Wednesday, 16 September 2026

फेक आईडी नहीं, फेक इरादे

 फेक आईडी नहीं, फेक इरादे

सन्दीप तोमर 


किसी कार्यक्रम में एक महिला से मुलाकात हुई। औपचारिक-सी बातचीत हुई। जाते-जाते उन्होंने मुझसे कांटेक्ट नंबर माँगा। मैंने अपने स्वभाव के अनुरूप नंबर दे दिया। मेरे लिए इसमें कोई विशेष बात नहीं थी। किसी परिचित को नंबर दे देना मेरे लिए वैसा ही सामान्य काम है जैसे किसी को किताब दे देना या किसी से उसका ईमेल पूछ लेना।

एक-दो दिन बाद व्हाट्सएप पर सुप्रभात का संदेश आया। मैंने भी सामान्य शिष्टाचार में जवाब दे दिया। फिर सुप्रभात के साथ दो-चार बातें होने लगीं और दो-चार बातें कब लंबी बातचीत में बदल गईं, पता ही नहीं चला।

किसी से सहानुभूति पाने का शायद सबसे आसान और सस्ता तरीका है- अपने पार्टनर से पीड़ित होने की दास्तान सुनाना।

इसमें ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती। कोई लंबी भूमिका नहीं चाहिए। बस इतना कह दीजिए कि पति समझता नहीं, पत्नी सहयोग नहीं करती, प्रेमी धोखा दे गया, प्रेमिका बेवफा निकली, ससुराल वाले प्रताड़ित करते हैं, बच्चे सुनते नहीं, घर में कोई कद्र नहीं करता... सामने वाला अगर थोड़ा संवेदनशील हुआ तो आपकी कहानी का एक आसान श्रोता बन जाएगा और श्रोता मिल जाए तो कहानी लंबी होती चली जाती है।

मैं यह नहीं कहता कि पार्टनर से पीड़ित होने वाले लोग नहीं होते। बिल्कुल होते हैं। बल्कि हमारे समाज में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है। खासकर महिलाओं के संदर्भ में घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक निर्भरता, शराब की लत, विवाह के भीतर असमानता और कई तरह के शोषण वास्तविक समस्याएँ हैं। इन समस्याओं को केवल ‘घर की बात’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

लेकिन एक समस्या और है। किसी की पीड़ा सुनना और किसी की पीड़ा का स्थायी कूड़ेदान बन जाना- दो अलग बातें हैं।

शुरुआत में मैं भी सहानुभूति के कारण उनकी बातें सुनता रहा। वे अपने पति के व्यवहार, उनकी आदतों, शराब, घर के माहौल और रोजमर्रा की परेशानियों के बारे में बतातीं। मैं सुनता रहा।

कुछ दिन सुनने के बाद मुझे लगने लगा कि यह बातचीत अब बातचीत नहीं रही। यह बाकायदा ‘पति-पुराण’ बन चुकी है। और पति-पुराण की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका कोई अंतिम अध्याय नहीं होता।

आज पति ने यह किया। कल पति ने वह किया। आज पति ने फिर शराब पी। पति शराब पीकर साहचर्य की डिमांड करता है लेकिन मुझे घिन्न आती है। कल पति ने फिर से पैसे माँगे। न देने पर फिर खूब गाली दी। कल फिर पति ने झगड़ा किया।

मैं सोचने लगा कि आखिर मैं कर क्या रहा हूँ? मैं कोई पारिवारिक परामर्शदाता नहीं था। न मैं कोई कानूनी विशेषज्ञ ही हूँ। न मेरे पास उनके पति को सुधारने की कोई मशीन ही है। न मेरे पास ऐसा कोई जादुई वाक्य था जिसे सुनकर उनके पति अगले दिन शराब छोड़कर आदर्श पति बन जाते।

मैं सिर्फ एक लेखक हूँ, जो अपने लेखन और पढ़ाई के लिए मुश्किल से समय निकाल पाता है। मेरी अपनी किताबें हैं, पढ़ाई है, लिखने के लिए विषय हैं और सबसे बढ़कर समय की अपनी एक सीमित पूँजी है।

मुझे लगा कि मेरा वह समय, जिसे मैं पढ़ने-लिखने में लगाना चाहता हूँ, किसी ऐसी समस्या को सुनने में खर्च हो रहा है जिसका समाधान मेरे पास है ही नहीं। तो मैंने उनसे कहा- ‘देखिए, हमें अपना क्वालिटी टाइम क्वालिटी बातचीत पर खर्च करना चाहिए। ऐसी बातचीत हो जिससे आपको भी कुछ मिले और शायद मुझे भी लिखने के लिए कोई नया विषय। यह पति-पुराण हमारे दोनों का समय नष्ट कर रहा है।’

उन्होंने अपनी समस्या फिर से दोहराई तो मैंने कहा- ‘अगर स्थिति इतनी ही खराब है तो अलग होना भी एक विकल्प हो सकता है।’ यह कहते हुए मुझे खुद मालूम था कि भारतीय मध्यमवर्गीय समाज में अलग होना कोई मोबाइल का ऐप डिलीट करने जितना आसान काम नहीं है। यहाँ विवाह सिर्फ दो लोगों के बीच का संबंध नहीं होता। उसके साथ बच्चे जुड़े होते हैं, परिवार जुड़े होते हैं, आर्थिक निर्भरता जुड़ी होती है, सामाजिक प्रतिष्ठा जुड़ी होती है और सबसे बड़ी बात- लोगों की राय जुड़ी होती है।

‘लोग क्या कहेंगे’ हमारे समाज में कई बार संविधान से भी बड़ा दस्तावेज हो जाता है।

उन महिला की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। उनके पति कामकाजी नहीं थे। महिला स्वयं प्राइवेट नौकरी करती थीं। उसी कमाई से घर चलता था और पति की शराब का खर्च भी निकलता था। यानी जिस व्यक्ति से वह परेशान थीं, उसी व्यक्ति की आर्थिक जरूरतों का भार भी उन्हीं के कंधों पर था।

फिर भी मैं यह नहीं चाहता था कि मेरी हर शाम किसी और के वैवाहिक जीवन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सुनने में निकल जाए। आखिर एक दिन मैंने कुछ खीजकर स्पष्ट कहा- ‘प्लीज, अब और नहीं। मेरे पास इतना समय नहीं होता कि मैं एक-एक घंटा यही सब सुनता रहूँ। न मेरे पास आपकी समस्या का कोई समाधान है और न सिर्फ मुझे सुनाते रहने से आपकी समस्या हल होने वाली है।’

मैंने फेसबुक से उन्हें अपनी मित्र सूची से हटा दिया। व्हाट्सएप पर उनका नंबर ब्लॉक कर दिया। और मन ही मन सोचा- अब शायद सुकून से लिखा-पढ़ा जा सकेगा। लेकिन सोशल मीडिया पर किसी को ब्लॉक कर देना भी हमेशा किसी कहानी का अंत नहीं होता। कभी-कभी वह अगले अध्याय की शुरुआत होती है।

कुछ समय बाद एक अनजान नंबर से मैसेज आने लगे। कोई लड़की थी। उसने खुद को देहरादून की कॉलेज स्टूडेंट बताया। कहने लगी कि वह मेरी कहानियाँ पढ़ती है। मेरे साहित्य में उसकी बहुत गहरी रुचि थी। मेरी कहानियों के पात्र उसे पसंद थे। मेरी भाषा पसंद थी। मेरे विचार पसंद थे। मेरी लगभग हर चीज पसंद थी।

अब किसी लेखक को इससे ज्यादा और क्या चाहिए! लेकिन समस्या यह थी कि उसकी रुचि कुछ ज्यादा ही गहरी थी। इतनी गहरी कि मुझे शक होने लगा। मुझे लगा कि कहीं कोई परिचित ही नए नंबर से फिरकी तो नहीं ले रहा।

फिर एक मजेदार संयोग सामने आया। उस लड़की ने जिन-जिन कहानियों को अपनी पसंद बताया, उनमें वही कहानियाँ भी थीं जो उस महिला मित्र को पसंद थीं। अब संयोग कभी-कभी इतना संयोग नहीं रहता। मैंने उस नंबर पर कभी फोन किया तो कॉल डिस्कनेक्ट कर दी गई। दूसरी बार किया तो फिर वही हुआ।

आखिर एक दिन मैंने सीधे कह दिया- ‘पहले दिन से पता था कि आप यह सब कर रही हैं।’ उसके बाद बातचीत बंद हो गई। मैंने राहत की साँस ली।

लेकिन इस पूरे प्रसंग ने मुझे सोशल मीडिया की एक विचित्र दुनिया के बारे में सोचने को मजबूर किया।

हम अक्सर कहते हैं- ‘फेक आईडी।’ मुझे यह शब्द हमेशा थोड़ा अजीब लगता है। आईडी फेक हो सकती है, लेकिन उसके पीछे बैठा इंसान तो असली ही होता है। वह कोई मशीन नहीं होता। वह कोई काल्पनिक पात्र नहीं होता। वह एक वास्तविक व्यक्ति है, जिसने बस अपनी पहचान बदल रखी है। इसलिए मुझे लगता है कि असली समस्या ‘फेक आईडी’ नहीं है।

अगर कहीं कोई समस्या है तो वह है फेक इरादा।

पहचान छिपाने का अपना कोई नैतिक अर्थ नहीं होता। वह इस बात पर निर्भर करता है कि पहचान क्यों छिपाई गई है। कोई व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए पहचान छिपा सकता है। कोई निजी जीवन बचाने के लिए। कोई सामाजिक दबाव से बचने के लिए। लेकिन कोई व्यक्ति अगर किसी और की पहचान बनकर सिर्फ इसलिए सामने आए कि वह दूसरे व्यक्ति के जीवन में घुस सके, उससे निजी बातें निकलवा सके, उसका समय ले सके या उसके विश्वास का फायदा उठा सके, तो समस्या प्रोफाइल की नहीं, इरादे की है। और सोशल मीडिया ने इस काम को बहुत आसान कर दिया है।

सामने बैठकर किसी से निजी सवाल पूछने में झिझक होती है। इनबॉक्स में पूछने में नहीं। सामने देखकर कोई अश्लील बात कहने में शर्म आती है। फर्जी नाम से लिखने में नहीं। सामने वाले की असहमति का सामना करना मुश्किल लगता है। स्क्रीन के पीछे से वही बात दोबारा-दोबारा कहने में कोई संकोच नहीं।

सोशल मीडिया ने आदमी को संवाद की सुविधा जितनी दी है, उतनी ही छिपने की सुविधा भी दी है। और छिपने की सुविधा ने कई लोगों को यह भ्रम दे दिया है कि उन्हें कुछ भी करने की आजादी मिल गई है।

 

सहानुभूति भी एक तरह की लत हो सकती है

मुझे लगता है कि हमारे समय में एक और विचित्र प्रवृत्ति बढ़ी है—लोगों को अपनी कहानी सुनाने के लिए श्रोता चाहिए। हर व्यक्ति चाहता है कि कोई उसे सुने। यह स्वाभाविक भी है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब सुनने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे ‘इमोशनल डस्टबिन’ बना दिया जाए। आप अपनी सारी निराशाएँ उसमें डालते जाइए। अपना गुस्सा डालिए। अपना वैवाहिक असंतोष डालिए। अपनी कुंठाएँ डालिए। अपनी इच्छाएँ डालिए। और फिर उम्मीद कीजिए कि सामने वाला हर बार सहानुभूति के साथ बैठा रहे।

कई बार यह सहानुभूति भी संबंध का एक माध्यम बन जाती है। पहले समस्या बताई जाती है। फिर समस्या पर चर्चा होती है। फिर सलाह माँगी जाती है। फिर निजी बातें शुरू होती हैं। फिर भावनात्मक निकटता पैदा की जाती है। और कई बार वही भावनात्मक निकटता धीरे-धीरे ऐसी जगह पहुँच जाती है जहाँ से लौटना दोनों के लिए असहज हो जाता है।

यहीं से सोशल मीडिया की कई कहानियाँ शुरू होती हैं।

 

एक और किस्सा

इंदौर से एक मित्रता प्रस्ताव आया। कुछ म्यूचुअल फ्रेंड्स दिखाई दिए तो मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। कुछ ही दिन बाद मैसेंजर पर बातचीत शुरू हुई।

उस लड़की ने बताया कि उसकी नई-नई शादी हुई है। पति अच्छा है, लेकिन बिस्तर पर... उसने अपनी वैवाहिक यौन-असंतुष्टि के बारे में बात करनी शुरू की।

मैंने सबसे पहले यह पता करने की कोशिश की कि सामने सचमुच कोई महिला है या कोई पुरुष किसी महिला की पहचान से बात कर रहा है।

एक मित्र से इसकी पुष्टि भी हुई। उस लड़की ने उन्हें अपनी शादी का निमंत्रण भेजा था और फोन पर आने के लिए भी कहा था।

तो कम-से-कम इतना स्पष्ट था कि वह कोई पूरी तरह काल्पनिक प्रोफाइल नहीं थी।

मुझे उससे सहानुभूति हुई। लेकिन वह सहानुभूति बहुत जल्दी एक दूसरी दिशा में जाने लगी। वह सेक्स चैट करना चाहती थी। उसका तर्क था- ‘मैं आपसे मिलने की जिद नहीं कर रही। बस आप मुझे रिप्लाई करें और मेरा साथ दें।’

मैं सोचता रह गया कि यह कैसा साथ माँगा जा रहा है? और मेरे जैसे साहित्यिक व्यक्ति से इस तरह का साथ क्यों माँगा जा रहा है?

क्या लेखक होना किसी के लिए यह प्रमाणपत्र है कि वह अपनी हर तरह की कल्पना का सहयात्री बनने के लिए उपलब्ध है?

एक दिन मैंने मैसेंजर खोला तो इनबॉक्स में एक साथ कई तरह की तस्वीरें थीं। मैंने उन्हें तुरंत डिलीट किया। उसे चेताया कि भविष्य में इस तरह का कोई वार्तालाप न करे।

यब सब बात मैंने अपनी एक महिला मित्र से साझा की। उन्होंने कहा- ‘तोमर जी, आप ख्यातिलब्ध हैं। जितनी जल्दी हो उसे ब्लॉक कीजिए। क्या पता कब कौन किस बात का गलत इस्तेमाल करके आपको ही बदनाम करने लगे।’

सलाह बिल्कुल व्यावहारिक थी। मैंने उस आईडी को ब्लॉक कर दिया। लेकिन मन में फिर वही सवाल था- संसार में आखिर कितनी तरह की कुंठाएँ हैं? और सोशल मीडिया ने उन कुंठाओं को कितने खूबसूरत पैकेज में उपलब्ध करा दिया है!

किसी के पास अकेलापन है तो उसके लिए इनबॉक्स है। किसी के पास वैवाहिक असंतोष है तो इनबॉक्स है। किसी के पास सेक्स की भूख है तो इनबॉक्स है। किसी को सहानुभूति चाहिए तो इनबॉक्स है। किसी को सिर्फ किसी अजनबी का ध्यान चाहिए तो भी इनबॉक्स है। और किसी को दूसरे के जीवन में ताक-झाँक करनी है तो भी इनबॉक्स मौजूद है। बस सामने वाला तैयार रहना चाहिए।

 

महिला मित्रों का इनबॉक्स

महिला मित्रों से जब कभी सोशल मीडिया की बातचीत होती है तो मुझे अक्सर लगता है कि उनके इनबॉक्स की अपनी एक अलग दुनिया है। न जाने कितने प्रस्ताव लंबित पड़े होते हैं। कितने ‘हाय’। कितने ‘हैलो मैम’। कितने ‘आप बहुत सुंदर हैं।’ कितने ‘आपकी पोस्ट बहुत अच्छी लगी।’ कितने ‘आपसे एक जरूरी बात करनी है।’ कितने ‘क्या हम दोस्त बन सकते हैं?’ और कितने ऐसे प्रस्ताव जिन्हें खोलकर देखना भी समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं।

पुरुषों के इनबॉक्स में भी यह सब होता है, लेकिन महिलाओं के मामले में एक और परत जुड़ जाती है- अनचाही निकटता की।

किसी महिला ने कोई तस्वीर डाल दी तो वह सार्वजनिक घोषणा नहीं होती कि अब हर व्यक्ति उस पर निजी टिप्पणी करने के लिए अधिकृत है।

किसी ने अपनी जिंदगी के बारे में कुछ लिखा तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपनी जिंदगी का दरवाजा हर अजनबी के लिए खोल रही है।

सोशल मीडिया पर सार्वजनिक होना और निजी होने की अनुमति देना—दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। लेकिन बहुत से लोग इन दोनों के बीच का फर्क नहीं समझते।

 

सबसे महँगी चीज- समय

इन तमाम अनुभवों से मुझे एक बात और समझ आई। सोशल मीडिया पर हम सिर्फ अपनी जानकारी, तस्वीरें या निजी बातें साझा नहीं करते। हम अपना समय भी साझा करते हैं। और समय शायद हमारी सबसे महँगी चीज है। पैसा चला जाए तो कमाया जा सकता है। मोबाइल खो जाए तो नया खरीदा जा सकता है। पासवर्ड बदल सकते हैं। प्रोफाइल बदल सकते हैं। नंबर बदल सकते हैं। लेकिन जो एक घंटा किसी निरर्थक बातचीत में चला गया, वह वापस नहीं आता।

मैंने अपने लेखन के लिए समय बड़ी मुश्किल से बचाया है। पढ़ने के लिए समय निकालना पड़ता है। लिखने के लिए समय निकालना पड़ता है।

एक लेखक का सबसे बड़ा संसाधन शायद उसकी मेज पर रखा लैपटॉप या उसकी अलमारी में रखी किताबें नहीं, बल्कि उसका एकांत और समय है। और सोशल मीडिया इस एकांत पर सबसे पहले हमला करता है।

कोई सुप्रभात भेजता है। कोई पूछता है- क्या कर रहे हैं? कोई कहता है- एक बात पूछनी थी। कोई अपनी समस्या बताता है। कोई अपनी कहानी सुनाता है। कोई आपकी कहानी पर चर्चा शुरू करता है। कोई निजी बात करता है।

और देखते-देखते वह एक घंटा निकल जाता है जिसे आपने सोचा था कि आज लिखूँगा। फिर रात को लगता है- आज भी नहीं लिख पाया।

दोष समय का नहीं था। दोष उस समय के छोटे-छोटे टुकड़ों का था, जिन्हें हमने बिना हिसाब दिए बाँट दिया।

 

इसलिए हर बातचीत संबंध नहीं होती

मुझे लगता है कि हमें सोशल मीडिया पर एक बात समझने की जरूरत है—हर बातचीत संबंध नहीं होती और हर निकटता आत्मीयता नहीं होती।

कोई लगातार आपसे बात कर रहा है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह आपको समझता भी है। कोई आपकी कहानियाँ पढ़ रहा है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह आपके व्यक्तित्व तक पहुँचने का अधिकार पा गया है। कोई अपनी निजी जिंदगी आपके सामने खोल रहा है, इसका अर्थ यह नहीं कि आप उसकी जिंदगी के स्थायी श्रोता बन गए हैं। और कोई आपकी सहानुभूति चाहता है, इसका अर्थ यह भी नहीं कि आपको अपनी मानसिक शांति और अपना समय उसके हवाले कर देना चाहिए।

सहानुभूति जरूरी है। लेकिन सीमाएँ भी जरूरी हैं। किसी की समस्या सुनना मानवीयता है।

हर दिन उसी समस्या में डूबे रहना जरूरी नहीं। किसी के अकेलेपन को समझना संवेदनशीलता है। उसके अकेलेपन का स्थायी साथी बन जाना आपकी जिम्मेदारी नहीं। और किसी के जीवन में संकट है तो उसके प्रति संवेदना रखिए, लेकिन यह भी समझिए कि हर संकट का समाधान आपका समय नहीं हो सकता।

 

फेक आईडी से ज्यादा खतरनाक है फेक इंटिमेसी

आज जब हम फेक आईडी की बात करते हैं तो मुझे लगता है कि हमें उससे आगे जाकर ‘फेक इंटिमेसी’ पर भी बात करनी चाहिए।

अजनबी व्यक्ति अचानक आपको बहुत निजी बातें बताने लगता है। आपको विशेष महसूस कराता है। कहता है कि वह आप पर भरोसा करता है। आपसे निजी बातें पूछता है। आपकी संवेदनशीलता को पहचानता है। आपकी कमजोरियों को जानता है। और फिर उसी रास्ते से आपकी निजी सीमा में प्रवेश कर जाता है।

कई बार उसे आपके जीवन में आने की जरूरत भी नहीं होती। उसे बस इतना चाहिए कि आप उसे अपना समय देते रहें। वह आपकी जिंदगी का हिस्सा बने बिना आपकी जिंदगी का समय खाता रहता है। यही सोशल मीडिया की शायद सबसे कम दिखाई देने वाली चोरी है। समय की चोरी। और इसकी कोई एफआईआर नहीं होती।

 

अपनी इमेज से ज्यादा अपनी सीमाओं की रक्षा कीजिए

आखिर में बात सिर्फ इतनी नहीं कि सोशल मीडिया पर सतर्क रहिए। बात थोड़ी आगे की है। अपनी छवि के साथ-साथ अपनी सीमाओं के प्रति भी सजग रहिए। किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत शुरू करते समय यह मानकर चलना जरूरी नहीं कि सामने वाला बुरा ही है। लेकिन यह मान लेना भी ठीक नहीं कि सामने वाला वैसा ही है जैसा वह अपने प्रोफाइल पर दिखाई दे रहा है।

पहचान की पुष्टि हो सकती है। इरादे की नहीं। वह समय के साथ ही सामने आता है।

इसलिए किसी की निजी कहानी सुनकर तुरंत भावनात्मक रूप से जुड़ जाने की जरूरत नहीं।

किसी की सहानुभूति की जरूरत को अपनी जिम्मेदारी मत समझिए। किसी के अकेलेपन को अपनी उपलब्धता मत बनाइए।

और सबसे जरूरी- अपने समय को सस्ता मत समझिए। क्योंकि सोशल मीडिया पर लोग आपकी तस्वीर चुरा लें, आपकी पोस्ट कॉपी कर लें, आपका नाम इस्तेमाल कर लें—इन सबका कोई न कोई उपाय है। लेकिन जो व्यक्ति आपका एक घंटा चुपचाप चुरा लेता है, उसके खिलाफ आपके पास कोई ‘ब्लॉक’ भी नहीं होता।

वह घंटा हमेशा के लिए गया। इसलिए अब मुझे लगता है- फेक आईडी से डरने की जरूरत उतनी नहीं है, जितनी फेक इरादों को पहचानने की। क्योंकि स्क्रीन के दूसरी तरफ बैठा व्यक्ति असली हो सकता है, उसका नाम असली हो सकता है, उसकी कहानी भी असली हो सकती है...

बस आपकी जिंदगी में उसकी जगह और उसके इरादे, दोनों नकली हो सकते हैं। और तब पता चलता है कि सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सावधानी पासवर्ड की नहीं, अपने समय, अपनी सहजता और अपनी सीमाओं की रखनी चाहिए।

 

Saturday, 12 September 2026

प्रेम, देह और नैतिकता का सवाल

 प्रेम, देह और नैतिकता का सवाल

- सन्दीप तोमर 
 

क्या देह के रिश्ते के लिए विवाह संस्था की उपस्थिति अनिवार्य है? यह सवाल जितना सीधा दिखाई देता है, उतना है नहीं। दरअसल, इसके भीतर मनुष्य की देह, इच्छा, प्रेम, अधिकार, स्वतंत्रता और सामाजिक स्वीकृति- इन सबके बीच का पूरा तनाव छिपा हुआ है। विवाह को हमने केवल दो व्यक्तियों के साथ रहने की व्यवस्था नहीं रहने दिया; उसे नैतिकता, परिवार, वंश, संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्त्री-पुरुष के व्यवहार को नियंत्रित करने वाली संस्था में बदल दिया। इसलिए जब कोई व्यक्ति यह पूछता है कि क्या दो सहमत वयस्कों के बीच देह का संबंध विवाह के बिना संभव है, तो प्रश्न केवल देह का नहीं रह जाता। वह सीधे उस सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने वाला लगने लगता है जिसने देह पर अधिकार को विवाह की वैधता से जोड़ दिया है।

हमारे समाज में विवाह के भीतर होने वाला हर यौन संबंध अपने आप सहमति का संबंध मान लिया जाता है। पति-पत्नी हैं, इसलिए दोनों एक-दूसरे के लिए उपलब्ध हैं, यह धारणा इतनी गहरी है कि विवाह के भीतर इच्छा और अनिच्छा के बीच का अंतर अक्सर दिखाई ही नहीं देता। कितने ही विवाहों में देह का मिलन प्रेम या इच्छा से नहीं, बल्कि कर्तव्य, दबाव, आदत या संबंध टूट जाने के भय से होता है। एक साथी पहल करता है और दूसरा चुप रहता है। वह चुप्पी सहमति मान ली जाती है। जबकि चुप रहना और सहमत होना एक बात नहीं है।

यहीं विवाह संस्था की सबसे असहज विडंबना सामने आती है। जिस संस्था को प्रेम, सुरक्षा और साथ का आश्रय होना चाहिए था, उसी संस्था के भीतर कई बार देह अपनी स्वतंत्र इच्छा खो देती है। एक पार्टनर सक्रिय होता है, दूसरा पैसिव। बाहर से संबंध सामान्य दिखाई देता है, भीतर से शायद उसमें बहुत कुछ मर चुका होता है। यदि दो व्यक्तियों के बीच देह का रिश्ता इच्छा, सम्मान और पारस्परिक सहमति पर टिकना चाहिए, तो केवल विवाह का प्रमाणपत्र उस संबंध को सार्थक कैसे बना सकता है?

इस प्रश्न का दूसरा सिरा उतना ही महत्वपूर्ण है- क्या मनुष्य को अपने साथी को चुनने की स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए? प्रेम और देह को हमेशा एक ही व्यक्ति, एक ही समय और एक ही जीवन-संबंध में बाँध देना क्या मनुष्य की स्वाभाविक इच्छाओं को समझना है या उन्हें नियंत्रित करना? संभव है किसी व्यक्ति को एक साथी के साथ भावनात्मक निकटता मिले और दूसरे के साथ कोई दूसरा अनुभव। संभव है किसी संबंध में प्रेम हो लेकिन देह की जरूरतें अलग हों। संभव है दो लोग एक-दूसरे से प्रेम करते हों और फिर भी यह स्वीकार करते हों कि उनका रिश्ता किसी एक व्यक्ति की सम्पूर्ण भावनात्मक और शारीरिक जरूरतों का अंतिम उत्तर नहीं है।

यहाँ सहमति सबसे महत्वपूर्ण शब्द है। विवाह के बाहर संबंध होना अपने आप में न तो स्वतंत्रता का प्रमाण है और न ही विवाह के भीतर होना अपने आप में नैतिकता का। असली प्रश्न यह है कि संबंध में शामिल लोगों की इच्छा क्या है, उनकी सहमति कितनी स्वतंत्र है, और क्या किसी व्यक्ति को धोखे, दबाव या अधिकार के नाम पर संबंध में बाँधा तो नहीं गया है। प्रेम में स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि सामने वाले की भावनाओं की कोई कीमत नहीं; बल्कि इसका अर्थ है कि दोनों व्यक्तियों को अपने बारे में निर्णय लेने का अधिकार हो।

सिमोन द बोउवार और जाँ-पॉल सार्त्र का संबंध इस बहस को समझने के लिए अक्सर उदाहरण की तरह सामने आता है। दोनों ने पारंपरिक दांपत्य की उस धारणा को स्वीकार नहीं किया जिसमें प्रेम का अर्थ एक-दूसरे पर पूर्ण अधिकार हो। उनके संबंध में स्वतंत्रता, बौद्धिक साझेदारी और व्यक्तिगत चुनाव की एक अलग अवधारणा दिखाई देती है। बोउवार के जीवन में सार्त्र के अतिरिक्त भी दूसरे प्रेम-संबंध रहे और सार्त्र इन संबंधों से परिचित थे। वे अपने संबंध को केवल सामाजिक वैवाहिक ढाँचे की शर्तों से नहीं परिभाषित करना चाहते थे। उनके जीवन को आदर्श बनाकर किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना जरूरी नहीं, लेकिन यह उदाहरण इतना जरूर बताता है कि प्रेम और प्रतिबद्धता की कल्पना एक ही ढाँचे में संभव नहीं होती।

दरअसल, प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि बोउवार के कितने प्रेमी थे या सार्त्र ने उसे स्वीकार कैसे किया। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दो स्वतंत्र व्यक्तियों ने अपने संबंध की शर्तें स्वयं तय करने का साहस कैसे किया। समाज की सबसे बड़ी बेचैनी शायद इसी स्वतंत्रता से पैदा होती है। समाज को विवाह इसलिए सुविधाजनक लगता है क्योंकि उसके भीतर रिश्तों की भूमिकाएँ पहले से तय होती हैं, पति कौन, पत्नी कौन, अधिकार किसका, जिम्मेदारी किसकी, बच्चे किसके, परिवार किसका। जैसे ही दो लोग इन तय भूमिकाओं से बाहर अपने संबंध की परिभाषा खुद लिखना शुरू करते हैं, सामाजिक व्यवस्था असहज होने लगती है।

भारतीय समाज में इस असहजता का एक बड़ा कारण यह भी है कि यहाँ देह केवल व्यक्ति की निजी चीज नहीं मानी जाती। परिवार, जाति, धर्म, समुदाय और सामाजिक प्रतिष्ठा तक उसकी निगरानी में शामिल हो जाते हैं। विशेषकर स्त्री की देह को परिवार की इज्जत से जोड़ दिया गया है। पुरुष के अनेक संबंधों को अक्सर अनुभव, मर्दानगी या स्वाभाविकता की भाषा मिल जाती है, जबकि स्त्री की इच्छा को चरित्र के तराजू पर तौला जाता है। यही दोहरा नैतिक पैमाना विवाह संस्था के भीतर और बाहर दोनों जगह दिखाई देता है।

लेकिन विवाह संस्था की आलोचना करते हुए यह भूलना भी ठीक नहीं कि हर विवाह दमन का दूसरा नाम नहीं है। बहुत से लोगों के लिए विवाह प्रेम, दोस्ती, सुरक्षा, साझेदारी और जीवन की कठिनाइयों को मिलकर झेलने का सुंदर माध्यम है। समस्या विवाह में नहीं, उस धारणा में है जिसमें विवाह को मनुष्य के निजी चुनाव से ऊपर रख दिया जाता है। जब विवाह प्रेम का विकल्प बन जाता है, तब वह संस्था है; जब वह प्रेम और स्वतंत्रता की साझी जमीन बनता है, तब वह संबंध भी हो सकता है।

इसी तरह विवाह के बाहर बने हर संबंध को स्वतः मुक्त और प्रगतिशील मान लेना भी उतना ही सरलीकरण होगा। वहाँ भी अधिकार, ईर्ष्या, असुरक्षा, छल और भावनात्मक हिंसा संभव है। इसलिए प्रश्न विवाह बनाम अविवाह का नहीं, बल्कि संबंधों की गुणवत्ता का होना चाहिए। क्या दोनों व्यक्ति स्वतंत्र हैं? क्या दोनों अपनी इच्छा व्यक्त कर सकते हैं? क्या ‘न’ कहने का अधिकार सुरक्षित है? क्या संबंध में पारदर्शिता है? और सबसे महत्वपूर्ण- क्या दोनों को अपनी देह और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का समान अधिकार है?

शायद देह के रिश्तों पर बहस की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए कि देह पर पहला अधिकार व्यक्ति का है। विवाह उस अधिकार को समाप्त नहीं करता और विवाह से बाहर होना उस अधिकार को अपने आप पवित्र भी नहीं बना देता। देह को नैतिकता की सार्वजनिक अदालत में खड़ा करने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसके भीतर इच्छा है या दबाव, सहमति है या भय, प्रेम है या अधिकारबोध।

भारतीय समाज को शायद विवाह को समाप्त करने से अधिक अपनी नैतिकता की भाषा बदलने की जरूरत है। दो सहमत वयस्कों के बीच बने संबंधों को केवल इसलिए अनैतिक कहना कि वे हमारी स्थापित पारिवारिक संरचना में फिट नहीं बैठते, व्यक्ति की स्वतंत्रता को सामाजिक सुविधा के सामने छोटा कर देना है। हर संबंध को स्वीकार करना जरूरी नहीं, लेकिन हर संबंध के लिए एक ही नैतिक पैमाना थोपना भी न्याय नहीं।

आखिर मनुष्य किसी संस्था से पहले एक स्वतंत्र व्यक्ति है। विवाह उसकी जिंदगी का एक चुनाव हो सकता है, उसकी नियति नहीं। प्रेम उसका अनुभव हो सकता है, संपत्ति नहीं। और देह, वह किसी रिश्ते की मुहर नहीं, स्वयं व्यक्ति के अस्तित्व का हिस्सा है। शायद रिश्तों की सबसे मानवीय शुरुआत वहीं से होगी जहाँ हम यह मानना सीखेंगे कि किसी व्यक्ति के साथ होना और किसी व्यक्ति का मालिक होना- दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

 

 

 

Sunday, 6 September 2026

समकालीन हिंदी कहानी, लैंगिक चेतना और 'थर्ड जेंडर' की संवेदना: दो कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन

 समकालीन हिंदी कहानी, लैंगिक चेतना और 'थर्ड जेंडर' की संवेदना: दो कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन

कहानी की विकास यात्रा पर बात की जाए तो कहना होगा कि समकालीन हिंदी कहानी अब पुराने घिसे-पिटे विषयों से कहीं आगे का सफ़र तय कर चुकी है। आज का कहानीकार अपने समय की नब्ज को पकड़कर रचना रच रहा है, लेकिन इसके बावजूद भाषा, शिल्प और वैचारिक स्पष्टता के स्तर पर कई गंभीर समस्याएँ मौजूद हैं। हाल-फिलहाल की कहानियों को पढ़कर लगता है कि कुछ लेखक तो भाषा के स्तर पर खूब मेहनत कर रहे हैं, अत्यधिक क्लिष्ट और सुसंस्कृत भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो भाषा के स्तर पर सोचते ही नहीं कि वे क्या लिख रहे हैं। नरेशन हो या संवाद—उनकी भाषा बहुत लचर होती है। इसके अलावा, अधिकांश कहानीकारों की एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि वे कथा-रस की जगह 'प्रवचन की मुद्रा' में आकर कहानी के मूल रूप को ही भूल बैठते हैं।

नवम्बर 2025 में अंजू शर्मा की कहानी 'राधिका रानी@इंस्ट्राग्राम डॉट कॉम' को पुरवाई कथा सम्मान दिया गया। उत्सुकतावश जब यह कहानी पढ़ी और इसके साथ ही सत्या शर्मा कीर्ति की कथाक्रम पत्रिका में प्रकाशित कहानी 'छुपमछुपाई' सामने आई, तो दोनों पर एक साथ बात करना बेहद जरूरी लगा। दोनों कहानियों की खास बात यह है कि इनके केंद्र में नायक 'थर्ड जेंडर' है, परंतु दोनों रचनाकारों का दृष्टिकोण और वैचारिक धरातल एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न है।

अंजू शर्मा की कहानी 'राधिका रानी@इंस्ट्राग्राम डॉट कॉम' को पढ़कर लगता है कि एक बेहद मजबूत थीम पर बेहद लचर कहानी लिखी गई है। इसमें टर्निंग पॉइंट्स, ड्रामा-टेंशन-रिलीज़ और भावनात्मक ज्वार के बीच जिस जीवंत समन्वय और कसावट की जरूरत थी, वह महसूस नहीं होती। कहानी में दो मुख्य संघर्ष हैं—पहला समाज बनाम राधे, दूसरा राधे का प्रेम बनाम उसकी स्त्रीरूप पहचान। परंतु कहानी में इनका कोई संतुलन नहीं दिखता। कहानी प्रेम वाली लाइन को छूकर छोड़ देती है; वह arc विकसित नहीं हो पाती। राधे की आंतरिक यात्रा भी आधी-अधूरी रह जाती है—उलझन दिखती है, पर कोई ठोस resolution या breakdown सामने नहीं आता।

इस कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि थर्ड जेंडर को समझने के बजाय कहानीकार ने एक स्त्री-वेशधारी पुरुष की त्रासदी को ही थर्ड जेंडर की त्रासदी मान लिया है। राधे का स्त्रैण होना, रासलीला में राधा की भूमिका निभाना, पुरुषों द्वारा उसका यौन उत्पीड़न होना और उसका प्रेम में असफल होना—इनमें से कोई भी बिंदु अपने-आप में उसे 'थर्ड जेंडर' नहीं बनाता। कहानी में उसकी लैंगिक पहचान को लेकर बुनियादी समझ ही स्पष्ट नहीं है। कथ्य भी बेहद लचर और बिखरा हुआ है। रासलीला, चंदा का प्रेम, आर्थिक संकट, लॉकडाउन, सोशल मीडिया की सफलता, यौन हिंसा और अंत में 'राधिका' में उसका विलय—कहानी बहुत सारे संघर्ष एक साथ खड़े तो करती है, लेकिन किसी एक केंद्रीय संघर्ष को गहराई से विकसित नहीं करती। घटनाएँ लगातार जुड़ती जाती हैं, पर उनका नाटकीय कारण-परिणाम संबंध कमजोर है। अंत में 'वही कृष्ण, वही राधिका' वाला निष्कर्ष प्रभाव पैदा करने की कोशिश तो करता है, लेकिन चरित्र की मनोवैज्ञानिक यात्रा से स्वाभाविक रूप से नहीं निकलता।

सबसे गंभीर समस्या यह है कि लेखक राधे के स्त्रीत्व को बार-बार देह, लचक, आवाज, रंग-रूप और 'स्त्रैण गुणों' से परिभाषित करता है। इससे लैंगिक पहचान की आधुनिक और मानवीय समझ के बजाय रूढ़ धारणाएँ मजबूत होती हैं। कहानी में थर्ड जेंडर समुदाय का कोई वास्तविक सामाजिक अनुभव, आत्मबोध, पहचान-संघर्ष या सामुदायिक संदर्भ दिखाई ही नहीं देता। इसलिए यह कहानी थर्ड जेंडर पर कहानी कम और 'स्त्री-वेश में नृत्य करने वाले पुरुष कलाकार की सामाजिक विडंबना' पर कहानी अधिक है। समस्या यह नहीं कि विषय गलत चुना गया है; समस्या यह है कि विषय और पात्र की लैंगिक पहचान के बीच लेखक ने जो संबंध बनाया है, वह वैचारिक रूप से ही कमजोर है।

वहीं दूसरी ओर सत्या शर्मा कीर्ति की कहानी 'छुपमछुपाई' है, जिसके केंद्र में भी नीलेश नाम का एक थर्ड जेंडर पात्र है। इस कहानी के प्रत्येक पक्ष को गहराई से देखा जाए तो यह 'राधिका रानी@इंस्ट्राग्राम डॉट कॉम' की तुलना में कहीं अधिक संघनित, आत्मीय और मानसिक रूप से उद्वेलित करने वाली सिद्ध होती है। सत्या जी ने कथा के हर पक्ष को किसी सतही सामाजिक ड्रामे से नहीं, बल्कि पात्र के गहन आंतरिक द्वंद्व, भय और आत्म-स्वीकार्यता के संवेदनशील धागों से बुना है।

कहानी की शुरुआत म्यूजिक सिस्टम पर थिरकते नीलेश से होती है, जहाँ उसे अपने मरहूम पिता के कमरे में होने का आभास होता है। उसे लगता है कि पिता का थप्पड़ उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर पड़ता है कि वह ऐसा क्यों पैदा हुआ? नीलेश मानसिक द्वंद्व में है, वह छटपटाता है कि कौन है उसके भीतर जो उसे कुरेदता है—मुझे कौन चाहिए, स्त्री या पुरुष? वह अपने इस द्वंद्व को किसी से साझा करना चाहता है, लेकिन उसके पास कोई ऐसा नहीं है जिससे वह अपने मन की बात कह सके। ऐसे में लेखिका यहाँ 'डायरी' को एक माध्यम बनाती हैं, जो कथा-शिल्प के इस पक्ष को और अधिक अंतरंग तथा संवेदनशील बनाता है।

इस कहानी का सबसे विचारणीय और समृद्ध पक्ष इसका दार्शनिक तथा पौराणिक जुड़ाव है। कहानी में सत्या लिखती हैं—"सिर्फ कृष्ण ही पुरुष हैं बाकी सब स्त्री..." यह संवाद नीलेश के विचलित मन को तुष्ट करता है और उसके अस्तित्व को सकारात्मकता की ओर ले जाता है। नीलेश जब नटराज रूपी शिव से स्वयं की तुलना करता है या महाभारत के पात्र 'बृहन्नला' से खुद की तुलना करते हुए कहता है—"हे कृष्ण, ये अज्ञातवास कब तक चलेगा?"—तब कहानी का यह वैचारिक पक्ष केवल एक व्यक्ति की त्रासदी न रहकर सदियों से अपनी पहचान छिपाने को मजबूर एक पूरे समुदाय के शास्कत 'अज्ञातवास' की करुण पुकार बन जाता है।

कहानी का सबसे सबल और व्यावहारिक पक्ष इसका चरमोत्कर्ष है। नीलेश अपने इस अज्ञातवास को निष्क्रिय रहकर सहने के बजाय तोड़ता है। वह किसी झूठी नाटकीयता या सामाजिक दबाव के आगे घुटने टेकने के बजाय चिकित्सीय तकनीक (Medical Transition) का निर्भीक सहारा लेकर हमेशा के लिए स्त्री रूप स्वीकारता है और अपनी पहचान स्थापित करने के लिए पिता के नाम पर ही एक नृत्य अकादमी खोलता है। कथा के इस पक्ष की सबसे खूबसूरत परिणति यहाँ होती है कि जिस पिता के थप्पड़ और अस्वीकृति के साए में वह ताउम्र जीया, अपनी पहचान की जीत को वह उन्हीं को समर्पित कर देता है। यहाँ नायक अपने स्वाभाविक और साहसी रूप में है; सत्या ने उसे किसी भी तरह की कृत्रिम नाटकीयता या बेचारगी के साथ पेश नहीं किया है।

निष्कर्षतः, अंजू शर्मा की कहानी जहाँ विषय और पात्र की लैंगिक पहचान के बीच कमजोर वैचारिक संबंध के कारण सतही बनकर रह जाती है, वहीं सत्या शर्मा कीर्ति की कहानी पात्र के आंतरिक अंतर्द्वंद्व, पौराणिक-सामाजिक चेतना और आत्म-सशक्तीकरण को अत्यंत प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत करती है।


सन्दीप तोमर 

आलोचक 




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