Wednesday, 10 July 2019


सन्दीप तोमर की कुछ लघुकथाएँ

(कम शब्दों में बात कहने का प्रयास)

" अफ़सोस"

चाकू का फर्र सीधा पेट में घुसा तो आंत-औजड़ी बाहर निकलता हुआ नीचे तक पहुँचा। शर्म-हया का पर्दा कट कर शरीर से अलग हुआ तो चाकूबाज को अफ़सोस हुआ उसके मुँह से शब्द निकले-“अरे ये तो अपने मजहब का है, मूंछ-दाढ़ी न रखने के दौर में कितना मुश्किल है पहचानना, साला मजहब की पहचान ही नहीं होती।“
लाश सड़क पर गिर चुकी थी। चाकूबाज को हत्या पर नहीं गुनाह पर अफ़सोस था।

“तैनाती”
शहर के जिस भी इलाके में कोई वारदात होती अगले दिन उसकी तैनाती वारदात वाले इलाके में कर दी जाती| पिछले कई महीने से ये ही सिलसिला चल रहा था| वह वारदात और तैनाती से खीज चुका था| 
उसने बड़े इत्मिनान से अफसर से कहा- “साहब, जब पक्की खबर है कि दो दिन बात सर्राफा बाजार में वारदात होने वाली है और उसके बाद मेरी तैनाती वहाँ तय है तो आज ही क्यों मुझे वहाँ तैनात कर दिया जाता?”

“खबरदार”
दबंग उस मरियल को घर से बाहर घसीट लाये। उसकी पसलियाँ किसी धोकनी की तरह चल रही थी। 
एक दबंग ने उसका गिरेवान पकड़ कर कहा-“ दबंगो के मोहल्ले में रहकर अपने मजहब के गीत गाता है, तुझे मौत का डर नहीं?”
मरियल गिडगिडाते हुए दहाडा-“ देखो मुझे जान से मार दो लेकिन खबरदार जो मेरे मजहब के खिलाफ़ एक शब्द भी कहा।“

"सपना”

वह सोया हुआ था, मैंने उसे नहीं जगाया - "दीवाना है किसी प्रेयसी की याद में सपना देख रहा होगा।"
वह उठा तो मुझसे बोला-"अगर तुम मुझे सोते से जगा देते तो वह आज यूँ दिल तोड़कर नहीं चली जाती।"

"जवाबी मेल"

आज मुझे एक औरत का मेल आया। उसमें उसने स्वयं की नग्न, अर्धनग्न तश्वीरें भेजी थी।

और मैंने उस औरत को जवाबी मेल भेजा। मेरी माँ जन्म देते ही मर गयी, जिन्दा होती तो इन्हीं स्तनों से मुझे दूध पिलाती।

"पहुँच"

उसने कहा - "मेरे पास बंगला है, पनामा है, पैराडाइज़ है, तुम्हारे पास क्या हैं हें ...?"
पत्रकार बोला-"मेरे पास ये सारे दाग धोने वाला डिटर्जेंट पाउडर है, वह भी एकदम देशी।"
पुलिस वाला-"(पिछवाड़े पर डंडा फटकारते हुए), साले तेरी पत्रकारिता निकालता हूँ, जानता नहीं साहब की पहुँच कहाँ तक है?"
पत्रकार बगले झांक रहा था।

विनती"

दंगई बमुश्किल १६ साल की छरहरे बदन वाली सांवली लड़की को घसीटकर मकान से बाहर ले आये.. लड़की लड़खड़ाते हुए खड़ी हुई कपडे झाड़े और दंगईयों से बोली-"तुम मुझे जान से मार दो लेकिन मेरी विनती है, देखो मेरी सलवार मत फाड़ना."

"भूतो न भविष्य"/ लघुकथा/ सन्दीप तोमर

हिसाब से बीज, खाद, पानी, निराई, हल, सबका खर्च बराबर भी किसानो को उनकी फसल के दाम की एवज में नहीं मिला था।
सभा हुई तो उसने ऐलान किया, इस बार सब तय करें कि हम शहर या सरकार को अपनी फसल नहीं बेचेंगे।
सब किसान उठकर अपने घरों का रुख करने लगे। वह खाली होते पंचायतघर को तकता रहा।

"प्रेम गली"
"महिवाल कहता रहा- जी करता है तेरे जैसा एक घड़ा बनाऊं। आधुनिक जमाने का प्रेमी हूँ। रोबोट बनाता और अपने हिसाब का सॉफ्टवेयर डालता।"
"देव कहता फिरा-मेरी किस्मत में तू नहीं शायद। आधुनिक जमाने का देव हूँ। किस्मत पर क्यों हाथ धरे बैठूं। जमाने में प्रेमिकाओं की क्या कमी है?"
रांझा फटे कपड़े, जगह-जगह पैच लगी पोशाक पहने गलियों में फिरता रहा। मैं आधुनिक जमाने का प्रेमी, सूट-टाई पहन कैसिनो में मिलूंगा, आएगी न?"

"नवयुग" 
"हम एक राष्ट्र एक चुनाव पर विश्वास करते हैं।"-सत्ता पक्ष के प्रतिनिधि ने कहा।
"इसका सीधा मतलब है एक पार्टी एक नेता एक सरकार।"-विपक्ष का प्रतिनिधि बोला।
"चिल्लाओ, तुम्हारी सुनता कौन है?" 
"यानि आप लोग लोकतंत्र को ही समाप्त कर दोगे?"
"लोकतंत्र, ये किस चिड़िया का नाम है?"

“परहेज”
उसे लोहिया के बनाये गए बुतों से परहेज होने लगा, उसने हथोडा हाथ में लिया और लखनऊ के लोहिया पार्क जाकर लोहिया के बुत पर ताबड़तोड़ प्रहार शुरू कर दिए| पार्क में घूम रहे लोगो ने उसकी बेजा हरकत पर उसे लात, घूंसों से मारना शुरू किया, ताबड़तोड़ मार से उसकी अंतड़ियाँ बाहर आई तो भीड़ रफूचक्कर हुई| पुलिस की गाड़ी और अम्बुलेंस साथ-साथ आई| उसे लोहिया अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराकर पुलिस ने आगे की कार्यवाही शुरू कर दी| 

"मजमून"
उसने तमाम उम्र लिखे खतों को एक लिफाफे में रक्ख डाक से प्रेषित कर दिया। 
हफ्ता भी नही बीता लिफ़ाफ़ा वापिस लौट आया इस मजमून के साथ कि" अब यहाँ कोई भावना नहीं रहती, यह मकान अब कामना के पास है।"
वह कभी उलट-पलटकर लिफ़ाफ़ा देखता , कभी उसका मजमून।

"करतब बनाम भूख"
मदारी ने एक नया करतब दिखाया और तमाशबीन जिनमें कुछ मनोरंजन के लिए खड़े थे लेकिन कुछ भूखें थे, सब ही उछल-उछल कर तालियां बजाने लगे थे। एक करतब पर लोगों की ताली बंद नहीं होती थी कि मदारी कुछ नया तमाशा पेश कर देता था।
इस तरह भीड़ में मेरी आवाज़ अनसुनी फरियाद बन गयी, जबकि मैं तो मजमें में यह सोचकर शामिल हुआ था कि यहाँ कोई लंगर लगा हुआ है।
भूख भी आखिर भूख थी, उसे भी ढेर हो जाना था बिलकुल मेरी ही तरह।

"करवा चौथ" 
आज सुबह से घर में कोहराम मचा था।
"तुम ये दकियानूसी सोच का व्रत नही रखोगी।"-देवेश ने पूरे आवेश में कहा।
"तुम्हारी ही लंबी आयु के लिये है, कौनसा अपनी आयु बढ़नी है इससे।"-जया ने जवाब दिया।
"इस नारकीय जीवन से तो मौत बढ़िया।"-देवेश ने कुढ़ते हुए कहा।
"तो फिर मरो।"-कहते हुए जया चाय बनाने के लिए किचन की ओर बढ़ गयी।

एक खबर 
वह किसी विशेष दल का सदस्य था। उसे किसी मिशन पर लगाया गया था। आईपीएस राणा वहां से गुजर रहे थे उन्होंने देखा कि वह हनुमान मंदिर के सामने संदिग्ध घूम रहा है। आईपीएस राणा ने उसकी हरकत को देखा तो उन्हें शक हुआ। वे अपनी गाड़ी से उतरे और उसे धर दबोचा।
शाम को टीवी पर एक खबर आई---
" एक हनुमान भक्त को मुसलमान आईपीएस राणा ने पीटा।"
मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि समाचार में क्या बताने की कोशिश की गई थी? न्यूज़ बनाने से पहले क्या मापदंड तय किये जाते हैं ये शायद मैं क्या कोई नही जानता था।

"सपना”
वह सोया हुआ था, मैंने उसे नहीं जगाया -"दीवाना है किसी प्रेयसी की याद में सपना देख रहा होगा।"
वह उठा तो मुझसे बोला-"अगर तुम मुझे सोते से जगा देते तो वह आज यूँ दिल तोड़कर नहीं चली जाती।"

"पहुँच"
उसने कहा - "मेरे पास बंगला है, पनामा है, पैराडाइज़ है, तुम्हारे पास क्या हैं हें ...?"
पत्रकार बोला-"मेरे पास ये सारे दाग धोने वाला डिटर्जेंट पाउडर है, वह भी एकदम देशी।"
पुलिस वाला-"(पिछवाड़े पर डंडा फटकारते हुए), साले तेरी पत्रकारिता निकालता हूँ, जानता नहीं साहब की पहुँच कहाँ तक है?"
पत्रकार बगले झांक रहा था। 

“दौड़"
उसके पास मंत्री जी के घोटाले में सम्मिलित होने के पर्याप्त सबूत थे। वह सुबह ही मोटरसाइकिल से मंत्री जी की कुटिया के बाहर पहुँच गया था, जैसे ही मंत्री जी चुनाव प्रचार के लिए निकले, उसने गेट से बाहर निकलती गाड़ी का शीशा नॉक करके पूछा था-"मंत्री जी देश के सबसे बड़े घोटाले में आपका नाम आने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?"
मंत्री जी ने इशारों में ही संवाददाता से कलम मांगी और कागज पर लिखा- “7 दिन के भागवत यज्ञ में मौनव्रत है।”
पत्रकार आज फिर ब्रेकिंग न्यूज की दौड़ में पिछड गए थे।

"चिड़िया का मजहब"

वह पिस्तौल से ताबड़तोड़ गोलियां चला रहा था, गोली से  एक आदमी उसी जगह दोहरा हो गया। थोड़ी देर बाद ही एक बूढ़ी औरत भी ढेर हो गई। तभी कमसिन जवान छरहरे बदन की एक लड़की गली में निकली, गोलियाँ चलाने वाले की बांछे खिल गयी।उसके साथ वाले का सिर भिन्ना गया। उसने कहा-"देखते क्या हो, गोलियाँ चलाओ।"गोलियां चलाने वाले ने पिस्तौल की नाल उसकी  ठुड्डी पर फेरते हुए कहा-" करारा माल है।" उसके साथ वाले ने कहा : “यह क्या कहते हो, हम बलवाई हैं, हमारा पेशा दूसरे मजहब के लोगो को मारना है।" गोलियां चलाने वाले ने जवाब दिया- “अबे लेकिन इन चहकती चिड़ियाओं का कोई मजहब नहीं होता।देखता है न, कब से जनानी का मुंह नहीं देखा।”

मूर्ति प्रकरण 
1
अम्बेडकर की मूर्ति ने लेनिन की मूर्ति से पूछा-"ये लोग मेरी मूर्ति तो रोज ही कहीं न कहीं तोड़ते ही रहते हैं, आज तुम्हारी भी तोड़ डाली। हमलोगों की मूर्तियों से ये इतना भय क्यो खाते है? 

लेनिन की मूर्ति ने कहा- " ये मामला भय का नहीं है,  मानसिक अवसाद का है। जहां विचार नहीं होता, वहां विकार चला आता है।"

2
लेनिन की मूर्ति ने अम्बेडकर की मूर्ति से सवाल किया- मेरी मूर्ति तो यहां पहली बार तोड़ी है, तुम्हारी तो वर्षो से तोड़ते आये हैं, तुमसे ये इतना क्यों चिढ़ते हैं? 

अम्बेडकर की मूर्ति ने कहा-" ये चिढ़ते इसलिए हैं कि हमारे विचार इनके विकारों पर हमेशा भारी पड़ते हैं।"

3
लेनिन की मूर्ति पर पहला वार ही हुआ था कि मूर्ति ने कहा- "रुको, किसे तोड़ रहे हो?"
हाथ में घन लिए व्यक्ति ने कहा-"तुम्हें और किसे?"
"मैं कौन हूँ?"
"होगा कोई, उससे मुझे क्या लेना-देना। हुकुम हुआ है इसलिए तोड़ रहा हूँ।"

4
वह लेनिन की मूर्ति पर ताबड़तोड़ घन चलाए जा रहा था। लेकिन मूर्ति लगातार हँस रही थी। 
वह बोला-" तुम हँस क्यों रहे हो? जानते नहीं दो मिनट में धरासायी हो जाओगे।"
मूर्ति ने जोर का ठहाका लगाया और कहा-" मैं विचार हूँ, यूँ धराशाही नहीं होता।"

5

लेनिन की मूर्ति ने पेरियार की मूर्ति से कहा-"मैं तो बाहर वाला यानी विदेशी हूँ, तुम तो इनके अपने हो। फिर भी......।"
पेरियार की मूर्ति ने कहा-"जिससे इन्हें खतरा लगता है, ये उसकी मूर्ति को तोड़ते है।"
"लेकिन मूर्ति ही क्यों?"
"क्योंकि ये विचार तक पहुंच नहीं पाते।"

6

लेनिन की मूर्ति लखनऊ के लोहिया पार्क पहुंच बोली-" हमारे दोनों के गुरु एक ही हैं, आज मुझे तोड़ा, कल तुम्हारी बारी।"
लोहिया ने कहा-"मुझे अंदेशा था तभी मैं मूर्ति लगाने का विरोध किया करता था।"

"मलेच्छ"

पहला दरवेश: विरह से भक्ति में लीन होना है तो योग आजमाओ.
दूसरा दरवेश: विरह और भक्ति में योग की क्या संधि है?
तीसरा दरवेश: इससे नया ज्ञान पनपेगा.
दूसरा दरवेश: उसे भक्ति-सुयोग और विरह-दुर्योग से जाना जायेगा? 
पहला दरवेश: मलेच्छ लगते हो?
तीसरा दरवेश: इस अपराध में तुम्हे देश निकाला दिया जायेगा.
दूसरा दरवेश: नहीं सखा, मैं रोज कसरत करूँगा.
पहला दरवेश: राजा तुम पर प्रसन्न होगा.

"मजदूर"

वह सुबह उठा..अख़बार उठाया तो देखा कि आज मई दिवस पर उसे सर्वश्रेष्ठ मजूर पुरस्कार मिला है..
उसने बचपन से ही सोच लिया था कि वो मजूर बनेगा और घूम घूमकर देश में मजूरी करेगा..
अपना सपना सच होते देख उसने राहत की साँस ली....

“निम्मी का जाना”
निम्मी तनाव को कम करने की जद्दोजहद में लगी रही। उसे जिंदगी का कोई ओर छोर नहीं मिल पाया। वो सोच रही थी-जिंदगी में कुछ बनने की गरज से ही तो वो गॉव छोड़कर शहर आई थी। नहीं चाहती थी वो अनीता की तरह बदनाम होना। उफ़्फ़ जिससे दामन छुड़ाना चाह रही थी, वो ही उसकी नियति बन गया। 
आज उसकी जिंदगी अनीता के नाड़े की तरह क्यों उलझ गयी। वो नेपथ्य में खोती चली गयी।

"तलाक"
"आज मैं जिंदगी के झमेलों से पूरी तरह आज़ाद हो गया, मुझे मेरी 15 साल की घुटन भरी जिंदगी से मुक्ति मिल गयी।"-इतना कहकर वो दहाड़ा और फुट-फूटकर रोया।
बड़ी बेटी को हॉस्टल छोड़ने का विदारक दृश्य और छोटी बेटी का अस्पताल का कमरा न. 327 उसकी आँखों के सामने तैरने लगे थे।

                              "तमन्ना"

विवेकानंद स्टेचू के पास पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठी सुन्दरी को वो अपलक निहार रहा था..
सुन्दरी ने पलकें उठा एक हल्की मुस्कराहट फैलाई...
वो सकपकाते हुई पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगा.

"जरुरत"

आज दोनों ही दोस्तों का इंटरव्यू था। कितने ही दिनों से जिसका भी इंटरव्यू होता वही एक मात्र पैंट कमीज और काले फीतेदार जुते पहनकर चला जाता। एक ने निर्णय किया, इसे नौकरी की ज्यादा जरुरत है, ये इंटरव्यू दे आएगा. पिता की मौत के बाद दो बहनों की शादी का भार भी इसके ऊपर है। बिना कुछ कहे वह गमछा बांध बाहर चला गया।
दूसरे ने सोचा ये कितना मजबूर है, बूढी माँ की आंख बनवाने तक के लिए पैसे नहीं है। बहाने से बाहर चला जाता हूँ। अभी दातुन लाने गया होगा.. वापिस आकर इंटरव्यू देने चला जायेगा। 
चेहरे पर मुस्कान बिखेर उसने गमछा उठा कंधे पर डाला और खोली से बाहर निकल गया।

“खुदा और गरीबी”
गरीबी उसकी नियति थी..वो दो जून की रोटी नहीं जुटा पाता था. खुदा के करम से रमजान का पाक महिना आ चुका.. उसने पत्नी और बच्चो के साथ रोज़े रखे..ईद के मुबारक रोज़ के लिए उसने कर्ज लिया था.. वो बच्चो को खुश करना चाहता था..
सुबह उसके बच्चे नींद से नहीं उठे.. उसने बेगम को सांत्वना दी--" बेगम हमारे बच्चो को जन्नत नसीब होगी..”

"कामरेड बनाम राष्ट्र्बाद"

दोनों दोस्त टल्ली होकर बात कर रहे थे..समझ नहीं आ रहा था कि टांगों और जुबान में से कौन ज्यादा कौन लडखडा रहा था । "बोलो, गरीब का सोचोगे?" "नहीं भाई, योग करेंगे।" "लालाजी वाला?" "खामोश! सरकार वाला। आखिर तुमने हमें समझा क्या है?" "बात तो एक ही है।" "कॉमरेड लगते हो?" "काम की तो रेड लग गयी जनाब.. भक्त सेना का रंगरूट हूँ।". " ट्रेनिंग में सब गंदा लगता है, बाद में मजे करोगे। बोलो भारत माता की जय!" उसने जय बोलना चाहा लेकिन आवाज हलक में ही घुटी रह गयी।

"कवित्व"
पहला कवि- "यार सुन ये सरकार का अखंड भारत का सपना कभी पूरा नहीं होना चाहिए."
दूसरा कवि- "क्यों भाई उससे क्या फर्क पड़ता है?"
पहला कवि-" देख हमारा तो धंधा चोपट हो जायेगा."
दूसरा कवि-" मैं तो श्रृंगार रस का कवि हूँ..मुझे क्या फर्क पड़ना?"
पहला कवि-" लेकिन मैं वीर रस का कवि हूँ..पाकिस्तान ही नहीं रहा तो हम किस काम के रहेंगे?"
गूढ़ मंत्रणा में दोनों की आँखों में आंसू थे..

"मजहब"
दोनों दिन भर अपने अपने मजहब को श्रेष्ठ साबित करने के लिए महफिलों में सिरकत करते रहे..जितना जहर उगलने को कहा गया, उन्होंने उगला.
शाम को दोनों थके-हारे मिले. देशी के अद्धे से थकान उतार कल तक के लिए रुखसत ली ..

"आहट"
वो अकेली ही लड़ी थी उन 5-5 वहशियों से लेकिन एक बार फिर दरिंदगी जीत गयी थी।
एक हल्की सी आहट में जाग जाने वाली दिव्या आज माँ के विलाप, पिता के रुदन और छोटे भाई की सिसकारियों सबसे बेखर चिरनिंद्रा में सोई थी।

"मुद्दा"
मुलजिम अभी कोर्ट में क्यों नहीं है?"-जज ने बचाव पक्ष के वकील से पूछा।
"वो देश द्रोही था मेलॉर्ड। हमने कोर्ट के बाहर ही उसकी जमकर धुनाई कर दी।"-सरकारी वकील ने कहा।
लेकिन हमने बचाव पक्ष के वकील से पूछा है। "
"इन्होंने भी मेरे बराबार ही कानून की हिफाजत की कसम खाई है।"
"लेकिन , सजा देने का अधिकार तो मुझे है।"
"आप भी तो वही सजा देते। मुद्दा तो राष्ट्रद्रोह है।"

Saturday, 13 January 2018

एक अपाहिज की डायरी (आत्मकथा) दूसरा भाग रचनाकार -- संदीप तोमर

आत्मकथा 

गतांक से आगे............
दूसरा भाग

दादा अपने भाइयों में सबसे बड़े थे..उनसे छोटे ७ भाई और तीन बहने थी। एक बड़े भाई की मृत्यु जवानी में ही हो गयी थी। उनकी दो बेटियां ही थी। खुद की पांच संतान, तीन बेटे और २ बेटियां। दादा ने ७ बच्चों की परवरिश की, ४ बेटियों की शादी भी की। दो बेटे बड़े थे और पिताजी सबसे छोटे। गॉव-गमांड में परिवार को उसके नाम से जाना जाता।लोग गॉव में मेरे परिवार को मुकद्दम कहते। ये एक पदवी थी, इलाके का प्रतिष्ठित परिवार, दादा बेहद ही सीधे इंसान, इनके सीधे होने के चलते बड़े बेटे ने घर की सब सम्पति पर अपना अधिपत्य किया हुआ था। मझले बेटे ने शुगर-मिल में कामदार की जॉब पकड़ ली और खेती-बाड़ी का काम छोटे बेटे के जिम्मे आ गया। उनकी पढाई-लिखाई पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। सब अपने-अपने चक्कर में लगे रहते, पिताजी जब तीसरी क्लास में पढ़ते थे तब से ही उन्हें खेती में लगा दिया गया। किसी तरह पढ़ते रहे.. दसवी क्लास में थे तो मालती देवी यानि मेरी माँ से शादी हो गयी.. फिर यहाँ-वहां नौकरी करते हुए घर का गुजारा करने लगे, जैसे-तैसे नौकरी के साथ प्राइवेट पढ़ते हुए १२वी की तो भविष्य की चिंता होने लगी। माँ खेती का काम देखती। अब बड़े दोनों भाई फसल बटवाने लगे। माँ खेती में पूरा हाथ बटाती, उसे दुःख होता कि मेहनत हम करें और अनाज सबका। प्रिगनेंट रहती तो भी खेती का काम देखती।
माँ का सहयोग न होता तो शायद पिताजी पढ़ भी न पाते। नीलू के जन्म के समय तक वे टीचर ट्रेनिंग कर चुके थे। मेरे जन्म से कुछ दिन पहले ही अध्यापक बने थे। मकान भी बिना किसी के सहयोग के बनाया था।
दादी के बड़े ताऊ के यहाँ जाने के फैसले से पिताजी आहत जरुर हुए थे। लेकिन हिम्मत नहीं हारी थी।
माँ मुझे लेकर डाक्टर के पास जाती। पिताजी स्कूल से आते तो बच्चे भी आ चुके होते। वो स्टोव पर खाना बनाते, सुप्रिया पिताजी को रोटी बनाते देखती तो अन्दर तक दुखी हो जाती, उसने कहा-"पिताजी मैं रोटी बनाउंगी। "
“हाँ बेटी तू बड़ी हो जा, फिर तुझे ही तो ये सब करना है।"-पिताजी आहत मन से कहते।
एक बच्ची उम्र से पहले बड़ी हो रही थी। तीसरी क्लास में आई तो नन्ही अँगुलियों से तवे पर रोटियां सेकने लगी। कच्ची-पक्की रोटियां बनाती, पिताजी बड़े चाव से खाते। बच्ची का हौसला बढता। छोटी होते हुए भी सुप्रिया पर काम की जिम्मेवारी बढ़ने लगी। साफ-सफाई, खाना-बर्तन सब करती। माँ के आने से पहले तक एक भी काम न छोडती। माँ को भी फक्र होता कि मेरे बच्चे कितने नेक हैं। सुकेश जरुर सुप्रिया को तंग करता लेकिन फिर भी सब भाई बहनों में बड़ा प्यार। पिता के अध्यापक होने का दबाव सबके मन पर था। कोई भी गलत काम करने से पहले मन में आ जाए कि एक टीचर के बच्चे हैं लोग क्या कहेंगे? ऐसे ही माहौल में परवरिश हो रही थी।
 मैं अब ५ साल का हो गया लेकिन पेट के बल ही सरकता। हाँ बस इतना सुधार आया कि अब घुटनों के सहारे घिसड़कर जमीन पर चल लेता। मोहल्ले के कुछ बच्चे मेरे दोस्त बन गए। महेश और राजेंद्र मेरे हमउम्र थे तो पहले उनसे ही दोस्ती हुई। छोटे-मोटे खेल खेलते, मेरा दिमाग तीव्र गति से चलता ये बात पिताजी को समझ आने लगी थी। उनका मन कहता कि बच्चा थोडा भी खड़ा होने लगे तो इसे स्कूल भेजा जाये।
सुप्रिया भाई का ख्याल रखती, जिस दिन उसकी छुट्टी होती और माँ को डाक्टर के पास नहीं जाना होता तो सुप्रिया ही मुझे नहलाती और कपडे बदलती।
कोई भी इलाज मुझ पर कारगर नहीं हो रहा था। माँ पिताजी सब परेशान। किसी ने बताया कि बुढाना कस्बे में बस स्टैंड के पास एक देशी वैद है जो इसी तरह के मरीजों का इलाज करता है। इलाज के लिए वहां ले जाने का फैसला किया गया।
एक सुबह पिताजी और माँ मुझे लेकर बुढाना डॉ सुबोध के क्लिनिक पहुंचे। मैं अब बातों को समझने लगा था, बातों का बारीकी से निरीक्षण करता। कहते हैं कि जब किसी का अंग-भंग होता है तो उनकी संवेदना का स्तर बढ़ जाता है और उसकी उस अंग विशेष की ताक़त भी मस्तिष्क में चली जाती है। चुनांचे मेरा मस्तिष्क भी शीघ्रता से  परिपक्व हो रहा था। पिताजी ने मुझे गोद से उतार एक बैंच पर बैठा दिया। डॉ सुबोध ने बताया कि ये लड़का तीन साल में सड़क पर दौड़ेगा और आप यही इसी बेंच पर बैठे हुए देखोगे। उन्होंने कुछ मरीजों से बात करायी। उनके माँ-बाप से बात करायी। जिन्होंने बताया कि हमारा बच्चा भी पेट के बल सरकता था, इसे आज डॉ साहब ने इतना कर दिया कि अब धीरे-धीरे चलने लगा है। मैं ये सब बाते सुन रहा था तो मैंने कल्पना की कि एक दिन मैं भी और सब बच्चो की तरह चल पाउँगा।
इलाज शुरू हो गया था। हर तीसरे दिन डाक्टर बुलाता कुछ अजीब से तेल की मालिश करता और फिर पट्टियों को लपेट देता। पट्टियों के नीचे लकड़ी की खरपच्चिया होती जो मुझे चुभती और परेशान करती। मेरा मन बाहर दोस्तों के साथ खेलने का करता। अब मैं दीवार पकड़ कर थोडा चलने का प्रयास करता। डॉ ने बताया कि इसे एक गडुलना लाकर दो ये उसे पकडकर चलेगा। पिताजी बढई से एक गडुलना बनवाकर ले आये। मैं अब गडुलने की सहायता से चलने का प्रयास करता। हर पंद्रह दिन बाद डॉ सुबोध दोनों पैरों पर प्लास्टर कर देता और फिर दो-तीन दिन उसका चलना फिरना बंद हो जाता। इस इलाज से एक फायदा ये हो रहा था कि अब मैं घर से बाहर कुछ कदम रखता, मुझे अनुभव होता कि दुनिया इस चारदीवारी से भी आगे है। माँ ने पिताजी को कहकर एक हिंदी का कायदा मंगवा दिया और एक स्लेट। अब मेरा स्कूल घर पर ही लगने लगा। मध्यमा पास माँ मुझे क ख ग पढ़ाती, स्लेट पर लिखाती, मेरा कई बार मन नहीं होता तो माँ सख्ती दिखाती। मेरा पढाई में मन नहीं लगता। माँ घर के काम-काज करती तो साथ में पीढ़े पर मुझे बैठा लेती और पढने को कहती। प्लास्टर और पट्टियों के बीच जूझता बालक कैसे पढाई में मन लगाये। क्लास में तो मास्टर का ध्यान ज्यादा बच्चो पर रहता है लेकिन यहाँ तो एक अध्यापक और एक ही छात्र, वो निगाह भी बचाए तो कैसे? माँ सख्ती करने लगी, हिंदी के कायदे का काला पन्ना जो किसी के भी होश उड़ा दे। माँ चाहती कि मुझे वो काला पन्ना कंठस्थ हो। काले पन्ने के लिए मार भी लगती। तब मुझे स्कूल गयी बहन सुप्रिया की याद आती, दीदी घर पर होती तो पिटाई से बचा लेती, मैं दीदी के स्कूल से आने की प्रतिक्षा करता, सुप्रिया स्कूल से आती तो ही मैं खाना खाता।
उम्र बढ़ने से शरीर का वजन भी बढ़ रहा था। माँ डॉक्टर के पास जाती तो रिक्शा न लेकर पैदल ही जाती। सात साल की उम्र के बच्चे को गोद में लेकर चलाना ऊपर से पट्टी और प्लास्टर का भी वजन। माँ मुश्किलों से ढाई-तीन किलोमीटर दूर बस अड्डे तक ले जाती और वहां से बस से बुढाना जाती। अब ये सब जिन्दगी का एक हिस्सा बन गया था।
परिवार से ही एक थे वीरेंदर चाचा जो स्कूल में पढ़ते थे। यशवीर चाचा फ़ौज में थे। लेह में पोस्टिंग हुई। वो फ़ौज से छुट्टी आये तो बादाम और अखरोट लाये। मैं बहुत खुश हुआ, मैने बादाम खाए, अखरोट मुझे पसंद नहीं आये। चाचा जितने दिन छुट्टी आते तो रोज़ मुझसे मिलने आते। मैं बहुत खुश होता, यूँ तो चाचाजी सबको प्यार करते लेकिन मुझे कुछ ज्यादा।
चाचाजी की शादी हुई लेकिन मुझे पट्टियाँ बंधी होने के कारण कोई उसे बारात में नहीं ले गया।  उस दिन बेहद दुखी हुआ, रोता रहा, यशवीर चाचा से बहुत लगाव था, मैं भी बारात में जाना चाहता था, उस शाम खाना भी नहीं खाया। सोचता रहा कि मैं यूँ इस हाल में ना होता तो मैं भी सुकेश भैया और नीलू की तरह नए कपडे पहनता, बारात का खाना खाता, रोते-रोते कब नींद आई होगी पता ही नहीं चला।
एक दिन माँ डाक्टर के पास से मुझे लेकर आ रही थी। रास्ते में वीरेंदर चाचा मिले.. बोले- “भाभी सुदीप को मेरी साईकिल पर बैठा दो, मैं घर ही जा रहा हूँ।”
माँ ने मुझे साईकिल पर बैठा दिया। चाचा साइकिल लेकर चल दिए, अभी गॉव में घुसे ही थे कि देखा कुछ बच्चे शोर मचा रहे थे। साईकिल रोक वो उन्हें देखने लगे। बच्चे एक टिड्डे को पकड़ने के लिए शोर मचा रहे थे। चाचा भी उस मण्डली में शामिल हो गए। टिड्डा मेरी कमर पर आकर बैठा। मैंने जैसे ही उससे डरकर कमर को हिलाया साईकिल ने अपना बैलेंस खोया और साईकिल और मैं दोनों धडाम नीचे। बाए हाथ की कोहनी की हड्डी टूट गयी। चाचा घबराकर भाग गए, सुदीप रोये जा रहा था। माँ आई तो बहुत तमाशा हुआ। चाचा जाकर खेत में छुप गए थे। अब खचेडू चूढ़े को बुलाया गया। उसने सोचा कि कोहनी उतरी है हिला-डुला कर कुछ किया और लुडपुड़ी बनवाकर बांध दी। दर्द के मारे मैं कराहता रहा। अलगे दिन सुबह होते ही पिताजी सुरेश डाक्टर के यहाँ ले गए। हाथ पर भी प्लास्टर बंध गया था।
मैं हाथ और पैर दोनों पर प्लास्टर देख रोता रहता।
माँ चाहती कि मैं पढू। अब हिंदी के साथ-साथ गिनती का भी जोर होने लगा। गिनती मुझे फट से याद हो जाती। देखते ही देखते २० तक के पहाड़े  भी रट गए। छोटे-मोटे गुना भाग जोड़-घटा भी सीख गया। इन सबमें सुप्रिया का मुझे भरपूर साथ मिलता। हाथ का प्लास्टर कट गया था। लेकिन अब कोहनी का मुड़ना बंद, रोज़ गर्म पानी की सिकाई। कभी-कभी सुप्रिया भी झल्ला जाती कि सारा काम मेरे जिम्मे दिन में चार-चार बार सिकाई। छोटी बच्ची ऊपर से काम का इतना बोझ? लेकिन फिर सोचती मेरा भाई है जल्दी ठीक हो जायेगा।
डॉ.सुबोध प्लास्टर के बाद पंद्रह दिन पैर खुले छोड़ देता ताकि जोड़ जाम न हो जाये। पंद्रह दिन फिर पैरों की सिकाई होती और पैर को खोलने के लिए व्यायाम करना पड़ता। मैं एक ही काम रोज़-रोज़ करने से उकता जाता। लेकिन माँ की सख्त हिदायत थी कि ठीक होना है दूसरे बच्चों की तरह चलना है तो ये सब करो।
माँ खेत का काम करती पशुओं का काम करती। मैं घर पर अकेला बोर हो जाता, बसंती दादी अपने दालान में बुला लेती। बसंती दादी और हमारा एक ही दालान था बस बीच में एक दरवाजा लगा था, जो सिर्फ रात में ही बंद होता। दोनों परिवारों का एक ही नल था जिस पर दोनों परिवारों का काम होता था, नहाना-धोना, बर्तन सब। बिजली भी सिर्फ हमारे यहाँ ही थी, रात में दोनों परिवारों के बच्चे वहीँ पढ़ते थे।
इस बीच दादी की तबियत ख़राब चल रही थी.. माँ पिताजी ताउजी के यहाँ जाते.. उनकी सेवा करते। माँ दादी के बाल धोती, कंधी करती उसके कपडे बदलती, कभी सुकेश भैया दादी से मिलने जाते तो दादी उसे ताऊ के बच्चो के कंचे दे देती और कहती मेरे छोटे पोते को दे देना।

एक दिन खबर आई कि दादी मर गयी। उस दिन सब लोग ताऊजी के यहाँ गए। मुझे खाना बसंती दादी ने खिलाया। दादी के अंतिम दर्शन भी नहीं हुए। मैं सोचता रहा कि दादी कहाँ चली गयी, क्या अब दादी फिर उससे मिलने नहीं आएगी।
क्रमशः  

Friday, 12 January 2018

चंद असरार

जब से उनको हमने ख़्वाबों में देखा है ।

बेशूमार प्यार हमने लुटाते हुए देखा है ।।

सर झुका के उन्होंने जब भी सलाम भेजा है ।

झुकी हुअी नजरो में हमने इंतज़ार देखा है।।

मस्त निगाहों से वो शरारत करते हैं अक्सर।

होश वालों से उन्हें तकरार करते  देखा है ।।

गिला- शिकवा भी क्या करना अब उम्र भर।

अमीरों को भी  दौलतें अक्सर माँगते देखा है ।।

अदना सा है अपना इश्क देख लो "उमंग"।

जीतकर जमाना हमने आशिक हारते देखा है।।

संदीप तोमर

Thursday, 11 January 2018

मैं संपादक बन गया-2 / लघुकथा

संदीप तोमर/"मैं संपादक बन गया-2 /लघुकथा

वह नौकरी से रिटायर हुआ था, रिटायरमेंट के पैसा मिल चुका था। उसे प्रकाशन और सम्पादन का भूत सवार हुआ। लिखता तो वह पहले से ही था। 

देवेश ने उसे सुझाव दिया था कि साझा संकलन निकाले। नवोदित छपने की एवज में अपनी एक- एक प्रति तो खरीद ही लेंगे।
उसने अपने मित्र देवेश की बात मानते हुए धड़ाधड़ कई संकलन निकाल दिए। अपने नाम से प्रकाशन विभाग भी रजिस्टर्ड करा लिया था।
पुस्तक मेले में कर्ज लेकर एक स्टॉल भी बुक कर लिया। बिक्री के लिए दो लड़के भी पगार पर रख लिए। आज पुस्तक मेले का आखिरी दिन है और उसे दूर-दूर तक ग्राहक नहीं दिख रहे हैं। खुद उसका दोस्त देवेश भी अपनी मंडली के साथ किताबें खरीदने नहीं आया। पंद्रह-बीस लेखक तो हुज्जतबाजी करके लेखकीय प्रति तक उससे झटक कर ले गए।
वह आँखों के सामने पड़ी किताबो की खेप की देख रहा था। कर्ज़ के बढ़ते सूद का खयाल उसे उद्वेलित करने लगा। 

मैं संपादक बन गया"-१ /लघुकथा

संदीप तोमर/"मैं संपादक बन गया"/लघुकथा

अखिल और देवेश पक्के दोस्त थे।दोनो ही लिखने के शौकीन।लेकिन एक बात थी लिखने से उन्हें कुछ खास मिल नहीं रहा था जिससे घर- बार चल सकता।देवेश तो जैसे- तैसे दाल रोटी का जुगाड़ कर लेता, अखिल के यहां हर दिन चौमास का दिन था।
आज दोनो दोस्त भविष्य की योजना बनाने के लिए बैठें हैं। देवेश ने कहा-" मेरे पास एक योजना है।वारे के न्यारे हो जाएंगे। समझ ले तेरा काम बन गया।"
" ठीक है बता क्या स्कीम है तेरे पास?"
"हम अलग-अलग विधाओं पर साझा संकलन निकालते हैं। अब हर कोई छपना चाहता है।"
"छपना तो चाहता है लेकिन हजार- पांच सौ रुपये कोई देना नहीं चाहता। फिर पैसा कहां से लगेगा?"
"उसका भी इलाज है, मेरा एक दोस्त प्रकाशक है, अठारह हज़ार रुपये में तीन सौ प्रतियां छाप देगा। हम लेखक से कुछ नहीं लेंगे। सौ लोगो की एक-एक पन्ने की रचना लेंगे। तीन सौ रुपये मूल्य भी रखा तो लेखक को तीस प्रतिशत की छूट पर हमने दो सौ दस में लेखक को बेच देनी है।अब जो छपा है वो अपनी रचना की प्रति अपने पास तो रखेगा ही न।लेखकों से ही इक्कीस हजार आ गया। बाकी बची 200 प्रतियों से सौ का मुनाफा हमारा, बाकी सौ का प्रकाशक का।"
"अरे वाह इसे कहते हैं- हल्दी लगे न फिटकरी रंग भी चौखा होए।"
अखिल की आंखों में चमक आ गया थी।

Wednesday, 10 January 2018

संदीप तोमर/ “अब सांस नहीं ली जाती”/ एक लघु सी कथा


“अब सांस नहीं ली जाती”


पलाश अब हमेशा खुश रहने का प्रयास करता, वह पहले की तरह पत्नी के प्रति रुखा व्यवहार नहीं करता था। न ही गुस्सा ही करता। जहाँ पहले वह आफिस के काम के बोझ के चलते झल्ला पड़ता था अब वह एकदम फ्री  माइन्ड रहने की कोशिश करता।
पत्नी उसके इस व्यवहार से हैरान थी साथ ही संसयित भी। पत्नी रोज की गतिविधि पर नजर रख रही थी। वह रोज किस-किस से कब फोन पर बात करता है, कितना समय मोबाइल और लैपटॉप पर देता है आदि आदि।
आज सुबह जैसे ही वह नहाने के लिए बाथरूम में घुसा था, पत्नी ने उसके पूरे मोबाइल को कंघाल दिया था। हर आशंका से बेखबर वह पहले ऑफिस गया फिर उसे ध्यान आया- रात का सीने का भयानक दर्द, वह सीट से उठा और अस्पताल की ओर चल दिया।
अस्पताल के परिसर में घुसा ही था कि कंचन से मुलाकात हो गयी।
"
पलाश तुम यहां कैसै?"
"
कल रात सीने में कुछ प्रोब्लम थी तो चेकअप कराने आया था।"-उसने नपातुला जवाब दिया।
"तुम आजकल मुझसे दूरी क्यों बनाये हो? क्या मैं तुम्हें जबर्दस्ती बांधती हूँ?"- कंचन ने कहा।
“नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है।“-पलाश बोला।
“ अच्छा सुनो, आज तुम्हारे घर में कुछ बात हुई क्या?”
“नहीं, कुछ भी तो नहीं।“
"आज तुम्हारी पत्नी का मेरे मोबाइल पर कॉल आया था, उसने मुझको गाली देकर जलील किया, मैं चुपचाप सुनती रही, बोली- तुम्हारे पति के सामने तुमको एक्सपोज करुँगी।"
“ओह उसने ये सब किया, मुझे अफ़सोस है।“
"हाँ पलाश, इस प्रेम को कोई समझ नहीं सकता, जो मुझे धमकी दे सकती है वह कल तुम्हें भी सबके सामने बेज्जत कर सकती है?”
“हाँ, कंचन, मैं तो अब घर में शांत ही रहता हूँ, मैंने जीने के तरीके ढूंढ लिए हैं।“
“मैं समझ सकती हूँ तुम कितना सहन रहे हो, इसलिए शायद मुझे तुमसे दूर हो जाना चाहिए।"
"
मै तो रोज ही उसके तीखे बाणों को झेलता हूँ। तुम भी दूर हो जाओगी तो कैसे जी पाऊंगा?"
कंचन की ऑंखें डबडबा रही हैं.... वह वार्ड की ओर बढ़ चली, पीछे-पीछे पलाश चल रहा है। वह वार्ड के अन्दर जाकर एक कमरे की ओर बढ़ी, जिसमें दो बेड लगे हुए हैं। वह पहले बेड के पास जाकर रुक गयी। पलाश कुछ भी समझ पाने की स्थिति में नहीं है। बेड पर लेटा युवक ऑंखें बंद किये है, कई मशीने उसके शरीर पर लगी हैं, आक्सीजन मास्क भी लगा है। ह्रदय गति के ग्राफ बहुत डगमगाया है।
तभी पलाश ने पूछा-“ ये कौन हैं? आप तु यहाँ कैसे?”
“पलाश ये मेरे पति हैं, कैंसर की लास्ट स्टेज में हैं। शायद ही..... ।“
“लेकिन तुमने तो मुझसे हमेशा कहा कि तुमने शादी नहीं की।“
वह कुछ जवाब देती इससे पहले एक कर्कश आवाज उसके कानों में गूंजी-“ पलाश तुम तो ऑफिस गए थे फिर यहाँ?”
पलाश ने पीछे मुड़कर देखा, यह उसकी पत्नी की आवाज थी, वह मन ही मन बुदबुदाया-“ कंचन का पति... आक्सीजन नली से सांसे ले रहा है और मेरी नली पर तुम पैर जमाये खड़ी हो, जब चाहो पैर हटा दो, जब चाहो दबाव बढ़ा दो।“


फेक आईडी नहीं, फेक इरादे

  फेक आईडी नहीं , फेक इरादे सन्दीप तोमर  किसी कार्यक्रम में एक महिला से मुलाकात हुई। औपचारिक-सी बातचीत हुई। जाते-जाते उन्होंने मुझसे कांटे...