Wednesday, 7 April 2021

“अनगिनत कसक की गाथाओं का पुलिंदा हैं लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा”


 

                              पुस्तक समीक्षा

पुस्तक — अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम  (कहानी संग्रह)    

लेखक – राजगोपाल सिंह वर्मा  

प्रकाशक- सुभदा बुक्स  

प्रकाशन वर्ष: २०२०

मूल्य:  २६० /.

 
(
समीक्षक-संदीप तोमर)

 

“अनगिनत कसक की गाथाओं का पुलिंदा हैं लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा”

लेखक राजगोपाल हमारे समय के विशिष्ट कथाकार हैं। “अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम” राजगोपाल सिंह वर्मा जी के सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह का नाम है। इस अद्भुत संकलन को पढने के पश्चात् इसकी समीक्षा लिखने से मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। अपने समय की शिनाख्त करती इस संकलन की कहानियाँ अद्भुत हैं। राजगोपाल हिन्दी के साहित्यजगत में अपनी तरह के कहानीकार हैं। वर्मा को “बेगम समरु का सच” से काफी ख्याति मिली, उसके बाद कहानी संग्रह का आना उनकी लेखन क्षमता को उजागर करता है। अगर मैं खुद से ही कुछ शब्द उधार लेकर कहूँ तो कहना पड़ेगा कि ये कहानियां बिलकुल ‘हटके’ हैं। राजगोपाल की कहानियां न तो हिन्दी के चालू मुहावरे में कलावादी शिल्पकारी से निर्मित होती हैं और न ही कथ्य की सपाट प्रस्तुति से। सधी हुई संप्रेषणीय भाषा और बेहद कसे हुए महीन शिल्प के सहारे वह विषय के इर्द-गिर्द एक ऐसा ताना-बाना रचते हैं जो पाठक को न केवल अंतिम पन्ने तक बाँधे रखता है बल्कि उनके साथ अपने समय और समाज की यात्रा कराते हुए उस पूरी विडंबना से रुबरु कराता है। कहा जा सकता है कि अपने समय पर लेखका की गहरी पकड है, वे परिस्थितियाँ जिन्होंने राजगोपाल से ये कहानियाँ लिखवाई हैं, कहीं अधिक सशक्त रहीं हैं और साथ ही लेखक की पैनी और महीन नजर उन परिस्तिथियों को कालजयी बना देती हैं।

‘सुभदा बुक्स” प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस कहानी संग्रह “अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम” में संकलित छोटी बड़ी कुल ग्यारह कहानियों में लेखक अपने समय के विभिन्न आयामों के साथ उपस्थित हैं। इन कहानियों में से अधिकांश में प्रेम को अलग अलग कोणों से प्रस्तुत किया गया है, इनमें अपने समय के प्रेम के दर्द को साफ-साफ देखा और महसूस किया जा सकता है जो शायद लेखक और कहानियों के पात्रों का केन्द्रीय भाव भी है। इन कहानियों की एक विशेषता ये है कि यहाँ वास्तविक चरित्र कहानी के पात्र बन जाते हैं और उसे पढते हुए आपको लगेगा ही नहीं कि कहानी से बाहर की कोई चीज़ है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये पात्र आपके आस-पास ही हैं और आप उनसे रोज रूबरू होते हैं।

संग्रह की पहली कहानी “छुटकी” की केन्द्रीय पात्र ‘छुटकी’ यानि नीलिमा की कथा प्रत्येक समाज और काल की गरीब मेहनतकश लड़की की कहानी है, जिसे घरेलू कामों मे लिप्त बेगार के चलते  कितने ही समझौते करने पड़ते है। मालिक के शोषण के चलते एक दिन बीमारी में जान गँवाती अनगिनत लड़कियों की वेदना को रचनाकार ने लिखने का प्रयास किया है। शरीर के जख्मों के साथ ही मन-मस्तिष्क के जख्म  कैसे जीवन का नासूर बन जाते हैं। इसी भाव से लेखक ने पाठको को रूबरू कराया है।“न जाने क्या कहलाता है यह रिश्ता” संवेदनाओं से ओत-प्रोत कहानी है, जिनका शिल्प काव्यात्मकता लिए है। संस्मर्णात्मक शैली में लिखी यह एक रोमांटिक कहानी है। माधुरी के साथ पनपा ऑनलाइन प्रेम जब अनेक परतें खोलते हुए आगे बढ़ता है तो नायक माधुरी की समस्याओं से रूबरू होता है, लेखक ने इस कहानी को अपनी कुशलता से परिणति तक पहुंचाया है। माधुरी का सुकड़ता संसार लेखक को खटकता है, ऐसा महसूस होता है, कि यहाँ लेखक स्वयं नायक के रूप में हमदर्द बन माधुरी जैसी अनगिनत लेखिकाओं का दर्द बयाँ करता है। “वो खत... अहसासों के” को डायरी शैली में लिखा गया है, हाल-फिलहाल डायरी शैली का चलन कम हुआ है, अनन्या को खत लिखते हुए लेखक ने फंटेसी का सहारा लेकर प्रेम की एक अलग निर्मिति बनाई है। “मुजरिम हाजिर हो” कहानी कोर्टरूम से शुरू होते हुए अब्दुल रहमान की गरीबी, तंग-परस्ती की दास्तान कह जाती है। जवान होती बेटियों को बरगला उनके साथ होने वाले अलग-अलग किस्म के शोषण को इस कहानी का आधार बनाया गया है। लेखक न्यायप्रणाली की सुस्त चाल से बीएचआई चिंचित होता है।  “सोलह प्रेमपत्र” में लेखक प्रेमी युगल प्रेम की शुरुआत के तरीके से कहानी को प्रारम्भ कर नायिका के आत्महत्या के निर्णय को इस बारीकी से उकेरता है मानो वह इस प्रेम का प्रत्यक्ष गवाह हो। घर छोडकर शादी करने के निर्णय और प्रेम के छल की कलई खुलने पर हुए प्रेम के हस्र को कहानी का आधार बना लेखक नवपीढ़ी को एक सार्थक संदेश इस कहानी के माध्यम से देता है। यह संकलन की एक सशक्त कहानी है।

टाइटल कहानी” अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम” में लेखक अपनी यात्रा के दौरान मिले पात्रों के बीच के प्रेम को उनके तरीके से समझने का प्रयास करता है और उसे इंसटेंट प्रेम की संज्ञा देता है। लेखक ठहराव वाले प्रेम की कल्पना भी करता है जेओ शायद आधुनिक समाज से निरापद है।

राजगोपाल वर्मा के लेखन की वाईई विशेषता है कि उनकी  कहानियों के पात्र तथा घटनाएँ एकदम सजीव हैं। ये कहानियां मन को इस तरह अभिभूत करती हैं कि पढ़ने-पढ़ते कहानी के किरदारों के साथ-साथ ही मन सफर करने लगता है। “प्रारब्ध” ठाकुर साहब की कहानी है जो चमत्कारिक से व्यक्तित्व के स्वामी हैं, जो अपने तीनों बच्चों की तारीफ़ के पुल बाँधते हैं, वही संतान पिता की चोट के बाद अपना असली रूप दिखाती है, जिससे ठाकुर साहब आहत होते हैं। इस कहानी में मानव स्वभाव और रिश्तों की जटिलता को प्रमुखता से लिखने का एक सफल प्रयास किया गया है। लेखक ने कहानी का अंत एक बड़े सच के साथ किया है-“ सच है... अपने हिस्से का हिसाब हमें स्वयं ही करना पड़ता है।“

“लॉगआऊट” सोशल मीडिया से पनपे प्रेम की अद्भुद दास्तान है। यह एक भावप्रधान कहानी बन पड़ी है, इस कहानी के संवाद पाठक को कहानी से जोड़ते है और पाठक खुद को कहानी में खुद को पाता है। “धूल की परत” भी एक बेहतरीन कहानी है, मैं इस संग्रह का टाइटल तय करता टीओ इस कहानी को प्रतिनिधि कहानी मान “धूल की परत” ही टाइटल रखता। इस कहानी का ताना-बाना लेखक को एक स्थापित कहानीकार साबित करता है। पाठक अगर पेन्सिल के साथ इस कहानी को पढ़ना शुरू करे तो मेरा दावा है कि वह बार-बार पंक्तियों को रेखांकित करता रहेगा। मसलन- “हम लोगों का सिंक्रोनाइजेशन ऐसा हुआ कि मित्रता अटूट बनी रही”, “उस दिखावटी दुनिया के मुखौटे उतरने आरंभ हुए... ।“, “आप आ जाते हो तो थोड़ा मन बदल जाता है,वरना ऊब होने लगी है लोगों से॥ ज़िंदगी से और कभी-कभी अपने आप से भी।“, “पूरी ज़िंदगी खुद से लड़ते रहो, एनए जाने कितनी सतहों में मन को छिपाकर रखो, छोटी-छोटी चीजों में खुशियाँ ढूँढते रहो ... ।“, “अब तो बची हुई ज़िंदगी एक्सपायर डेट की तरह तरह है।“... “दूर से हाथ तापने और खुद को जलते हुए महसूस करने में जमीन-आसमान का अंतर है।, “....वह केयूसीएच समय तक प्रेम करता है, दया भी दिखा सकता है पर जीवन भर एनए अपना सकता है, और न अपना बनकर रह सकता है।“, “ओल्ड हैबिट्स डाइ हार्ड”।“धूल की परत पढ़ते हुए अहसास हुआ कि लेखक मेरा अतीत कैसे जानता है?

सभी कहानियों के कथानकों की विविधता, लेखक के विस्तृत अनुभव, प्रकांड ज्ञान व अत्यंत सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का परिचय देती है। लेखक राजगोपाल वर्मा अपने खुले नेत्र, संवेदनशील हृदय और सक्रिय कलम से अपनी रचनाओं में स्मरणीयता के साथ-साथ पठनीयता जैसे गुणों को जन्म देकर हिंदी-जगत के सुधी पाठकवृंद को बरबस अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हैं। भाषा और शिल्प की बात की जाए तो हम पाते हैं कि वर्माजी ने कहानी के लिए किसी विशेष शिल्प को नहीं अपनाया। उनकी कथा कहने की शैली इतनी सरल और सहज है कि उनके पात्र बड़े ही सहज-सरल शब्दों में संवाद करते हैं। लेखक जो भी जैसा भी घटते हुए देखता है, उन घटनाओं से बड़ी आसानी से कथा में बुनता चलता है। वाक्य विन्यास एकदम सहज है और संवाद कथा की मांग के हिसाब से ही प्रयुक्त किये गए हैं, कुल मिलाकर कहानियां  पठनीय है। आखिर में इस सुन्दर और सार्थक संग्रह के लिए राजगोपाल वर्माजी को अनन्त शुभकामनायें। उनके इस अनूठे संग्रह का साहित्य जगत में स्वागत है।

Wednesday, 31 March 2021

एक अपाहिज की डायरी( आत्मकथा ) तीसरा भाग

 एक अपाहिज की डायरी दो साल से अधिक हुए तब शेयर करना शुरू किया था, दो ही एपिसोड लिखें होंगे फिर छूट गया, अब पुनः लिख रहा हूँ, पिछले दो अंक आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं, अब आगे .... 

                तीसरा भाग  



अभी हाथ का प्लास्टर खुला नहीं था। माँ डॉ. सुबोध से मेरा इलाज करवाकर आ रही थी, पैसे बचाने के चलते उसने रिक्शा नहीं किया, वो मुझे गोद में ले वापिस आ रही थी। रास्ते में रेलवे के फाटक पड़ते थे, ट्रेन आने का समय था, फाटक बन्द। ऐसी स्थिति में अक्सर लोग फाटक के नीचे से निकलकर आते-जाते, माँ ने समय बचाने के लिए फाटक के नीचे से निकलने का प्रयास किया। एक फाटक पार करके दूसरा फाटक पार ही किया था कि पैर एक पत्थर से टकराया। माँ का संतुलन बिगड़ा तो उसने अपनी कोहनी नीचे टिका दी ताकि मेरे हाथ का प्लास्टर नीचे न लगे, माँ जैसे-तैसे संभली दो कदम ही चली थी कि पैर के नीचे केले के छिलके के आ जाने से माँ का संतुलन फिर बिगड़ गया, माँ ने फिर से कोहनी नीचे टिका दी। माँ की कोहनी लहुलुहान हो गयी, मेरी आँखों में आँसू थे। मैं किसी से कुछ कहने कि स्थिति में नहीं था लेकिन इन सब बातों से सीख रहा था। मेरा मानसिक विकास और सामाजिक विकास इन घटनाओं पर निर्भर था।

माँ के हाथों की चोट मुझे मानसिक रूप से परेशान कर रही थी। दो दिन बाद फिर डाक्टर की विजिट थी। माँ जा नहीं सकती थी। पिताजी ने जाने का फैसला किया। स्कूल से छुट्टी ली और बुढाना डॉ. सुबोध के पास चले गए। डॉ. ने हाथ और पैर का प्लास्टर काट दिया और पैरों पर पट्टियाँ बाँध दी। पिताजी वहाँ से चलने के लिए बस स्टैंड पर आ गए। अभी बस नहीं आई थी, स्टैंड के पास एक बुजुर्ग और एक लड़की बैठे थे, पिताजी ने मुझे  उनके पास बैठा दिया। ये वो समय था जब इन्सान को देखकर इन्सान खुश होता था और बातचीत बहुत जल्दी परिचय में बदल जाया करती थी। बुजुर्ग और पिताजी आपस में बाते करने लगे। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो घर-परिवार की बातें होने लगी, परिचय हुआ। इस बीच बस आ गयी। बस लगभग भरी हुई थी, पिताजी और बुजुर्ग दो वाली एक सीट पर बैठ गए, मुझे उस लड़की की गोद में बैठा दिया। उसका नाम सुधा था- एकदम सीधी-सादी लड़की। उम्र यही कोई चौदह-पन्द्रह साल। सुधा ने मेरे पैरों पर पट्टियाँ लिपटी देखी और गले में पट्टी डालकर हाथ उसने डाले हुए, वो थोड़ी मायूस सी हुई। उसने पूछा-"तेरे पैर में ये पट्टी क्यों बंधी हैं।"

मैं चुप बैठा रहा। सुधा ने फिर उत्सुकता दिखाई। पैर को हाथ लगाकर कहा- "दुखता है?"
मैंने रूखेपन में जबाब दिया-"नहीं।"

आगे हमारे बीच कोई बातचीत नहीं हुई। पिताजी और बुजुर्ब बात करते रहे। शहर आने पर वो लोग उतरे। पिताजी ने बस से उतरकर मुझे पास की दुकान पर खड़ी साईकिल पर बिठाया और गॉव आ गए।

शाम को पिताजी ने माँ को बताया-"आज बस में एक बुजुर्ग मिले, उनकी पोती उनके साथ थी। उनका रिश्ता हमारे अखिल से तय हुआ था।“

“अखिल’ हमारे अखिल, यानि जेठ जी के बड़े बेटे से?”

“हाँ मालती, लेकिन भैया-भाभी ने रिश्ता तोड़ दिया, बुजुर्ग ने अपनी पोती से मेरे पैर छुवाए, मैंने उन्हें रिश्ते की हामी भर दी, कल भाई से बात करता हूँ।"

“आपने क्यों हामी भरी? जीजी क्या मान जाएँगी?”

“देखना पड़ेगा, लेकिन मुझे अपने भाई पर पूरा विश्वास है, भाई मेरी बात को नहीं टालेंगे, फिर मैं जुबान दे आया हूँ।“

अगले दिन पिताजी बड़े ताऊ के पास गए और रिश्ते के बारे में पूछा, सुक्खनसिंह ने कहा –“हरीप्रसाद! तेरी भाभी मना कर रही है।“

पिताजी ने कहा- "भाई मैंने जुबान दी है, अब शादी तो वहीँ से होगी।"

बड़े भाई ने छोटे भाई की जुबान का सम्मान करते हुए रिश्ता पक्का कर लिया। अखिल  की शादी सुधा से हो गयी। सुधा का परिवार गरीब था। वो बारात का स्वागत बहुत अच्छे से नहीं कर पाए, परिवार पिताजी से नाराज हुआ।

सुधा परिवार की बड़ी बहु थी। गरीब परिवार की लड़की। कम दहेज़ ला पाई। उम्र भी कम। ऊँचा परिवार, इलाके में रुतबा। ताऊजी को लगता हरि की बात मान गलती तो नहीं की, जैसा परिवार का नाम है- न वैसा स्वागत हुआ, न ही लेन-देन। सास को भी बहु पसन्द नहीं आई। अखिल का भी व्यवहार रुखा था। एक लड़की अनजान घर में अपना घर-बार सब छोड़कर जाती है और एक पति ही अगर सही से व्यवहार करे तो उसके सब गिले-शिकवे ख़त्म हो जाते हैं। लेकिन यहाँ तो अलग ही बात थी। पतिदेव भी मासाअल्लाह। सुधा खुद को प्रताड़ित महसूस करती। लेकिन उसके अन्दर विरोध का स्वर न था। कुछ ही दिनों में रिश्ता टूटने के कगार पर आ गया।

सुधा का भाई आया, परिवार ने बहु को रखने में अपनी असमर्थता जताई। पिताजी को बुलाने के लिए ताऊजी ने छोटे बेटे प्रदीप को गॉव भेजा। माँ मुझे डाक्टर के पास ले जाने के लिए तैयार कर रही थी। उन्होंने प्रदीप को कहा---“तुम सुदीप को लेकर जाओ, तेरे चाचा और मैं आते हैं।” मुझे प्रदीप की साइकिल पर बैठा दिया गया। अभी शहर से ३०० मीटर की दूरी बची होगी कि मेरा पैर साइकिल के पहिये में आ गया। वाल्वबॉडी पैर में घुसी तो साईकिल चलना मुश्किल। मैं रोने लगा था। प्रदीप ने साइकिल रोकी, लहुलुहान पैर देखा तो वो घबरा गया। जैसे-तैसे डॉ. सुरेश के क्लिनिक पहुँचे, डॉ. सुरेश ने पट्टी बाँधी लेकिन खून नहीं रुका, तब तक पिताजी और माँ भी आ चुके थे, शिवमूर्ति के पास डॉ. राजेंद्र के पास ले जाया गया। वहाँ पैर में ४ टाँके लगे। मुझे लेकर माँ घर आ गयी। उस दिन हम बुढ़ाना डॉ के पास भी नहीं जा पाए। पिताजी अपने भाई के घर पहुँचे। अखिल को समझाने के प्रयास होने लगे। अखिल टस से मस होने को तैयार नहीं हुआ। पिताजी असमंजस में पड़ गए। जब उन्हें कुछ रास्ता न सुझा तो उन्होंने कहा- “जब तक कुछ तय नहीं हो जाता सुधा गॉव में रहेगी।” बहुत हा-हुल्ला के बाद सुधा गॉव आ गयी।

मेरी सम्वेदना इस तरह की घटनाओ से प्रभावित हो रही थी। बिना स्कूल जाये ही सामाजिक पाठशाला शुरू हो गयी थी। ये पहला अवसर था जब मेरे दिल में स्त्री-सम्वेदना का जन्म हुआ। मेरा हृदय रोने लगा, मैं माँ का समर्पण देख रहा था, बहन सुप्रिया का स्नेह देख रहा था, मैंने स्त्री को दादी के रूप में देखा था, सब अपने थे, स्त्री से एक नया रिश्ता देखा- भाभी का रिश्ता। माँ ने बताया- भाभी भी माँ होती है भाभी माँ। सुधा भाभी से ये मेरी दूसरी मुलाकात थी, उस दिन खाना सुधा भाभी ने ही बनाया।

मैंने गुरु के रूप मे माँ को देखा, माँ मुझे पढ़ाती थी, दुनियादारी सिखाती थी, मैं माँ के प्रति और भाभी माँ का प्रति श्रद्धामय था।  

अगले दिन माँ खेत में चली गयी, भाभी माँ ने घर का काम किया। फुर्सत मिली तो मुझसे बोली-"सुदीप खाना खाओगे..?"

"हाँ भाभी, बहुत भूख लगी है।"-ये मेरा सुधा से भाभी बनने के बाद पहला संवाद था।
सुधा खाना लगा लायी, मैं खाना खाने लगा।

सुधा बोली-"सुदीप तुम इतना कम क्यों बोलते हो?"

"भाभी क्या बोलू, मैंने कुछ देखा ही नहीं, घर से बाहर जाता ही नहीं, तो कुछ सीखा ही नहीं, माँ कहती है कि जब बात को जानो तब ही बोलो, वर्ना नहीं बोलो।"

"देवर जी, तुम बहुत अच्छे हो।"

"पता नहीं, मुझे तो सुप्रिया दीदी ही अच्छी लगती है।"

"क्यों भाभी अच्छी नहीं है?"

"भाभी तो माँ होती है?"

"ये तुमसे किसने कहा?"

"माँ कहती है।"

"अच्छा, चाची ऐसा बोली थी।"

“हाँ भाभी, माँ ही मुझे पढ़ाती है, वो ही सिखाती है सब कुछ।"

मैं सबसे ज्यादा बातें सुप्रिया दीदी से ही करता था। पहली बार किसी और से इतनी बात की।

“देवर जी आप बहुत सीधे-बहुत भोले हो।”–सुधा भाभी ने कहा था।

“पता नहीं भाभी, मैं घर में ही रहता हूँ न, कहीं जाता नहीं ना, मुझे पता नहीं कैसे बात करते हैं? भाभी मैंने कुछ गलत तो नहीं बोला?”

“नहीं देवर जी, आप ने कुछ भी तो गलत नहीं बोला।”

“कुछ गलत बोलूँ तो मुझे आप ही देना, माँ को मत बताना, वर्ना तो डांट ज्यादा पड़ेगी, माँ बोलेगी-तूने भाभी तो तंग किया।”

“अरे, आप ऐसे क्यों बोल रहे हो? मैं चाची को तब बोलूँगी न जब आप मुझे तंग करोगे।”

“मुझे माँ की डाट से बहुत डर लगता है, जानती हो माँ को लगता है- घर में मैं ही सबसे ज्यादा शरारती हूँ, नीलू को तो माँ सीधा समझती है, और नीलू तो सब शरारत करता है और फिर माँ के सामने सीधा बन जाता है, हम सबको उसकी वजह से डाट पड़ती है।”

“अच्छा नीलू इतने शरारती हैं, लगते तो बहुत सीधे हैं।”

“हाँ भाभी, सब ऐसे ही सोचते हैं लेकिन वो ही मुझे डांट पड़वाता है, प्रिया दीदी ऐसा नहीं करती, दीदी मुझे बहुत प्यार करती है।”

“ये तो अच्छी बात है, प्रिया आपको प्यार करती है, करें क्यों न, आप हो ही इतने प्यारे।”

भाभी ने आगे कहा-“देवर जी आप बड़ा होकर क्या बनना चाहते हो?”

“चलूँगा तो बनूँगा ना।”-कहकर मेरी आँखों में आँसू आ गए।

“दिल छोटा न करो, आप ठीक हो जाओगे, मेरा मन कहता है।”

“पता नहीं, माँ भी कहती है कि मैं अपने बेटे के लिए इतनी हितया (कष्ट) भर रही हूँ, एक दिन उसे अपने पैरों पर चलते देखना चाहती हूँ।”

“देखना देवर जी, एक दिन चाची के मन की जरुर पूरी होगी।”

उस दिन मेरी आँखों में आंसू थे। सुधा ने उन आँसुओं को पोंछने के लिए हाथ बढाया लेकिन कुछ सोचकर हाथ रोक दिए।

 क्रमश:

फेक आईडी नहीं, फेक इरादे

  फेक आईडी नहीं , फेक इरादे सन्दीप तोमर  किसी कार्यक्रम में एक महिला से मुलाकात हुई। औपचारिक-सी बातचीत हुई। जाते-जाते उन्होंने मुझसे कांटे...