Friday, 5 June 2026

बिगाड़ के डर से- प्रियंका ओम की कहानी ‘विगत की व्याधि’ : एक समीक्षात्मक आलोचना

प्रियंका ओम की कहानीविगत की व्याधि’ : एक समीक्षात्मक आलोचना

प्रियंका ओम को बहुत पहले से पढता-समझता आ रहा हूँ... और यकीन के साथ कह सकता हूँ कि वे बहुत समय लेकर, बहुत ठहरकर लिखती हैं, उनके लेखन में संख्या बढ़ाने को लेकर लिखना कभी मुझे नहीं दिखा। जब तक वे कहानी को पूरी तरह से मथ नहीं लेती, वे कलम आगे नहीं बढाती। हाल ही में उनकी कहानी विगत की व्याधि हंस के जून अंक में आई है, उनके उपन्यास साज-बाज को पढ़ते हुए जिन चीजों पर मैं अटका था, इस कहानी को पढ़ते हुए लगा कि उन्होंने लेखन के वे तमाम बेरियर हटा दिए हैं, जहाँ आलोचक अटके।

प्रियंका ओम की कहानी विगत की व्याधि’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में वृद्धावस्था, दाम्पत्य संबंधों, मानसिक स्वास्थ्य और स्मृतियों के दीर्घकालिक प्रभावों को केंद्र में रखकर लिखी गई एक महत्त्वपूर्ण कहानी है। यह कहानी केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की भी पड़ताल करती है जो मानसिक रोगों को समझने के बजाय उन्हें चरित्र-दोष, सनक या पारिवारिक कलह मानकर टाल देती है। कहानी का मूल कथ्य यह है कि अतीत के अनसुलझे घाव व्यक्ति के वर्तमान को किस प्रकार विषाक्त कर देते हैं और अंततः पूरा परिवार उनकी चपेट में आ जाता है।

कहानी का केंद्र वृद्ध दम्पती- निर्मल बाबू और कुंती देवी हैं। बाहरी स्तर पर यह एक सामान्य घरेलू विवाद की कथा प्रतीत होती है, जहाँ पत्नी पति पर निराधार आरोप लगाती रहती है और पति स्वयं को एक प्रकार की कैद में अनुभव करता है। किंतु जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, पाठक समझता है कि समस्या केवल वैवाहिक असहमति नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक व्याधि है। बेटी पल्लवी के माध्यम से यह तथ्य सामने आता है कि कुंती देवी सिज़ोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं और वास्तविकता तथा भ्रम के बीच भेद नहीं कर पा रही हैं।

कहानी की सबसे बड़ी शक्ति इसका मनोवैज्ञानिक यथार्थ है। लेखिका ने मानसिक रोग को किसी सनसनीखेज घटना की तरह प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसके सूक्ष्म और दैनिक प्रभावों को उकेरा है। कुंती देवी का सब्जियाँ गिनना, चोरी के भ्रम पालना, पड़ोसियों और पति के संबंधों को लेकर काल्पनिक कथाएँ गढ़ना, फोन पर निगरानी रखना, ये सभी व्यवहार रोग की अभिव्यक्तियाँ हैं, जिन्हें परिवार लंबे समय तक केवल ‘सनक’ मानता रहता है। इस प्रकार कहानी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज की अज्ञानता को भी उजागर करती है।

कहानी का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष दाम्पत्य संबंधों की जटिलता है। लेखिका दाम्पत्य को किसी आदर्शवादी दृष्टि से नहीं देखतीं। यह बात मुझे उपन्यास साज-बाज पढ़ते हुए भी प्रतीत हुई थी। निर्मल बाबू और कुंती देवी के वैवाहिक जीवन में प्रेम, उपेक्षा, असमानता, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत कुंठाएँ एक साथ उपस्थित हैं। फ्लैशबैक के माध्यम से स्पष्ट होता है कि निर्मल बाबू ने पत्नी को कभी मन से स्वीकार नहीं किया था और कुंती देवी ने जीवन भर भावनात्मक असुरक्षा का बोझ ढोया। यही दबा हुआ अतीत बाद में मानसिक विकृति के रूप में उभरता है। इस प्रकार कहानी मानसिक बीमारी को केवल जैविक या चिकित्सकीय समस्या न मानकर सामाजिक और भावनात्मक संदर्भों से भी जोड़ती है।

कहानी का शीर्षक विगत की व्याधि’ अत्यंत सार्थक है। यहाँ ‘विगत’ केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि स्मृतियों, अपमानों, अस्वीकृतियों और अधूरे प्रेम का प्रतीक है। कुंती देवी वर्तमान में नहीं, बल्कि अतीत की छायाओं में जी रही हैं। उनके भ्रमों का स्रोत भी वही अतीत है जिसने उन्हें कभी संतुष्टि और आत्मविश्वास नहीं दिया। इस दृष्टि से शीर्षक कथा के केंद्रीय भाव को सटीक रूप से व्यक्त करता है।

शिल्प की दृष्टि से भी कहानी उल्लेखनीय है। वर्तमान और अतीत के बीच लगातार आवागमन कथा को मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान करता है। बालकनी का बिंब विशेष रूप से प्रभावशाली है। आरंभ में जो बालकनी खुलापन, संवाद और दाम्पत्य निकटता का प्रतीक थी, वही बाद में बंदीगृह और संदेह का प्रतीक बन जाती है। यह रूपक कहानी के भाव-संरचना को मजबूत बनाता है।

भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादप्रधान है। लेखिका ने अनावश्यक बौद्धिकता से बचते हुए पात्रों की सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया है। विशेष रूप से कुंती देवी और पल्लवी के संवाद अत्यंत स्वाभाविक प्रतीत होते हैं। भाषा में संवेदना है, किंतु भावुकता नहीं; यही इसकी साहित्यिक शक्ति है।

फिर भी कहानी कुछ सीमाएँ भी रखती है। कई स्थानों पर मानसिक रोग संबंधी व्याख्या अत्यधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। पल्लवी द्वारा सिज़ोफ्रेनिया की विस्तार से की गई व्याख्या कथा के स्वाभाविक प्रवाह को कुछ हद तक बाधित करती है। यदि रोग के संकेतों को और अधिक कलात्मक ढंग से पाठक पर छोड़ दिया जाता, तो कथा का प्रभाव और गहरा हो सकता था। इसी प्रकार कुछ प्रसंग अपेक्षाकृत लंबे हैं, जिनसे कथा की गति थोड़ी धीमी पड़ती है।

समग्रतः विगत की व्याधि’ एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से परिपक्व कहानी है। यह कहानी वृद्धावस्था, मानसिक स्वास्थ्य और दाम्पत्य जीवन की उन परतों को उद्घाटित करती है जिन पर हिंदी कथा-साहित्य में अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है। प्रियंका ओम ने यह स्थापित किया है कि कई बार व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु वर्तमान नहीं, बल्कि उसका अनसुलझा अतीत होता है। यही अतीत जब व्याधि बनकर लौटता है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरा परिवार उसकी कीमत चुकाता है।

निष्कर्षतः विगत की व्याधि’ मानसिक स्वास्थ्य विमर्श और पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं को समझने वाली एक प्रभावशाली कहानी है, जो पाठक को केवल भावुक नहीं करती, बल्कि सोचने के लिए भी विवश करती है।

हिन्दी कथा साहित्य को एक बढ़िया, प्रभावशाली रचना देने के लिए प्रियंका ओम को बधाई...


सन्दीप तोमर 

Monday, 1 June 2026

रेखाचित्र- टेपरिकॉर्डर

टेपरिकॉर्डर


 

अलमारी के एक पुराने खाने में रखा था- बीपीएल सानियों कंपनी का मेरा टेपरिकॉर्डर। धूल में लिपटा, खामोश, लेकिन भीतर कहीं अब भी कुछ बोलता हुआ। यह वही टेपरिकॉर्डर था जो मैंने स्कूल के दिनों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर इकट्ठे किये पैसो से खरीदा था। मेरा स्कूल का दोस्त था विपिन, उसके पिताजी को नयी नयी चीजों का शौंक था, और मेरे घर में ये सब पढाई खराब करने का यंत्र। पिताजी से किसी भी मनोरंजन के साधन की उम्मीद करना ही बेकार था। विपिन ने जब कहा कि उस टेपरिकॉर्डर बेचना है तो उसी से यह ख़रीदा गया था। दिन भर की पढ़ाई, फिर शाम को पास-पड़ोस के बच्चों को जोड़-घटाव सिखाना, और महीने के अंत में मिलती थी ट्यूशन फीस, एक बच्चे से साठ रूपये, पड़ोस के चार बच्चे नवी कक्षा का गणित पढने मेरे पास आते थे। १९९२ में दो सौ चालीस रूपये महीने की ट्यूशन फीस भी मन को बड़ा सुकून देती थी। उसी फीस से इकट्ठे हुए पैसों से पहले एक दिवार घडी खरीदी फिर उसी इकट्ठी हुई फीस से साढ़े तीन सौ रूपये विपिन को देकर यह टेपरिकार्डर ले लिया। ये वो समय था जब थोड़े-थोड़े पैसे जमा हो जाते तो मन में एक अजीब-सी गर्मी भर जाती थी।

टेपरिकॉर्डर लेना कोई अनायास हुई घटना नहीं थी। मुझे कैमरा, टेपरिकार्डर, घडी का शौक था। एक सपना था कि ये सब चीजें मेरी निजी हों, मेरी जिन्दगी का हिस्सा हों, क्योंकि पिताजी की सीमित आय से पढाई के लिए तो पैसे मांगे जा सकते थे लेकिन अपने निजी शौक पूरे करने के लिए उनसे पैसे लेने का सवाल ही नहीं होता था। मुझे उस समय नए सिक्के इकट्ठे करने का भी शौक था, मेरे कई शौक थे जो धीरे-धीरे कागज़ के लिफ़ाफों में, छोटे सिक्कों और मुड़े-तुड़े नोटों में आकार ले रहे थे।

उस दिन जब पहली बार उसे घर लाया, तो कमरे की दीवारें जैसे थोड़ी और पास आ गई थीं। एक सिहरन-सी महसूस हुई, जैसे कोई पुराना सपना नए रूप में लौट आया हो। वो एक ठोस-सा, भारी-भरकम टू इन वन था, भले वह पुराना था लेकिन उसमें जो जादू भरा था, वो किसी यादों के संदूक जैसा था।

काले-भूरे प्लास्टिक में जड़ा हुआ शरीर, आगे की ओर सिल्वर पट्टी में चमकते बटन, कैसेट स्लॉट के ठीक ऊपर कतार में सजे हुए बटन; प्ले, पॉज़, रिवाइंड, फॉरवर्ड, स्टॉप और इजेक्ट। रिकॉर्डिंग के लिए तो स्टॉप और प्ले को एक साथ दबाना पड़ता था, और उस हल्की-सी "क्लिक" की आवाज़ से जैसे दिल भी धड़क उठता था। वॉल्यूम डायल घुमाते हुए एक खड़खड़ाहट सी आती थी, मानो साउंड का ही नहीं, वक्त का भी स्तर बदल रहा हो। उसमें रेडियो भी था, और एफएम भी, मतलब यह वो ज़माना था जब टू इन वन की जगह ‘थ्री इन वन’ जैसी अनोखी चीज़ें आने लगी थीं। डायल घुमाकर स्टेशन पकड़ते वक्त उस सूं-सूं और खर्र-खर्र के बीच जब कोई साफ आवाज़ मिलती तो लगता जैसे कोई सुदूर जगह से जुड़ गए हों। आकाशवाणी की मद्धम सी उद्घोषणा, फिर किसी पुराने ग़ज़ल की शुरुआती तान। लगता मानों कमरा एकाएक किसी और समय, किसी और संसार में तब्दील हो गया हैऔर कैसेट? हर कैसेट के साथ एक नयी कहानी जुड़ी होती थी। कभी कोई नया कैसेट मार्किट से आया, कभी किसी दोस्त ने तोहफे में दिया। कुछ कैसेटों के साथ प्लेन काग़ज लगा होता जिस पर हाथ से नाम लिखा करता: "लता मंगेशकर– रोमांटिक कलेक्शन" या "किशोर कुमार– सैड सॉन्ग्स", और कुछ पर तो बस एक फटे-से स्टिकर के नीचे छिपे होते थे कुछ किस्से। ‘शोले’ और ‘कालिया’ फिल्म के डायलोग की कैसेट्स लाया तो उनका हर डायलोग जुबान पर चढ़ गया। छेनू आया था डायलोग भी खूब बोला जाने लगा, एक और डायलोग याद आता है उन्हीं दिनों का याद किया हुआ- “एक म्यान में दो तलवारे होने का मतलब है, एक का टूट जाना विक्की... और विक्की फौलाद से बनी वो तलवारें है छेनू जिसने सिर्फ काटना सीखा है..” “कौन बोल रहे हो... तुम्हारा बाप कालिया... जिसे तुमने खुद पैदा किया है...।”, यह डायलोग भी खूब जुबान पर रहा।

उस दिन जब पहली बार उसे घर लाया गया, तो सिर्फ एक संगीत यंत्र नहीं आया था, मानो घर में एक नया किरायेदार आया था, जो बोलता नहीं था, लेकिन सुनाता बहुत कुछ था। कमरे की दीवारें सच में पास आ गई थीं, शायद इसलिए कि अब उनमें गूंजने को बहुत कुछ था।

सच पूछो तो वह टेपरिकॉर्डर मेरे लिए केवल संगीत का साधन नहीं था, वह मेरी मेहनत का दूसरा प्रतिफल था, पहले प्रतिफल के रूप में मैंने एक दीवार घड़ी खरीदी थी, जिसके लिए दो बच्चों की ट्यूशन फीस खर्च की गयी थी।

पढ़ाई के समय अक्सर वह मेरे पास ही रहता। अब हर ट्यूशन फीस से एक-दो नयी कैसेट खरीदी जाती, या फिर ब्लेंक खरीदकर अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड करवाकर लता, १९९२ में एक साइड की कैसेट रिकॉर्ड करवाने के पाँच रुपये और दोनों साइड के दस रुपये देने होते। धीरे-धीरे पसंद के गानों की कैसेट का भी कलेक्शन होता गया। गणित के सवाल हल करते हुए मैं उसे चला देता, और कोई पुराना, जाना-पहचाना गाना मेरी उँगलियों की गति के साथ बहता रहता। एक कैसेट में तो मैंने अपना प्रिय गाना दोनों साइड में रिकॉर्ड करा लिया थ- ताकि बार-बार रिवाइंड न करना पड़े। मुझे गाने सुनते हुए गणित के सवाल हल करने की आदत सी होने लगी, लेकिन इतना जरुर रहा कि आवाज़ इतनी धीमी होती कि कमरे के बाहर कोई खड़ा हो तो उसके कानों तक गाने के बोल न पहुँच पाए, रात को सोने से पहले कमरे में लाल रंग का प्रकाश, यानी नाईट बल्ब ऑन करके गाने सुनना और उसी संगीत के साथ नींद लेना, ये मानो नियत कर्म बन गया, ऐसे ही पंसदीदा संगीत सुन दिन भी कट जाता।

समय बीतता गया, और मशीनें, जैसे जीवन, पुरानी होने लगीं। कभी टेप अटक जाती, कभी आवाज़ फुसफुसाने लगती। वैसे भी यह पहले ही पुराना माल था तो समय के साथ खराबी आना स्वाभाविक था, शुरू में कुछ बार दुकान ले गया, खतौली में ही एक लड़का था बिल्लू, वह रेडियो, टेपरिकार्डर और टीवी ठीक करता था, लेकिन हर बार ठीक कराने के नाम पर पैसे खर्च होते। जब बिल्लू उसे ठीक करता तो मैं ये देखता कि कौन से पार्ट्स अमूमन ख़राब होते हैं, किस तरीके से वह पार्ट्स बाहर निकालता है, कैसे उनको लगाता है यह सब अवलोकन मैं किया करता, फिर एक दिन, एक छोटी-सी सोल्डरिंग आयरन खरीद लाया। तय कर लिया किअब इसे खुद ही ठीक करूँगा। धीरे-धीरे वायरिंग समझ आने लगी, टेप हेड की सफाई, सर्किट की मरम्मत, स्पीकर की लाइन, सब कुछ सीखा, अपनी कोशिशों से। अब वह टेपरिकॉर्डर सिर्फ एक यंत्र नहीं रहा था, वह मेरी प्रयोगशाला बन गया था और मैं उसका एक इंजिनियर। वह अनुभव एक सृजन जैसा था जिसमें तकनीक, धैर्य और आत्मीय लगाव तीनों शामिल थे।

अलग-अलग जगह रहकर पढाई करते हुए, वह मेरे गाँव वाले कमरे को शोभायमान करता रहा, जब कभी छुट्टी में गाँव जाता उससे रूबरू होता, वह मेरा अकेलेपन का भी साथी बन चुका था, किसी बेहतरीन प्रेयसी की भांति वह भी यादों का हिस्सा बनता। उससे मिलकर वही ख़ुशी होती जो माशूका से मिलकर होती हो, वही अनुभूति। पढाई करने तक वह गाँव रहा लेकिन जैसे ही प्रथम नियुक्ति का वक़्त आया और होस्टल छोड़ कमरा किराए पर लेना पड़ा, वह टेपरिकार्डर भी अन्य जरूरी सामान का हिस्सा बन गया। कर्मपुरा से महेन्द्रा पार्क तक के सफ़र में वह भी साथ-साथ हमसफ़र रहा। फिर जब रहने में स्थायित्व आया, उसे भी स्थायी आवास मिल गया। हमेशा ही टीवी से ज्यादा प्रिय रहा, रात को सोने से पहले उसकी ड्यूटी थी, एफएम पर नीलेश का कार्यक्रम ‘ब्रोकन हार्ट’ सुनाना।

वह मेरे हर दुःख-सुख का साथी बना गया था। आज जब उसे देखता हूँ, तो लगता है जैसे वह केवल गाने नहीं बजाता था, वह मेरी किशोरावस्था का संगीत था, मेरे भीतर के आत्मविश्वास का, आत्मनिर्भरता का, और उस छोटे-से लड़के का, जिसे अपनी कमाई से खरीदी चीज़ सबसे प्रिय लगती थी।

फिर एक दिन पता चला कि उसे मेरे पीछे से एक कबाड़ी के सुपुर्द कर दिया गया, और साथ में वो सब कसेट्स भी, जो मैंने बड़े जतन से एक-एक कर सहेजी थी। उस दिन मैं भी ब्रोकन हार्ट हो गया था, एक ऐसा टूटा हुआ इंसान जिसकी कहानी सुनाने एफएम पर कोई नीलेश नहीं आएगा।

आज उस टेपरिकॉर्डर का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है, उसका कोई अवशेष भी नहीं रखा है, यदि वह होता भी तो शायद चालू नहीं होता, शायद टूट चुका होता, लेकिन मेरे पास सहेजा हुआ होता तो एक तसल्ली होती कि मेरे जीवन के शुरूआती दिनों की एक यादगार वस्तु मेरे पास है, अब वह मात्र मेरी स्मृतियों में बिल्कुल वैसा ही है जैसा पहली बार था: थोड़ा भारी, कुछ खड़खड़ाता हुआ, लेकिन पूरी तरह मेरा। यह सब लिखते हुए मानों उन्ही दिनों में पहुँच गया हूँ, और एक संगीत की धुन मेरे कानों में बज रही है- “चलते-चलते ये मेरे गीत याद रखना... कभी अलविदा न कहना...।”




सन्दीप तोमर 

विभाजन से पारिवारिक विघटन तक की जीवनगाथा

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