Wednesday, 13 May 2015

देखते हैं.... कविता

देखते हैं-संदीप तोमर 


तुम पर क्या जोर चलता बहलने के लिए 
दिल का एक कोना चाहिए टहलने के लिए 
कायनात का क्या करें सनम 
हाथ दो ही काफी है कस कर पकड़ने के लिए
क्यों रोज़ रोज़ डराते हो रूठ कर
धमाका एक ही काफी है जमीन दहलने के लिए......
यूँ भी तो होती है इज्जत तार तार
दो गज कपडा ही दे दो पहनने के लिए
तुम्हे अक्सर रुठने की अदा निराली
कैसे हुनर पैदा करें तुझे रोज़ मनाने के लिए
कितने रोज़ उधार मांग कर लाये
जितने भी लाये गुजार दिए ज़माने के लिए
जब ख्वाहिस हो चले आइये मेरे हूजुर में
सजा रखा है तख़्त-ओ-ताज जनाज़े के लिए
हम मोहब्बत के बाग़ सजाये दिल में "उमंग"
देखते है कौन आता है इसे उजाड़ने के लिए

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