Thursday, 7 May 2026

सीरिज == बिगाड़ के डर से... जानकी पुल पर एक कहानी पढ़ी-- कहानी पर मेरी राय---

 बिगाड़ के डर से...


जानकी पुल पर एक कहानी पढ़ी-- कहानी पर मेरी राय---
सुधा ॐ धींगरा की कहानी ‘अंतर्नाद’ अपने विषय के कारण पहली नज़र में महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है। बलात्कार, स्त्री-अस्मिता, मीडिया-ट्रायल, पितृसत्ता और स्त्री की आत्मप्रतिष्ठा जैसे प्रश्न निस्संदेह हमारे समय के बड़े प्रश्न हैं। लेकिन किसी गंभीर विषय का चयन मात्र किसी रचना को प्रभावशाली नहीं बना देता। साहित्य का मूल्यांकन अंततः उसके कलात्मक निर्वाह, शिल्प, भाषा, चरित्र-निर्माण, अंतर्विरोधों की विश्वसनीयता और कथ्य की आंतरिक संगति के आधार पर होता है। इसी कसौटी पर ‘अंतर्नाद’ एक अत्यंत कमजोर, असंतुलित और कई स्तरों पर सतही कहानी बनकर सामने आती है।
सबसे पहली समस्या कहानी के शिल्प की है। पूरी कहानी वस्तुतः एक लंबे भाषण में बदल जाती है। यह कहानी कम और मंचीय वक्तव्य अधिक लगती है। कथानक, दृश्य, परिस्थितियाँ, संवाद, पात्रों के बीच का तनाव — सब कुछ अनुपस्थित है। नायिका लगातार बोलती जाती है और लेखक उसकी आवाज़ में अपने विचार ठूँसता जाता है। कहानी में कथा-संरचना का विकास नहीं है, बल्कि एक विचारधारात्मक मोनोलॉग है जो पचासों पन्नों तक फैला हुआ है। साहित्य में विचारों की उपस्थिति बुरी नहीं होती, लेकिन जब विचार पात्रों की स्वाभाविकता को खा जाते हैं, तब रचना घोषणापत्र बन जाती है। ‘अंतर्नाद’ इसी संकट की शिकार है।
कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी नायिका मोहिनी देशमुख का चरित्र है। लेखिका उसे एक साथ कई विरोधी रूपों में प्रस्तुत करना चाहती हैं — वह अत्यंत आधुनिक, आत्मनिर्भर, एआई कंपनी चलाने वाली, कॉर्पोरेट दुनिया की सफल महिला भी है; साथ ही इतनी भावुक, असावधान और मानसिक रूप से निर्भर भी कि एक साधारण भावनात्मक जाल में फँसकर अपने पिता की करोड़ों की कंपनी और बैंकिंग ढाँचे को लगभग किसी अजनबी युवक के हवाले कर देती है। यह विरोधाभास स्वाभाविक नहीं बन पाया।
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक की एक कॉर्पोरेट महिला, जो प्रोजेक्ट्स, बैंकिंग, साझेदारी और कंपनी संचालन समझती है, वह अपने पार्टनर के बारे में लगभग कुछ नहीं जानती — यह बात अविश्वसनीय लगती है। कहानी में बार-बार कहा गया है कि वह “टॉपर” थी, “आत्मनिर्भर” थी, “एआई कंपनी” की संस्थापक थी; लेकिन उसके निर्णयों में परिपक्वता का एक भी संकेत नहीं मिलता। वह प्रेम में है, इसलिए सब कुछ भूल जाती है — यह तर्क हिंदी फिल्मों में चल सकता है, गंभीर कथा-साहित्य में नहीं।
उदाहरण के लिए यह अंश देखिए—
“मेरा परिवार बहुत आदर्शवादी थी। मैं भी परिवार की आन, बान, शान में नहीं जीना चाहती थी, स्वयं मेहनत करके कुछ बनना चाहती थी। पढ़ाई में मैं टॉपर थी। कोई जान नहीं पाया था कि मैं समृद्ध परिवार से हूँ। रमन उसका नाम है…”
यहाँ भाषा और विचार — दोनों स्तरों पर भारी असावधानी दिखाई देती है। “मेरा परिवार बहुत आदर्शवादी थी” जैसी बुनियादी व्याकरणिक त्रुटि चौंकाती है। “रमन उसका नाम है” जैसी संरचना भी बेहद असहज है। आगे “सेल्फ सपोर्टेड लड़कों” जैसी अभिव्यक्तियाँ कहानी की भाषा को हिंदी और कॉर्पोरेट जार्गन के बीच झुलाती रहती हैं। ऐसा लगता है कि लेखिका भाषा के भीतर नहीं, भाषा के ऊपर खड़ी होकर उसे धकेल रही हैं।
इसी अंश में नायिका कहती है कि वह किसी को यह नहीं जानने देना चाहती थी कि वह समृद्ध परिवार से है, लेकिन आगे पता चलता है कि उसका परिवार इतना प्रभावशाली है कि बैंक लोन, कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स, सिक्योरिटी नेटवर्क, पुलिस, कानूनी टीम — सब कुछ तत्काल सक्रिय हो जाता है। यहाँ कहानी की आंतरिक संगति टूटती है। लेखिका सुविधानुसार पात्र को कभी साधारण लड़की बना देती हैं, कभी सर्वशक्तिमान कॉर्पोरेट उत्तराधिकारी।
कहानी की दूसरी बड़ी समस्या उसका अतिनाटकीयपन है। हर घटना चरम पर घटती है। रमन सिर्फ स्वार्थी नहीं, बल्कि बलात्कारी, धोखेबाज़, फ्रॉड करने वाला, हत्या की योजना बनाने वाला, मीडिया-मैनेज करने वाला खलनायक है। दूसरी ओर नायिका लगभग हर स्तर पर पीड़िता होते हुए भी अंततः नैतिक विजेता के रूप में खड़ी होती है। इस तरह का द्वैत साहित्य को कमजोर करता है क्योंकि वास्तविक जीवन में मनुष्य इतने एकरेखीय नहीं होते।
कहानी में मीडिया की आलोचना भी बेहद सतही और सुविधाजनक है। मीडिया को लगभग सामूहिक खलनायक की तरह चित्रित किया गया है। लेकिन कहीं भी कोई विशिष्ट संदर्भ, समाचार-तंत्र की जटिलता, वर्गीय विमर्श या जनमत की संरचना नहीं आती। सब कुछ नारे की तरह कहा गया है। लेखिका जिस विषय को उठाना चाहती हैं, वह गंभीर समाजशास्त्रीय समझ की माँग करता है, लेकिन कहानी उसे भावुक आक्रोश तक सीमित कर देती है।
सबसे अधिक आपत्तिजनक बात यह है कि कहानी कई जगहों पर स्त्री-विमर्श को जैविक शुद्धता के बेहद कमजोर और खतरनाक तर्कों तक ले जाती है। उदाहरण के लिए यह अंश—
“नारी तो कभी मैली होती ही नहीं। कुदरत ने उसे बनाया ही इस तरह का है, कि हर माह माहवारी उसे भीतर से साफ़ कर देती है…”
यह कथन न सिर्फ वैज्ञानिक रूप से हास्यास्पद है, बल्कि स्त्री-अस्मिता की पूरी बहस को शरीर की “शुद्धता” और “मैलेपन” के पुराने ढाँचों में वापस धकेल देता है। स्त्री की गरिमा का आधार उसका जैविक “शुद्ध” होना नहीं, उसका मनुष्य होना है। लेकिन कहानी बार-बार उसी पितृसत्तात्मक भाषा में लौट आती है, जिससे लड़ने का दावा करती है। यह वैचारिक भ्रम कहानी की केंद्रीय कमजोरी है।
कहानी में बार-बार “पुरुष सत्ता”, “पुरुष मानसिकता”, “स्त्रियों की कंडीशनिंग” जैसे शब्द आते हैं, लेकिन उनका कोई गहरा विश्लेषण नहीं है। वे केवल घोषणात्मक वाक्य बनकर रह जाते हैं। यही कारण है कि कहानी विमर्श का भ्रम पैदा करती है, लेकिन वास्तविक वैचारिक जटिलता तक नहीं पहुँचती।
भाषा की दृष्टि से भी कहानी बेहद असावधान है। हिंदी, अंग्रेज़ी और भावुक भाषण शैली का मिश्रण कई जगह हास्यास्पद हो जाता है। जैसे—
“मैं उसे एक ‘सब्जेक्ट’ बना कर अधिकार जमा रहा था…”
“उसकी ‘पोज़ेसिवनेस’ मुझे चुभने लगी…”
“कॉर्पोरेट वर्ड में काम का एक हिस्सा…”
ये वाक्य कहानी की संवेदनात्मक लय तोड़ते हैं। ऐसा लगता है मानो कोई फेसबुक पोस्ट या टीवी डिबेट का ट्रांसक्रिप्ट पढ़ रहे हों। कथा-भाषा में जो सांद्रता, संकेत और कलात्मक संयम होना चाहिए, वह पूरी तरह अनुपस्थित है।
कहानी का एक और संकट उसका आत्ममुग्ध नैतिक स्वर है। नायिका लगातार अपने विचारों को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करती है। पाठक के लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा गया। साहित्य प्रश्न उठाता है, जटिलताएँ निर्मित करता है; जबकि यह कहानी हर जगह निष्कर्ष सुनाती चलती है।
बलात्कार जैसे गंभीर विषय को कहानी जिस तरह “मोटिवेशनल स्पीच” में बदल देती है, वह भी समस्या पैदा करता है। पीड़ा की गहराई, आंतरिक टूटन, सामाजिक चुप्पी, मनोवैज्ञानिक आघात — इन सबको कलात्मक सूक्ष्मता चाहिए थी। लेकिन यहाँ सब कुछ भाषणों और नारों में बदल जाता है। परिणामतः संवेदना पैदा होने के बजाय कृत्रिमता पैदा होती है।
कहानी का अंत भी अत्यंत फिल्मी है— हॉल में सन्नाटा, फिर तालियाँ, फिर युवा पीढ़ी तक “अंतर्नाद” पहुँच जाना। यह अंत किसी टीवी शो की स्क्रिप्ट जैसा लगता है, कहानी का स्वाभाविक निष्कर्ष नहीं।
दरअसल ‘अंतर्नाद’ की सबसे बड़ी विफलता यही है कि वह अपने समय की स्त्री को उसकी वास्तविक जटिलताओं में नहीं पकड़ पाती। वह या तो पीड़िता है या विजेता; बीच का मनुष्य कहीं गायब है। उसमें आत्मालोचन नहीं, केवल आरोप हैं; अनुभव की गहराई नहीं, विचारों की घोषणा है; कथा नहीं, भाषण है।
साहित्य में स्त्री-विमर्श का अर्थ केवल पुरुष-विरोध नहीं होता, न ही हर पुरुष को राक्षस और हर स्त्री को प्रतीक बना देना। अच्छी कहानियाँ मनुष्य की जटिलताओं को पकड़ती हैं। इस दृष्टि से देखें तो ‘अंतर्नाद’ अपने महत्त्वपूर्ण विषय के बावजूद एक कमजोर, अतिनाटकीय और शिल्पहीन कहानी बनकर रह जाती है।
सन्दीप तोमर
(कथाकार, आलोचक)

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