बिगाड़ के डर से--- पुरस्कार और कहानी लेखन
पिछले वर्ष गाजियाबाद एक कहानी की वर्कशॉप में बोलने का मौका मिला तो मैंने कहानी विधा की एक लम्बी विकास यात्रा की बात करते हुए कहा था - कहानी अब पुराने घिसे–पिटे विषयों से कहीं आगे का सफ़र तय कर चुकी है। कहानीकार अपने समय की नब्ज को पकड़े और वहाँ से कहानी के विषय लेकर कहानी लिखे। हाल-फिलहाल कुछ कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता है कि कुछ लेखक तो भाषा के स्तर पर खूब मेहनत कर रहे हैं, अत्यधिक क्लिष्ट और सुसंस्कृत भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो भाषा के स्तर पर सोचते ही नहीं कि वे क्या लिख रहे हैं? नरेशन हो या संवाद - उनकी बहुत लचर भाषा होती है। अधिकांश कहानीकारों की यह भी दिक्कत है कि वे प्रवचन की मुद्रा में आकर कहानी के मूल रूप को भूल बैठते हैं। उस कार्यक्रम में विनय विक्रम सिंह की कहानी के हवाले से मैंने कहा था - “भाषा का अपना सौन्दर्य है, किंतु जब कहानीकार अति-चित्रात्मक और कीमियागिरीपूर्ण लेखन करता है या हर वाक्य में रचनाकार का सजग सौन्दर्यबोध झलकता है तो कथा का शिल्प कथा की गति को रोक देता है... ऐसी कहानियों में कहानी का वातावरण, भाषा और संवेदना की गहनता तो होती है— पर ऐसे कहानीकार अपने समय से संवाद नहीं कर पाते। लेखक एक सुंदर, पर नॉस्टैल्जिक संसार रचता है, जहाँ गरीबी भी गरिमामय है और अभाव भी कलात्मक। किंतु यह यथार्थ नहीं, यथार्थ का सौंदर्यीकृत पुनर्निमाण है। आज के दौर में जहाँ कला, धर्म और आजीविका का मिश्रण नए आयाम ले रहा है, वहाँ ऐसी कथाएँ पुराने मिथकीय आग्रह, लेखक के निजी पूर्वाग्रहों में फँसी प्रतीत होने लगती हैं।”यही बात मुझे कुणाल सिंह की कहानी “विसर्जन” को पढ़कर महसूस हुई थी। विसर्जन को पढ़कर मैंने एक लम्बी टिप्पणी उन्क्त वेब पोर्टल को लिखी थी, लेकिन उन्होंने उक्त टिप्पणी को प्रकाशित नहीं किया।
नवम्बर २०२५ में अंजू शर्मा की कहानी को प्रसिद्ध कथा यूके का इंदु शर्मा कथा सम्मान दिया गया। यह एक निष्पक्ष चयन प्रक्रिया वाला सम्मान है। ऐसा दावा किया जाता है। मन में उत्सुकता हुई कि चुनी गई कहानी पढ़ी जाए... कहानी को पढ़कर लगा कि एक बेहद मजबूत थीम पर बेहद लचर कहानी लिखी गई है। इसमें टर्निंग पॉइंट्स, ड्रामा-टेंशन-रिलीज़ और भावनात्मक ज्वार के बीच ज्वलंत समन्वय को और कसावट की जरूरत है, ऐसा मुझे महसूस हुआ। कहानी में दो संघर्ष हैं— पहला समाज बनाम राधे, दूसरा राधे का प्रेम बनाम उसकी स्त्रीरूप पहचान। कहानी में इनका संतुलन नहीं दिखा। कहानी प्रेम वाली लाइन को छूकर छोड़ देती है; वह arc विकसित नहीं हो पाती। राधे की आंतरिक यात्रा भी आधी-अधूरी रह जाती है— उलझन दिखती है, पर resolution या breakdown नहीं आता।
भगतजी की मृत्यु कहानी का असली pivot है, पर प्लॉट को यहाँ चरम तक ले जाना चाहिए था, लेकिन कहानीकार ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं है। कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी मुझे यह लगी कि राधे का मनोवैज्ञानिक द्वंद्व पूरी तरह articulate नहीं हुआ; climax तक भी उसकी growth या fall स्पष्ट नहीं हो पाता। चंदा सबसे महत्वपूर्ण भावनात्मक धुरी बन सकती थी, पर उसका किरदार कथा में कोई आयाम नहीं पाता। चंदा–राधे का रिश्ता केवल संकेत में है; इसमें संभावित tragedy या forbidden love का भारी material है, जिस पर काम होना चाहिए था। कहानी में लंबे संवाद में लेखक ने दो-चार शब्द शुरू में और दो-चार ही अंत में ब्रज भाषा के लिखकर बताया है कि ये संवाद ब्रज भाषा का ज्ञाता दर्शाने के लिए ठूंसे भर हैं; लेखक खुद ब्रज भाषा लिखने में सिद्धहस्त नहीं है। एक ही वाक्य में संस्कृत-निष्ठ हिन्दी, ब्रज और उर्दू का घालमेल भी दिखता है।
कथा में वर्णन बहुत है, घटनाएँ कम। आंतरिक संघर्ष की भाषा कवितामयी है, पर analytical depth कम है या न के बराबर। कई बार कहानी जर्नल की तरह लगने लगती है, फिक्शन की तरह नहीं। अगर समाजशास्त्रीय परतों पर बात की जाए तो हम पाते हैं कि यह कहानी असल में जेंडर–द्वैत का विघटन दर्शाती है। राधे की देह और मन अलग-अलग दिशाओं में खिंचते हैं— यह trans-feminine या gender-fluid identity की ओर संकेत करता है, पर कहानी इसे सिर्फ अभिनय की परिणति मानती है।
कहानी में— Conflict है (समाज vs कला vs पहचान), Build-up भी है (दुविधा, तंज, प्रेम, कला, गिरावट), पर Climax या Resolution नहीं है (राधे किस ओर जाता है? टूटता है? लड़ता है? समर्पित होता है? स्वीकारता है? खो देता है?) यह “आख्यान-पूर्णता” की सबसे बड़ी कमी है।
कहानी को बेहतर बनाने के लिए ठोस प्रेम–रेखा विकसित की जानी चाहिए थी। चंदा का arc कहानी को भावनात्मक ऊँचाई दे सकता है। जैसे— क्या वह राधे का प्रेम स्वीकार करती या अस्वीकार? समाज उसे कैसे देखता? क्या यह प्रेम राधे का उपचार बनता है या और घाव? राधे का मनोवैज्ञानिक संघर्ष गहरा किया जाना चाहिए था— जिसमें identity crisis, अपनी देह से संघर्ष, कला vs समाज, प्रेम vs वास्तविकता, आत्मसम्मान vs भूख इत्यादि को ध्यान में रखा जाता।
बहरहाल, यदि निर्णायकों ने इस कहानी को कथा सम्मान के लिए चुना है तो उनकी अपनी आलोचनात्मक, पाठकीय दृष्टि है, लेकिन यहाँ यह सवाल अवश्य खड़ा होता है कि निर्णायकों में कितनी निष्पक्षता होती है? वे किसी कहानी को किस कसौटी पर कसते हैं? उनके अपने पुरस्कारों के अपने मानक क्या हैं? मुझे लगता है कि कहानीकार की विचारधारा निर्णायकों और आयोजकों से कितनी मिलती है, यह भी चयन का एक महत्वपूर्ण घटक हो सकता है। शॉर्टलिस्ट किए जाने का भार जिनके ऊपर होता है, उनके आपसी रिश्ते भी कई बार चयन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि ऐसा हो ही, यह मेरा अनुमान भर भी हो सकता है। आवश्यक नहीं कि किसी निष्पक्ष आलोचना की पुरस्कारों के लिए कथाओं के चयन से कोई तारतम्यता हो।
बहरहाल, यह सब मेरी चिंता का विषय नहीं है। अभी हाल ही में सन्निधि ने अनीता प्रभाकर कहानी प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कारों के साथ ही कुछ सांत्वना पुरस्कारों के नामों पर मेरी नजर गई, जिनमें एक घोर सांप्रदायिक नाम के साथ ही डॉ. रंजना जायसवाल का भी नाम था। अभी कुछ दिन पहले एक नवोदित लेखिका ने चर्चा के समय कहा— डॉ. रंजना जायसवाल आजकल बढ़िया कहानियाँ लिख रही हैं... ।
आजकल पैर की चोट के चलते इधर-उधर जाना लगभग बंद रहा, और कार्यक्रमों में जाना तो एकदम बंद है।बहराल घर से ही साहित्य का पठन-पाठन चल रहा है।
संयोग ही है कि कल ही एक साहित्यिक पत्रिका मिली, जिसमें सबसे पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त अपनी प्रिय लेखिका ममता कालिया की कहानी पढ़ी, उसके बाद डॉ. रंजना जायसवाल की कहानी पढ़ी।
कहानी का शीर्षक है— “भालचंद्र डिब्बे वाला”। पत्रिका के ढाई पृष्ठ कहानीकार ने निःसंदेह खराब कराए हैं, जिनमें किसी लेखक की एक कहानी का पूरा स्पेस मिल सकता था। ये वो ढाई पृष्ठ हैं, जिनकी कहानी में कोई आवश्यकता मुझे नहीं लगी।
ढाई पृष्ठ पढ़ने के बाद मेरे अंदर का पाठक भाषा का स्तर देख बेचैन हो उठा।
“हम खानाबदोशों के ठिकाने का कोई पता कहाँ होता है न?” (पृष्ठ-२२)
सामने दरवाजे के दाहिने तरफ उसके नाम की नेम प्लेट चमक रही थी (पृष्ठ-२२)
मेज पर उसके नाम की नेम प्लेट रखी थी पृष्ठ-२२)
रिवलिंग चेयर पर बगुले सी सफ़ेद और मुलायम सफ़ेद तौलिया रखी हुई थी(पृष्ठ-२२)
बैंक की तरफ आते वक्त उसने एक डिब्बे वाले को देख था (पृष्ठ- २३)
अरविन्द जी के पीछे-पीछे पूरा कुनबा भी चल आया था (पृष्ठ-२३)
नौ जवानों और अधेड़ कर्मचारियों के एक कुनबा उनके चैंबर में बिखर चुका था (पृष्ठ-२३)
तब तक स्थान्तरण के एक पत्र (पृष्ठ-२३)
इमारतें अब उसे उतनी अपरिचित नहीं लग रहे थे (पृष्ठ-२३)
यहीं-कहीं आस-पास डब्बे वाले भाऊ (पृष्ठ-२३)
भाऊ डब्बे वाले का काम करते थे (पृष्ठ-२३)
उनके जैसे पांच हजार हजारों लोग इस शहर में डब्बे वाले का काम करते थे (पृष्ठ-२३)
पृष्ठ २४ पर पहचानने के लिए हुलिया का वर्णन करते हुए कहानीकार लिखती हैं- बहत्तर किलो वजन, खिचड़ी बाल, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर का पेशेंट, डबल चिन और तोंद वाले राजीव को पहचानना मुश्किल तो था पर नामुमकिन तो नहीं... (मुझे समझ नहीं आया कि पहचान के लिए डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर कैसे झलक जाता है? ये शरीर के अन्दर की बीमारी हैं या बाहर से दिखने वाली?)
प्यार की दो छींटे क्या पड़ी (पृष्ठ-२४)
वक्त की मार से वो चश्मा भी अब चोटहिल हो चुका था (पृष्ठ-२४)
उन्होंने बुढ़ापे में झुक गयी कमर की तरह झुक आई चश्में की डंडियों को सूती धागे से बांधकर सीधा कर साध दिया था (पृष्ठ -२४)
बूढ़ी हो गयी हो तेरी ताई... जब देखो किड़-किड़ करती रहती हो (पृष्ठ-२६)
उन्होंने अपनी झुर्रीदार हाथों से उसके हाथों को अपने हाथों में ले लिया (पृष्ठ-२६)
दरिया बह निकलने को बहाने ढूढ रहा था(पृष्ठ-२६)
वे बारिश के हल्के दबाव से मिट्टी के बाहर अपने झरोखों से बाहरी दुनियाँ को झाँकने लगे हैं (पृष्ठ-२६)
दर्द बादलों के माध्यम से धरती पर टप-टप टपक रहा था (पृष्ठ-२६)
कहानी में इन वाक्यों को पढ़कर लगा कि कहानीकार आखिर किस तरह की नई भाषा गढ़ रहा है? क्या यह नव-व्याकरण है या फिर नई वाली हिंदी के भाषिक प्रयोग?
इसी संदर्भ में एक और हालिया प्रसंग याद आता है। हाल ही में पाकिस्तान में एक स्कूल में हुई घटना को मीडिया में काफी कवरेज मिला—एक स्कूल की प्रधानाचार्या ने अपने चपरासी के चाय पिलाने के स्टाइल से प्रभावित होकर उसके साथ निकाह कर लिया। चूँकि खबर बहुत वायरल हुई, तो शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इस खबर से परिचित न हुआ हो। एक लेखक महेन्द्र तिवारी ने उस घटना पर कहानी लिखी, जिसे जनसत्ता अखबार ने प्रकाशित किया।
जब मैंने ये कहानी साहित्य किंज के व्हाट्सएप ग्रुप में पढ़ी तो मैंने लिखा— “ये पूरी अखबार की खबर है। उसे कहानी बनाकर लिख दिया गया बस।”
कहानीकार का तर्क था— “तो कहानी भी एक घटना ही होती है सर। अगर रिपोर्टिंग लिखी जाती तो कहानी कैसे कहलाती? धुरंधर फिल्म की कहानी को आप क्या कहेंगे? आप कहेंगे कि धुरंधर भी मौलिक नहीं है?”
फिर किसी महाशय की टिप्पणी थी— “सच्ची घटनाओं पर कहानियां लिखी जाती हैं। और पहले भी लिखी जाती रही हैं। उसमें कहानीपन होना चाहिए।”
मैंने अपनी बात रखते हुए कहा— “लेखक की मौलिकता वहां होती जहां वह पात्रों के आंतरिक भावों को पाठक के सामने रख दे। उसके भीतर के द्वंद्व को बाहर निकाल दे। कुल मिलाकर कहानी घटना भर न हो। अमीना बेगम ने चपरासी से शादी क्यों की? पूरी कहानी इस पर केंद्रित होनी चाहिए। इसी बात की पड़ताल करें तो?”
मैंने उस घटना की खबर के कुछ लिंक शेयर किए, तो जवाब मिला— “रिपोर्टिंग में यह दिखाया गया है कि उसके चाय रखने के सलीके से प्रभावित होकर प्रिंसिपल मैम चपरासी से निकाह कर लेती है। लेकिन कहानीकार बाह्य कारकों से निकाह नहीं करा सकता है। साहित्यकार उसके अंदर की फीलिंग को बाहर निकालने का काम करता है। तभी वह साहित्यिक कृति बन पाती है। आपने इसमें प्रयास तो किया है पर संवेदनाओं पर कुछ घटनाएं हावी दिख जाती है। खैर इससे कहानी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। यह कहानी ही है और इसे महेंद्र तिवारी की कहानी कहा जाएगा।”
मेरा मत था— “रिपोर्टिंग को कहानी में बदलने को मौलिक रचना कैसे कहा जा सकता है? कहानी कहे जाने पर सवाल नहीं है, सवाल मौलिकता पर है। मौलिकता यानी नया दृष्टिकोण (vision), न कि केवल नया कथानक (plot)।”
लेखक का तर्क था— “आपके अनुसार उसमें मौलिकता यानि नया दृष्टिकोण नहीं है? पहले तो ये बोल रहे थे कि कहानी मौलिक नहीं है। अब कह रहे हैं कि नया दृष्टिकोण नहीं है। आप कहानी पर सवाल खड़े नहीं कर रहे, आप तो जनसत्ता की स्तरीयता और उसके संपादक पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। यह आवश्यक नहीं कि हर कहानीकार आपके दृष्टिकोण से ही कहानी लिखे।”
मेरा स्पष्ट मानना है कि कहानीकार को कहानी से इतना मोह नहीं होना चाहिए कि वह कहानी के डिफेंस में तर्क करने लगे।
कहानीकार ने कहा- आप तो जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित अखबार पर ही सवाल खाद आकार रहे हैं?
मुझे लगता है कि कोई अखबार, कोई पत्रिका, कोई लेखक, कोई रचना आलोचना से परे नहीं हो सकते।
एक महोदया उनके पक्ष में तर्क देती हैं— “कहानियां, कविताएं सभी आसपास घटी घटाओं, आप बीती या जग बीती से ही निकलती हैं। यदि यह घटना स्वयं देखी होती या किसी से सुनी होती, उसकी रिपोर्टिंग न होती तो इस कहानी को मौलिक कहा जाता, यदि रिपोर्टिंग हो गई तो, कहानी मौलिक नहीं हुई? यह समाचार हजारों ने पढ़ा होगा, कितनों ने कहानी में ढाला?”
मुझे कहना पड़ा— “यानी अब मौलिकता को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। समाचार या रिपोर्टिंग पर कहानी लिखी जा सकती है। इससे मुझे कोई गुरेज नहीं है। लेकिन मेरा सवाल मौलिकता को लेकर था। कथानक का स्रोत चाहे कहीं से भी हो (खबर, लोककथा, इतिहास), यदि लेखक उसमें नया अर्थ, नया संवेदनात्मक अनुभव और रचनात्मक पुनर्संरचना देता है, तो वह रचना मौलिक मानी जाएगी। लेकिन यदि कहानी केवल खबर का विस्तार भर है—अर्थात घटनाक्रम वही है, पात्रों में कोई गहराई नहीं जोड़ी गई, और लेखक का दृष्टिकोण नया नहीं है—तो उसे ‘रिपोर्टाज’ या ‘रूपांतरण’ तो कहा जा सकता है, लेकिन पूरी तरह मौलिक कहानी नहीं।”
यही वह बिंदु है जहाँ समूची बहस आकर टिकती है—चाहे वह पुरस्कार प्राप्त कहानियाँ हों या अख़बार में छपी चर्चित रचनाएँ। सवाल सिर्फ भाषा या कथानक का नहीं है, बल्कि उस रचनात्मक ईमानदारी का है, जो किसी भी साहित्यिक कृति को “घटना” से “कहानी” बनाती है।
आख़िरकार प्रश्न सिर्फ एक कहानी या एक लेखक का नहीं है, बल्कि उस समूची साहित्यिक व्यवस्था का है जहाँ भाषा की बुनियादी शुद्धता, कथ्य की आंतरिक सच्चाई और शिल्प की ईमानदारी की जगह अक्सर संबंधों, विचारधारात्मक निकटताओं और दिखावटी प्रभावों को तरजीह मिलने लगती है। यदि कहानी अपने समय की संवेदना को सटीक भाषा और प्रामाणिक अनुभव के साथ व्यक्त नहीं कर पा रही, और फिर भी वह पुरस्कारों से नवाज़ी जा रही है, तो यह केवल एक रचना की विफलता नहीं, बल्कि चयन-प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न है।
साहित्य में असहमति स्वाभाविक है, दृष्टियाँ भिन्न हो सकती हैं, परंतु भाषा की लापरवाही और शिल्प की कमजोरी को ‘नवाचार’ का नाम देकर प्रतिष्ठित करना अंततः साहित्य के साथ ही अन्याय है। जरूरी यह है कि हम रचना को रचना की कसौटी पर परखें— न कि रचनाकार के प्रभाव, परिचय या प्रचलित धारणाओं के आधार पर। वरना वह समय दूर नहीं जब कहानी अपने मूल स्वभाव— जीवन के सत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति से भटककर एक औपचारिक अभ्यास मात्र बनकर रह जाएगी।
सन्दीप तोमर (कथाकार, आलोचक)
नई दिल्ली
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