एकता व्यास की कहानी ‘स्लीपिंग पार्टनर’
यह कहानी अपने शीर्षक के कारण प्रथम दृष्टया पाठक को एक ऐसे भ्रम में डालती है, मानो यह किसी यौन सम्बन्ध अथवा देहात्मक निकटता की कथा हो। किंतु कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह स्पष्ट होता जाता है कि लेखिका का सरोकार शरीर से अधिक उस गहरे अकेलेपन से है, जो आधुनिक जीवन-शैली और बदलते पारिवारिक ढाँचों ने बुज़ुर्गों के हिस्से में छोड़ दिया है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी सफलता भी है कि वह एक भ्रामक शीर्षक के भीतर अत्यंत मार्मिक मानवीय संवेदना को छिपाकर रखती है।
कहानी की पृष्ठभूमि एक ऐसी सीनियर सिटीजन सोसाइटी है, जहाँ जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचे लोग रह रहे हैं। उनके जीवन-साथी अब इस दुनिया में नहीं हैं और बच्चे अपने-अपने करियर, विदेशों या महानगरों में व्यस्त हैं। मध्यवर्ग और उच्च-मध्यवर्ग—दोनों ही वर्गों के बुज़ुर्ग यहाँ लगभग एक जैसी मानसिक त्रासदी से गुजरते दिखाई देते हैं। आर्थिक सुविधाएँ मौजूद हैं, लेकिन भावनात्मक रिक्तता लगातार फैलती जाती है। लेखिका ने इस विडम्बना को बहुत सहज ढंग से उभारा है कि आधुनिकता ने बुज़ुर्गों को सुविधाएँ तो दी हैं, पर साथ छीन लिया है।
कहानी का पुरुष पात्र निरव शाह अपनी दिवंगत पत्नी भारती की स्मृतियों में जीता हुआ व्यक्ति है। वह हर बात में भारती को याद करता है—खाने के स्वाद से लेकर घर की सज्जा और व्यवहार तक। दूसरी ओर मिनाली भी अपने अकेलेपन और अनिद्रा से जूझ रही स्त्री है। वह निरव की ओर आकर्षित अवश्य होती है, किंतु यह आकर्षण देह से अधिक साझे अकेलेपन का आकर्षण है। यहाँ लेखिका ने अत्यंत सूक्ष्मता से यह रेखांकित किया है कि वृद्धावस्था में मनुष्य को प्रेम से पहले उपस्थिति की आवश्यकता होती है—किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसकी साँसों और खर्राटों की आवाज़ यह भरोसा दे सके कि वह अकेला नहीं है।
मिनाली द्वारा निरव को अपने घर सोने का निमंत्रण कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे अधिक विवादास्पद लग सकने वाला प्रसंग है। कुछ आलोचक इसे लिव-इन रिलेशनशिप या दैहिक निकटता की कथा के रूप में पढ़ सकते हैं, किंतु कहानी का भाव-संकेत उससे बिल्कुल अलग है। मिनाली को नींद नहीं आती; वह अपने जीवनसाथी के साथ सोने की अभ्यस्त रही है। इसलिए उसका निमंत्रण ‘हमबिस्तर’ होने का नहीं, बल्कि ‘साथ सोने’ का निमंत्रण है। कहानी का यह बिंदु अत्यंत मानवीय और संवेदनशील है, जिसे लेखिका ने बिना अनावश्यक उत्तेजना के प्रस्तुत किया है।
एकता व्यास की विशेषता यह है कि वे बदलते सामाजिक यथार्थ से कहानी के नए विषय चुनती हैं। भूमंडलीकरण, भौतिकवाद और उदारवादी जीवन-शैली ने परिवारों की पारंपरिक संरचना को बदल दिया है। संयुक्त परिवार टूटे हैं, रिश्तों की निकटता कम हुई है और बुज़ुर्ग भावनात्मक निर्वासन का जीवन जीने को विवश हुए हैं। ‘स्लीपिंग पार्टनर’ इसी बदलते समाज की कहानी है। यह उन लोगों की कथा है जिन्हें पैसे, सुविधा और स्वतंत्रता तो मिली, पर रात की नींद छिन गई।
कहानी की भाषा में कई जगह आत्मीयता और घरेलू सहजता दिखाई देती है। गुजराती मिश्रित संवाद पात्रों को स्थानीयता और विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। साथ ही, कहानी में स्मृति और वर्तमान के बीच जो आवाजाही है, वह कथा को भावुक हुए बिना मार्मिक बनाती है।
हालाँकि कहानी अभी और कसावट की माँग करती है। कुछ प्रसंग अपेक्षाकृत लंबे हो गए हैं, जिनसे कथा का प्रवाह थोड़ा ढीला पड़ता है। प्रूफ और भाषा-संशोधन की भी पर्याप्त गुंजाइश है। यदि लेखिका कथा-संरचना को थोड़ा और सघन करें तथा अनावश्यक विस्तार को नियंत्रित करें, तो यह कहानी समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में बुज़ुर्ग अकेलेपन पर लिखी गई एक उल्लेखनीय और प्रभावशाली कहानी बन सकती है।
कुल मिलाकर ‘स्लीपिंग पार्टनर’ उस भावनात्मक भूख की कहानी है, जिसे आधुनिक समाज अक्सर समझ नहीं पाता। यह कहानी बताती है कि जीवन के अंतिम वर्षों में मनुष्य को प्रेम से भी अधिक किसी की उपस्थिति, किसी की आवाज़ और किसी के साथ की आवश्यकता होती है। यही इसकी सबसे बड़ी मानवीय उपलब्धि है।
सन्दीप तोमर
(समीक्षक, आलोचक)

“स्लीपिंग पार्टनर” कहानी पर इस न्यायोचित समीक्षा के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
ReplyDeleteलेखक होने के नाते ये हमरा कर्तव्य बनता है की हम या तो आज के वक्त को लिखे या समाज को आने वाले वक्त का आईना दिखायें… यह कहानी आज से शुरू होकर आने वाले समय तक पहुँचने वाली कड़वी सच्चाई है।
आपके सभी सुझावों को ध्यान में रखते हुए कहानी पर दोबारा काम करने के प्रयास करूँगी।
आपको शुभकामनायें
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