प्रियंका ओम की कहानी ‘विगत की व्याधि’ : एक समीक्षात्मक आलोचना
प्रियंका ओम को बहुत पहले से पढता-समझता आ
रहा हूँ... और यकीन के साथ कह सकता हूँ कि वे बहुत समय लेकर, बहुत ठहरकर लिखती हैं, उनके लेखन में संख्या बढ़ाने
को लेकर लिखना कभी मुझे नहीं दिखा। जब तक वे कहानी को पूरी तरह से मथ नहीं लेती, वे कलम आगे नहीं बढाती। हाल ही में उनकी कहानी विगत की व्याधि हंस के जून
अंक में आई है, उनके उपन्यास साज-बाज को पढ़ते हुए जिन चीजों पर मैं अटका था, इस कहानी को पढ़ते हुए लगा कि उन्होंने लेखन के वे तमाम बेरियर हटा दिए
हैं, जहाँ आलोचक अटके।
प्रियंका ओम की कहानी ‘विगत की व्याधि’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में
वृद्धावस्था, दाम्पत्य संबंधों, मानसिक
स्वास्थ्य और स्मृतियों के दीर्घकालिक प्रभावों को केंद्र में रखकर लिखी गई एक
महत्त्वपूर्ण कहानी है। यह कहानी केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की भी पड़ताल करती है जो मानसिक रोगों को समझने
के बजाय उन्हें चरित्र-दोष, सनक या पारिवारिक कलह मानकर टाल
देती है। कहानी का मूल कथ्य यह है कि अतीत के अनसुलझे घाव व्यक्ति के वर्तमान को
किस प्रकार विषाक्त कर देते हैं और अंततः पूरा परिवार उनकी चपेट में आ जाता है।
कहानी का केंद्र वृद्ध दम्पती- निर्मल बाबू
और कुंती देवी हैं। बाहरी स्तर पर यह एक सामान्य घरेलू विवाद की कथा प्रतीत होती
है, जहाँ पत्नी पति पर निराधार आरोप लगाती रहती है और पति स्वयं
को एक प्रकार की कैद में अनुभव करता है। किंतु जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है,
पाठक समझता है कि समस्या केवल वैवाहिक असहमति नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक व्याधि है। बेटी पल्लवी के माध्यम से यह तथ्य सामने
आता है कि कुंती देवी सिज़ोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं और
वास्तविकता तथा भ्रम के बीच भेद नहीं कर पा रही हैं।
कहानी की सबसे बड़ी शक्ति इसका मनोवैज्ञानिक
यथार्थ है। लेखिका ने मानसिक रोग को किसी सनसनीखेज घटना की तरह प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसके सूक्ष्म और दैनिक प्रभावों को उकेरा है। कुंती देवी का
सब्जियाँ गिनना, चोरी के भ्रम पालना, पड़ोसियों
और पति के संबंधों को लेकर काल्पनिक कथाएँ गढ़ना, फोन पर
निगरानी रखना, ये सभी व्यवहार रोग की अभिव्यक्तियाँ हैं, जिन्हें
परिवार लंबे समय तक केवल ‘सनक’ मानता रहता है। इस प्रकार कहानी मानसिक स्वास्थ्य
के प्रति समाज की अज्ञानता को भी उजागर करती है।
कहानी का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष दाम्पत्य संबंधों की जटिलता है। लेखिका दाम्पत्य को किसी आदर्शवादी दृष्टि से नहीं देखतीं। यह बात मुझे उपन्यास साज-बाज पढ़ते हुए भी प्रतीत हुई थी। निर्मल बाबू और कुंती देवी के वैवाहिक जीवन में प्रेम, उपेक्षा, असमानता, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत कुंठाएँ एक साथ उपस्थित हैं। फ्लैशबैक के माध्यम से स्पष्ट होता है कि निर्मल बाबू ने पत्नी को कभी मन से स्वीकार नहीं किया था और कुंती देवी ने जीवन भर भावनात्मक असुरक्षा का बोझ ढोया। यही दबा हुआ अतीत बाद में मानसिक विकृति के रूप में उभरता है। इस प्रकार कहानी मानसिक बीमारी को केवल जैविक या चिकित्सकीय समस्या न मानकर सामाजिक और भावनात्मक संदर्भों से भी जोड़ती है।
कहानी का शीर्षक ‘विगत की व्याधि’ अत्यंत सार्थक है। यहाँ ‘विगत’
केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि स्मृतियों, अपमानों,
अस्वीकृतियों और अधूरे प्रेम का प्रतीक है। कुंती देवी वर्तमान में
नहीं, बल्कि अतीत की छायाओं में जी रही हैं। उनके भ्रमों का
स्रोत भी वही अतीत है जिसने उन्हें कभी संतुष्टि और आत्मविश्वास नहीं दिया। इस
दृष्टि से शीर्षक कथा के केंद्रीय भाव को सटीक रूप से व्यक्त करता है।
शिल्प की दृष्टि से भी कहानी उल्लेखनीय है।
वर्तमान और अतीत के बीच लगातार आवागमन कथा को मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान करता है।
बालकनी का बिंब विशेष रूप से प्रभावशाली है। आरंभ में जो बालकनी खुलापन, संवाद और दाम्पत्य निकटता का प्रतीक थी, वही बाद में
बंदीगृह और संदेह का प्रतीक बन जाती है। यह रूपक कहानी के भाव-संरचना को मजबूत
बनाता है।
भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण
और संवादप्रधान है। लेखिका ने अनावश्यक बौद्धिकता से बचते हुए पात्रों की सामाजिक
पृष्ठभूमि के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया है। विशेष रूप से कुंती देवी और पल्लवी
के संवाद अत्यंत स्वाभाविक प्रतीत होते हैं। भाषा में संवेदना है, किंतु भावुकता नहीं; यही इसकी साहित्यिक शक्ति है।
फिर भी कहानी कुछ सीमाएँ भी रखती है। कई
स्थानों पर मानसिक रोग संबंधी व्याख्या अत्यधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। पल्लवी
द्वारा सिज़ोफ्रेनिया की विस्तार से की गई व्याख्या कथा के स्वाभाविक प्रवाह को
कुछ हद तक बाधित करती है। यदि रोग के संकेतों को और अधिक कलात्मक ढंग से पाठक पर
छोड़ दिया जाता, तो कथा का प्रभाव और गहरा हो सकता था। इसी
प्रकार कुछ प्रसंग अपेक्षाकृत लंबे हैं, जिनसे कथा की गति
थोड़ी धीमी पड़ती है।
समग्रतः ‘विगत की
व्याधि’ एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से परिपक्व कहानी है। यह कहानी
वृद्धावस्था, मानसिक स्वास्थ्य और दाम्पत्य जीवन की उन परतों
को उद्घाटित करती है जिन पर हिंदी कथा-साहित्य में अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया
है। प्रियंका ओम ने यह स्थापित किया है कि कई बार व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु
वर्तमान नहीं, बल्कि उसका अनसुलझा अतीत होता है। यही अतीत जब
व्याधि बनकर लौटता है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरा परिवार उसकी कीमत चुकाता है।
निष्कर्षतः ‘विगत की व्याधि’ मानसिक स्वास्थ्य विमर्श और
पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं को समझने वाली एक प्रभावशाली कहानी है, जो पाठक को केवल भावुक नहीं करती, बल्कि सोचने के
लिए भी विवश करती है।
हिन्दी कथा साहित्य को एक बढ़िया, प्रभावशाली
रचना देने के लिए प्रियंका ओम को बधाई...
सन्दीप तोमर


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