Wednesday, 10 January 2018

एक अपाहिज की डायरी (आत्मकथा)

एक अपाहिज की डायरी (आत्मकथा)


आत्मकथा का पहला पार्ट- "एक अपाहिज की डायरी” पाठकों के बीच रखने हुए गौरव का अनुभव हो रहा है। 122 पृष्ठ की इस गाथा में ‘संदीप तोमर’ यानि मेरे जीवन की वो कडुवी दास्तान है जिसे लिखने का साहस बहुत लोगों में नहीं होता।मैं भी ऐसा साहस नहीं रख पाता यदि मेरे पिताश्री “श्री हरिसिंह तोमर” ने मुझे भट्टी में तपाकर कुंदन न बनाया होता, आज मैं जहाँ हूँ, जो भी हूँ, उसका ९९% श्रेय उन्हीं को जाता है, बाकि सब तो सप्लिमेंट्री हैं। इस सम्पूर्ण गाथा को लिखते हुए मैंने बहुत ईमानदारी बरतने की कोशिश की है। “मोहनदास करमचंद गाँधी” तो मैं हूँ नहीं, जो “सत्य के मेरे प्रयोग” जैसी रचना हम लोगों को दे गए।जो सच को लिखने का एक प्रभावी दस्तावेज है और आत्मकथा लिखने वाले रचनाकारों के लिए प्रेरणा-ग्रन्थ।
कुछ लोगों को शीर्षक से आपत्ति हो सकती है। लेकिन वास्तव में शारीरिक विकलांगता के चलते जो कष्ट जीवन भर मिले उन्हें आज सोचता हूँ तो इससे उपयुक्त शीर्षक नही पाता हूँ।मेरे साहित्यिक मित्र और प्रेरणा स्वरुप अग्रज भाई “श्री अनिल शूर ‘आजाद’ ने मुझसे कहा- शीर्षक एक जाँबाज की डायरी रखिये, मैं जानता हूँ आप जाँबाज हैं, और इतना साहस है कि आप सच को मुखर होकर लिखते हैं।
मेरी सोशल नेटवर्किंग से बनी दोस्त ‘गीता कैथल का कहना था-“आपको सशक्त सबल स्पष्टवादी लेखक, विचारक के साथ एक बेहतरीन इंसान के रूप ही पाया है, जाने क्यों आज यकीन करने का मन नही कर रहा, पर जो भी है यह इस बात का प्रमाण है कि जो भी जाना, कम ही जाना, आप उससे कही ज्यादा आगे हैं। हमें इस पुस्तक का बेसब्री से इंतजार रहेगा।“ इसी के साथ उन्होंने हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित की।
पितातुल्य मार्गदर्शक “श्री सूरजमल रस्तोगी” जी का मत है-“श्री तोमर जी,निस्संदेह आप स्पष्टवादिता के लिए प्रसिद्ध हैं। जान मिल्टन ने एक कविता लिखी थी ‘ऑन हिज ब्लाइंडनेस’ जिसमे उन्होंने स्पष्ट किया था – ‘माना कि मेरी आँखों की रोशनी नहीं हैं लेकिन मुझे ईश्वर ने इसके बदले में एक और शक्ति दी है जिससे मैँ समाज की सेवा कर सकता हूँ और वह है काव्य सृजन’।आपको भी मैं उसी रूप में पाता हूँ, जो साहित्य के माध्यम से लोगो के प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।
हां, मैँ आस्तिक हूँ और उस एक शक्ति में विश्वास रखता हूँ। आप सच्चे हैं, यह सही है किंतु कहीं आंशिक रूप में ही क्यों न हो, एक नैराश्य आपके उपरोक्त कथन में अवश्य है।“
हो सकता है कि मेरे किन्हीं वक्तव्यों से उन्हें या किसी अन्य शुभचिंतक को नैराश्य का भाव लगे लेकिन इतना अवश्य कहूँगा कि
“दरिया होकर भी समुन्द्र में खो यूँ जाना मंजूर न था
हम वो हैं जो अपने रास्ते खुद तलाश किया करते हैं। 
-----संदीप तोमर

क्रमशः 


Tuesday, 2 June 2015

प्रभु लीला

प्रभु  लीला 

भक्त ने कहा----कुबेर का खजाना पहले सेवक ने ख़त्म किया हुआ था..अब खजाना खाली तो सेवक क्या करे..खजाना ऋणात्मक था.. फिर सेवक ने एकसाल में खजाना भरा..हमने पूछा--कही डैकेती डाले क्या...बोले नहीं--- वो तो पुष्पक विमान के इंधन से आया.. हमने पूछा -वो कैसे तो भक्त ने बताया-- भैया सेवक ने इंधन का दामकमनहीं किया. जनता देती रही खजाना भरता रहा.... हमने कहा -भक्त भाईआपनेहमारे चक्षु खोल दिए..और दो चार चीजो का दाम बढ़ा दीजिये ताकि... फिर ठहरे जड़बुद्धि फिर एक सवाल पूछ बैठे-- ये तो बताइए कि समस्त लोग की यात्रा का व्यय प्रभु कहाँ से लाते है...? तो भक्त नजरे हमें भस्म करने की मुद्रा में थी बोले-- ये जो कोष भरा है उसी से खर्च होता है.. हमने पूछा और आज कल नारद मुनि नहीं दीखते.. बोले अब परभू ही सारे विभाग देखते हैं.. पहले सब लोगो में भ्रस्ताचार था.. अब सब ठीक है...हमें फिर सवाल किया..-और उर्वशी कहाँहै? सुना है कि बड़ी कटीली नचनियां थी.. स्वर्ग में उसे बड़े अदब से देखा जाता था..भक्त हौले से मुस्काए..बोले--- हम आज कल प्रभु ने अपने सभासदो में प्रमुख स्थान दिया है...सम्पूर्ण लोको में अब ज्ञान का विस्तार होगा.. आपके भी...

Wednesday, 13 May 2015

कुछ नहीं बदला- संदीप तोमर

......
सुदीप के साथ काम करने वाली सजातीय कमला ने उसे नेहा से मिलवाया ...... नेहा के परिवास में ६ लाद्द्किया थी और पिता निहायत ही गरीब..... सुदीप को लगा कि मेरे लिए मिशाल कायम करने और अपने मनमुताबिक शादी करने का इससे अच्छा रिश्ता नहीं मिल सकता...... उसने नेहा के पिता को शादी के लिए हाँ कर दी.... और अपनी मंशा से उन्हें अवगत करा दिया...... नेहा के पिता ने जब सुना कि बटेऊ बिना बारात और बिना दहेज़ के शादी करना चाहते हैं तो उन्हें लगा कि बिन मांगे मन्नत पूरी हो गयी......
सुदीप के घर वालों ने अनमने मन से उसका विवाह कर दिया ...... सुदीप ने वैवाहिक जीवन में भी अपनी पढाई को जरी रखा और वो अधिक अच्छे ओहदे के लिए प्रयास करता रहा..... उसकी पत्नी नेहा उसे पढने को मना करती और पूर्णरूप से घर परिवार ने रच बस जाने का दबाव डालती...... साथ ही रोज़ डिस्को ,,,रेस्तरो जाने की जिद्द करती...... सुदीप के मन में जैसे एक फ़ांस सी गड गयी......अब छोटी छोटी बातों पर विवाद होने लगे......उस इदं तो हद ही हो गयी..... सुदीप की तबियत खराब थी..... और नेहा ने खाना नहीं बनाया था..... सुदीप के कहने पर जबाब मिला आपकी तो रोज़ ही तबियत ख़राब रहती है...... मैं क्या सारा दिन चूल्हे में खटने के लिए हूँ.... ढाबे से खाना माँगा लो...मेरा आज खाना बनाने का बिलकुल मन नहीं है...... विवाद बढ़ गया तो नेहा ने अपना बैग सम्भाला और मायके चली गयी.....
हफ्ते बाद भी नेहा नहीं आई...... आया तो कोर्ट का नोटिस..... सुदीप ने नोटिस पढ़ा जिसमे उसके ऊपर दहेज़ उत्पीडन के चार्जेस लगे थे.... उसे याद आने लगा कि कैसे उसकी सादगीपूर्ण शादी को मिडिया में भी कवरेज मिला था...... आँखे आसुंओ से तर बतर थी और पिता का चेहरा आंसू की बूंदों में तैर रहा था.......

स्टेला का पत्र

प्रिय सुदीप   


नमस्कार ...
आपका आभार किन शब्दों में अदा करूँ....समझ नहीं आ रहा ..... ये भी समझ नहीं आ रहा कि कहा से शुरू करू......
कितना गलत सोचती थी मैं आपके बारे में.... आपका साथ काम करना ....काम करने का ढंग ,,,, आपका बातों का तरीका .... सबको देखती तो आपमें एक एटटयूड देखती थी..... .हर बार लगता ये क्या इंसान है किस गरूर में जीता है....... उस दिन जब आप पकोड़े बनाकर लाये तो देखा कि आपके अन्दर एक कुक भी है....फिर आपके बारे में आपके पुराने साथियों से जानना शुरू किया...... आपकी अच्छाईयाँ पता करने लगी तो खुद पर शर्मिंदा होती..... एक दूरी रही आपके और मेरे दरमयान ..... ना आप कभी बात करते ना मैंने करने की कोशिश की..... और हम नजदीक ही नहीं आ पाए..... उस दिन जब आप बैठे कॉफ़ी पी रहे थे तब आपने मुझे भी काफी ऑफर दिया.... कॉफ़ी की गर्मी से ज्यादा गर्माहट आपके साथ बात करने में थी.....
मैंने आपको कहा कि आप पुराने ख्यालात के हैं तो आपको बुरा नहीं लगा आप आक्रोशित नहीं हुए..... मुझे घोर आश्चर्य हुआ ...कैसे एक इंसान रियेक्ट नहीं करता..... मि. अखिल के छींटाकशी करने पर भी देखा आप रियेक्ट नहीं करते..... आपकी इस अदा ने मुझे आपका कायल बना दिया......
मैं अपनी निजी समस्या से उलझी हुई थी.... मुझे आपमें आशा की किरण दिखाई दी.... जब मैंने आपको दकियानूसी कहा तो आपने बड़ी सहजता से कहा था कि मैं राशि से जैमिनी हूँ..... और जैमिनी बड़े ही रोमांटिक होते है...मैंने उत्सुकता में कहा था कि हमें भी सुनाइए अपने रोमांटिसिज्म के किस्से तो आपने आपने अपने सात साल चले प्रेम प्रसंग को बिना झिझक के शेयर किया ..... तब मैंने आपसे अपने प्रेमी और उसके साथ विवाह की अड़चन का किस्सा शेयर किया , आपने बड़ी तल्लीनता से मुझे सुना.... और आपने जो मदद की उसकी बदोलत आज मैं मोहित की अर्धांगिनी हूँ... आप न होते तो जाति की दीवारे लांघने की हिम्मत ना मुझमें थी न ही मोहित में......
कभी कभी मन करता है आपके चरण की पूजा करूँ.....
आपका वो वाक्य मैं कभी नहीं भूल सकती..... आपने कहा था..... कि मेरा प्रेम सफल नहीं हुआ ...मैं चाहता हूँ जो भी प्रेम करें उसका प्रेम परिणति तक पहुंचे......
सुदीप जी आप महान हैं......जहाँ कही प्रेमी युगल को देखती हूँ आपकी याद आ जाती है...... वही कॉफ़ी का कप और आपसे साथ बातों की गर्माहट..... और मैं इस गर्माहट को ख़त्म नहीं करना चाहती......
आप ऐसे ही बने रहिये फिर कोई वंदना आपको देखने समझने में वक्त लगाये और फिर आप किसी की जिन्दगी में मशीहा बन जाएँ.....
आपकी सखी.....
स्टेला 
चंचल मना हो तुम देवी 
आज मैं कह सकता हूँ
दुर्दिन में जो छोड़ो साथ
कैसे सह सकता हूँ
बिन तुम सखी कैसे 
रह सकता हूँ जीवन सपाट
हो सके तो खोल लेना
बंद पड़े कुटिल कपाट
हिंसा का आदी नही हूँ
जो दूँ जीवन कष्ट तुम्हे
हो जो गति कल्पनातीत
और कांप उठें तमाम रूहें
कष्टों को सहने की कला
आदत में है मेरी सुमार
दुःख हरने में पारंगता
समझ ले है ये सुकुमार
वल्लिका बढे सुखमय
जीवन की, यही चाह रखता हूँ
ओ कष्टों की देवी , मैं
कठोर दंड भी सह सकता हूँ.

पत्र अपने प्रेमी के नाम

पत्र अपने प्रेमी के नाम....


सुदीप !

कैसे हो? मुझे पता है आप ठीक नहीं होंगे ..ठीक हो भी कैसे सकते हो... कमजोर इंसान.. प्यार ने तुम्हे कुछ ज्यादा ही कमजोर बना दिया...मैं नहीं चाहती थी कभी तुम्हारी कमजोरी बनू... इसलिए कोशिश करती हूँ कि तुमसे कम मिलूं... तुमने मुझे कुछ सवालों की फेहरिस्त दी थी... तुमने इतने सवाल किये ..एक सवाल मेरा भी है... क्या तुम्हारा प्यार आकर्षण से परे है?क्या तुम मुझे मेरी सुन्दरता से इतर प्रेम करते हो?तुम मुझे हमेशा झूठी कहते हो... तुम्हे मैं झोठी क्यों लगती हूँ....क्या मैं सच में इतनी बुरी हूँ? क्या मैं ट्रस्ट वर्थी नहीं लगती ? तुम मुझे एक इंसान के नाते कहाँ पाते हो?
सुदीप कहना नहीं चाहती थी लेकिन तुम्हे धोखे में भी नहीं रखना चाहती.... अब वो दिन पास आता जा रहा है जब हम दोनों के बीच कोई तीसरा आने वाला होगा..मुझे नहीं मालूम आगे क्या होगा? मैं तुम्हारी भावनाओं के साथ सरवाईव करने की कोशिश करुँगी.....कोई वजह नहीं कि हम ऐसे इंसान के साथ अपनी जिन्दगी जी रहे होंगे जिसे हम जानते तक नहीं.... तुमने अपनी लिखी कहानियां मुझे नहीं देनी चाहिए थी.... पह्ले पेज ने ही मुझे रुला दिया.... अगर आपने मुझे परखने के लिए ऐसा किया है तो मैं तुम्हे कभी माफ़ नहीं करुँगी...देखों तुम एक अच्छे इंसान हो.... मैं चाहकर भी तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकती... तुम एक दिन बड़े लेखक बनोगे.....तब मैं देखूंगी कि इस वन्दे की हाईट इतनी ऊँची है कि देखने के लिए गर्दन को ऊँचा करना पड़े....तब शायद मुझे भी दुःख हो पछतावा हो कि मैंने इसे छोड़कर गलती तो नहीं की....मैं सिर्फ इतना कह सकती हूँ कि होने वाले साथी में तुम्हारे सवालों के उत्तर खोजूंगी .... आपको मेरी बाते शायद बहकी बहकी लगें.... लेकिन देखते हैं कि किश्मत में क्या लिखा है? समय की धारा का रुख देखते हैं.... मुझे तुम पर ट्रस्ट है लेकिन अपनी किश्मत पर नहीं.... किश्मत क्या करेगी ये ही तो देखना है ... लेकिन हाँ सुदीप तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे.... जिससे मैं खुद को कभी माफ़ ना कर पाऊँ....
पता चला था कि तुम्हारी तबियत ख़राब है अब कैसे हो? तुम्हारी तबियत ख़राब होती है तो मेरा सिर दर्द हो जाता है और तुम्हारा भी.... जल्दी ठीक हो जाओ... फिर खूब बाते करेंगे और घूमेंगे .... तुमसे बहुत सी बाते करनी हैं.... तुम्हारा स्नेह मुझे बहुत कुछ करने की प्रेरणा देता है... मुझे जीने की प्रेरणा देता है.... तुम्हारे पास मन की सुन्दरता है ...मैं तुम्हे क्या समझती हूँ ये शब्दों में नहीं कहा जा सकता.... इसे बस भावनाओं से महसूस किया जा सकता है.... और ये तुम भी जानते हो....तुम कहते हो जिन्दगी की आखिरी साँस तक इंतजार किया जा सकता है... मुझे मालूम है जो सोचोगे,, कर दोगे...
सुदीप तुम्हे वैसे तो वेट करना अच्छा नहीं लगता फिर जिन्दगी भर कैसे कर पाओगे... हमें एक दुसरे को भूलना ही होगा....
चलो एक काम करते हैं... भूलने की ट्राई करते हैं.... फिर देखते है... और हाँ फ्यूचर् का ज्यादा मत सोचो....
शेष फिर कभी....
आपकी
परम
दुष्यंत कुमार की जमीन से एक रचना....
लग रहा है बेफिक्र वो बेहद सावधान है
छोटा सा कमरा नहीं वो तो पूरा मकान है
लोग तो चलते हैं रेग रेंग कर सड़क पर
चेहरे पर है झुर्री वो अभी पूरा जवान है
एक अदद मकान की ख्वाहिश ही नहीं
उसकी झोली में तो पूरा ही आसमान है
वो जी रहा है सुखी ख्वाहिशों की खातिर
उसकी मुट्ठी में सारा इश्क-ओ-जहान है
समेटने को हर चाहत इश्क की गलियों से
वाह जी वाह ये भी कोई अहसान है
देखने है और कितने दौर कोई इल्म नहीं
आखिरी मंजिल तो सबकी शमसान है
उसमे मुझे एक खास आदमियत नजर आई
लोग कहते है कि वो पक्का बदजुबान है

फेक आईडी नहीं, फेक इरादे

  फेक आईडी नहीं , फेक इरादे सन्दीप तोमर  किसी कार्यक्रम में एक महिला से मुलाकात हुई। औपचारिक-सी बातचीत हुई। जाते-जाते उन्होंने मुझसे कांटे...