Sunday, 6 September 2026

समकालीन हिंदी कहानी, लैंगिक चेतना और 'थर्ड जेंडर' की संवेदना: दो कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन

 समकालीन हिंदी कहानी, लैंगिक चेतना और 'थर्ड जेंडर' की संवेदना: दो कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन

कहानी की विकास यात्रा पर बात की जाए तो कहना होगा कि समकालीन हिंदी कहानी अब पुराने घिसे-पिटे विषयों से कहीं आगे का सफ़र तय कर चुकी है। आज का कहानीकार अपने समय की नब्ज को पकड़कर रचना रच रहा है, लेकिन इसके बावजूद भाषा, शिल्प और वैचारिक स्पष्टता के स्तर पर कई गंभीर समस्याएँ मौजूद हैं। हाल-फिलहाल की कहानियों को पढ़कर लगता है कि कुछ लेखक तो भाषा के स्तर पर खूब मेहनत कर रहे हैं, अत्यधिक क्लिष्ट और सुसंस्कृत भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो भाषा के स्तर पर सोचते ही नहीं कि वे क्या लिख रहे हैं। नरेशन हो या संवाद—उनकी भाषा बहुत लचर होती है। इसके अलावा, अधिकांश कहानीकारों की एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि वे कथा-रस की जगह 'प्रवचन की मुद्रा' में आकर कहानी के मूल रूप को ही भूल बैठते हैं।

नवम्बर 2025 में अंजू शर्मा की कहानी 'राधिका रानी@इंस्ट्राग्राम डॉट कॉम' को पुरवाई कथा सम्मान दिया गया। उत्सुकतावश जब यह कहानी पढ़ी और इसके साथ ही सत्या शर्मा कीर्ति की कथाक्रम पत्रिका में प्रकाशित कहानी 'छुपमछुपाई' सामने आई, तो दोनों पर एक साथ बात करना बेहद जरूरी लगा। दोनों कहानियों की खास बात यह है कि इनके केंद्र में नायक 'थर्ड जेंडर' है, परंतु दोनों रचनाकारों का दृष्टिकोण और वैचारिक धरातल एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न है।

अंजू शर्मा की कहानी 'राधिका रानी@इंस्ट्राग्राम डॉट कॉम' को पढ़कर लगता है कि एक बेहद मजबूत थीम पर बेहद लचर कहानी लिखी गई है। इसमें टर्निंग पॉइंट्स, ड्रामा-टेंशन-रिलीज़ और भावनात्मक ज्वार के बीच जिस जीवंत समन्वय और कसावट की जरूरत थी, वह महसूस नहीं होती। कहानी में दो मुख्य संघर्ष हैं—पहला समाज बनाम राधे, दूसरा राधे का प्रेम बनाम उसकी स्त्रीरूप पहचान। परंतु कहानी में इनका कोई संतुलन नहीं दिखता। कहानी प्रेम वाली लाइन को छूकर छोड़ देती है; वह arc विकसित नहीं हो पाती। राधे की आंतरिक यात्रा भी आधी-अधूरी रह जाती है—उलझन दिखती है, पर कोई ठोस resolution या breakdown सामने नहीं आता।

इस कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि थर्ड जेंडर को समझने के बजाय कहानीकार ने एक स्त्री-वेशधारी पुरुष की त्रासदी को ही थर्ड जेंडर की त्रासदी मान लिया है। राधे का स्त्रैण होना, रासलीला में राधा की भूमिका निभाना, पुरुषों द्वारा उसका यौन उत्पीड़न होना और उसका प्रेम में असफल होना—इनमें से कोई भी बिंदु अपने-आप में उसे 'थर्ड जेंडर' नहीं बनाता। कहानी में उसकी लैंगिक पहचान को लेकर बुनियादी समझ ही स्पष्ट नहीं है। कथ्य भी बेहद लचर और बिखरा हुआ है। रासलीला, चंदा का प्रेम, आर्थिक संकट, लॉकडाउन, सोशल मीडिया की सफलता, यौन हिंसा और अंत में 'राधिका' में उसका विलय—कहानी बहुत सारे संघर्ष एक साथ खड़े तो करती है, लेकिन किसी एक केंद्रीय संघर्ष को गहराई से विकसित नहीं करती। घटनाएँ लगातार जुड़ती जाती हैं, पर उनका नाटकीय कारण-परिणाम संबंध कमजोर है। अंत में 'वही कृष्ण, वही राधिका' वाला निष्कर्ष प्रभाव पैदा करने की कोशिश तो करता है, लेकिन चरित्र की मनोवैज्ञानिक यात्रा से स्वाभाविक रूप से नहीं निकलता।

सबसे गंभीर समस्या यह है कि लेखक राधे के स्त्रीत्व को बार-बार देह, लचक, आवाज, रंग-रूप और 'स्त्रैण गुणों' से परिभाषित करता है। इससे लैंगिक पहचान की आधुनिक और मानवीय समझ के बजाय रूढ़ धारणाएँ मजबूत होती हैं। कहानी में थर्ड जेंडर समुदाय का कोई वास्तविक सामाजिक अनुभव, आत्मबोध, पहचान-संघर्ष या सामुदायिक संदर्भ दिखाई ही नहीं देता। इसलिए यह कहानी थर्ड जेंडर पर कहानी कम और 'स्त्री-वेश में नृत्य करने वाले पुरुष कलाकार की सामाजिक विडंबना' पर कहानी अधिक है। समस्या यह नहीं कि विषय गलत चुना गया है; समस्या यह है कि विषय और पात्र की लैंगिक पहचान के बीच लेखक ने जो संबंध बनाया है, वह वैचारिक रूप से ही कमजोर है।

वहीं दूसरी ओर सत्या शर्मा कीर्ति की कहानी 'छुपमछुपाई' है, जिसके केंद्र में भी नीलेश नाम का एक थर्ड जेंडर पात्र है। इस कहानी के प्रत्येक पक्ष को गहराई से देखा जाए तो यह 'राधिका रानी@इंस्ट्राग्राम डॉट कॉम' की तुलना में कहीं अधिक संघनित, आत्मीय और मानसिक रूप से उद्वेलित करने वाली सिद्ध होती है। सत्या जी ने कथा के हर पक्ष को किसी सतही सामाजिक ड्रामे से नहीं, बल्कि पात्र के गहन आंतरिक द्वंद्व, भय और आत्म-स्वीकार्यता के संवेदनशील धागों से बुना है।

कहानी की शुरुआत म्यूजिक सिस्टम पर थिरकते नीलेश से होती है, जहाँ उसे अपने मरहूम पिता के कमरे में होने का आभास होता है। उसे लगता है कि पिता का थप्पड़ उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर पड़ता है कि वह ऐसा क्यों पैदा हुआ? नीलेश मानसिक द्वंद्व में है, वह छटपटाता है कि कौन है उसके भीतर जो उसे कुरेदता है—मुझे कौन चाहिए, स्त्री या पुरुष? वह अपने इस द्वंद्व को किसी से साझा करना चाहता है, लेकिन उसके पास कोई ऐसा नहीं है जिससे वह अपने मन की बात कह सके। ऐसे में लेखिका यहाँ 'डायरी' को एक माध्यम बनाती हैं, जो कथा-शिल्प के इस पक्ष को और अधिक अंतरंग तथा संवेदनशील बनाता है।

इस कहानी का सबसे विचारणीय और समृद्ध पक्ष इसका दार्शनिक तथा पौराणिक जुड़ाव है। कहानी में सत्या लिखती हैं—"सिर्फ कृष्ण ही पुरुष हैं बाकी सब स्त्री..." यह संवाद नीलेश के विचलित मन को तुष्ट करता है और उसके अस्तित्व को सकारात्मकता की ओर ले जाता है। नीलेश जब नटराज रूपी शिव से स्वयं की तुलना करता है या महाभारत के पात्र 'बृहन्नला' से खुद की तुलना करते हुए कहता है—"हे कृष्ण, ये अज्ञातवास कब तक चलेगा?"—तब कहानी का यह वैचारिक पक्ष केवल एक व्यक्ति की त्रासदी न रहकर सदियों से अपनी पहचान छिपाने को मजबूर एक पूरे समुदाय के शास्कत 'अज्ञातवास' की करुण पुकार बन जाता है।

कहानी का सबसे सबल और व्यावहारिक पक्ष इसका चरमोत्कर्ष है। नीलेश अपने इस अज्ञातवास को निष्क्रिय रहकर सहने के बजाय तोड़ता है। वह किसी झूठी नाटकीयता या सामाजिक दबाव के आगे घुटने टेकने के बजाय चिकित्सीय तकनीक (Medical Transition) का निर्भीक सहारा लेकर हमेशा के लिए स्त्री रूप स्वीकारता है और अपनी पहचान स्थापित करने के लिए पिता के नाम पर ही एक नृत्य अकादमी खोलता है। कथा के इस पक्ष की सबसे खूबसूरत परिणति यहाँ होती है कि जिस पिता के थप्पड़ और अस्वीकृति के साए में वह ताउम्र जीया, अपनी पहचान की जीत को वह उन्हीं को समर्पित कर देता है। यहाँ नायक अपने स्वाभाविक और साहसी रूप में है; सत्या ने उसे किसी भी तरह की कृत्रिम नाटकीयता या बेचारगी के साथ पेश नहीं किया है।

निष्कर्षतः, अंजू शर्मा की कहानी जहाँ विषय और पात्र की लैंगिक पहचान के बीच कमजोर वैचारिक संबंध के कारण सतही बनकर रह जाती है, वहीं सत्या शर्मा कीर्ति की कहानी पात्र के आंतरिक अंतर्द्वंद्व, पौराणिक-सामाजिक चेतना और आत्म-सशक्तीकरण को अत्यंत प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत करती है।


सन्दीप तोमर 

आलोचक 




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