बिगाड़ के डर से…
विकलांग विमर्श इतना भी आसान नहीं है...
मेरे एक शिक्षक साथी ने एक किताब सुझाई और
कहा— “सर, आपको यह महत्वपूर्ण किताब अवश्य पढ़नी
चाहिए।” उनके आग्रह से मेरे भीतर उस पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता पैदा हुई। फिर
पता चला कि उक्त पुस्तक को पुरस्कार भी मिल चुका है और इंदौर की किसी संस्था ने
उसके लेखक को सम्मानित भी किया है। अब मेरे लिए उस पुस्तक को पढ़ना लगभग अनिवार्य
हो गया था। मैंने पुस्तक खरीदी और पढ़ना शुरू किया।
लेकिन ज्यों-ज्यों मैं पुस्तक पढ़ता गया, मेरी हैरानी बढ़ती गई। हैरानी का कारण यह था कि पुस्तक मेरे भीतर किसी
प्रकार की साहित्यिक दिलचस्पी पैदा ही नहीं कर पा रही थी। पन्ना-दर-पन्ना आगे
बढ़ते हुए मुझे लगा कि या तो लेखक ने अपनी आपबीती किसी को सुनाकर लिखवा दी है,
या फिर लेखक के पास संस्मरणात्मक उपन्यास कहने की वह कलात्मक क्षमता
नहीं है, जिसकी इस विधा में सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
वैसे भी “संस्मरणात्मक उपन्यास” जैसी विधा
पर अभी तक बहुत गंभीर चर्चा नहीं हुई। मैंने स्वयं इस शैली में कुछ रचनाएँ लिखने
की कोशिश की और कुछ वरिष्ठ लेखकों ने उसे स्वीकार्यता भी दी। सच कहूँ तो मुझे
संस्मरणात्मक उपन्यास लिखने में अधिक आनंद आता है, क्योंकि
इसमें जीवन की वास्तविकता और कथा-संरचना एक साथ चलती हैं। लेकिन यही वह क्षेत्र है
जहाँ लेखक की ईमानदारी और कलात्मकता दोनों की असली परीक्षा होती है।
जिस पुस्तक को मैं पढ़ रहा था, उसमें लेखक ने अपने विकलांग जीवन के संघर्षों को लिखते हुए पाठक की
सहानुभूति बटोरने पर इतना अधिक जोर दिया कि मूल विषय और उसके भीतर छिपे
जीवन-संघर्ष का ताप कहीं पीछे छूट गया। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि
विकलांग-विमर्श दया बटोरने का नहीं, मनुष्य के जुझारूपन और
अस्तित्व-संघर्ष को सामने लाने का विषय होना चाहिए। लेकिन “विटामिन जिंदगी” में
ऐसा नहीं हो पाया। किताब लेखक को एक संघर्षशील मनुष्य के रूप में कम और दया के
पात्र के रूप में अधिक प्रस्तुत करती है।
यह समस्या केवल एक पुस्तक तक सीमित नहीं है।
मैंने विकलांग-विमर्श पर आधारित अनेक कहानियाँ और उपन्यास पढ़े हैं, लेकिन अधिकांश रचनाकार अपने विकलांग पात्रों के साथ न्याय नहीं कर पाए।
हिंदी कथा-साहित्य में विकलांग पात्रों को या तो करुणा पैदा करने वाले पात्र के
रूप में चित्रित किया गया है, या फिर उन्हें हास्य और
विडंबना का माध्यम बना दिया गया। बहुत कम रचनाएँ ऐसी हैं जहाँ विकलांग पात्र अपनी
सम्पूर्ण मनुष्यता, जिजीविषा और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित
दिखाई देते हों।
जब मैंने “लहरों के पूर्व रंग” पुस्तक का संकलन शुरू किया, तब विकलांग-विमर्श पर केंद्रित अनेक रचनाएँ पढ़ीं। महादेवी वर्मा की “अलोपी” और “गुंगिया”, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की “खितीन बाबू”, विष्णु प्रभाकर की संस्मरणात्मक कहानी “नेत्रहीन”, डॉ. इंद्र बहादुर द्वारा लिखित “हेलेन केलर की आत्मकथा” आदि। इन सबको पढ़ते हुए बार-बार यही महसूस हुआ कि रचनाकार विकलांग पात्रों की भीतरी दुनिया तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाए। कहीं करुणा अधिक हो गई, कहीं आदर्शवाद, कहीं विकलांगता को प्रतीक बना दिया गया और कहीं उसे केवल कथानक का उपकरण भर बना दिया गया।
शायद इन्हीं सब कारणों से भीतर एक बेचैनी पैदा हुई और मैंने “एक अपाहिज की डायरी” लिखने का जोखिम उठाया। यह जोखिम केवल साहित्यिक नहीं था, बल्कि आत्मिक भी था। क्योंकि आत्मकथात्मक शैली में लिखते समय लेखक अपने अनुभवों को निर्वस्त्र करता है। उसमें छिपने की गुंजाइश बहुत कम होती है। मैंने अपने नायक के साथ जो घटा, जैसा घटा, उसे पूरी ईमानदारी से कागज पर उतारने की कोशिश की। मैं “मोहनदास करमचंद गांधी” तो नहीं हूँ कि “सत्य के मेरे प्रयोग” जैसी विराट और ऐतिहासिक रचना दे सकूँ, लेकिन इतना जरूर चाहता था कि जो लिखूँ, वह भीतर से झूठा न लगे।
साहित्य में विकलांग-विमर्श का सबसे बड़ा
संकट यही है कि यहाँ अक्सर विकलांग व्यक्ति को “मनुष्य” मानने के बजाय “स्थिति”
मान लिया जाता है। लेखक उसके दर्द को तो लिखता है, लेकिन
उसकी इच्छाएँ, उसका प्रेम, उसका क्रोध,
उसका अहंकार, उसका यौन-बोध, उसका सामाजिक अपमान, उसकी महत्वाकांक्षाएँ— इन सबको
नज़रअंदाज़ कर देता है। जैसे विकलांग व्यक्ति केवल पीड़ा झेलने के लिए पैदा हुआ
हो। जबकि सच यह है कि विकलांग व्यक्ति भी उतना ही जटिल, विरोधाभासी
और बहुआयामी मनुष्य होता है, जितना कोई और।
दरअसल हिंदी साहित्य में विमर्शों के नाम पर
भी एक फैशन पैदा हो गया है। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श,
आदिवासी-विमर्श और विकलांग-विमर्श— इन सब पर बड़ी संख्या में ऐसा
लेखन सामने आया है, जिसमें अनुभव की प्रामाणिकता कम और
वैचारिक प्रदर्शन अधिक है। कुछ लेखक विमर्श को समझने के बजाय उसका उपयोग अपनी
“प्रगतिशील छवि” चमकाने के लिए करते दिखाई देते हैं। परिणाम यह होता है कि रचना
जीवन से कटकर नारे में बदल जाती है।
इसी बीच कुछ अच्छी रचनाएँ भी पढ़ने को
मिलीं। पूजा अग्निहोत्री की कहानी “वो धूप जो जलकर
निकल गयी” ऐसी ही कहानी है, जो अपने विकलांग पात्र के साथ अपेक्षाकृत अधिक न्याय करती दिखाई देती है।
वहाँ पात्र केवल दया का पात्र नहीं बनता, बल्कि अपनी
संवेदनाओं और संघर्षों के साथ उपस्थित होता है। ऐसी रचनाएँ उम्मीद जगाती हैं कि
हिंदी साहित्य अभी पूरी तरह संवेदनहीन नहीं हुआ।
हाल ही में मैंने एक और चर्चित उपन्यास “व्हीलचेयर” पढ़ा। यह उपन्यास भी गहरी
निराशा देकर गया। यहाँ भी लेखक पात्र और कथा— दोनों के साथ न्याय करते नहीं दिखाई
पड़ते। कथ्य अत्यंत कमजोर है और बार-बार का दोहराव पाठक को थका देता है। ज्ञान
प्रकाश विवेक पूरे उपन्यास में किस्सागोई पैदा करने में असफल रहे हैं। ऐसा लगता है
जैसे लेखक के पास अनुभव तो हैं, लेकिन उन्हें कथा में बदलने
की कला नहीं है। उपन्यास कई जगह डायरी, कई जगह लेख और कई जगह
भावुक आत्मस्वीकृति बनकर रह जाता है। एक जगह वे लिखते हैं—
“ज़िन्दगी एक ऐसा लतीफ़ा बना गयी थी, जिसको सुनकर आँसू टपक पड़ते हैं।”
ऐसे वाक्य पढ़कर पाठक का “लतीफ़ा” शब्द से ही विश्वास उठने लगता है।
लतीफ़ा अपने स्वभाव में व्यंग्य, विनोद और हल्केपन का वाहक
होता है, लेकिन यहाँ लेखक उसे करुणा के ऐसे अतिरंजित बिंदु
तक ले जाते हैं कि भाषा अपनी विश्वसनीयता खो बैठती है। साहित्य में संवेदना जितनी
आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक भाषा की सटीकता भी है।
उपन्यास पढ़ते हुए मैं यह भी नहीं समझ पाया
कि प्रेम-विवाह करने वाली पत्नी अस्पताल में भर्ती अपने पति को “मिस्टर असमर्थ”
कैसे कह सकती है? यदि यह स्थिति लंबे समय तक विकलांग जीवन के
साथ संघर्ष करते हुए आती, तब भी उसे मनोवैज्ञानिक धरातल पर
समझा जा सकता था, लेकिन उपचाराधीन व्यक्ति के प्रति इतनी
शीघ्र निर्ममता पाठक को चौंकाती है। “क्या फर्क पड़ता है, छुट्टी
दो दिन पहले मिले या बाद में, रहना तो आपको बेड पर ही है”—
जैसे संवाद प्रेम को गहराई नहीं देते, बल्कि उसे हास्यास्पद
और कृत्रिम बना देते हैं।
एक स्थान पर ज्ञान प्रकाश विवेक लिखते हैं—
“आकाश अपनी पर्सनैलिटी के प्रति सचेत था। वह लापरवाह-सा नज़र आता।”
यहाँ प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति एक साथ अत्यधिक सचेत और उतना ही
लापरवाह कैसे हो सकता है? लेखक चरित्र-निर्माण में स्थिरता
नहीं रख पाते। फुटबॉल प्लेयर होना, कद-काठी, विकलांग होने का दर्द— इन बातों का इतना अधिक दोहराव है कि लगने लगता है
लेखक की कलम में कथा को आगे बढ़ाने की ऊर्जा कम पड़ गई है। कथानक आगे बढ़ने के
बजाय एक ही भावभूमि पर गोल-गोल घूमता रहता है।
एक जगह उपन्यासकार लिखते हैं— “विकलांग
लोगों की सबसे बड़ी विडम्बना यह होती है कि वे निरंतर शरीर के उस अंग के बारे में
सोचते रहते हैं, जो या तो होता नहीं, या
नाकारा, बेहिस और बेजान होता है।”
यह वाक्य पढ़कर लगता है कि लेखक ने विकलांग व्यक्तियों के जीवन को
बहुत सतही ढंग से देखा है। यदि वे किसी विकलांग व्यक्ति के साथ कुछ दिन भी बिताते,
तो शायद समझ पाते कि विकलांग लोग अपने निष्क्रिय अंगों के बारे में
कम, जीवन के सक्रिय संघर्षों के बारे में अधिक सोचते हैं।
उन्हें अपने शरीर की कमी पर रोते रहने की फुर्सत नहीं होती। वे अपनी सीमाओं के
भीतर नई संभावनाएँ गढ़ते हैं। बहुत-से विकलांग व्यक्ति मानसिक रूप से सामान्य
लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक दृढ़ और आत्मनिर्भर हो जाते हैं। वे अपनी कमजोरी को ही
अपनी ताकत में बदल देते हैं।
लेखक एक जगह लिखते हैं— “आकाश को इस बात का
इल्हाम हो चुका था कि वह लाचार है।”
और अगले ही पृष्ठ पर लिखते हैं— “आकाश अपने अपाहिज रूप को स्वीकार
नहीं कर पा रहा था।”
यह विरोधाभास केवल भाषा का नहीं, चरित्र की
मनोवैज्ञानिक संरचना का भी है। यदि पात्र अपनी स्थिति को स्वीकार कर चुका है,
तो फिर अस्वीकार का संकट क्यों? और यदि वह अभी
स्वीकार नहीं कर पाया, तो “इल्हाम” जैसी निर्णायक भाषा क्यों?
उपन्यासकार अंत तक यह स्पष्ट नहीं कर पाते कि वे अपने नायक को किस
रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं— संघर्षशील मनुष्य, आत्मदया
में डूबा व्यक्ति या केवल करुणा बटोरने वाला पात्र।
डॉ. तनेजा के आकाश और संगीता दोनों के साथ
संवाद अपेक्षाकृत अधिक दिलचस्प और मनोवैज्ञानिक हैं। उनमें जीवन-दृष्टि की संभावना
दिखाई देती है। लेकिन विडम्बना यह है कि उस मनोवैज्ञानिकता का प्रभाव पूरे उपन्यास
में कहीं दिखाई नहीं देता। लेखक लिखते हैं— “विकलांग के दुःख हर पल तोड़ते हैं।”
मैं कहता हूँ— विकलांगता के दुःख हमेशा तोड़ते नहीं, कई बार वे मनुष्य को भीतर से असाधारण रूप से मजबूत भी बनाते हैं। डॉ.
तनेजा और नर्स स्टेला के संवाद उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति बन सकते थे, लेकिन उनका असर मुख्य पात्रों के व्यवहार और विकास में कहीं परिलक्षित
नहीं होता। इससे पूरा कथानक बिखरा हुआ प्रतीत होता है।
अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद संगीता
आकाश को जिस कमरे में रखती है, उसका वर्णन देखिए— पुरानी
छतरी, पुराना कूलर, टू-इन-वन, पुरानी वाशिंग मशीन, टूटे जूते, टूटी हत्थेवाली कुर्सी…। यह दृश्य किसी स्वाभाविक वैवाहिक तनाव से अधिक
कृत्रिम प्रतीत होता है। मानव-मन की थोड़ी भी समझ रखने वाला व्यक्ति जानता है कि
प्रेम-विवाह करने वाले दंपति के बीच इतनी जल्दी ऐसा भावनात्मक पतन आ जाना सहज नहीं
है। लेखक बिना पर्याप्त मनोवैज्ञानिक तैयारी के पात्रों को अमानवीय बना देते हैं।
विडम्बना देखिए— रघु, जो एक मूक-बधिर नौकर है, व्हीलचेयर देखकर खुश होता
है, जबकि आकाश, जिसे उसकी सबसे अधिक
आवश्यकता है, सोचता है— “व्हीलचेयर सुविधा देती है, सुख नहीं।”
यहाँ समस्या व्हीलचेयर नहीं, लेखक की दृष्टि
है। उपन्यास में व्हीलचेयर एक सहायक उपकरण कम और कलंक अधिक बनकर उपस्थित होती है।
लेखक बार-बार उसे त्रासदी का प्रतीक बनाते हैं, जबकि
वास्तविक जीवन में व्हीलचेयर अनेक लोगों के लिए स्वतंत्रता और गतिशीलता का माध्यम
होती है।
पूरे उपन्यास में उपस्थित अनेक प्रसंग यह
आभास देते हैं कि लेखक का ध्यान कथा की स्वाभाविकता से अधिक पन्ने भरने पर रहा है।
पत्नी की बॉस का घर आने वाला प्रसंग भी कुछ ऐसा ही लगता है। जबकि वही बॉस एक
अत्यंत सकारात्मक बात कहती है— “एक इनर हाइट भी होती है, उस हाइट को कोई एक्सीडेंट नहीं छीन सकता।”
लेकिन आश्चर्य यह है कि इस संवाद का भी संगीता या आकाश पर कोई
प्रभाव दिखाई नहीं देता। जैसे लेखक स्वयं अपने ही सकारात्मक विचारों पर विश्वास
नहीं करते।
एक जगह उपन्यासकार लिखते हैं— “जिन लोगों का
शारीरिक रूप से कुछ छिन जाता है, वे समाज में सहमे-सहमे से
नज़र आते हैं।”
मैं लेखक से पूछना चाहता हूँ कि वे कितने विकलांग लोगों से वास्तव
में मिले हैं? उन्हें अरुणिमा सिन्हा, स्टीफन
हॉकिंग और अनेक संघर्षशील व्यक्तित्वों को गहराई से पढ़ने-समझने की आवश्यकता है।
विकलांगता मनुष्य को हमेशा सहमा हुआ नहीं बनाती, कई बार वह
उसे अधिक निर्भीक और जीवन-सचेत बना देती है।
अध्याय अठारह में लेखक यौन-इच्छाओं को लेकर
भी कई अनावश्यक और तर्कहीन बातें लिखते हैं। यौन-क्रीड़ा का किसी व्यक्ति की
विकलांगता से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। यह बात लेखक सहित पाठकों को भी समझनी
चाहिए। मेरे एक दृष्टिबाधित मित्र विश्वविद्यालय में कहा करते थे— “सेक्स के लिए
सेक्स-ऑर्गन की जरूरत होती है, आँखों, हाथों या पैरों की नहीं।”
यह वाक्य जितना सरल है, उतना ही गहरा भी।
लेकिन उपन्यास इस विषय को भी दया और हीनभावना के चश्मे से देखता है।
पूरे उपन्यास में आकाश को जितना असहाय
दिखाया गया है, वैसा असहाय विकलांग पात्र मैंने अपने जीवन
में नहीं देखा। लेखक कई बार उसके हाथों से महंगे कप तुड़वाते हैं। पढ़ते हुए
बार-बार मन में प्रश्न उठता है— आकाश पैरों से विकलांग हुआ है या हाथों से?
यह अतिशयोक्ति पात्र को विश्वसनीय नहीं रहने देती।
विडम्बना यह भी है कि आज के एंड्रॉइड और
डिजिटल युग में लेखक आकाश को व्हीलचेयर पर बैठाकर बिजली का बिल जमा करवाने काउंटर
तक भेजते हैं, जबकि उसकी पत्नी स्वयं ऑनलाइन बिल भरती है।
वर्क-फ्रॉम-होम के दौर में इंजीनियरिंग पढ़ा-लिखा पात्र बेरोजगार बना रहता है,
जबकि उसके सामने अनेक संभावनाएँ हो सकती थीं। इसी प्रकार कनॉट प्लेस
जैसे व्यावसायिक इलाके में किसी रेस्तराँ का दरबान व्हीलचेयर के कारण प्रवेश रोक
दे— यह भी बेहद अविश्वसनीय लगता है। बाज़ार का मनोविज्ञान ग्राहक को रोकने का नहीं,
आकर्षित करने का होता है।
मैंने स्वयं अपनी विकलांगता के बावजूद ऐसा
कभी अनुभव नहीं किया कि मुझे कहीं प्रवेश से रोका गया हो। दरअसल लेखक के भीतर
व्हीलचेयर को लेकर जो हीनभावना बैठी हुई है, वही बार-बार
कथा में रिसती रहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने अपने निजी भय और असुरक्षाएँ
नायक पर आरोपित कर दी हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि दुर्घटना के बाद मित्र व्यक्ति
से दूरी बना लेते हैं, जबकि अनुभवजन्य सच्चाई यह है कि कठिन
समय में कई मित्र और अधिक निकट आ जाते हैं।
यही कारण है कि उपन्यास का लगभग पहला डेढ़
सौ पृष्ठ बोझिल और अनावश्यक विस्तार से भरा प्रतीत होता है। वास्तविक उपन्यास तो
अंतिम तीस-चालीस पन्नों में कहीं जाकर शुरू होता है। और सबसे बड़ी विडम्बना यह कि
विकलांग पति को छोड़कर चली गई पत्नी का अंत में बिना पर्याप्त कारण लौट आना उतना
ही अतार्किक लगता है, जितना उसका अचानक छोड़कर चले जाना। उपन्यास
अपने अंत तक आते-आते पाठक को भावनात्मक संतोष नहीं, बल्कि एक
अधूरी और अविश्वसनीय कथा का अनुभव देकर छोड़ता है।
असल में विकलांग-विमर्श पर लिखना केवल
“विकलांगता” पर लिखना नहीं है। यह मनुष्य की उस लड़ाई को लिखना है, जो वह अपने शरीर, समाज, व्यवस्था
और कभी-कभी अपने ही भीतर से लड़ता है। यहाँ लेखक को अतिरिक्त संवेदनशीलता और
अतिरिक्त ईमानदारी की आवश्यकता होती है। लेकिन अक्सर लेखक या तो दया में फँस जाता
है या प्रेरणात्मक भाषण देने लगता है। दोनों ही स्थितियाँ साहित्य को कमजोर करती
हैं।
मुझे लगता है कि आने वाले समय में हिंदी
साहित्य को विकलांग-विमर्श पर नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। विकलांग पात्रों
को “बेचारा” या “महान” बनाकर प्रस्तुत करने के बजाय उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह
देखने की जरूरत है। क्योंकि सबसे बड़ा अन्याय यही है कि किसी मनुष्य को उसकी
सम्पूर्ण मनुष्यता से वंचित कर दिया जाए।
और शायद इसी “बिगाड़” के डर से बहुत से लेखक
सच लिखने से बचते हैं। वे पात्र को सुरक्षित बनाते हैं, कथा को मुलायम बनाते हैं और जीवन की असुविधाजनक सच्चाइयों पर पर्दा डाल
देते हैं। लेकिन साहित्य यदि असुविधाजनक सच कहने का साहस खो देगा, तो फिर वह केवल पुरस्कारों और सम्मानों की सीढ़ी भर बनकर रह जाएगा।





