my thoughts: रिश्तों के बोझ से कब दबती है जिन्दगी
मुठ्ठी के र...: रिश्तों के बोझ से कब दबती है जिन्दगी मुठ्ठी के रेत सी निकलती है जिन्दगी ख्वाबों की आरज़ू में भटका हूँ दर- बदर किस ख्वाहिश में यूँ ...
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विभाजन से पारिवारिक विघटन तक की जीवनगाथा
बिगाड़ के डर से... (मलिक राजकुमार के उपन्यास 'स्टेशन मास्टर' का आलोचनात्मक मूल्यांकन) भारतीय उपन्यास साहित्य में देश-विभाजन एक ऐसा...
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बिगाड़ के डर से… विकलांग विमर्श इतना भी आसान नहीं है... मेरे एक शिक्षक साथी ने एक किताब सुझाई और कहा— “सर , आपको यह महत्वपूर्ण किताब अ...
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बिगाड़ के डर से--- एकता व्यास की कहानी ‘स्लीपिंग पार्टनर’ यह कहानी अपने शीर्षक के कारण प्रथम दृष्टया पाठक को एक ऐसे भ्रम में डालती है, मान...
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जब मुझसे कोई पूछता है — “ आप कहानी कैसे लिखते हैं ?” तो मैं अकसर मुस्कुरा देता हूँ। क्योंकि कहानी लिखना मेरे लिए कि...
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