Thursday, 7 May 2026

कहानी और पुरस्कार


 कहानी और पुरस्कार
एक किस्सा कुछ यूँ---

एक ऑनलाइन और ऑफलाइन पत्रिका ने मिलकर कहानी प्रतियोगिता आयोजित की। नियम बड़े लोकतांत्रिक अंदाज़ में लिखे गए थे— “पुरस्कार का आधार पाठकों के लाइक और कॉमेंट्स होंगे।”
अब मैं सामान्यतः ऐसी प्रतियोगिताओं में कहानियाँ नहीं भेजता। साहित्य को मैं कभी वोटिंग एप का खेल नहीं मान पाया। लेकिन एक बहुत प्रिय महिला मित्र ने अपनी कहानी भेजते हुए आग्रह किया—
“तोमर जी, आप भी कहानी भेजिए न…”

दोस्ती के आग्रह में आदमी कई बार अपने सिद्धांतों को थोड़ी देर के लिए कोने में रख देता है। मैंने भी रख दिया। नियमावली पढ़ी, थोड़ा माथा पकड़ा, फिर सोचा— चलो, देख लेते हैं कि साहित्य का नया लोकतंत्र कैसा दिखता है।

मन में एक सवाल लगातार कुलबुला रहा था—
क्या सचमुच सामान्य पाठक कहानी की तकनीक, संरचना, शिल्प, कथ्य, चरित्र-विकास और भाषा की बारीकियों को उस स्तर पर परखते हैं कि केवल लाइक और कॉमेंट्स को ही पुरस्कार का आधार बना दिया जाए?
क्योंकि सोशल मीडिया पर तो लोग कई बार सिर्फ लेखक का चेहरा देखकर भी “वाह सर”, “गजब”, “लाजवाब” लिख आते हैं। कहानी पढ़ना तो दूर, शीर्षक तक पूरा नहीं पढ़ते।

खैर, कहानी अपलोड कर दी गयी।

धीरे-धीरे प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। मेरी कहानी पर सबसे अधिक लाइक आए, सबसे अधिक टिप्पणियाँ आईं। लोग कहानी शेयर कर रहे थे, बहस कर रहे थे, निजी संदेश भेज रहे थे। मैं यह नहीं कहता कि मेरी कहानी सर्वश्रेष्ठ थी, लेकिन प्रतियोगिता की घोषित शर्तों के हिसाब से वह स्पष्ट रूप से सबसे आगे थी।

फिर परिणाम आया।

और परिणाम देखकर मुझे पहली बार समझ आया कि साहित्यिक प्रतियोगिताओं में “नियमावली” केवल पाठकों को उत्साहित रखने के लिए होती है, आयोजकों को बाँधने के लिए नहीं।

जिस कहानी को पाठकों ने सबसे अधिक पसंद किया, उसे प्रथम नहीं बल्कि द्वितीय पुरस्कार दिया गया।
और जो कहानी प्रथम हुई, उसके बारे में लोगों ने उतनी चर्चा तक नहीं की थी।

मेरी मित्र की कहानी प्रतियोगिता से बाहर कर दी गयी।

अब यहाँ से कहानी ज्यादा दिलचस्प हो जाती है।

कुछ दिन बाद आयोजक महोदय मेरी उस मित्र को फोन करते हैं—
“आपकी कहानी वास्तव में दिल को छूने वाली थी… प्रतियोगिता में भले चयन न हो पाया हो, लेकिन मैं उसे अपनी प्रिंट पत्रिका में स्थान दे रहा हूँ… और पत्रिका की प्रति भी आपको भेजूँगा…”

यह सुनकर मुझे साहित्य कम, पुरानी हिंदी फिल्मों के संवाद ज्यादा याद आने लगे।

फिर प्रिंट पत्रिका आई।
उसमें न मेरी द्वितीय पुरस्कार प्राप्त कहानी थी, न प्रतियोगिता के घोषित परिणामों का कोई सम्मान।
लेकिन मेरी मित्र की कहानी बड़े आदर से प्रकाशित थी।

अब आप इसे संयोग कह सकते हैं।
मैं इसे साहित्यिक संस्कार नहीं कह पाता।

धीरे-धीरे समझ आने लगता है कि कुछ लोग पत्रिका नहीं निकालते, वे अपने अहंकार और आकर्षण का निजी दरबार चलाते हैं।
कई तथाकथित संपादकों के लिए साहित्य साधना नहीं, “इम्प्रेशन मैनेजमेंट” का माध्यम बन चुका है।
वे कहानी कम पढ़ते हैं, प्रोफाइल फोटो ज्यादा देखते हैं।
रचना से अधिक रचनाकार के जेंडर में रुचि रखते हैं।
और “प्रकाशन” को ऐसे पेश करते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा उपकार कर रहे हों।

सबसे मजेदार बात यह है कि ऐसे लोग खुद को साहित्य का प्रहरी भी घोषित किए रहते हैं।
फेसबुक पर लंबी पोस्ट लिखेंगे—
“हम साहित्य में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते…”
और इनबॉक्स में लिखेंगे—
“मैम, आपकी संवेदनशीलता ने मन छू लिया…”

अब ये “मन” कहाँ छूता है, यह साहित्य का विषय नहीं, मनोविज्ञान का विषय है।

आजकल कई ऑनलाइन प्रतियोगिताएँ वास्तव में साहित्यिक कम, डिजिटल दुकानदारी अधिक हो गयी हैं।
लाइक जुटवाओ, मित्रों से कॉमेंट कराओ, वेबसाइट की ट्रैफिक बढ़ाओ, पत्रिका का प्रचार करवाओ— और अंत में पुरस्कार उस व्यक्ति को दे दो जो आयोजकों की निजी पसंद हो।

कई बार तो निर्णायक बाद में खोजे जाते हैं और विजेता पहले तय होते हैं।
कुछ जगह पुरस्कार प्रतिभा को नहीं, परिचय को मिलता है।
कुछ जगह लेखन नहीं, लॉबिंग जीतती है।
और कुछ जगह “साहित्यिक संस्कार” का अर्थ होता है— आयोजक की पोस्ट पर नियमित “वाह वाह” करना।

दुखद यह नहीं है कि पुरस्कार पक्षपाती हो गया।
दुखद यह है कि इस प्रक्रिया में नए लेखक सबसे अधिक ठगे जाते हैं।
वे सचमुच विश्वास कर लेते हैं कि साहित्य एक निष्पक्ष दुनिया है।
वे रात-रात भर जागकर कहानी लिखते हैं, शब्दों में अपना जीवन उड़ेल देते हैं, और फिर देखते हैं कि परिणाम किसी और ही गणित से तय हो रहे हैं।

लेकिन समय बदल रहा है।

अब महिलाएँ भी समझने लगी हैं कि हर “आप बहुत अच्छा लिखती हैं” वास्तव में साहित्यिक प्रशंसा नहीं होती।
हर “मैं आपकी रचना पत्रिका में लेना चाहता हूँ” के पीछे संपादकीय ईमानदारी नहीं होती।
और हर साहित्यिक मंच वास्तव में साहित्य के लिए नहीं चलाया जाता।

इसलिए ऐसे आयोजकों और संपादकों से मेरा साफ संदेश है—

मेरे भाई,
प्रकाशन के नाम पर महिलाओं को प्रभावित करने का यह पुराना खेल अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला।
लेखिकाएँ अब आपकी कृपा पर निर्भर नहीं हैं।
सोशल मीडिया ने उन्हें अपनी आवाज़ खुद दे दी है।
वे अब समझती हैं कि कौन रचना पढ़ रहा है और कौन केवल अवसर तलाश रहा है।

साहित्य सेवा के नाम पर निजी आकर्षण की दुकानें बहुत दिन नहीं चलतीं।
क्योंकि अंततः शब्द बचते हैं, चालाकियाँ नहीं।

बिगाड़ के डर से--- पुरस्कार और कहानी लेखन

 बिगाड़ के डर से--- पुरस्कार और कहानी लेखन


पिछले वर्ष गाजियाबाद एक कहानी की वर्कशॉप में बोलने का मौका मिला तो मैंने कहानी विधा की एक लम्बी विकास यात्रा की बात करते हुए कहा था - कहानी अब पुराने घिसे–पिटे विषयों से कहीं आगे का सफ़र तय कर चुकी है। कहानीकार अपने समय की नब्ज को पकड़े और वहाँ से कहानी के विषय लेकर कहानी लिखे। हाल-फिलहाल कुछ कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता है कि कुछ लेखक तो भाषा के स्तर पर खूब मेहनत कर रहे हैं, अत्यधिक क्लिष्ट और सुसंस्कृत भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो भाषा के स्तर पर सोचते ही नहीं कि वे क्या लिख रहे हैं? नरेशन हो या संवाद - उनकी बहुत लचर भाषा होती है। अधिकांश कहानीकारों की यह भी दिक्कत है कि वे प्रवचन की मुद्रा में आकर कहानी के मूल रूप को भूल बैठते हैं। उस कार्यक्रम में विनय विक्रम सिंह की कहानी के हवाले से मैंने कहा था - “भाषा का अपना सौन्दर्य है, किंतु जब कहानीकार अति-चित्रात्मक और कीमियागिरीपूर्ण लेखन करता है या हर वाक्य में रचनाकार का सजग सौन्दर्यबोध झलकता है तो कथा का शिल्प कथा की गति को रोक देता है... ऐसी कहानियों में कहानी का वातावरण, भाषा और संवेदना की गहनता तो होती है— पर ऐसे कहानीकार अपने समय से संवाद नहीं कर पाते। लेखक एक सुंदर, पर नॉस्टैल्जिक संसार रचता है, जहाँ गरीबी भी गरिमामय है और अभाव भी कलात्मक। किंतु यह यथार्थ नहीं, यथार्थ का सौंदर्यीकृत पुनर्निमाण है। आज के दौर में जहाँ कला, धर्म और आजीविका का मिश्रण नए आयाम ले रहा है, वहाँ ऐसी कथाएँ पुराने मिथकीय आग्रह, लेखक के निजी पूर्वाग्रहों में फँसी प्रतीत होने लगती हैं।”
यही बात मुझे कुणाल सिंह की कहानी “विसर्जन” को पढ़कर महसूस हुई थी। विसर्जन को पढ़कर मैंने एक लम्बी टिप्पणी उन्क्त वेब पोर्टल को लिखी थी, लेकिन उन्होंने उक्त टिप्पणी को प्रकाशित नहीं किया।
नवम्बर २०२५ में अंजू शर्मा की कहानी को प्रसिद्ध कथा यूके का इंदु शर्मा कथा सम्मान दिया गया। यह एक निष्पक्ष चयन प्रक्रिया वाला सम्मान है। ऐसा दावा किया जाता है। मन में उत्सुकता हुई कि चुनी गई कहानी पढ़ी जाए... कहानी को पढ़कर लगा कि एक बेहद मजबूत थीम पर बेहद लचर कहानी लिखी गई है। इसमें टर्निंग पॉइंट्स, ड्रामा-टेंशन-रिलीज़ और भावनात्मक ज्वार के बीच ज्वलंत समन्वय को और कसावट की जरूरत है, ऐसा मुझे महसूस हुआ। कहानी में दो संघर्ष हैं— पहला समाज बनाम राधे, दूसरा राधे का प्रेम बनाम उसकी स्त्रीरूप पहचान। कहानी में इनका संतुलन नहीं दिखा। कहानी प्रेम वाली लाइन को छूकर छोड़ देती है; वह arc विकसित नहीं हो पाती। राधे की आंतरिक यात्रा भी आधी-अधूरी रह जाती है— उलझन दिखती है, पर resolution या breakdown नहीं आता।
भगतजी की मृत्यु कहानी का असली pivot है, पर प्लॉट को यहाँ चरम तक ले जाना चाहिए था, लेकिन कहानीकार ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं है। कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी मुझे यह लगी कि राधे का मनोवैज्ञानिक द्वंद्व पूरी तरह articulate नहीं हुआ; climax तक भी उसकी growth या fall स्पष्ट नहीं हो पाता। चंदा सबसे महत्वपूर्ण भावनात्मक धुरी बन सकती थी, पर उसका किरदार कथा में कोई आयाम नहीं पाता। चंदा–राधे का रिश्ता केवल संकेत में है; इसमें संभावित tragedy या forbidden love का भारी material है, जिस पर काम होना चाहिए था। कहानी में लंबे संवाद में लेखक ने दो-चार शब्द शुरू में और दो-चार ही अंत में ब्रज भाषा के लिखकर बताया है कि ये संवाद ब्रज भाषा का ज्ञाता दर्शाने के लिए ठूंसे भर हैं; लेखक खुद ब्रज भाषा लिखने में सिद्धहस्त नहीं है। एक ही वाक्य में संस्कृत-निष्ठ हिन्दी, ब्रज और उर्दू का घालमेल भी दिखता है।
कथा में वर्णन बहुत है, घटनाएँ कम। आंतरिक संघर्ष की भाषा कवितामयी है, पर analytical depth कम है या न के बराबर। कई बार कहानी जर्नल की तरह लगने लगती है, फिक्शन की तरह नहीं। अगर समाजशास्त्रीय परतों पर बात की जाए तो हम पाते हैं कि यह कहानी असल में जेंडर–द्वैत का विघटन दर्शाती है। राधे की देह और मन अलग-अलग दिशाओं में खिंचते हैं— यह trans-feminine या gender-fluid identity की ओर संकेत करता है, पर कहानी इसे सिर्फ अभिनय की परिणति मानती है।
कहानी में— Conflict है (समाज vs कला vs पहचान), Build-up भी है (दुविधा, तंज, प्रेम, कला, गिरावट), पर Climax या Resolution नहीं है (राधे किस ओर जाता है? टूटता है? लड़ता है? समर्पित होता है? स्वीकारता है? खो देता है?) यह “आख्यान-पूर्णता” की सबसे बड़ी कमी है।
कहानी को बेहतर बनाने के लिए ठोस प्रेम–रेखा विकसित की जानी चाहिए थी। चंदा का arc कहानी को भावनात्मक ऊँचाई दे सकता है। जैसे— क्या वह राधे का प्रेम स्वीकार करती या अस्वीकार? समाज उसे कैसे देखता? क्या यह प्रेम राधे का उपचार बनता है या और घाव? राधे का मनोवैज्ञानिक संघर्ष गहरा किया जाना चाहिए था— जिसमें identity crisis, अपनी देह से संघर्ष, कला vs समाज, प्रेम vs वास्तविकता, आत्मसम्मान vs भूख इत्यादि को ध्यान में रखा जाता।
बहरहाल, यदि निर्णायकों ने इस कहानी को कथा सम्मान के लिए चुना है तो उनकी अपनी आलोचनात्मक, पाठकीय दृष्टि है, लेकिन यहाँ यह सवाल अवश्य खड़ा होता है कि निर्णायकों में कितनी निष्पक्षता होती है? वे किसी कहानी को किस कसौटी पर कसते हैं? उनके अपने पुरस्कारों के अपने मानक क्या हैं? मुझे लगता है कि कहानीकार की विचारधारा निर्णायकों और आयोजकों से कितनी मिलती है, यह भी चयन का एक महत्वपूर्ण घटक हो सकता है। शॉर्टलिस्ट किए जाने का भार जिनके ऊपर होता है, उनके आपसी रिश्ते भी कई बार चयन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि ऐसा हो ही, यह मेरा अनुमान भर भी हो सकता है। आवश्यक नहीं कि किसी निष्पक्ष आलोचना की पुरस्कारों के लिए कथाओं के चयन से कोई तारतम्यता हो।
बहरहाल, यह सब मेरी चिंता का विषय नहीं है। अभी हाल ही में सन्निधि ने अनीता प्रभाकर कहानी प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कारों के साथ ही कुछ सांत्वना पुरस्कारों के नामों पर मेरी नजर गई, जिनमें एक घोर सांप्रदायिक नाम के साथ ही डॉ. रंजना जायसवाल का भी नाम था। अभी कुछ दिन पहले एक नवोदित लेखिका ने चर्चा के समय कहा— डॉ. रंजना जायसवाल आजकल बढ़िया कहानियाँ लिख रही हैं... ।
आजकल पैर की चोट के चलते इधर-उधर जाना लगभग बंद रहा, और कार्यक्रमों में जाना तो एकदम बंद है।बहराल घर से ही साहित्य का पठन-पाठन चल रहा है।
संयोग ही है कि कल ही एक साहित्यिक पत्रिका मिली, जिसमें सबसे पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त अपनी प्रिय लेखिका ममता कालिया की कहानी पढ़ी, उसके बाद डॉ. रंजना जायसवाल की कहानी पढ़ी।
कहानी का शीर्षक है— “भालचंद्र डिब्बे वाला”। पत्रिका के ढाई पृष्ठ कहानीकार ने निःसंदेह खराब कराए हैं, जिनमें किसी लेखक की एक कहानी का पूरा स्पेस मिल सकता था। ये वो ढाई पृष्ठ हैं, जिनकी कहानी में कोई आवश्यकता मुझे नहीं लगी।
ढाई पृष्ठ पढ़ने के बाद मेरे अंदर का पाठक भाषा का स्तर देख बेचैन हो उठा।
“हम खानाबदोशों के ठिकाने का कोई पता कहाँ होता है न?” (पृष्ठ-२२)
सामने दरवाजे के दाहिने तरफ उसके नाम की नेम प्लेट चमक रही थी (पृष्ठ-२२)
मेज पर उसके नाम की नेम प्लेट रखी थी पृष्ठ-२२)
रिवलिंग चेयर पर बगुले सी सफ़ेद और मुलायम सफ़ेद तौलिया रखी हुई थी(पृष्ठ-२२)
बैंक की तरफ आते वक्त उसने एक डिब्बे वाले को देख था (पृष्ठ- २३)
अरविन्द जी के पीछे-पीछे पूरा कुनबा भी चल आया था (पृष्ठ-२३)
नौ जवानों और अधेड़ कर्मचारियों के एक कुनबा उनके चैंबर में बिखर चुका था (पृष्ठ-२३)
तब तक स्थान्तरण के एक पत्र (पृष्ठ-२३)
इमारतें अब उसे उतनी अपरिचित नहीं लग रहे थे (पृष्ठ-२३)
यहीं-कहीं आस-पास डब्बे वाले भाऊ (पृष्ठ-२३)
भाऊ डब्बे वाले का काम करते थे (पृष्ठ-२३)
उनके जैसे पांच हजार हजारों लोग इस शहर में डब्बे वाले का काम करते थे (पृष्ठ-२३)
पृष्ठ २४ पर पहचानने के लिए हुलिया का वर्णन करते हुए कहानीकार लिखती हैं- बहत्तर किलो वजन, खिचड़ी बाल, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर का पेशेंट, डबल चिन और तोंद वाले राजीव को पहचानना मुश्किल तो था पर नामुमकिन तो नहीं... (मुझे समझ नहीं आया कि पहचान के लिए डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर कैसे झलक जाता है? ये शरीर के अन्दर की बीमारी हैं या बाहर से दिखने वाली?)
प्यार की दो छींटे क्या पड़ी (पृष्ठ-२४)
वक्त की मार से वो चश्मा भी अब चोटहिल हो चुका था (पृष्ठ-२४)
उन्होंने बुढ़ापे में झुक गयी कमर की तरह झुक आई चश्में की डंडियों को सूती धागे से बांधकर सीधा कर साध दिया था (पृष्ठ -२४)
बूढ़ी हो गयी हो तेरी ताई... जब देखो किड़-किड़ करती रहती हो (पृष्ठ-२६)
उन्होंने अपनी झुर्रीदार हाथों से उसके हाथों को अपने हाथों में ले लिया (पृष्ठ-२६)
दरिया बह निकलने को बहाने ढूढ रहा था(पृष्ठ-२६)
वे बारिश के हल्के दबाव से मिट्टी के बाहर अपने झरोखों से बाहरी दुनियाँ को झाँकने लगे हैं (पृष्ठ-२६)
दर्द बादलों के माध्यम से धरती पर टप-टप टपक रहा था (पृष्ठ-२६)
कहानी में इन वाक्यों को पढ़कर लगा कि कहानीकार आखिर किस तरह की नई भाषा गढ़ रहा है? क्या यह नव-व्याकरण है या फिर नई वाली हिंदी के भाषिक प्रयोग?
इसी संदर्भ में एक और हालिया प्रसंग याद आता है। हाल ही में पाकिस्तान में एक स्कूल में हुई घटना को मीडिया में काफी कवरेज मिला—एक स्कूल की प्रधानाचार्या ने अपने चपरासी के चाय पिलाने के स्टाइल से प्रभावित होकर उसके साथ निकाह कर लिया। चूँकि खबर बहुत वायरल हुई, तो शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इस खबर से परिचित न हुआ हो। एक लेखक महेन्द्र तिवारी ने उस घटना पर कहानी लिखी, जिसे जनसत्ता अखबार ने प्रकाशित किया।
जब मैंने ये कहानी साहित्य किंज के व्हाट्सएप ग्रुप में पढ़ी तो मैंने लिखा— “ये पूरी अखबार की खबर है। उसे कहानी बनाकर लिख दिया गया बस।”
कहानीकार का तर्क था— “तो कहानी भी एक घटना ही होती है सर। अगर रिपोर्टिंग लिखी जाती तो कहानी कैसे कहलाती? धुरंधर फिल्म की कहानी को आप क्या कहेंगे? आप कहेंगे कि धुरंधर भी मौलिक नहीं है?”
फिर किसी महाशय की टिप्पणी थी— “सच्ची घटनाओं पर कहानियां लिखी जाती हैं। और पहले भी लिखी जाती रही हैं। उसमें कहानीपन होना चाहिए।”
मैंने अपनी बात रखते हुए कहा— “लेखक की मौलिकता वहां होती जहां वह पात्रों के आंतरिक भावों को पाठक के सामने रख दे। उसके भीतर के द्वंद्व को बाहर निकाल दे। कुल मिलाकर कहानी घटना भर न हो। अमीना बेगम ने चपरासी से शादी क्यों की? पूरी कहानी इस पर केंद्रित होनी चाहिए। इसी बात की पड़ताल करें तो?”
मैंने उस घटना की खबर के कुछ लिंक शेयर किए, तो जवाब मिला— “रिपोर्टिंग में यह दिखाया गया है कि उसके चाय रखने के सलीके से प्रभावित होकर प्रिंसिपल मैम चपरासी से निकाह कर लेती है। लेकिन कहानीकार बाह्य कारकों से निकाह नहीं करा सकता है। साहित्यकार उसके अंदर की फीलिंग को बाहर निकालने का काम करता है। तभी वह साहित्यिक कृति बन पाती है। आपने इसमें प्रयास तो किया है पर संवेदनाओं पर कुछ घटनाएं हावी दिख जाती है। खैर इससे कहानी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। यह कहानी ही है और इसे महेंद्र तिवारी की कहानी कहा जाएगा।”
मेरा मत था— “रिपोर्टिंग को कहानी में बदलने को मौलिक रचना कैसे कहा जा सकता है? कहानी कहे जाने पर सवाल नहीं है, सवाल मौलिकता पर है। मौलिकता यानी नया दृष्टिकोण (vision), न कि केवल नया कथानक (plot)।”
लेखक का तर्क था— “आपके अनुसार उसमें मौलिकता यानि नया दृष्टिकोण नहीं है? पहले तो ये बोल रहे थे कि कहानी मौलिक नहीं है। अब कह रहे हैं कि नया दृष्टिकोण नहीं है। आप कहानी पर सवाल खड़े नहीं कर रहे, आप तो जनसत्ता की स्तरीयता और उसके संपादक पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। यह आवश्यक नहीं कि हर कहानीकार आपके दृष्टिकोण से ही कहानी लिखे।”
मेरा स्पष्ट मानना है कि कहानीकार को कहानी से इतना मोह नहीं होना चाहिए कि वह कहानी के डिफेंस में तर्क करने लगे।
कहानीकार ने कहा- आप तो जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित अखबार पर ही सवाल खाद आकार रहे हैं?
मुझे लगता है कि कोई अखबार, कोई पत्रिका, कोई लेखक, कोई रचना आलोचना से परे नहीं हो सकते।
एक महोदया उनके पक्ष में तर्क देती हैं— “कहानियां, कविताएं सभी आसपास घटी घटाओं, आप बीती या जग बीती से ही निकलती हैं। यदि यह घटना स्वयं देखी होती या किसी से सुनी होती, उसकी रिपोर्टिंग न होती तो इस कहानी को मौलिक कहा जाता, यदि रिपोर्टिंग हो गई तो, कहानी मौलिक नहीं हुई? यह समाचार हजारों ने पढ़ा होगा, कितनों ने कहानी में ढाला?”
मुझे कहना पड़ा— “यानी अब मौलिकता को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। समाचार या रिपोर्टिंग पर कहानी लिखी जा सकती है। इससे मुझे कोई गुरेज नहीं है। लेकिन मेरा सवाल मौलिकता को लेकर था। कथानक का स्रोत चाहे कहीं से भी हो (खबर, लोककथा, इतिहास), यदि लेखक उसमें नया अर्थ, नया संवेदनात्मक अनुभव और रचनात्मक पुनर्संरचना देता है, तो वह रचना मौलिक मानी जाएगी। लेकिन यदि कहानी केवल खबर का विस्तार भर है—अर्थात घटनाक्रम वही है, पात्रों में कोई गहराई नहीं जोड़ी गई, और लेखक का दृष्टिकोण नया नहीं है—तो उसे ‘रिपोर्टाज’ या ‘रूपांतरण’ तो कहा जा सकता है, लेकिन पूरी तरह मौलिक कहानी नहीं।”
यही वह बिंदु है जहाँ समूची बहस आकर टिकती है—चाहे वह पुरस्कार प्राप्त कहानियाँ हों या अख़बार में छपी चर्चित रचनाएँ। सवाल सिर्फ भाषा या कथानक का नहीं है, बल्कि उस रचनात्मक ईमानदारी का है, जो किसी भी साहित्यिक कृति को “घटना” से “कहानी” बनाती है।
आख़िरकार प्रश्न सिर्फ एक कहानी या एक लेखक का नहीं है, बल्कि उस समूची साहित्यिक व्यवस्था का है जहाँ भाषा की बुनियादी शुद्धता, कथ्य की आंतरिक सच्चाई और शिल्प की ईमानदारी की जगह अक्सर संबंधों, विचारधारात्मक निकटताओं और दिखावटी प्रभावों को तरजीह मिलने लगती है। यदि कहानी अपने समय की संवेदना को सटीक भाषा और प्रामाणिक अनुभव के साथ व्यक्त नहीं कर पा रही, और फिर भी वह पुरस्कारों से नवाज़ी जा रही है, तो यह केवल एक रचना की विफलता नहीं, बल्कि चयन-प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न है।
साहित्य में असहमति स्वाभाविक है, दृष्टियाँ भिन्न हो सकती हैं, परंतु भाषा की लापरवाही और शिल्प की कमजोरी को ‘नवाचार’ का नाम देकर प्रतिष्ठित करना अंततः साहित्य के साथ ही अन्याय है। जरूरी यह है कि हम रचना को रचना की कसौटी पर परखें— न कि रचनाकार के प्रभाव, परिचय या प्रचलित धारणाओं के आधार पर। वरना वह समय दूर नहीं जब कहानी अपने मूल स्वभाव— जीवन के सत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति से भटककर एक औपचारिक अभ्यास मात्र बनकर रह जाएगी।
सन्दीप तोमर (कथाकार, आलोचक)
नई दिल्ली

सीरिज == बिगाड़ के डर से... जानकी पुल पर एक कहानी पढ़ी-- कहानी पर मेरी राय---

 बिगाड़ के डर से...


जानकी पुल पर एक कहानी पढ़ी-- कहानी पर मेरी राय---
सुधा ॐ धींगरा की कहानी ‘अंतर्नाद’ अपने विषय के कारण पहली नज़र में महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है। बलात्कार, स्त्री-अस्मिता, मीडिया-ट्रायल, पितृसत्ता और स्त्री की आत्मप्रतिष्ठा जैसे प्रश्न निस्संदेह हमारे समय के बड़े प्रश्न हैं। लेकिन किसी गंभीर विषय का चयन मात्र किसी रचना को प्रभावशाली नहीं बना देता। साहित्य का मूल्यांकन अंततः उसके कलात्मक निर्वाह, शिल्प, भाषा, चरित्र-निर्माण, अंतर्विरोधों की विश्वसनीयता और कथ्य की आंतरिक संगति के आधार पर होता है। इसी कसौटी पर ‘अंतर्नाद’ एक अत्यंत कमजोर, असंतुलित और कई स्तरों पर सतही कहानी बनकर सामने आती है।
सबसे पहली समस्या कहानी के शिल्प की है। पूरी कहानी वस्तुतः एक लंबे भाषण में बदल जाती है। यह कहानी कम और मंचीय वक्तव्य अधिक लगती है। कथानक, दृश्य, परिस्थितियाँ, संवाद, पात्रों के बीच का तनाव — सब कुछ अनुपस्थित है। नायिका लगातार बोलती जाती है और लेखक उसकी आवाज़ में अपने विचार ठूँसता जाता है। कहानी में कथा-संरचना का विकास नहीं है, बल्कि एक विचारधारात्मक मोनोलॉग है जो पचासों पन्नों तक फैला हुआ है। साहित्य में विचारों की उपस्थिति बुरी नहीं होती, लेकिन जब विचार पात्रों की स्वाभाविकता को खा जाते हैं, तब रचना घोषणापत्र बन जाती है। ‘अंतर्नाद’ इसी संकट की शिकार है।
कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी नायिका मोहिनी देशमुख का चरित्र है। लेखिका उसे एक साथ कई विरोधी रूपों में प्रस्तुत करना चाहती हैं — वह अत्यंत आधुनिक, आत्मनिर्भर, एआई कंपनी चलाने वाली, कॉर्पोरेट दुनिया की सफल महिला भी है; साथ ही इतनी भावुक, असावधान और मानसिक रूप से निर्भर भी कि एक साधारण भावनात्मक जाल में फँसकर अपने पिता की करोड़ों की कंपनी और बैंकिंग ढाँचे को लगभग किसी अजनबी युवक के हवाले कर देती है। यह विरोधाभास स्वाभाविक नहीं बन पाया।
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक की एक कॉर्पोरेट महिला, जो प्रोजेक्ट्स, बैंकिंग, साझेदारी और कंपनी संचालन समझती है, वह अपने पार्टनर के बारे में लगभग कुछ नहीं जानती — यह बात अविश्वसनीय लगती है। कहानी में बार-बार कहा गया है कि वह “टॉपर” थी, “आत्मनिर्भर” थी, “एआई कंपनी” की संस्थापक थी; लेकिन उसके निर्णयों में परिपक्वता का एक भी संकेत नहीं मिलता। वह प्रेम में है, इसलिए सब कुछ भूल जाती है — यह तर्क हिंदी फिल्मों में चल सकता है, गंभीर कथा-साहित्य में नहीं।
उदाहरण के लिए यह अंश देखिए—
“मेरा परिवार बहुत आदर्शवादी थी। मैं भी परिवार की आन, बान, शान में नहीं जीना चाहती थी, स्वयं मेहनत करके कुछ बनना चाहती थी। पढ़ाई में मैं टॉपर थी। कोई जान नहीं पाया था कि मैं समृद्ध परिवार से हूँ। रमन उसका नाम है…”
यहाँ भाषा और विचार — दोनों स्तरों पर भारी असावधानी दिखाई देती है। “मेरा परिवार बहुत आदर्शवादी थी” जैसी बुनियादी व्याकरणिक त्रुटि चौंकाती है। “रमन उसका नाम है” जैसी संरचना भी बेहद असहज है। आगे “सेल्फ सपोर्टेड लड़कों” जैसी अभिव्यक्तियाँ कहानी की भाषा को हिंदी और कॉर्पोरेट जार्गन के बीच झुलाती रहती हैं। ऐसा लगता है कि लेखिका भाषा के भीतर नहीं, भाषा के ऊपर खड़ी होकर उसे धकेल रही हैं।
इसी अंश में नायिका कहती है कि वह किसी को यह नहीं जानने देना चाहती थी कि वह समृद्ध परिवार से है, लेकिन आगे पता चलता है कि उसका परिवार इतना प्रभावशाली है कि बैंक लोन, कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स, सिक्योरिटी नेटवर्क, पुलिस, कानूनी टीम — सब कुछ तत्काल सक्रिय हो जाता है। यहाँ कहानी की आंतरिक संगति टूटती है। लेखिका सुविधानुसार पात्र को कभी साधारण लड़की बना देती हैं, कभी सर्वशक्तिमान कॉर्पोरेट उत्तराधिकारी।
कहानी की दूसरी बड़ी समस्या उसका अतिनाटकीयपन है। हर घटना चरम पर घटती है। रमन सिर्फ स्वार्थी नहीं, बल्कि बलात्कारी, धोखेबाज़, फ्रॉड करने वाला, हत्या की योजना बनाने वाला, मीडिया-मैनेज करने वाला खलनायक है। दूसरी ओर नायिका लगभग हर स्तर पर पीड़िता होते हुए भी अंततः नैतिक विजेता के रूप में खड़ी होती है। इस तरह का द्वैत साहित्य को कमजोर करता है क्योंकि वास्तविक जीवन में मनुष्य इतने एकरेखीय नहीं होते।
कहानी में मीडिया की आलोचना भी बेहद सतही और सुविधाजनक है। मीडिया को लगभग सामूहिक खलनायक की तरह चित्रित किया गया है। लेकिन कहीं भी कोई विशिष्ट संदर्भ, समाचार-तंत्र की जटिलता, वर्गीय विमर्श या जनमत की संरचना नहीं आती। सब कुछ नारे की तरह कहा गया है। लेखिका जिस विषय को उठाना चाहती हैं, वह गंभीर समाजशास्त्रीय समझ की माँग करता है, लेकिन कहानी उसे भावुक आक्रोश तक सीमित कर देती है।
सबसे अधिक आपत्तिजनक बात यह है कि कहानी कई जगहों पर स्त्री-विमर्श को जैविक शुद्धता के बेहद कमजोर और खतरनाक तर्कों तक ले जाती है। उदाहरण के लिए यह अंश—
“नारी तो कभी मैली होती ही नहीं। कुदरत ने उसे बनाया ही इस तरह का है, कि हर माह माहवारी उसे भीतर से साफ़ कर देती है…”
यह कथन न सिर्फ वैज्ञानिक रूप से हास्यास्पद है, बल्कि स्त्री-अस्मिता की पूरी बहस को शरीर की “शुद्धता” और “मैलेपन” के पुराने ढाँचों में वापस धकेल देता है। स्त्री की गरिमा का आधार उसका जैविक “शुद्ध” होना नहीं, उसका मनुष्य होना है। लेकिन कहानी बार-बार उसी पितृसत्तात्मक भाषा में लौट आती है, जिससे लड़ने का दावा करती है। यह वैचारिक भ्रम कहानी की केंद्रीय कमजोरी है।
कहानी में बार-बार “पुरुष सत्ता”, “पुरुष मानसिकता”, “स्त्रियों की कंडीशनिंग” जैसे शब्द आते हैं, लेकिन उनका कोई गहरा विश्लेषण नहीं है। वे केवल घोषणात्मक वाक्य बनकर रह जाते हैं। यही कारण है कि कहानी विमर्श का भ्रम पैदा करती है, लेकिन वास्तविक वैचारिक जटिलता तक नहीं पहुँचती।
भाषा की दृष्टि से भी कहानी बेहद असावधान है। हिंदी, अंग्रेज़ी और भावुक भाषण शैली का मिश्रण कई जगह हास्यास्पद हो जाता है। जैसे—
“मैं उसे एक ‘सब्जेक्ट’ बना कर अधिकार जमा रहा था…”
“उसकी ‘पोज़ेसिवनेस’ मुझे चुभने लगी…”
“कॉर्पोरेट वर्ड में काम का एक हिस्सा…”
ये वाक्य कहानी की संवेदनात्मक लय तोड़ते हैं। ऐसा लगता है मानो कोई फेसबुक पोस्ट या टीवी डिबेट का ट्रांसक्रिप्ट पढ़ रहे हों। कथा-भाषा में जो सांद्रता, संकेत और कलात्मक संयम होना चाहिए, वह पूरी तरह अनुपस्थित है।
कहानी का एक और संकट उसका आत्ममुग्ध नैतिक स्वर है। नायिका लगातार अपने विचारों को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करती है। पाठक के लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा गया। साहित्य प्रश्न उठाता है, जटिलताएँ निर्मित करता है; जबकि यह कहानी हर जगह निष्कर्ष सुनाती चलती है।
बलात्कार जैसे गंभीर विषय को कहानी जिस तरह “मोटिवेशनल स्पीच” में बदल देती है, वह भी समस्या पैदा करता है। पीड़ा की गहराई, आंतरिक टूटन, सामाजिक चुप्पी, मनोवैज्ञानिक आघात — इन सबको कलात्मक सूक्ष्मता चाहिए थी। लेकिन यहाँ सब कुछ भाषणों और नारों में बदल जाता है। परिणामतः संवेदना पैदा होने के बजाय कृत्रिमता पैदा होती है।
कहानी का अंत भी अत्यंत फिल्मी है— हॉल में सन्नाटा, फिर तालियाँ, फिर युवा पीढ़ी तक “अंतर्नाद” पहुँच जाना। यह अंत किसी टीवी शो की स्क्रिप्ट जैसा लगता है, कहानी का स्वाभाविक निष्कर्ष नहीं।
दरअसल ‘अंतर्नाद’ की सबसे बड़ी विफलता यही है कि वह अपने समय की स्त्री को उसकी वास्तविक जटिलताओं में नहीं पकड़ पाती। वह या तो पीड़िता है या विजेता; बीच का मनुष्य कहीं गायब है। उसमें आत्मालोचन नहीं, केवल आरोप हैं; अनुभव की गहराई नहीं, विचारों की घोषणा है; कथा नहीं, भाषण है।
साहित्य में स्त्री-विमर्श का अर्थ केवल पुरुष-विरोध नहीं होता, न ही हर पुरुष को राक्षस और हर स्त्री को प्रतीक बना देना। अच्छी कहानियाँ मनुष्य की जटिलताओं को पकड़ती हैं। इस दृष्टि से देखें तो ‘अंतर्नाद’ अपने महत्त्वपूर्ण विषय के बावजूद एक कमजोर, अतिनाटकीय और शिल्पहीन कहानी बनकर रह जाती है।
सन्दीप तोमर
(कथाकार, आलोचक)

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