Thursday, 7 May 2026

कहानी और पुरस्कार


 कहानी और पुरस्कार
एक किस्सा कुछ यूँ---

एक ऑनलाइन और ऑफलाइन पत्रिका ने मिलकर कहानी प्रतियोगिता आयोजित की। नियम बड़े लोकतांत्रिक अंदाज़ में लिखे गए थे— “पुरस्कार का आधार पाठकों के लाइक और कॉमेंट्स होंगे।”
अब मैं सामान्यतः ऐसी प्रतियोगिताओं में कहानियाँ नहीं भेजता। साहित्य को मैं कभी वोटिंग एप का खेल नहीं मान पाया। लेकिन एक बहुत प्रिय महिला मित्र ने अपनी कहानी भेजते हुए आग्रह किया—
“तोमर जी, आप भी कहानी भेजिए न…”

दोस्ती के आग्रह में आदमी कई बार अपने सिद्धांतों को थोड़ी देर के लिए कोने में रख देता है। मैंने भी रख दिया। नियमावली पढ़ी, थोड़ा माथा पकड़ा, फिर सोचा— चलो, देख लेते हैं कि साहित्य का नया लोकतंत्र कैसा दिखता है।

मन में एक सवाल लगातार कुलबुला रहा था—
क्या सचमुच सामान्य पाठक कहानी की तकनीक, संरचना, शिल्प, कथ्य, चरित्र-विकास और भाषा की बारीकियों को उस स्तर पर परखते हैं कि केवल लाइक और कॉमेंट्स को ही पुरस्कार का आधार बना दिया जाए?
क्योंकि सोशल मीडिया पर तो लोग कई बार सिर्फ लेखक का चेहरा देखकर भी “वाह सर”, “गजब”, “लाजवाब” लिख आते हैं। कहानी पढ़ना तो दूर, शीर्षक तक पूरा नहीं पढ़ते।

खैर, कहानी अपलोड कर दी गयी।

धीरे-धीरे प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। मेरी कहानी पर सबसे अधिक लाइक आए, सबसे अधिक टिप्पणियाँ आईं। लोग कहानी शेयर कर रहे थे, बहस कर रहे थे, निजी संदेश भेज रहे थे। मैं यह नहीं कहता कि मेरी कहानी सर्वश्रेष्ठ थी, लेकिन प्रतियोगिता की घोषित शर्तों के हिसाब से वह स्पष्ट रूप से सबसे आगे थी।

फिर परिणाम आया।

और परिणाम देखकर मुझे पहली बार समझ आया कि साहित्यिक प्रतियोगिताओं में “नियमावली” केवल पाठकों को उत्साहित रखने के लिए होती है, आयोजकों को बाँधने के लिए नहीं।

जिस कहानी को पाठकों ने सबसे अधिक पसंद किया, उसे प्रथम नहीं बल्कि द्वितीय पुरस्कार दिया गया।
और जो कहानी प्रथम हुई, उसके बारे में लोगों ने उतनी चर्चा तक नहीं की थी।

मेरी मित्र की कहानी प्रतियोगिता से बाहर कर दी गयी।

अब यहाँ से कहानी ज्यादा दिलचस्प हो जाती है।

कुछ दिन बाद आयोजक महोदय मेरी उस मित्र को फोन करते हैं—
“आपकी कहानी वास्तव में दिल को छूने वाली थी… प्रतियोगिता में भले चयन न हो पाया हो, लेकिन मैं उसे अपनी प्रिंट पत्रिका में स्थान दे रहा हूँ… और पत्रिका की प्रति भी आपको भेजूँगा…”

यह सुनकर मुझे साहित्य कम, पुरानी हिंदी फिल्मों के संवाद ज्यादा याद आने लगे।

फिर प्रिंट पत्रिका आई।
उसमें न मेरी द्वितीय पुरस्कार प्राप्त कहानी थी, न प्रतियोगिता के घोषित परिणामों का कोई सम्मान।
लेकिन मेरी मित्र की कहानी बड़े आदर से प्रकाशित थी।

अब आप इसे संयोग कह सकते हैं।
मैं इसे साहित्यिक संस्कार नहीं कह पाता।

धीरे-धीरे समझ आने लगता है कि कुछ लोग पत्रिका नहीं निकालते, वे अपने अहंकार और आकर्षण का निजी दरबार चलाते हैं।
कई तथाकथित संपादकों के लिए साहित्य साधना नहीं, “इम्प्रेशन मैनेजमेंट” का माध्यम बन चुका है।
वे कहानी कम पढ़ते हैं, प्रोफाइल फोटो ज्यादा देखते हैं।
रचना से अधिक रचनाकार के जेंडर में रुचि रखते हैं।
और “प्रकाशन” को ऐसे पेश करते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा उपकार कर रहे हों।

सबसे मजेदार बात यह है कि ऐसे लोग खुद को साहित्य का प्रहरी भी घोषित किए रहते हैं।
फेसबुक पर लंबी पोस्ट लिखेंगे—
“हम साहित्य में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते…”
और इनबॉक्स में लिखेंगे—
“मैम, आपकी संवेदनशीलता ने मन छू लिया…”

अब ये “मन” कहाँ छूता है, यह साहित्य का विषय नहीं, मनोविज्ञान का विषय है।

आजकल कई ऑनलाइन प्रतियोगिताएँ वास्तव में साहित्यिक कम, डिजिटल दुकानदारी अधिक हो गयी हैं।
लाइक जुटवाओ, मित्रों से कॉमेंट कराओ, वेबसाइट की ट्रैफिक बढ़ाओ, पत्रिका का प्रचार करवाओ— और अंत में पुरस्कार उस व्यक्ति को दे दो जो आयोजकों की निजी पसंद हो।

कई बार तो निर्णायक बाद में खोजे जाते हैं और विजेता पहले तय होते हैं।
कुछ जगह पुरस्कार प्रतिभा को नहीं, परिचय को मिलता है।
कुछ जगह लेखन नहीं, लॉबिंग जीतती है।
और कुछ जगह “साहित्यिक संस्कार” का अर्थ होता है— आयोजक की पोस्ट पर नियमित “वाह वाह” करना।

दुखद यह नहीं है कि पुरस्कार पक्षपाती हो गया।
दुखद यह है कि इस प्रक्रिया में नए लेखक सबसे अधिक ठगे जाते हैं।
वे सचमुच विश्वास कर लेते हैं कि साहित्य एक निष्पक्ष दुनिया है।
वे रात-रात भर जागकर कहानी लिखते हैं, शब्दों में अपना जीवन उड़ेल देते हैं, और फिर देखते हैं कि परिणाम किसी और ही गणित से तय हो रहे हैं।

लेकिन समय बदल रहा है।

अब महिलाएँ भी समझने लगी हैं कि हर “आप बहुत अच्छा लिखती हैं” वास्तव में साहित्यिक प्रशंसा नहीं होती।
हर “मैं आपकी रचना पत्रिका में लेना चाहता हूँ” के पीछे संपादकीय ईमानदारी नहीं होती।
और हर साहित्यिक मंच वास्तव में साहित्य के लिए नहीं चलाया जाता।

इसलिए ऐसे आयोजकों और संपादकों से मेरा साफ संदेश है—

मेरे भाई,
प्रकाशन के नाम पर महिलाओं को प्रभावित करने का यह पुराना खेल अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला।
लेखिकाएँ अब आपकी कृपा पर निर्भर नहीं हैं।
सोशल मीडिया ने उन्हें अपनी आवाज़ खुद दे दी है।
वे अब समझती हैं कि कौन रचना पढ़ रहा है और कौन केवल अवसर तलाश रहा है।

साहित्य सेवा के नाम पर निजी आकर्षण की दुकानें बहुत दिन नहीं चलतीं।
क्योंकि अंततः शब्द बचते हैं, चालाकियाँ नहीं।

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