Monday, 1 June 2026

रेखाचित्र- टेपरिकॉर्डर

टेपरिकॉर्डर


 

अलमारी के एक पुराने खाने में रखा था- बीपीएल सानियों कंपनी का मेरा टेपरिकॉर्डर। धूल में लिपटा, खामोश, लेकिन भीतर कहीं अब भी कुछ बोलता हुआ। यह वही टेपरिकॉर्डर था जो मैंने स्कूल के दिनों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर इकट्ठे किये पैसो से खरीदा था। मेरा स्कूल का दोस्त था विपिन, उसके पिताजी को नयी नयी चीजों का शौंक था, और मेरे घर में ये सब पढाई खराब करने का यंत्र। पिताजी से किसी भी मनोरंजन के साधन की उम्मीद करना ही बेकार था। विपिन ने जब कहा कि उस टेपरिकॉर्डर बेचना है तो उसी से यह ख़रीदा गया था। दिन भर की पढ़ाई, फिर शाम को पास-पड़ोस के बच्चों को जोड़-घटाव सिखाना, और महीने के अंत में मिलती थी ट्यूशन फीस, एक बच्चे से साठ रूपये, पड़ोस के चार बच्चे नवी कक्षा का गणित पढने मेरे पास आते थे। १९९२ में दो सौ चालीस रूपये महीने की ट्यूशन फीस भी मन को बड़ा सुकून देती थी। उसी फीस से इकट्ठे हुए पैसों से पहले एक दिवार घडी खरीदी फिर उसी इकट्ठी हुई फीस से साढ़े तीन सौ रूपये विपिन को देकर यह टेपरिकार्डर ले लिया। ये वो समय था जब थोड़े-थोड़े पैसे जमा हो जाते तो मन में एक अजीब-सी गर्मी भर जाती थी।

टेपरिकॉर्डर लेना कोई अनायास हुई घटना नहीं थी। मुझे कैमरा, टेपरिकार्डर, घडी का शौक था। एक सपना था कि ये सब चीजें मेरी निजी हों, मेरी जिन्दगी का हिस्सा हों, क्योंकि पिताजी की सीमित आय से पढाई के लिए तो पैसे मांगे जा सकते थे लेकिन अपने निजी शौक पूरे करने के लिए उनसे पैसे लेने का सवाल ही नहीं होता था। मुझे उस समय नए सिक्के इकट्ठे करने का भी शौक था, मेरे कई शौक थे जो धीरे-धीरे कागज़ के लिफ़ाफों में, छोटे सिक्कों और मुड़े-तुड़े नोटों में आकार ले रहे थे।

उस दिन जब पहली बार उसे घर लाया, तो कमरे की दीवारें जैसे थोड़ी और पास आ गई थीं। एक सिहरन-सी महसूस हुई, जैसे कोई पुराना सपना नए रूप में लौट आया हो। वो एक ठोस-सा, भारी-भरकम टू इन वन था, भले वह पुराना था लेकिन उसमें जो जादू भरा था, वो किसी यादों के संदूक जैसा था।

काले-भूरे प्लास्टिक में जड़ा हुआ शरीर, आगे की ओर सिल्वर पट्टी में चमकते बटन, कैसेट स्लॉट के ठीक ऊपर कतार में सजे हुए बटन; प्ले, पॉज़, रिवाइंड, फॉरवर्ड, स्टॉप और इजेक्ट। रिकॉर्डिंग के लिए तो स्टॉप और प्ले को एक साथ दबाना पड़ता था, और उस हल्की-सी "क्लिक" की आवाज़ से जैसे दिल भी धड़क उठता था। वॉल्यूम डायल घुमाते हुए एक खड़खड़ाहट सी आती थी, मानो साउंड का ही नहीं, वक्त का भी स्तर बदल रहा हो। उसमें रेडियो भी था, और एफएम भी, मतलब यह वो ज़माना था जब टू इन वन की जगह ‘थ्री इन वन’ जैसी अनोखी चीज़ें आने लगी थीं। डायल घुमाकर स्टेशन पकड़ते वक्त उस सूं-सूं और खर्र-खर्र के बीच जब कोई साफ आवाज़ मिलती तो लगता जैसे कोई सुदूर जगह से जुड़ गए हों। आकाशवाणी की मद्धम सी उद्घोषणा, फिर किसी पुराने ग़ज़ल की शुरुआती तान। लगता मानों कमरा एकाएक किसी और समय, किसी और संसार में तब्दील हो गया हैऔर कैसेट? हर कैसेट के साथ एक नयी कहानी जुड़ी होती थी। कभी कोई नया कैसेट मार्किट से आया, कभी किसी दोस्त ने तोहफे में दिया। कुछ कैसेटों के साथ प्लेन काग़ज लगा होता जिस पर हाथ से नाम लिखा करता: "लता मंगेशकर– रोमांटिक कलेक्शन" या "किशोर कुमार– सैड सॉन्ग्स", और कुछ पर तो बस एक फटे-से स्टिकर के नीचे छिपे होते थे कुछ किस्से। ‘शोले’ और ‘कालिया’ फिल्म के डायलोग की कैसेट्स लाया तो उनका हर डायलोग जुबान पर चढ़ गया। छेनू आया था डायलोग भी खूब बोला जाने लगा, एक और डायलोग याद आता है उन्हीं दिनों का याद किया हुआ- “एक म्यान में दो तलवारे होने का मतलब है, एक का टूट जाना विक्की... और विक्की फौलाद से बनी वो तलवारें है छेनू जिसने सिर्फ काटना सीखा है..” “कौन बोल रहे हो... तुम्हारा बाप कालिया... जिसे तुमने खुद पैदा किया है...।”, यह डायलोग भी खूब जुबान पर रहा।

उस दिन जब पहली बार उसे घर लाया गया, तो सिर्फ एक संगीत यंत्र नहीं आया था, मानो घर में एक नया किरायेदार आया था, जो बोलता नहीं था, लेकिन सुनाता बहुत कुछ था। कमरे की दीवारें सच में पास आ गई थीं, शायद इसलिए कि अब उनमें गूंजने को बहुत कुछ था।

सच पूछो तो वह टेपरिकॉर्डर मेरे लिए केवल संगीत का साधन नहीं था, वह मेरी मेहनत का दूसरा प्रतिफल था, पहले प्रतिफल के रूप में मैंने एक दीवार घड़ी खरीदी थी, जिसके लिए दो बच्चों की ट्यूशन फीस खर्च की गयी थी।

पढ़ाई के समय अक्सर वह मेरे पास ही रहता। अब हर ट्यूशन फीस से एक-दो नयी कैसेट खरीदी जाती, या फिर ब्लेंक खरीदकर अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड करवाकर लता, १९९२ में एक साइड की कैसेट रिकॉर्ड करवाने के पाँच रुपये और दोनों साइड के दस रुपये देने होते। धीरे-धीरे पसंद के गानों की कैसेट का भी कलेक्शन होता गया। गणित के सवाल हल करते हुए मैं उसे चला देता, और कोई पुराना, जाना-पहचाना गाना मेरी उँगलियों की गति के साथ बहता रहता। एक कैसेट में तो मैंने अपना प्रिय गाना दोनों साइड में रिकॉर्ड करा लिया थ- ताकि बार-बार रिवाइंड न करना पड़े। मुझे गाने सुनते हुए गणित के सवाल हल करने की आदत सी होने लगी, लेकिन इतना जरुर रहा कि आवाज़ इतनी धीमी होती कि कमरे के बाहर कोई खड़ा हो तो उसके कानों तक गाने के बोल न पहुँच पाए, रात को सोने से पहले कमरे में लाल रंग का प्रकाश, यानी नाईट बल्ब ऑन करके गाने सुनना और उसी संगीत के साथ नींद लेना, ये मानो नियत कर्म बन गया, ऐसे ही पंसदीदा संगीत सुन दिन भी कट जाता।

समय बीतता गया, और मशीनें, जैसे जीवन, पुरानी होने लगीं। कभी टेप अटक जाती, कभी आवाज़ फुसफुसाने लगती। वैसे भी यह पहले ही पुराना माल था तो समय के साथ खराबी आना स्वाभाविक था, शुरू में कुछ बार दुकान ले गया, खतौली में ही एक लड़का था बिल्लू, वह रेडियो, टेपरिकार्डर और टीवी ठीक करता था, लेकिन हर बार ठीक कराने के नाम पर पैसे खर्च होते। जब बिल्लू उसे ठीक करता तो मैं ये देखता कि कौन से पार्ट्स अमूमन ख़राब होते हैं, किस तरीके से वह पार्ट्स बाहर निकालता है, कैसे उनको लगाता है यह सब अवलोकन मैं किया करता, फिर एक दिन, एक छोटी-सी सोल्डरिंग आयरन खरीद लाया। तय कर लिया किअब इसे खुद ही ठीक करूँगा। धीरे-धीरे वायरिंग समझ आने लगी, टेप हेड की सफाई, सर्किट की मरम्मत, स्पीकर की लाइन, सब कुछ सीखा, अपनी कोशिशों से। अब वह टेपरिकॉर्डर सिर्फ एक यंत्र नहीं रहा था, वह मेरी प्रयोगशाला बन गया था और मैं उसका एक इंजिनियर। वह अनुभव एक सृजन जैसा था जिसमें तकनीक, धैर्य और आत्मीय लगाव तीनों शामिल थे।

अलग-अलग जगह रहकर पढाई करते हुए, वह मेरे गाँव वाले कमरे को शोभायमान करता रहा, जब कभी छुट्टी में गाँव जाता उससे रूबरू होता, वह मेरा अकेलेपन का भी साथी बन चुका था, किसी बेहतरीन प्रेयसी की भांति वह भी यादों का हिस्सा बनता। उससे मिलकर वही ख़ुशी होती जो माशूका से मिलकर होती हो, वही अनुभूति। पढाई करने तक वह गाँव रहा लेकिन जैसे ही प्रथम नियुक्ति का वक़्त आया और होस्टल छोड़ कमरा किराए पर लेना पड़ा, वह टेपरिकार्डर भी अन्य जरूरी सामान का हिस्सा बन गया। कर्मपुरा से महेन्द्रा पार्क तक के सफ़र में वह भी साथ-साथ हमसफ़र रहा। फिर जब रहने में स्थायित्व आया, उसे भी स्थायी आवास मिल गया। हमेशा ही टीवी से ज्यादा प्रिय रहा, रात को सोने से पहले उसकी ड्यूटी थी, एफएम पर नीलेश का कार्यक्रम ‘ब्रोकन हार्ट’ सुनाना।

वह मेरे हर दुःख-सुख का साथी बना गया था। आज जब उसे देखता हूँ, तो लगता है जैसे वह केवल गाने नहीं बजाता था, वह मेरी किशोरावस्था का संगीत था, मेरे भीतर के आत्मविश्वास का, आत्मनिर्भरता का, और उस छोटे-से लड़के का, जिसे अपनी कमाई से खरीदी चीज़ सबसे प्रिय लगती थी।

फिर एक दिन पता चला कि उसे मेरे पीछे से एक कबाड़ी के सुपुर्द कर दिया गया, और साथ में वो सब कसेट्स भी, जो मैंने बड़े जतन से एक-एक कर सहेजी थी। उस दिन मैं भी ब्रोकन हार्ट हो गया था, एक ऐसा टूटा हुआ इंसान जिसकी कहानी सुनाने एफएम पर कोई नीलेश नहीं आएगा।

आज उस टेपरिकॉर्डर का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है, उसका कोई अवशेष भी नहीं रखा है, यदि वह होता भी तो शायद चालू नहीं होता, शायद टूट चुका होता, लेकिन मेरे पास सहेजा हुआ होता तो एक तसल्ली होती कि मेरे जीवन के शुरूआती दिनों की एक यादगार वस्तु मेरे पास है, अब वह मात्र मेरी स्मृतियों में बिल्कुल वैसा ही है जैसा पहली बार था: थोड़ा भारी, कुछ खड़खड़ाता हुआ, लेकिन पूरी तरह मेरा। यह सब लिखते हुए मानों उन्ही दिनों में पहुँच गया हूँ, और एक संगीत की धुन मेरे कानों में बज रही है- “चलते-चलते ये मेरे गीत याद रखना... कभी अलविदा न कहना...।”




सन्दीप तोमर 

Thursday, 21 May 2026

बिगाड़ के डर से--- एकता व्यास की कहानी ‘स्लीपिंग पार्टनर’

बिगाड़ के डर से--- 

एकता व्यास की कहानी ‘स्लीपिंग पार्टनर’ 

यह कहानी अपने शीर्षक के कारण प्रथम दृष्टया पाठक को एक ऐसे भ्रम में डालती है, मानो यह किसी यौन सम्बन्ध अथवा देहात्मक निकटता की कथा हो। किंतु कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह स्पष्ट होता जाता है कि लेखिका का सरोकार शरीर से अधिक उस गहरे अकेलेपन से है, जो आधुनिक जीवन-शैली और बदलते पारिवारिक ढाँचों ने बुज़ुर्गों के हिस्से में छोड़ दिया है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी सफलता भी है कि वह एक भ्रामक शीर्षक के भीतर अत्यंत मार्मिक मानवीय संवेदना को छिपाकर रखती है।

कहानी की पृष्ठभूमि एक ऐसी सीनियर सिटीजन सोसाइटी है, जहाँ जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचे लोग रह रहे हैं। उनके जीवन-साथी अब इस दुनिया में नहीं हैं और बच्चे अपने-अपने करियर, विदेशों या महानगरों में व्यस्त हैं। मध्यवर्ग और उच्च-मध्यवर्ग—दोनों ही वर्गों के बुज़ुर्ग यहाँ लगभग एक जैसी मानसिक त्रासदी से गुजरते दिखाई देते हैं। आर्थिक सुविधाएँ मौजूद हैं, लेकिन भावनात्मक रिक्तता लगातार फैलती जाती है। लेखिका ने इस विडम्बना को बहुत सहज ढंग से उभारा है कि आधुनिकता ने बुज़ुर्गों को सुविधाएँ तो दी हैं, पर साथ छीन लिया है।

कहानी का पुरुष पात्र निरव शाह अपनी दिवंगत पत्नी भारती की स्मृतियों में जीता हुआ व्यक्ति है। वह हर बात में भारती को याद करता है—खाने के स्वाद से लेकर घर की सज्जा और व्यवहार तक। दूसरी ओर मिनाली भी अपने अकेलेपन और अनिद्रा से जूझ रही स्त्री है। वह निरव की ओर आकर्षित अवश्य होती है, किंतु यह आकर्षण देह से अधिक साझे अकेलेपन का आकर्षण है। यहाँ लेखिका ने अत्यंत सूक्ष्मता से यह रेखांकित किया है कि वृद्धावस्था में मनुष्य को प्रेम से पहले उपस्थिति की आवश्यकता होती है—किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसकी साँसों और खर्राटों की आवाज़ यह भरोसा दे सके कि वह अकेला नहीं है।

मिनाली द्वारा निरव को अपने घर सोने का निमंत्रण कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे अधिक विवादास्पद लग सकने वाला प्रसंग है। कुछ आलोचक इसे लिव-इन रिलेशनशिप या दैहिक निकटता की कथा के रूप में पढ़ सकते हैं, किंतु कहानी का भाव-संकेत उससे बिल्कुल अलग है। मिनाली को नींद नहीं आती; वह अपने जीवनसाथी के साथ सोने की अभ्यस्त रही है। इसलिए उसका निमंत्रण ‘हमबिस्तर’ होने का नहीं, बल्कि ‘साथ सोने’ का निमंत्रण है। कहानी का यह बिंदु अत्यंत मानवीय और संवेदनशील है, जिसे लेखिका ने बिना अनावश्यक उत्तेजना के प्रस्तुत किया है।

एकता व्यास की विशेषता यह है कि वे बदलते सामाजिक यथार्थ से कहानी के नए विषय चुनती हैं। भूमंडलीकरण, भौतिकवाद और उदारवादी जीवन-शैली ने परिवारों की पारंपरिक संरचना को बदल दिया है। संयुक्त परिवार टूटे हैं, रिश्तों की निकटता कम हुई है और बुज़ुर्ग भावनात्मक निर्वासन का जीवन जीने को विवश हुए हैं। ‘स्लीपिंग पार्टनर’ इसी बदलते समाज की कहानी है। यह उन लोगों की कथा है जिन्हें पैसे, सुविधा और स्वतंत्रता तो मिली, पर रात की नींद छिन गई।

कहानी की भाषा में कई जगह आत्मीयता और घरेलू सहजता दिखाई देती है। गुजराती मिश्रित संवाद पात्रों को स्थानीयता और विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। साथ ही, कहानी में स्मृति और वर्तमान के बीच जो आवाजाही है, वह कथा को भावुक हुए बिना मार्मिक बनाती है।

हालाँकि कहानी अभी और कसावट की माँग करती है। कुछ प्रसंग अपेक्षाकृत लंबे हो गए हैं, जिनसे कथा का प्रवाह थोड़ा ढीला पड़ता है। प्रूफ और भाषा-संशोधन की भी पर्याप्त गुंजाइश है। यदि लेखिका कथा-संरचना को थोड़ा और सघन करें तथा अनावश्यक विस्तार को नियंत्रित करें, तो यह कहानी समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में बुज़ुर्ग अकेलेपन पर लिखी गई एक उल्लेखनीय और प्रभावशाली कहानी बन सकती है।

कुल मिलाकर ‘स्लीपिंग पार्टनर’ उस भावनात्मक भूख की कहानी है, जिसे आधुनिक समाज अक्सर समझ नहीं पाता। यह कहानी बताती है कि जीवन के अंतिम वर्षों में मनुष्य को प्रेम से भी अधिक किसी की उपस्थिति, किसी की आवाज़ और किसी के साथ की आवश्यकता होती है। यही इसकी सबसे बड़ी मानवीय उपलब्धि है।


सन्दीप तोमर 

(समीक्षक, आलोचक)

Friday, 8 May 2026

बिगाड़ के डर से… विकलांग विमर्श इतना भी आसान नहीं है...

 


बिगाड़ के डर से…

विकलांग विमर्श इतना भी आसान नहीं है...

मेरे एक शिक्षक साथी ने एक किताब सुझाई और कहा— “सर, आपको यह महत्वपूर्ण किताब अवश्य पढ़नी चाहिए।” उनके आग्रह से मेरे भीतर उस पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता पैदा हुई। फिर पता चला कि उक्त पुस्तक को पुरस्कार भी मिल चुका है और इंदौर की किसी संस्था ने उसके लेखक को सम्मानित भी किया है। अब मेरे लिए उस पुस्तक को पढ़ना लगभग अनिवार्य हो गया था। मैंने पुस्तक खरीदी और पढ़ना शुरू किया।

लेकिन ज्यों-ज्यों मैं पुस्तक पढ़ता गया, मेरी हैरानी बढ़ती गई। हैरानी का कारण यह था कि पुस्तक मेरे भीतर किसी प्रकार की साहित्यिक दिलचस्पी पैदा ही नहीं कर पा रही थी। पन्ना-दर-पन्ना आगे बढ़ते हुए मुझे लगा कि या तो लेखक ने अपनी आपबीती किसी को सुनाकर लिखवा दी है, या फिर लेखक के पास संस्मरणात्मक उपन्यास कहने की वह कलात्मक क्षमता नहीं है, जिसकी इस विधा में सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

वैसे भी “संस्मरणात्मक उपन्यास” जैसी विधा पर अभी तक बहुत गंभीर चर्चा नहीं हुई। मैंने स्वयं इस शैली में कुछ रचनाएँ लिखने की कोशिश की और कुछ वरिष्ठ लेखकों ने उसे स्वीकार्यता भी दी। सच कहूँ तो मुझे संस्मरणात्मक उपन्यास लिखने में अधिक आनंद आता है, क्योंकि इसमें जीवन की वास्तविकता और कथा-संरचना एक साथ चलती हैं। लेकिन यही वह क्षेत्र है जहाँ लेखक की ईमानदारी और कलात्मकता दोनों की असली परीक्षा होती है।

जिस पुस्तक को मैं पढ़ रहा था, उसमें लेखक ने अपने विकलांग जीवन के संघर्षों को लिखते हुए पाठक की सहानुभूति बटोरने पर इतना अधिक जोर दिया कि मूल विषय और उसके भीतर छिपे जीवन-संघर्ष का ताप कहीं पीछे छूट गया। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि विकलांग-विमर्श दया बटोरने का नहीं, मनुष्य के जुझारूपन और अस्तित्व-संघर्ष को सामने लाने का विषय होना चाहिए। लेकिन “विटामिन जिंदगी” में ऐसा नहीं हो पाया। किताब लेखक को एक संघर्षशील मनुष्य के रूप में कम और दया के पात्र के रूप में अधिक प्रस्तुत करती है।

यह समस्या केवल एक पुस्तक तक सीमित नहीं है। मैंने विकलांग-विमर्श पर आधारित अनेक कहानियाँ और उपन्यास पढ़े हैं, लेकिन अधिकांश रचनाकार अपने विकलांग पात्रों के साथ न्याय नहीं कर पाए। हिंदी कथा-साहित्य में विकलांग पात्रों को या तो करुणा पैदा करने वाले पात्र के रूप में चित्रित किया गया है, या फिर उन्हें हास्य और विडंबना का माध्यम बना दिया गया। बहुत कम रचनाएँ ऐसी हैं जहाँ विकलांग पात्र अपनी सम्पूर्ण मनुष्यता, जिजीविषा और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित दिखाई देते हों।


जब मैंने लहरों के पूर्व रंग” पुस्तक का संकलन शुरू किया, तब विकलांग-विमर्श पर केंद्रित अनेक रचनाएँ पढ़ीं। महादेवी वर्मा की “अलोपी” और “गुंगिया”, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की “खितीन बाबू”, विष्णु प्रभाकर की संस्मरणात्मक कहानी “नेत्रहीन”, डॉ. इंद्र बहादुर द्वारा लिखित “हेलेन केलर की आत्मकथा” आदि। इन सबको पढ़ते हुए बार-बार यही महसूस हुआ कि रचनाकार विकलांग पात्रों की भीतरी दुनिया तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाए। कहीं करुणा अधिक हो गई, कहीं आदर्शवाद, कहीं विकलांगता को प्रतीक बना दिया गया और कहीं उसे केवल कथानक का उपकरण भर बना दिया गया।

शायद इन्हीं सब कारणों से भीतर एक बेचैनी पैदा हुई और मैंने एक अपाहिज की डायरी” लिखने का जोखिम उठाया। यह जोखिम केवल साहित्यिक नहीं था, बल्कि आत्मिक भी था। क्योंकि आत्मकथात्मक शैली में लिखते समय लेखक अपने अनुभवों को निर्वस्त्र करता है। उसमें छिपने की गुंजाइश बहुत कम होती है। मैंने अपने नायक के साथ जो घटा, जैसा घटा, उसे पूरी ईमानदारी से कागज पर उतारने की कोशिश की। मैं “मोहनदास करमचंद गांधी” तो नहीं हूँ कि “सत्य के मेरे प्रयोग” जैसी विराट और ऐतिहासिक रचना दे सकूँ, लेकिन इतना जरूर चाहता था कि जो लिखूँ, वह भीतर से झूठा न लगे।


साहित्य में विकलांग-विमर्श का सबसे बड़ा संकट यही है कि यहाँ अक्सर विकलांग व्यक्ति को “मनुष्य” मानने के बजाय “स्थिति” मान लिया जाता है। लेखक उसके दर्द को तो लिखता है, लेकिन उसकी इच्छाएँ, उसका प्रेम, उसका क्रोध, उसका अहंकार, उसका यौन-बोध, उसका सामाजिक अपमान, उसकी महत्वाकांक्षाएँ— इन सबको नज़रअंदाज़ कर देता है। जैसे विकलांग व्यक्ति केवल पीड़ा झेलने के लिए पैदा हुआ हो। जबकि सच यह है कि विकलांग व्यक्ति भी उतना ही जटिल, विरोधाभासी और बहुआयामी मनुष्य होता है, जितना कोई और।

दरअसल हिंदी साहित्य में विमर्शों के नाम पर भी एक फैशन पैदा हो गया है। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श और विकलांग-विमर्श— इन सब पर बड़ी संख्या में ऐसा लेखन सामने आया है, जिसमें अनुभव की प्रामाणिकता कम और वैचारिक प्रदर्शन अधिक है। कुछ लेखक विमर्श को समझने के बजाय उसका उपयोग अपनी “प्रगतिशील छवि” चमकाने के लिए करते दिखाई देते हैं। परिणाम यह होता है कि रचना जीवन से कटकर नारे में बदल जाती है।

इसी बीच कुछ अच्छी रचनाएँ भी पढ़ने को मिलीं। पूजा अग्निहोत्री की कहानी वो धूप जो जलकर निकल गयी” ऐसी ही कहानी है, जो अपने विकलांग पात्र के साथ अपेक्षाकृत अधिक न्याय करती दिखाई देती है। वहाँ पात्र केवल दया का पात्र नहीं बनता, बल्कि अपनी संवेदनाओं और संघर्षों के साथ उपस्थित होता है। ऐसी रचनाएँ उम्मीद जगाती हैं कि हिंदी साहित्य अभी पूरी तरह संवेदनहीन नहीं हुआ।

हाल ही में मैंने एक और चर्चित उपन्यास व्हीलचेयर” पढ़ा। यह उपन्यास भी गहरी निराशा देकर गया। यहाँ भी लेखक पात्र और कथा— दोनों के साथ न्याय करते नहीं दिखाई पड़ते। कथ्य अत्यंत कमजोर है और बार-बार का दोहराव पाठक को थका देता है। ज्ञान प्रकाश विवेक पूरे उपन्यास में किस्सागोई पैदा करने में असफल रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे लेखक के पास अनुभव तो हैं, लेकिन उन्हें कथा में बदलने की कला नहीं है। उपन्यास कई जगह डायरी, कई जगह लेख और कई जगह भावुक आत्मस्वीकृति बनकर रह जाता है। एक जगह वे लिखते हैं— “ज़िन्दगी एक ऐसा लतीफ़ा बना गयी थी, जिसको सुनकर आँसू टपक पड़ते हैं।”
ऐसे वाक्य पढ़कर पाठक का “लतीफ़ा” शब्द से ही विश्वास उठने लगता है। लतीफ़ा अपने स्वभाव में व्यंग्य, विनोद और हल्केपन का वाहक होता है, लेकिन यहाँ लेखक उसे करुणा के ऐसे अतिरंजित बिंदु तक ले जाते हैं कि भाषा अपनी विश्वसनीयता खो बैठती है। साहित्य में संवेदना जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक भाषा की सटीकता भी है।

उपन्यास पढ़ते हुए मैं यह भी नहीं समझ पाया कि प्रेम-विवाह करने वाली पत्नी अस्पताल में भर्ती अपने पति को “मिस्टर असमर्थ” कैसे कह सकती है? यदि यह स्थिति लंबे समय तक विकलांग जीवन के साथ संघर्ष करते हुए आती, तब भी उसे मनोवैज्ञानिक धरातल पर समझा जा सकता था, लेकिन उपचाराधीन व्यक्ति के प्रति इतनी शीघ्र निर्ममता पाठक को चौंकाती है। “क्या फर्क पड़ता है, छुट्टी दो दिन पहले मिले या बाद में, रहना तो आपको बेड पर ही है”— जैसे संवाद प्रेम को गहराई नहीं देते, बल्कि उसे हास्यास्पद और कृत्रिम बना देते हैं।

एक स्थान पर ज्ञान प्रकाश विवेक लिखते हैं— “आकाश अपनी पर्सनैलिटी के प्रति सचेत था। वह लापरवाह-सा नज़र आता।”

यहाँ प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति एक साथ अत्यधिक सचेत और उतना ही लापरवाह कैसे हो सकता है? लेखक चरित्र-निर्माण में स्थिरता नहीं रख पाते। फुटबॉल प्लेयर होना, कद-काठी, विकलांग होने का दर्द— इन बातों का इतना अधिक दोहराव है कि लगने लगता है लेखक की कलम में कथा को आगे बढ़ाने की ऊर्जा कम पड़ गई है। कथानक आगे बढ़ने के बजाय एक ही भावभूमि पर गोल-गोल घूमता रहता है।

एक जगह उपन्यासकार लिखते हैं— “विकलांग लोगों की सबसे बड़ी विडम्बना यह होती है कि वे निरंतर शरीर के उस अंग के बारे में सोचते रहते हैं, जो या तो होता नहीं, या नाकारा, बेहिस और बेजान होता है।”

यह वाक्य पढ़कर लगता है कि लेखक ने विकलांग व्यक्तियों के जीवन को बहुत सतही ढंग से देखा है। यदि वे किसी विकलांग व्यक्ति के साथ कुछ दिन भी बिताते, तो शायद समझ पाते कि विकलांग लोग अपने निष्क्रिय अंगों के बारे में कम, जीवन के सक्रिय संघर्षों के बारे में अधिक सोचते हैं। उन्हें अपने शरीर की कमी पर रोते रहने की फुर्सत नहीं होती। वे अपनी सीमाओं के भीतर नई संभावनाएँ गढ़ते हैं। बहुत-से विकलांग व्यक्ति मानसिक रूप से सामान्य लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक दृढ़ और आत्मनिर्भर हो जाते हैं। वे अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत में बदल देते हैं।

लेखक एक जगह लिखते हैं— “आकाश को इस बात का इल्हाम हो चुका था कि वह लाचार है।” और अगले ही पृष्ठ पर लिखते हैं— “आकाश अपने अपाहिज रूप को स्वीकार नहीं कर पा रहा था।” यह विरोधाभास केवल भाषा का नहीं, चरित्र की मनोवैज्ञानिक संरचना का भी है। यदि पात्र अपनी स्थिति को स्वीकार कर चुका है, तो फिर अस्वीकार का संकट क्यों? और यदि वह अभी स्वीकार नहीं कर पाया, तो “इल्हाम” जैसी निर्णायक भाषा क्यों? उपन्यासकार अंत तक यह स्पष्ट नहीं कर पाते कि वे अपने नायक को किस रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं— संघर्षशील मनुष्य, आत्मदया में डूबा व्यक्ति या केवल करुणा बटोरने वाला पात्र।

डॉ. तनेजा के आकाश और संगीता दोनों के साथ संवाद अपेक्षाकृत अधिक दिलचस्प और मनोवैज्ञानिक हैं। उनमें जीवन-दृष्टि की संभावना दिखाई देती है। लेकिन विडम्बना यह है कि उस मनोवैज्ञानिकता का प्रभाव पूरे उपन्यास में कहीं दिखाई नहीं देता। लेखक लिखते हैं— “विकलांग के दुःख हर पल तोड़ते हैं।”

मैं कहता हूँ— विकलांगता के दुःख हमेशा तोड़ते नहीं, कई बार वे मनुष्य को भीतर से असाधारण रूप से मजबूत भी बनाते हैं। डॉ. तनेजा और नर्स स्टेला के संवाद उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति बन सकते थे, लेकिन उनका असर मुख्य पात्रों के व्यवहार और विकास में कहीं परिलक्षित नहीं होता। इससे पूरा कथानक बिखरा हुआ प्रतीत होता है।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद संगीता आकाश को जिस कमरे में रखती है, उसका वर्णन देखिए— पुरानी छतरी, पुराना कूलर, टू-इन-वन, पुरानी वाशिंग मशीन, टूटे जूते, टूटी हत्थेवाली कुर्सी…। यह दृश्य किसी स्वाभाविक वैवाहिक तनाव से अधिक कृत्रिम प्रतीत होता है। मानव-मन की थोड़ी भी समझ रखने वाला व्यक्ति जानता है कि प्रेम-विवाह करने वाले दंपति के बीच इतनी जल्दी ऐसा भावनात्मक पतन आ जाना सहज नहीं है। लेखक बिना पर्याप्त मनोवैज्ञानिक तैयारी के पात्रों को अमानवीय बना देते हैं।

विडम्बना देखिए— रघु, जो एक मूक-बधिर नौकर है, व्हीलचेयर देखकर खुश होता है, जबकि आकाश, जिसे उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, सोचता है— “व्हीलचेयर सुविधा देती है, सुख नहीं।”

यहाँ समस्या व्हीलचेयर नहीं, लेखक की दृष्टि है। उपन्यास में व्हीलचेयर एक सहायक उपकरण कम और कलंक अधिक बनकर उपस्थित होती है। लेखक बार-बार उसे त्रासदी का प्रतीक बनाते हैं, जबकि वास्तविक जीवन में व्हीलचेयर अनेक लोगों के लिए स्वतंत्रता और गतिशीलता का माध्यम होती है।

पूरे उपन्यास में उपस्थित अनेक प्रसंग यह आभास देते हैं कि लेखक का ध्यान कथा की स्वाभाविकता से अधिक पन्ने भरने पर रहा है। पत्नी की बॉस का घर आने वाला प्रसंग भी कुछ ऐसा ही लगता है। जबकि वही बॉस एक अत्यंत सकारात्मक बात कहती है— “एक इनर हाइट भी होती है, उस हाइट को कोई एक्सीडेंट नहीं छीन सकता।” लेकिन आश्चर्य यह है कि इस संवाद का भी संगीता या आकाश पर कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता। जैसे लेखक स्वयं अपने ही सकारात्मक विचारों पर विश्वास नहीं करते।

एक जगह उपन्यासकार लिखते हैं— “जिन लोगों का शारीरिक रूप से कुछ छिन जाता है, वे समाज में सहमे-सहमे से नज़र आते हैं।”

मैं लेखक से पूछना चाहता हूँ कि वे कितने विकलांग लोगों से वास्तव में मिले हैं? उन्हें अरुणिमा सिन्हा, स्टीफन हॉकिंग और अनेक संघर्षशील व्यक्तित्वों को गहराई से पढ़ने-समझने की आवश्यकता है। विकलांगता मनुष्य को हमेशा सहमा हुआ नहीं बनाती, कई बार वह उसे अधिक निर्भीक और जीवन-सचेत बना देती है।

अध्याय अठारह में लेखक यौन-इच्छाओं को लेकर भी कई अनावश्यक और तर्कहीन बातें लिखते हैं। यौन-क्रीड़ा का किसी व्यक्ति की विकलांगता से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। यह बात लेखक सहित पाठकों को भी समझनी चाहिए। मेरे एक दृष्टिबाधित मित्र विश्वविद्यालय में कहा करते थे— “सेक्स के लिए सेक्स-ऑर्गन की जरूरत होती है, आँखों, हाथों या पैरों की नहीं।”

यह वाक्य जितना सरल है, उतना ही गहरा भी। लेकिन उपन्यास इस विषय को भी दया और हीनभावना के चश्मे से देखता है।


पूरे उपन्यास में आकाश को जितना असहाय दिखाया गया है, वैसा असहाय विकलांग पात्र मैंने अपने जीवन में नहीं देखा। लेखक कई बार उसके हाथों से महंगे कप तुड़वाते हैं। पढ़ते हुए बार-बार मन में प्रश्न उठता है— आकाश पैरों से विकलांग हुआ है या हाथों से? यह अतिशयोक्ति पात्र को विश्वसनीय नहीं रहने देती।

विडम्बना यह भी है कि आज के एंड्रॉइड और डिजिटल युग में लेखक आकाश को व्हीलचेयर पर बैठाकर बिजली का बिल जमा करवाने काउंटर तक भेजते हैं, जबकि उसकी पत्नी स्वयं ऑनलाइन बिल भरती है। वर्क-फ्रॉम-होम के दौर में इंजीनियरिंग पढ़ा-लिखा पात्र बेरोजगार बना रहता है, जबकि उसके सामने अनेक संभावनाएँ हो सकती थीं। इसी प्रकार कनॉट प्लेस जैसे व्यावसायिक इलाके में किसी रेस्तराँ का दरबान व्हीलचेयर के कारण प्रवेश रोक दे— यह भी बेहद अविश्वसनीय लगता है। बाज़ार का मनोविज्ञान ग्राहक को रोकने का नहीं, आकर्षित करने का होता है।

मैंने स्वयं अपनी विकलांगता के बावजूद ऐसा कभी अनुभव नहीं किया कि मुझे कहीं प्रवेश से रोका गया हो। दरअसल लेखक के भीतर व्हीलचेयर को लेकर जो हीनभावना बैठी हुई है, वही बार-बार कथा में रिसती रहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने अपने निजी भय और असुरक्षाएँ नायक पर आरोपित कर दी हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि दुर्घटना के बाद मित्र व्यक्ति से दूरी बना लेते हैं, जबकि अनुभवजन्य सच्चाई यह है कि कठिन समय में कई मित्र और अधिक निकट आ जाते हैं।

यही कारण है कि उपन्यास का लगभग पहला डेढ़ सौ पृष्ठ बोझिल और अनावश्यक विस्तार से भरा प्रतीत होता है। वास्तविक उपन्यास तो अंतिम तीस-चालीस पन्नों में कहीं जाकर शुरू होता है। और सबसे बड़ी विडम्बना यह कि विकलांग पति को छोड़कर चली गई पत्नी का अंत में बिना पर्याप्त कारण लौट आना उतना ही अतार्किक लगता है, जितना उसका अचानक छोड़कर चले जाना। उपन्यास अपने अंत तक आते-आते पाठक को भावनात्मक संतोष नहीं, बल्कि एक अधूरी और अविश्वसनीय कथा का अनुभव देकर छोड़ता है।

असल में विकलांग-विमर्श पर लिखना केवल “विकलांगता” पर लिखना नहीं है। यह मनुष्य की उस लड़ाई को लिखना है, जो वह अपने शरीर, समाज, व्यवस्था और कभी-कभी अपने ही भीतर से लड़ता है। यहाँ लेखक को अतिरिक्त संवेदनशीलता और अतिरिक्त ईमानदारी की आवश्यकता होती है। लेकिन अक्सर लेखक या तो दया में फँस जाता है या प्रेरणात्मक भाषण देने लगता है। दोनों ही स्थितियाँ साहित्य को कमजोर करती हैं।

मुझे लगता है कि आने वाले समय में हिंदी साहित्य को विकलांग-विमर्श पर नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। विकलांग पात्रों को “बेचारा” या “महान” बनाकर प्रस्तुत करने के बजाय उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह देखने की जरूरत है। क्योंकि सबसे बड़ा अन्याय यही है कि किसी मनुष्य को उसकी सम्पूर्ण मनुष्यता से वंचित कर दिया जाए।

और शायद इसी “बिगाड़” के डर से बहुत से लेखक सच लिखने से बचते हैं। वे पात्र को सुरक्षित बनाते हैं, कथा को मुलायम बनाते हैं और जीवन की असुविधाजनक सच्चाइयों पर पर्दा डाल देते हैं। लेकिन साहित्य यदि असुविधाजनक सच कहने का साहस खो देगा, तो फिर वह केवल पुरस्कारों और सम्मानों की सीढ़ी भर बनकर रह जाएगा।


Thursday, 7 May 2026

कहानी और पुरस्कार


 कहानी और पुरस्कार
एक किस्सा कुछ यूँ---

एक ऑनलाइन और ऑफलाइन पत्रिका ने मिलकर कहानी प्रतियोगिता आयोजित की। नियम बड़े लोकतांत्रिक अंदाज़ में लिखे गए थे— “पुरस्कार का आधार पाठकों के लाइक और कॉमेंट्स होंगे।”
अब मैं सामान्यतः ऐसी प्रतियोगिताओं में कहानियाँ नहीं भेजता। साहित्य को मैं कभी वोटिंग एप का खेल नहीं मान पाया। लेकिन एक बहुत प्रिय महिला मित्र ने अपनी कहानी भेजते हुए आग्रह किया—
“तोमर जी, आप भी कहानी भेजिए न…”

दोस्ती के आग्रह में आदमी कई बार अपने सिद्धांतों को थोड़ी देर के लिए कोने में रख देता है। मैंने भी रख दिया। नियमावली पढ़ी, थोड़ा माथा पकड़ा, फिर सोचा— चलो, देख लेते हैं कि साहित्य का नया लोकतंत्र कैसा दिखता है।

मन में एक सवाल लगातार कुलबुला रहा था—
क्या सचमुच सामान्य पाठक कहानी की तकनीक, संरचना, शिल्प, कथ्य, चरित्र-विकास और भाषा की बारीकियों को उस स्तर पर परखते हैं कि केवल लाइक और कॉमेंट्स को ही पुरस्कार का आधार बना दिया जाए?
क्योंकि सोशल मीडिया पर तो लोग कई बार सिर्फ लेखक का चेहरा देखकर भी “वाह सर”, “गजब”, “लाजवाब” लिख आते हैं। कहानी पढ़ना तो दूर, शीर्षक तक पूरा नहीं पढ़ते।

खैर, कहानी अपलोड कर दी गयी।

धीरे-धीरे प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। मेरी कहानी पर सबसे अधिक लाइक आए, सबसे अधिक टिप्पणियाँ आईं। लोग कहानी शेयर कर रहे थे, बहस कर रहे थे, निजी संदेश भेज रहे थे। मैं यह नहीं कहता कि मेरी कहानी सर्वश्रेष्ठ थी, लेकिन प्रतियोगिता की घोषित शर्तों के हिसाब से वह स्पष्ट रूप से सबसे आगे थी।

फिर परिणाम आया।

और परिणाम देखकर मुझे पहली बार समझ आया कि साहित्यिक प्रतियोगिताओं में “नियमावली” केवल पाठकों को उत्साहित रखने के लिए होती है, आयोजकों को बाँधने के लिए नहीं।

जिस कहानी को पाठकों ने सबसे अधिक पसंद किया, उसे प्रथम नहीं बल्कि द्वितीय पुरस्कार दिया गया।
और जो कहानी प्रथम हुई, उसके बारे में लोगों ने उतनी चर्चा तक नहीं की थी।

मेरी मित्र की कहानी प्रतियोगिता से बाहर कर दी गयी।

अब यहाँ से कहानी ज्यादा दिलचस्प हो जाती है।

कुछ दिन बाद आयोजक महोदय मेरी उस मित्र को फोन करते हैं—
“आपकी कहानी वास्तव में दिल को छूने वाली थी… प्रतियोगिता में भले चयन न हो पाया हो, लेकिन मैं उसे अपनी प्रिंट पत्रिका में स्थान दे रहा हूँ… और पत्रिका की प्रति भी आपको भेजूँगा…”

यह सुनकर मुझे साहित्य कम, पुरानी हिंदी फिल्मों के संवाद ज्यादा याद आने लगे।

फिर प्रिंट पत्रिका आई।
उसमें न मेरी द्वितीय पुरस्कार प्राप्त कहानी थी, न प्रतियोगिता के घोषित परिणामों का कोई सम्मान।
लेकिन मेरी मित्र की कहानी बड़े आदर से प्रकाशित थी।

अब आप इसे संयोग कह सकते हैं।
मैं इसे साहित्यिक संस्कार नहीं कह पाता।

धीरे-धीरे समझ आने लगता है कि कुछ लोग पत्रिका नहीं निकालते, वे अपने अहंकार और आकर्षण का निजी दरबार चलाते हैं।
कई तथाकथित संपादकों के लिए साहित्य साधना नहीं, “इम्प्रेशन मैनेजमेंट” का माध्यम बन चुका है।
वे कहानी कम पढ़ते हैं, प्रोफाइल फोटो ज्यादा देखते हैं।
रचना से अधिक रचनाकार के जेंडर में रुचि रखते हैं।
और “प्रकाशन” को ऐसे पेश करते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा उपकार कर रहे हों।

सबसे मजेदार बात यह है कि ऐसे लोग खुद को साहित्य का प्रहरी भी घोषित किए रहते हैं।
फेसबुक पर लंबी पोस्ट लिखेंगे—
“हम साहित्य में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते…”
और इनबॉक्स में लिखेंगे—
“मैम, आपकी संवेदनशीलता ने मन छू लिया…”

अब ये “मन” कहाँ छूता है, यह साहित्य का विषय नहीं, मनोविज्ञान का विषय है।

आजकल कई ऑनलाइन प्रतियोगिताएँ वास्तव में साहित्यिक कम, डिजिटल दुकानदारी अधिक हो गयी हैं।
लाइक जुटवाओ, मित्रों से कॉमेंट कराओ, वेबसाइट की ट्रैफिक बढ़ाओ, पत्रिका का प्रचार करवाओ— और अंत में पुरस्कार उस व्यक्ति को दे दो जो आयोजकों की निजी पसंद हो।

कई बार तो निर्णायक बाद में खोजे जाते हैं और विजेता पहले तय होते हैं।
कुछ जगह पुरस्कार प्रतिभा को नहीं, परिचय को मिलता है।
कुछ जगह लेखन नहीं, लॉबिंग जीतती है।
और कुछ जगह “साहित्यिक संस्कार” का अर्थ होता है— आयोजक की पोस्ट पर नियमित “वाह वाह” करना।

दुखद यह नहीं है कि पुरस्कार पक्षपाती हो गया।
दुखद यह है कि इस प्रक्रिया में नए लेखक सबसे अधिक ठगे जाते हैं।
वे सचमुच विश्वास कर लेते हैं कि साहित्य एक निष्पक्ष दुनिया है।
वे रात-रात भर जागकर कहानी लिखते हैं, शब्दों में अपना जीवन उड़ेल देते हैं, और फिर देखते हैं कि परिणाम किसी और ही गणित से तय हो रहे हैं।

लेकिन समय बदल रहा है।

अब महिलाएँ भी समझने लगी हैं कि हर “आप बहुत अच्छा लिखती हैं” वास्तव में साहित्यिक प्रशंसा नहीं होती।
हर “मैं आपकी रचना पत्रिका में लेना चाहता हूँ” के पीछे संपादकीय ईमानदारी नहीं होती।
और हर साहित्यिक मंच वास्तव में साहित्य के लिए नहीं चलाया जाता।

इसलिए ऐसे आयोजकों और संपादकों से मेरा साफ संदेश है—

मेरे भाई,
प्रकाशन के नाम पर महिलाओं को प्रभावित करने का यह पुराना खेल अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला।
लेखिकाएँ अब आपकी कृपा पर निर्भर नहीं हैं।
सोशल मीडिया ने उन्हें अपनी आवाज़ खुद दे दी है।
वे अब समझती हैं कि कौन रचना पढ़ रहा है और कौन केवल अवसर तलाश रहा है।

साहित्य सेवा के नाम पर निजी आकर्षण की दुकानें बहुत दिन नहीं चलतीं।
क्योंकि अंततः शब्द बचते हैं, चालाकियाँ नहीं।

बिगाड़ के डर से--- पुरस्कार और कहानी लेखन

 बिगाड़ के डर से--- पुरस्कार और कहानी लेखन


पिछले वर्ष गाजियाबाद एक कहानी की वर्कशॉप में बोलने का मौका मिला तो मैंने कहानी विधा की एक लम्बी विकास यात्रा की बात करते हुए कहा था - कहानी अब पुराने घिसे–पिटे विषयों से कहीं आगे का सफ़र तय कर चुकी है। कहानीकार अपने समय की नब्ज को पकड़े और वहाँ से कहानी के विषय लेकर कहानी लिखे। हाल-फिलहाल कुछ कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता है कि कुछ लेखक तो भाषा के स्तर पर खूब मेहनत कर रहे हैं, अत्यधिक क्लिष्ट और सुसंस्कृत भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो भाषा के स्तर पर सोचते ही नहीं कि वे क्या लिख रहे हैं? नरेशन हो या संवाद - उनकी बहुत लचर भाषा होती है। अधिकांश कहानीकारों की यह भी दिक्कत है कि वे प्रवचन की मुद्रा में आकर कहानी के मूल रूप को भूल बैठते हैं। उस कार्यक्रम में विनय विक्रम सिंह की कहानी के हवाले से मैंने कहा था - “भाषा का अपना सौन्दर्य है, किंतु जब कहानीकार अति-चित्रात्मक और कीमियागिरीपूर्ण लेखन करता है या हर वाक्य में रचनाकार का सजग सौन्दर्यबोध झलकता है तो कथा का शिल्प कथा की गति को रोक देता है... ऐसी कहानियों में कहानी का वातावरण, भाषा और संवेदना की गहनता तो होती है— पर ऐसे कहानीकार अपने समय से संवाद नहीं कर पाते। लेखक एक सुंदर, पर नॉस्टैल्जिक संसार रचता है, जहाँ गरीबी भी गरिमामय है और अभाव भी कलात्मक। किंतु यह यथार्थ नहीं, यथार्थ का सौंदर्यीकृत पुनर्निमाण है। आज के दौर में जहाँ कला, धर्म और आजीविका का मिश्रण नए आयाम ले रहा है, वहाँ ऐसी कथाएँ पुराने मिथकीय आग्रह, लेखक के निजी पूर्वाग्रहों में फँसी प्रतीत होने लगती हैं।”
यही बात मुझे कुणाल सिंह की कहानी “विसर्जन” को पढ़कर महसूस हुई थी। विसर्जन को पढ़कर मैंने एक लम्बी टिप्पणी उन्क्त वेब पोर्टल को लिखी थी, लेकिन उन्होंने उक्त टिप्पणी को प्रकाशित नहीं किया।
नवम्बर २०२५ में अंजू शर्मा की कहानी को प्रसिद्ध कथा यूके का इंदु शर्मा कथा सम्मान दिया गया। यह एक निष्पक्ष चयन प्रक्रिया वाला सम्मान है। ऐसा दावा किया जाता है। मन में उत्सुकता हुई कि चुनी गई कहानी पढ़ी जाए... कहानी को पढ़कर लगा कि एक बेहद मजबूत थीम पर बेहद लचर कहानी लिखी गई है। इसमें टर्निंग पॉइंट्स, ड्रामा-टेंशन-रिलीज़ और भावनात्मक ज्वार के बीच ज्वलंत समन्वय को और कसावट की जरूरत है, ऐसा मुझे महसूस हुआ। कहानी में दो संघर्ष हैं— पहला समाज बनाम राधे, दूसरा राधे का प्रेम बनाम उसकी स्त्रीरूप पहचान। कहानी में इनका संतुलन नहीं दिखा। कहानी प्रेम वाली लाइन को छूकर छोड़ देती है; वह arc विकसित नहीं हो पाती। राधे की आंतरिक यात्रा भी आधी-अधूरी रह जाती है— उलझन दिखती है, पर resolution या breakdown नहीं आता।
भगतजी की मृत्यु कहानी का असली pivot है, पर प्लॉट को यहाँ चरम तक ले जाना चाहिए था, लेकिन कहानीकार ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं है। कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी मुझे यह लगी कि राधे का मनोवैज्ञानिक द्वंद्व पूरी तरह articulate नहीं हुआ; climax तक भी उसकी growth या fall स्पष्ट नहीं हो पाता। चंदा सबसे महत्वपूर्ण भावनात्मक धुरी बन सकती थी, पर उसका किरदार कथा में कोई आयाम नहीं पाता। चंदा–राधे का रिश्ता केवल संकेत में है; इसमें संभावित tragedy या forbidden love का भारी material है, जिस पर काम होना चाहिए था। कहानी में लंबे संवाद में लेखक ने दो-चार शब्द शुरू में और दो-चार ही अंत में ब्रज भाषा के लिखकर बताया है कि ये संवाद ब्रज भाषा का ज्ञाता दर्शाने के लिए ठूंसे भर हैं; लेखक खुद ब्रज भाषा लिखने में सिद्धहस्त नहीं है। एक ही वाक्य में संस्कृत-निष्ठ हिन्दी, ब्रज और उर्दू का घालमेल भी दिखता है।
कथा में वर्णन बहुत है, घटनाएँ कम। आंतरिक संघर्ष की भाषा कवितामयी है, पर analytical depth कम है या न के बराबर। कई बार कहानी जर्नल की तरह लगने लगती है, फिक्शन की तरह नहीं। अगर समाजशास्त्रीय परतों पर बात की जाए तो हम पाते हैं कि यह कहानी असल में जेंडर–द्वैत का विघटन दर्शाती है। राधे की देह और मन अलग-अलग दिशाओं में खिंचते हैं— यह trans-feminine या gender-fluid identity की ओर संकेत करता है, पर कहानी इसे सिर्फ अभिनय की परिणति मानती है।
कहानी में— Conflict है (समाज vs कला vs पहचान), Build-up भी है (दुविधा, तंज, प्रेम, कला, गिरावट), पर Climax या Resolution नहीं है (राधे किस ओर जाता है? टूटता है? लड़ता है? समर्पित होता है? स्वीकारता है? खो देता है?) यह “आख्यान-पूर्णता” की सबसे बड़ी कमी है।
कहानी को बेहतर बनाने के लिए ठोस प्रेम–रेखा विकसित की जानी चाहिए थी। चंदा का arc कहानी को भावनात्मक ऊँचाई दे सकता है। जैसे— क्या वह राधे का प्रेम स्वीकार करती या अस्वीकार? समाज उसे कैसे देखता? क्या यह प्रेम राधे का उपचार बनता है या और घाव? राधे का मनोवैज्ञानिक संघर्ष गहरा किया जाना चाहिए था— जिसमें identity crisis, अपनी देह से संघर्ष, कला vs समाज, प्रेम vs वास्तविकता, आत्मसम्मान vs भूख इत्यादि को ध्यान में रखा जाता।
बहरहाल, यदि निर्णायकों ने इस कहानी को कथा सम्मान के लिए चुना है तो उनकी अपनी आलोचनात्मक, पाठकीय दृष्टि है, लेकिन यहाँ यह सवाल अवश्य खड़ा होता है कि निर्णायकों में कितनी निष्पक्षता होती है? वे किसी कहानी को किस कसौटी पर कसते हैं? उनके अपने पुरस्कारों के अपने मानक क्या हैं? मुझे लगता है कि कहानीकार की विचारधारा निर्णायकों और आयोजकों से कितनी मिलती है, यह भी चयन का एक महत्वपूर्ण घटक हो सकता है। शॉर्टलिस्ट किए जाने का भार जिनके ऊपर होता है, उनके आपसी रिश्ते भी कई बार चयन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि ऐसा हो ही, यह मेरा अनुमान भर भी हो सकता है। आवश्यक नहीं कि किसी निष्पक्ष आलोचना की पुरस्कारों के लिए कथाओं के चयन से कोई तारतम्यता हो।
बहरहाल, यह सब मेरी चिंता का विषय नहीं है। अभी हाल ही में सन्निधि ने अनीता प्रभाकर कहानी प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कारों के साथ ही कुछ सांत्वना पुरस्कारों के नामों पर मेरी नजर गई, जिनमें एक घोर सांप्रदायिक नाम के साथ ही डॉ. रंजना जायसवाल का भी नाम था। अभी कुछ दिन पहले एक नवोदित लेखिका ने चर्चा के समय कहा— डॉ. रंजना जायसवाल आजकल बढ़िया कहानियाँ लिख रही हैं... ।
आजकल पैर की चोट के चलते इधर-उधर जाना लगभग बंद रहा, और कार्यक्रमों में जाना तो एकदम बंद है।बहराल घर से ही साहित्य का पठन-पाठन चल रहा है।
संयोग ही है कि कल ही एक साहित्यिक पत्रिका मिली, जिसमें सबसे पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त अपनी प्रिय लेखिका ममता कालिया की कहानी पढ़ी, उसके बाद डॉ. रंजना जायसवाल की कहानी पढ़ी।
कहानी का शीर्षक है— “भालचंद्र डिब्बे वाला”। पत्रिका के ढाई पृष्ठ कहानीकार ने निःसंदेह खराब कराए हैं, जिनमें किसी लेखक की एक कहानी का पूरा स्पेस मिल सकता था। ये वो ढाई पृष्ठ हैं, जिनकी कहानी में कोई आवश्यकता मुझे नहीं लगी।
ढाई पृष्ठ पढ़ने के बाद मेरे अंदर का पाठक भाषा का स्तर देख बेचैन हो उठा।
“हम खानाबदोशों के ठिकाने का कोई पता कहाँ होता है न?” (पृष्ठ-२२)
सामने दरवाजे के दाहिने तरफ उसके नाम की नेम प्लेट चमक रही थी (पृष्ठ-२२)
मेज पर उसके नाम की नेम प्लेट रखी थी पृष्ठ-२२)
रिवलिंग चेयर पर बगुले सी सफ़ेद और मुलायम सफ़ेद तौलिया रखी हुई थी(पृष्ठ-२२)
बैंक की तरफ आते वक्त उसने एक डिब्बे वाले को देख था (पृष्ठ- २३)
अरविन्द जी के पीछे-पीछे पूरा कुनबा भी चल आया था (पृष्ठ-२३)
नौ जवानों और अधेड़ कर्मचारियों के एक कुनबा उनके चैंबर में बिखर चुका था (पृष्ठ-२३)
तब तक स्थान्तरण के एक पत्र (पृष्ठ-२३)
इमारतें अब उसे उतनी अपरिचित नहीं लग रहे थे (पृष्ठ-२३)
यहीं-कहीं आस-पास डब्बे वाले भाऊ (पृष्ठ-२३)
भाऊ डब्बे वाले का काम करते थे (पृष्ठ-२३)
उनके जैसे पांच हजार हजारों लोग इस शहर में डब्बे वाले का काम करते थे (पृष्ठ-२३)
पृष्ठ २४ पर पहचानने के लिए हुलिया का वर्णन करते हुए कहानीकार लिखती हैं- बहत्तर किलो वजन, खिचड़ी बाल, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर का पेशेंट, डबल चिन और तोंद वाले राजीव को पहचानना मुश्किल तो था पर नामुमकिन तो नहीं... (मुझे समझ नहीं आया कि पहचान के लिए डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर कैसे झलक जाता है? ये शरीर के अन्दर की बीमारी हैं या बाहर से दिखने वाली?)
प्यार की दो छींटे क्या पड़ी (पृष्ठ-२४)
वक्त की मार से वो चश्मा भी अब चोटहिल हो चुका था (पृष्ठ-२४)
उन्होंने बुढ़ापे में झुक गयी कमर की तरह झुक आई चश्में की डंडियों को सूती धागे से बांधकर सीधा कर साध दिया था (पृष्ठ -२४)
बूढ़ी हो गयी हो तेरी ताई... जब देखो किड़-किड़ करती रहती हो (पृष्ठ-२६)
उन्होंने अपनी झुर्रीदार हाथों से उसके हाथों को अपने हाथों में ले लिया (पृष्ठ-२६)
दरिया बह निकलने को बहाने ढूढ रहा था(पृष्ठ-२६)
वे बारिश के हल्के दबाव से मिट्टी के बाहर अपने झरोखों से बाहरी दुनियाँ को झाँकने लगे हैं (पृष्ठ-२६)
दर्द बादलों के माध्यम से धरती पर टप-टप टपक रहा था (पृष्ठ-२६)
कहानी में इन वाक्यों को पढ़कर लगा कि कहानीकार आखिर किस तरह की नई भाषा गढ़ रहा है? क्या यह नव-व्याकरण है या फिर नई वाली हिंदी के भाषिक प्रयोग?
इसी संदर्भ में एक और हालिया प्रसंग याद आता है। हाल ही में पाकिस्तान में एक स्कूल में हुई घटना को मीडिया में काफी कवरेज मिला—एक स्कूल की प्रधानाचार्या ने अपने चपरासी के चाय पिलाने के स्टाइल से प्रभावित होकर उसके साथ निकाह कर लिया। चूँकि खबर बहुत वायरल हुई, तो शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इस खबर से परिचित न हुआ हो। एक लेखक महेन्द्र तिवारी ने उस घटना पर कहानी लिखी, जिसे जनसत्ता अखबार ने प्रकाशित किया।
जब मैंने ये कहानी साहित्य किंज के व्हाट्सएप ग्रुप में पढ़ी तो मैंने लिखा— “ये पूरी अखबार की खबर है। उसे कहानी बनाकर लिख दिया गया बस।”
कहानीकार का तर्क था— “तो कहानी भी एक घटना ही होती है सर। अगर रिपोर्टिंग लिखी जाती तो कहानी कैसे कहलाती? धुरंधर फिल्म की कहानी को आप क्या कहेंगे? आप कहेंगे कि धुरंधर भी मौलिक नहीं है?”
फिर किसी महाशय की टिप्पणी थी— “सच्ची घटनाओं पर कहानियां लिखी जाती हैं। और पहले भी लिखी जाती रही हैं। उसमें कहानीपन होना चाहिए।”
मैंने अपनी बात रखते हुए कहा— “लेखक की मौलिकता वहां होती जहां वह पात्रों के आंतरिक भावों को पाठक के सामने रख दे। उसके भीतर के द्वंद्व को बाहर निकाल दे। कुल मिलाकर कहानी घटना भर न हो। अमीना बेगम ने चपरासी से शादी क्यों की? पूरी कहानी इस पर केंद्रित होनी चाहिए। इसी बात की पड़ताल करें तो?”
मैंने उस घटना की खबर के कुछ लिंक शेयर किए, तो जवाब मिला— “रिपोर्टिंग में यह दिखाया गया है कि उसके चाय रखने के सलीके से प्रभावित होकर प्रिंसिपल मैम चपरासी से निकाह कर लेती है। लेकिन कहानीकार बाह्य कारकों से निकाह नहीं करा सकता है। साहित्यकार उसके अंदर की फीलिंग को बाहर निकालने का काम करता है। तभी वह साहित्यिक कृति बन पाती है। आपने इसमें प्रयास तो किया है पर संवेदनाओं पर कुछ घटनाएं हावी दिख जाती है। खैर इससे कहानी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। यह कहानी ही है और इसे महेंद्र तिवारी की कहानी कहा जाएगा।”
मेरा मत था— “रिपोर्टिंग को कहानी में बदलने को मौलिक रचना कैसे कहा जा सकता है? कहानी कहे जाने पर सवाल नहीं है, सवाल मौलिकता पर है। मौलिकता यानी नया दृष्टिकोण (vision), न कि केवल नया कथानक (plot)।”
लेखक का तर्क था— “आपके अनुसार उसमें मौलिकता यानि नया दृष्टिकोण नहीं है? पहले तो ये बोल रहे थे कि कहानी मौलिक नहीं है। अब कह रहे हैं कि नया दृष्टिकोण नहीं है। आप कहानी पर सवाल खड़े नहीं कर रहे, आप तो जनसत्ता की स्तरीयता और उसके संपादक पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। यह आवश्यक नहीं कि हर कहानीकार आपके दृष्टिकोण से ही कहानी लिखे।”
मेरा स्पष्ट मानना है कि कहानीकार को कहानी से इतना मोह नहीं होना चाहिए कि वह कहानी के डिफेंस में तर्क करने लगे।
कहानीकार ने कहा- आप तो जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित अखबार पर ही सवाल खाद आकार रहे हैं?
मुझे लगता है कि कोई अखबार, कोई पत्रिका, कोई लेखक, कोई रचना आलोचना से परे नहीं हो सकते।
एक महोदया उनके पक्ष में तर्क देती हैं— “कहानियां, कविताएं सभी आसपास घटी घटाओं, आप बीती या जग बीती से ही निकलती हैं। यदि यह घटना स्वयं देखी होती या किसी से सुनी होती, उसकी रिपोर्टिंग न होती तो इस कहानी को मौलिक कहा जाता, यदि रिपोर्टिंग हो गई तो, कहानी मौलिक नहीं हुई? यह समाचार हजारों ने पढ़ा होगा, कितनों ने कहानी में ढाला?”
मुझे कहना पड़ा— “यानी अब मौलिकता को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। समाचार या रिपोर्टिंग पर कहानी लिखी जा सकती है। इससे मुझे कोई गुरेज नहीं है। लेकिन मेरा सवाल मौलिकता को लेकर था। कथानक का स्रोत चाहे कहीं से भी हो (खबर, लोककथा, इतिहास), यदि लेखक उसमें नया अर्थ, नया संवेदनात्मक अनुभव और रचनात्मक पुनर्संरचना देता है, तो वह रचना मौलिक मानी जाएगी। लेकिन यदि कहानी केवल खबर का विस्तार भर है—अर्थात घटनाक्रम वही है, पात्रों में कोई गहराई नहीं जोड़ी गई, और लेखक का दृष्टिकोण नया नहीं है—तो उसे ‘रिपोर्टाज’ या ‘रूपांतरण’ तो कहा जा सकता है, लेकिन पूरी तरह मौलिक कहानी नहीं।”
यही वह बिंदु है जहाँ समूची बहस आकर टिकती है—चाहे वह पुरस्कार प्राप्त कहानियाँ हों या अख़बार में छपी चर्चित रचनाएँ। सवाल सिर्फ भाषा या कथानक का नहीं है, बल्कि उस रचनात्मक ईमानदारी का है, जो किसी भी साहित्यिक कृति को “घटना” से “कहानी” बनाती है।
आख़िरकार प्रश्न सिर्फ एक कहानी या एक लेखक का नहीं है, बल्कि उस समूची साहित्यिक व्यवस्था का है जहाँ भाषा की बुनियादी शुद्धता, कथ्य की आंतरिक सच्चाई और शिल्प की ईमानदारी की जगह अक्सर संबंधों, विचारधारात्मक निकटताओं और दिखावटी प्रभावों को तरजीह मिलने लगती है। यदि कहानी अपने समय की संवेदना को सटीक भाषा और प्रामाणिक अनुभव के साथ व्यक्त नहीं कर पा रही, और फिर भी वह पुरस्कारों से नवाज़ी जा रही है, तो यह केवल एक रचना की विफलता नहीं, बल्कि चयन-प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न है।
साहित्य में असहमति स्वाभाविक है, दृष्टियाँ भिन्न हो सकती हैं, परंतु भाषा की लापरवाही और शिल्प की कमजोरी को ‘नवाचार’ का नाम देकर प्रतिष्ठित करना अंततः साहित्य के साथ ही अन्याय है। जरूरी यह है कि हम रचना को रचना की कसौटी पर परखें— न कि रचनाकार के प्रभाव, परिचय या प्रचलित धारणाओं के आधार पर। वरना वह समय दूर नहीं जब कहानी अपने मूल स्वभाव— जीवन के सत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति से भटककर एक औपचारिक अभ्यास मात्र बनकर रह जाएगी।
सन्दीप तोमर (कथाकार, आलोचक)
नई दिल्ली

रेखाचित्र- टेपरिकॉर्डर

टेपरिकॉर्डर   अलमारी के एक पुराने खाने में रखा था - बीपीएल सानियों कंपनी का मेरा टेपरिकॉर्डर। धूल में लिपटा , खामोश , लेकिन भीतर कहीं अ...