँ।
प्रकाशक: जी हाँ, मगर आजकल लेखक वही सफल है जो अपनी किताब खुद बेच सके। चाहें तो ऑनलाइन “बाय नाउ” का बटन छाती पर चिपका लें।
लेखक: तो आप क्या करेंगे?
प्रकाशक: हम? हम तो आपकी रॉयल्टी की गणना करेंगे।
लेखक: लेकिन किताब बिकी ही नहीं तो रॉयल्टी कहाँ से?
प्रकाशक (गंभीर होकर): यही तो हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है—रॉयल्टी की समस्या ही खत्म कर देते हैं।
इतना सुनकर लेखक को अचानक समझ आया—प्रकाशक असल में संत हैं। वे लेखक को ‘वैराग्य’ सिखाते हैं—“लिखो, छपवाओ, मगर उम्मीद मत रखो।”
प्रकाशक का विज्ञापन (काल्पनिक)
“हमारे यहाँ पाण्डुलिपि छपवाइए।
छपाई, बाइंडिंग, डिज़ाइन, प्रूफरीडिंग सबका पैसा दीजिए।
पांडुलिपि मुफ्त दीजिए।
प्रचार खुद कीजिए।
किताब खुद बेचिए।
रॉयल्टी के नाम पर शांति का अनुभव कीजिए।
हम सिर्फ एक सेवा मुफ्त देंगे—
आपकी उम्मीदों का अंतिम संस्कार।”
यही है हिंदी प्रकाशन का असली गणित: लेखक लिखे, प्रचार करे, बेचने की कोशिश करे; पाठक फोटो खींचकर फेसबुक पर डाले; और प्रकाशक तपस्या करे—“कैसे बिना बेचे भी सम्मान पाए।”

Thursday, 6 November 2025

लघुकथा विकास और हम रचनाकार

 


संदीप तोमर


हिंदी साहित्य में लघुकथा का इतिहास अपेक्षाकृत छोटा हैलेकिन इसकी यात्रा अत्यंत रोचक और सार्थक रही है। एक समय था जब सारिका और कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं ने इसे मंच दिया। सारिका ने तो लघुकथा का विशेषांक भी प्रकाशित किया। उस दौर में लघुकथाकारों की एक नई पीढ़ी सामने आई और विधा ने अपने शैशव काल से किशोरावस्था में प्रवेश किया। यह पीढ़ी समाज में व्याप्त नैतिकतासंस्कारनारी-उत्थान और नारी-शोषण जैसे विषयों पर लिख रही थी। उस समय समाज की यही मांग थी और साहित्य उसका प्रतिबिंब प्रस्तुत करता था।

समय के साथ समाज बदलता गयातकनीक बदल गई और पाठक भी बदल गया। जिन मनीषियों ने स्वयं को समय के साथ अपडेट नहीं कियावे पीछे छूट गए। यह एक गंभीर सच्चाई है कि साहित्यकार अगर अपने समय से संवाद न करे तो वह अप्रासंगिक हो जाता है। वरिष्ठ लघुकथाकार योगराज प्रभाकर कहते हैं कि रचनाकारों को समय की माँग के अनुसार स्वयं को अपडेट करना चाहिए। उनका मानना है कि बहुत से लेखक अस्सी के दशक की सोच से आगे नहीं बढ़ पाए। उनके लेखन में नवीनता का अभाव है। वहीं नई पीढ़ी के रचनाकारों ने तकनीकीराजनीतिक और सामाजिक सरोकारों को अपनी रचनाओं में शामिल कियाजिससे उनकी लघुकथाएँ सामयिक और प्रभावशाली बन सकीं।

सुरेंद्र कुमार अरोरा भी मानते हैं कि लघुकथा के विकास के लिए रचनाकार का सामयिक होना अनिवार्य है। समाज में अपराधहिंसास्त्री-विरोधी दृष्टिकोण और तकनीकी विसंगतियों जैसे मुद्दों को साहित्य से बाहर नहीं रखा जा सकता। यदि लेखक पुरानी सोच पर अड़े रहेंगे तो पाठक उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। उदाहरण के तौर परजब बलवाई अब महिलाओं को “ईज़ी टारगेट” बनाने लगे हैंतो रचनाकार को भी इन यथार्थों को साहित्य का हिस्सा बनाना ही होगा।

स्पष्ट है कि जो स्वयं को अपडेट नहीं करेगावह लंबा नहीं टिकेगा। हाँपुराने विषयों पर आज भी लिखा जा सकता हैलेकिन अब चुनौती शिल्प और ट्रीटमेंट की है। कथा-विन्यास में नवीनता के बिना रचनाकार पाठक को न दिल से छू पाएगान ही उसके मस्तिष्क में कोलाहल पैदा कर पाएगा। पुराने विषयों को भी यदि नए अंदाज़ और संवेदना के साथ लिखा जाए तो वे पाठक के लिए सार्थक रहेंगे।

आज का पाठक पहले से कहीं अधिक जागरूक और विकल्पों से भरपूर है। मनोरंजन के असंख्य साधनों के बीच उसे आकर्षित करने के लिए लेखक को केवल कहानी नहींबल्कि प्रभावी शिल्प भी देना होगा। यदि लेखक पुरानी शैली में ही अटका रहेगा तो पाठक उसे छोड़ देगा। डिजिटल मीडिया के युग में रचनाकार को उन साधनों का उपयोग करना होगाजो साहित्य में आधुनिकता का बोध कराएँ। उदाहरण स्वरूप साहित्यानमा विद संदीप तोमर” यूट्यूब चैनल को देखा जा सकता हैजो साहित्य को डिजिटल रूप देता है। पाठक अब श्रोता भी हैऔर साहित्य ऑडियो-वीडियो के रूप में उसकी व्यस्त दिनचर्या में शामिल हो रहा है।

इसी संदर्भ में एक संस्मरण उल्लेखनीय है। नेत्रविहीन साहित्यकार श्री गोपाल सिसोदिया ने बताया कि राजस्थान यात्रा के दौरान बस में एक महिला अफ़साने साहित्य के (साहित्यानमा विद संदीप तोमर)” चैनल पर लघुकथा सुन रही थीं। आवाज पहचानकर उन्होंने कहा— “ये तो संदीप तोमर की चिर-परिचित आवाज है।” यह प्रसंग प्रमाण है कि डिजिटल युग में साहित्य के प्रचार-प्रसार का यह रूप समय की माँग है। इस चैनल के माध्यम से हम उन रचनाकारों को स्वर देते हैं जो लिखने में सक्षम हैं पर वाचन नहीं कर पाते। साहित्य अब केवल पुस्तकों तक सीमित नहींबल्कि बसमेट्रो और सफ़र की थकान में भी साथी बन रहा है।

कुछ लोग यह मानते हैं कि लेखक को अपनी रचनाओं का वाचन भी करना चाहिए। लेकिन मेरा स्पष्ट मानना है कि लेखक का काम लिखना मात्र है। जैसे फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखने वाला लेखक डायलॉग बोलने या अभिनय करने नहीं उतरतावैसे ही लेखक को लेखक रहने देना चाहिए। गीतकार अगर गायक बन जाए तो गायक का स्थान कहाँ होगायही तर्क यहाँ भी लागू होता है। लेखक अपनी रचना देकर दायित्व निभा चुका हैअब वाचन का काम रेडियो या मंच के कलाकारों का है। हाँअगर लेखक स्वयं भी अच्छा वाचक है तो यह अतिरिक्त उपलब्धि हैलेकिन यह अनिवार्यता नहीं हो सकती।

दूसरी ओरसाहित्यिक दुनिया में खेमेबाजी का संकट बढ़ रहा है। औसत रचनाएँ केवल इस कारण चर्चित हो जाती हैं कि वे किसी बड़े लेखक या समीक्षक के संरक्षण में हैं। यह प्रवृत्ति न केवल साहित्य का स्तर गिराती हैबल्कि लेखक को आत्ममुग्ध बनाकर उसके विकास की राह रोक देती है। आलोचना का उद्देश्य मार्गदर्शन होना चाहिएन कि चाटुकारिता।

नई पीढ़ी के रचनाकारों ने इस बदलती वास्तविकता के अनुरूप स्वयं को ढाला है। उदाहरण स्वरूपसन्दीप तोमर ने अपनी लघुकथाओं में शहरी तनाव और अकेलेपन की मनोवैज्ञानिक जटिलताओं के साथसामाजिक-पारिवारिक द्वंद्व को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। भावना शुक्ल की लघुकथाएँ स्त्री विमर्श और डिजिटल जीवन के संघर्षों को उजागर करती हैं। अनिल शूर “आजाद” और बलराम अग्रवाल पारंपरिक कथा-शिल्प में नवीन प्रयोग करते हुए सामाजिक विसंगतियों पर तीखी टिप्पणी करते हैं।

इसी क्रम में पूजा अग्निहोत्री की विषकंठ” स्त्री की जीवन-यात्रा के संवेदनशील पहलुओं को उभारती है। यह कथा पाठक को भीतर तक झकझोर देती है और स्त्री स्वतंत्रता बनाम परंपरागत नैतिकता पर सोचने को मजबूर करती है। चंदेश छतलानी की सन्नाटे में आवाज़” मौन और अकेलेपन की तीव्र अनुभूति को संक्षिप्त वाक्यों और विरामों के ज़रिए पाठक के भीतर उतार देती है। वहीं सुभाष नीरव की रचनाएँ संवेदनाओं के टकराव को सूक्ष्मता से प्रस्तुत करती है। इन तीनों रचनाकारों की रचनाएँ सिद्ध करती हैं कि लघुकथा में नवीनतासामयिकता और शैलीगत विविधता एक साथ संभव हैं।

एक समय दिल्ली में लघुकथा का बड़ा कार्यक्रम हुआलेकिन आश्चर्य कि दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले कुछ नामचीन लघुकथा-सेवक उसमें अनुपस्थित रहे। यह इत्तेफ़ाक था या अनदेखी— यह सवाल भी विचारणीय है। साहित्यिक आयोजनों का लाभ यही है कि लेखक-पाठक व साथी मिलते हैंपरन्तु खेमेबाजी और मठवाद अक्सर साहित्य-सरोकारों को पीछे धकेल देते हैं। जब औसत रचनाएँ केवल इस कारण पुरस्कृत होती हैं कि आयोजक और निर्णायक एक-दूसरे के निकट हैंतो साहित्य का अहित ही होता है। जज या समीक्षक का दायित्व होना चाहिए कि वह रचनाकार को विधागत व विषयगत त्रुटियों की ओर इंगित करेताकि लेखक सुधरे और विधा का विकास हो। इस क्रम में याद आता है- इसी कार्यक्रम में एक लेखिका की रचना पर मधुदीप अग्रवाल की टिप्पणी थी- यह बेहतरीन रचना है- इसे मैं अपने संपादन में लेता हूँ, मधुदीप से मेरा सवाल था- किसी औसत से भी कमतर रचना की तारीफ़ को एक सम्पादकीय दृष्टि की बजाय उपकार की श्रेणी में रखा जाना ज्यादा उचित होगा। सवाल यह है कि बात रचनाओं पर हो या रचनाकर के ओहदे, कद, या सौन्दर्य पर?

26 नवम्बर 2017 को इसी उद्देश्य से एक गोष्ठी का आयोजन हुआजिसमें दृष्टि के सम्पादक अशोक जैन ने अनिल शूर “आजाद” और संदीप तोमर के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे भागीरथ प्रयत्न लघुकथा के इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध होंगे। इस अवसर पर समय पर दस्तक” नामक संकलन की भी घोषणा हुईजो नवलेखन का प्रतिनिधित्व करेगा। वरिष्ठ लघुकथाकार अशोक यादव ने कहा कि पुरानी पीढ़ी का दायित्व है कि वे नवलेखन का मार्गदर्शन करें। सुरेंद्र कुमार अरोरा ने चिंता जताई कि प्रतिदिन सैकड़ों लघुकथाएँ लिखी जा रही हैंपरंतु उनमें गुणवत्ता का अभाव है। उनके अनुसार अधिक से अधिक कार्यशालाएँ और विमर्श-गोष्ठियाँ आवश्यक हैंताकि रचनाकार शिल्प और विधान पर मेहनत कर सकें।

सितम्बर 2017 में विकासपुरी में अनिल शूर “आजाद” के प्रयास से भी ऐसा आयोजन हुआ था। इसमें लघुकथा-शोधपीठपोस्टर-लघुकथाफेसबुक-लेखनमंचन और लघुकथा-विकास के विविध पहलुओं पर विस्तृत चर्चा हुई। वरिष्ठ लघुकथाकार सुभाष नीरव ने यहाँ शैली के महत्व पर कहा कि उन्होंने कहानी की शैली को लघुकथा में ढालने का प्रयोग किया और सफलता पाई। उनका मानना था कि वरिष्ठों को नयी पीढ़ी को प्रोत्साहित और मार्गदर्शन करना चाहिए।

अध्यक्षीय संबोधन में अशोक वर्मा ने सम्प्रेषण को कथ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण बताया और लघुकथा के मंचन पर बल दिया। लेकिन सबसे आवश्यक यह है कि नई पीढ़ी लगातार लेखन करेप्रायोगिक बने और मठवाद व छपास-लालसा से बचे। हाल ही में दो हज़ार रुपये लेकर संकलन में दो पन्ने देने जैसी व्यावसायिक प्रवृत्तियाँ सामने आई हैं। ऐसे प्रकाशक न केवल लेखकों का शोषण कर रहे हैंबल्कि साहित्य का भी नुकसान कर रहे हैं। लेखक को समझना होगा कि संकलनों की तुलना में पत्रिकाओं की पहुँच और प्रभाव कहीं अधिक है।

पिछले दो दशकों में लघुकथाएं बहु संख्या में लिखी गयी, लघुकथा संग्रहों, साझा संकलनों की बाढ़ आई, विकलांग विमर्श, किन्नर विमर्श इत्यादि विषयों पर खूब संकलन आये। पत्रिकाओं ने लघुकथा विशेषांक निकले, लेकिन अधिकतर पुराने ढर्रे पर होने के चलते अधिक चर्चित नहीं हुए, इसकी दो वजहें हो सकती हैं- संपादकों का आसान रास्ता अख्तियार करना- यानि जो भी रचनाएँ आई- उन्हें छाप देना दूसरा आलोचकों तक उक्त कार्य का न पहुंच/ पहुंचा पाना। अभिनव इमरोज के संपादक श्री देवेन्द्र बहल के आग्रह पर मैंने नवम्बर 2024 के अंक का लघुकथा विशेषांक निकलने की जिम्मेदारी ली, जिसके लिए रचनाएँ जुटाने/ लिखवाने में मुझे चार माह से अधिक का समय लगा, लेकिन इसमें विवधता का पूरा ख्याल रखा गया, मेरी समझ से यह पहला ऐसा विशेषांक था, जिसमें  लघुकथा पर संस्मरण, यात्रा-वृतान्त, दोहे, साक्षात्कार, विमर्श पर लेखा के साथ-साथ चुपचाप लेखन कर रहे मनु स्वामी पर विस्तृत आलेख के साथ सम्पादकीय को भी लघुकथा लेख प्रक्तिया के लेख के रूप में लिखा गया। उक्त विशेषक की साल भर चर्चा इसकी सफलता का द्योतक रही।

एक समय था जब लघुकथा की समीक्षाएं मुख्य धरा की पत्रिकाओं में नहीं छपती थी, लघुकथाओं को भी फ़िलर की तरह इस्तेमाल किया जाता था, ऐसी चिंताएं अनेकों गोष्ठियों में ममता कालिया, चित्र मुद्गल सरीखी लेखिकाओंने भी व्यक्त की। मुझे इसके पीछे जो कारन समझ आया- वह ये कि रचनाकारों ने लाखुक्था अको कम समय में लिखी जाने वाली आसान विधा मान लघुकथा छोड़ चुटकुला, बोधकथा सब कुछ लिखा, और टैग लघुकथा का दिया, साथ ही लघुकथा में आलोचकों का अभाव, चार- छः लघुकथा लिखने और एक-दो संकलनों को पढने के बाद हर रचनाकार स्वयं को आलोचक मान बैठा, जिससे मित्र लेखकों की सरहना तो खूब लिखी गयी लेकिन आलोचना विधा कहीं गहरे में दब गयी। इसी बीच सुभाष नीरव का लघुकथा संग्रह “बारिश और एनी लघुकथाएं प्रकाशित हुआ, जिसमें मुझे इतना प्रभावित किया कि उसकी समीक्षा लिखने में मैंने एक माह का समय लिया, उक्त समीक्षा का प्रकाशन पाखी पत्रिका में हुआ, चर्चा ये हुई कि अब लघुकथा की समीक्षा के लिए मुख्य धारा की पत्रिकाओं के दरवाजे भी खुल गये। एक समय था जब पाखी पत्रिका के संपादक प्रेम भारद्वाज थे, उनके संपादक रहते पाखी में लघुकथाओं का प्रकाशन बंद रहा। मार्टिन जॉन ने सोशल मिडिया पर लिखा- स्नादीप तोमर के प्रयासों से पाखी जैसी पत्रिकाओं में लघुकथा समीक्षा और लघुकथा प्रकाशन का मढ़ प्रशस्त हुआ है, पाखी के अगले अंक में मार्टिन जॉन के लघुकथा संग्रह “सब खैरियत है” की मेरे द्वारा लिखी समीक्षा प्रकाशित हुई। कहा जा सकता है कि आलोचक की आस्था किसी विधा/ पुस्तक की दशा और दिशा तय करती है।

भविष्य निस्संदेह लघुकथा का है। इसकी संक्षिप्तता और तीक्ष्णता आज की व्यस्त जीवन-शैली के अनुकूल है। लेकिन इस भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए रचनाकार को प्रयोगधर्मी होना होगा। नए विषयोंनई शैलियों और नए माध्यमों को अपनाना ही पड़ेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑडियोबुक्स जैसे साधन साहित्य की पहुँच को और व्यापक कर रहे हैं। यदि हम इस संभावना का रचनात्मक उपयोग करें तो लघुकथा को वैश्विक पाठक वर्ग तक पहुँचाया जा सकता है।

आने वाला समय वास्तव में लघुकथा का है। बशर्ते हम समय के साथ बदलेंखेमेबाजी से बचें और आलोचना को ईमानदारी से स्वीकारें। साहित्य में स्थायित्व वही रचनाएँ पा सकती हैं जो पाठक को सोचने पर विवश करें। अतः रचनाकार का मूल्यांकन उसकी रचना से होना चाहिएन कि उसके नाम से। यदि हम इस दिशा में ईमानदार बने रहेंतो लघुकथा निश्चित ही साहित्य की सबसे प्रभावशाली विधा बनकर उभरेगी।

 

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